राष्ट्रपति की सादगी कुछ और आगे तक बढऩी चाहिए ताकि..

संपादकीय
23 मई 2018


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पिछले कई मौकों पर अपनी सज्जनता दिखाई है जिससे देश के बाकी नेताओं को, और नौकरशाहों को, और शायद जजों को भी कुछ नसीहत लेने की जरूरत है। अभी उनके शिमला प्रवास के दौरान स्थानीय प्रशासन ने स्कूलों की आधे दिन की छुट्टी कर दी थी, और सड़कों पर गाडिय़ों को रोक दिया था। उन्होंने उसी दिन हुए एक समारोह में मंच से ही इस बात के लिए अफसोस जाहिर किया, और हिमाचल की जनता से माफी मांगी। वे अपनी तरफ से तो शिमला के बाजार में पैदल चलते हुए दुकानों पर गए, और परिवार सहित वहां के एक रेस्त्रां में बैठकर चाय-काफी भी पी। जो खरीददारी की, उसका भुगतान भी खुद ही किया। देश के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद ऐसी सादगी कुछ तो कम ही बच जाती है, और फिर कुछ आसपास के मुसाहिब अफसर सादगी रहने भी नहीं देते। नतीजा यह होता है कि राष्ट्रपति तो दूर, छोटे-छोटे से नेता भी अपनी ताकत की शान दिखाते हुए जनता को कुचलते हुए चलते हैं। और चूंकि तकरीबन तमाम राजनीतिक दलों में नेताओं का मिजाज ऐसा ही रहता है, इसलिए जनता यह बात भूल सी गई है कि नेताओं का सादगी या सज्जनता से कोई लेना-देना होता है। आम जनता तो चीखते सायरनों वाले सत्ता के काफिलों के लिए छिटककर किनारे होकर रास्ता देने के इतने आदी हो गए हैं कि अब उन्हें शायद इसका बुरा भी नहीं लगता। 
हम राष्ट्रपति की कुछ और बातों की वजह से भी यह लिख रहे हैं। अभी दो दिन हुए जब उन्होंने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मानद उपाधि लेने से मना कर दिया। जबकि हालत यह है कि दीक्षांत समारोह में शामिल होने वाले तमाम किस्म के नेता उन्हें मिलने वाली मानद उपाधियों को तुरंत मंजूर कर लेते हैं। यह एक अच्छा सिलसिला है कि राष्ट्रपति ने मानद उपाधि के इस पाखंड को खत्म करने की कोशिश की है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने इसी जगह एक से अधिक बार पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की एक पहल को लिखा था कि उन्होंने अपने नाम के साथ महामहिम शब्द का इस्तेमाल बंद करवा दिया था। लोकतंत्र में ऐसे सामंती पाखंड की कोई जगह होनी भी नहीं चाहिए। उनके देखादेखी बाद में देश भर में राज्यपालों को भी उनके फैसले के मुताबिक अपने राजभवनों को महामहिम शब्दावली से मुक्त करना पड़ा था। 
राष्ट्रपति का जैसा रूख दिख रहा है, उन्हें खुद ही पहल करके एक ऐसी बैठक बुलानी चाहिए जिसमें सरकार, अदालत, और संसद से जुड़े हुए सभी निर्णायक तबके मौजूद रहें, और जिस बैठक में यह चर्चा हो सके कि सत्ता के कौन-कौन से सामंती प्रतीक खत्म किए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह लोकतंत्र में समानता की सोच के खिलाफ एक गैरबराबरी खड़ी करने वाली बात है। दूसरी बात यह भी है कि ऐसे सारे प्रतीक आम जनता के कंधों पर ही ढोए जाते हैं, और इनका खर्च जनता ही उठाती है। आज देश भर में न कोई अपने बंगले छोडऩा चाहते, न कोई शान-शौकत की जिंदगी छोडऩा चाहते, और यह सब जनता के खजाने को लुटाकर किया जाता है। इसलिए राष्ट्रपति को यह चाहिए कि वे सार्वजनिक जीवन में सादगी के लिए कोशिश करें, और खुद अपने इंतजाम में कटौती करते चलें, अपने खुद के निजी खर्च को सरकार पर न आने दें। रामनाथ कोविंद एक दलित और गरीब परिवार से आए हुए हैं, और वे भारत के गरीबों की हकीकत औरों के मुकाबले शायद कुछ अधिक समझते होंगे। इसलिए उनको ऐसे तमाम राजकीय और शासकीय इंतजाम खत्म करने का माहौल बनाना चाहिए जो कि जनता के पैसों पर ही किए जाते हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मई

डीजल-पेट्रोल पर टैक्स-ड्यूटी का ढांचा एकदम ही नाजायज

संपादकीय
22 मई 2018


भारत के ताजा इतिहास में पेट्रोल और डीजल में इस तरह की आग पहले कभी लगी हो यह याद नहीं पड़ता है। और दूसरी बात यह है कि मोदी सरकार आने के बाद से अब तक लगातार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल पिछली मनमोहन सरकार के दस बरसों के मुकाबले खासा सस्ता मिलते आया है। इसके बावजूद सरकार ने पेट्रोल, डीजल, और रसोई गैस पर लगातार तरह-तरह की ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाकर उसके दाम आसमान पर रखे। अंतरराष्ट्रीय बाजार के सस्ते रेट का फायदा भारत के ग्राहकों को मिलना तो दूर रहा, भारत के लोगों पर टैक्स इतना बढ़ाया गया कि अब उनका सब्र जवाब दे रहा है। केन्द्र सरकार के टैक्स, ड्यूटी, सेस के अलावा राज्य सरकार के टैक्स भी उसके ऊपर जुड़ जाते हैं, और पेट्रोलियम पर यह नकली महंगाई खड़ी करके केन्द्र और राज्य दोनों भरपूर कमाई कर रहे हैं। कल ही पेट्रोलियम मंत्री का यह बयान सामने आया है कि डीजल-पेट्रोल पर टैक्स कम नहीं किया जाएगा क्योंकि यह रकम ग्रामीण विकास के लिए खर्च की जा रही है। 
वैसे तो किसी देश की सरकार टैक्स देने की क्षमता वाले एक तबके से वसूली करके उसे दूसरे जरूरतमंद तबके पर खर्च करती है, और केन्द्र सरकार के बजट का एक मकसद यह भी रहता है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि आज डीजल-पेट्रोल की खपत बड़ी-बड़ी निजी गाडिय़ों तक सीमित नहीं है, इनकी महंगाई से सारा सार्वजनिक परिवहन भी महंगा हो रहा है, कारोबारी गाडिय़ां महंगी हो रही हैं, और शहरी मध्यम-निम्न वर्ग भी आज अपनी निजी दुपहिया पर चलते हैं, और उन पर भी इस अभूतपूर्व और अस्वाभाविक महंगाई की मार पड़ रही है। सरकार इस अंदाज में पेट्रोलियम पर ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाते और बढ़ाते जा रही है कि मानो उनकी खपत महज उच्च आय वर्ग में है। आज गांव के किसान, गांव के कारीगर, और गांव से शहर काम करने आने वाले लोग भी निजी या कारोबारी गाडिय़ों का इस्तेमाल करते हैं, और हर किस्म का सफर महंगा हो गया है। सामानों की आवाजाही महंगी हो गई है, और खेतों के डीजल पंप, ट्रैक्टर, खेती की और मशीनें, सब कुछ का इस्तेमाल महंगा हो गया है। 
केन्द्र सरकार को लोगों के सब्र का और इम्तिहान नहीं लेना चाहिए। शहरी फैशनेबुल लोगों से लेकर कारीगरों और मजदूरों तक, सबको डीजल-पेट्रोल की जरूरत पड़ती है। केन्द्र सरकार एक बार भी इस बारे में कोई सफाई नहीं दे पाई है कि सत्ता में आने के बाद पूरे चार बरस से वह सस्ती अंतरराष्ट्रीय खरीदी करके सबसे महंगी घरेलू बिक्री क्यों कर रही है। यह सिलसिला बेइंसाफी का है। आज जब हम यह लिख रहे हैं, तो उसी वक्त देश के कारोबारी तबकों से भी यह मांग उठ रही है कि पेट्रोलियम पर से वैट और एक्साईज ड्यूटी को कम किया जाए। सरकार की इस अंधाधुंध महंगाई से देश में पेट्रोलियम की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण खत्म होने की बात भी फर्जी साबित होती है। कहने के लिए पेट्रोलियम कंपनियां अपना दाम तय कर रही हैं, लेकिन उसके बाद केन्द्र सरकार उस पर टैक्स-ड्यूटी बढ़ाने का अपना काम बढ़ाते चल रही है, और इसका खुले बाजार से कुछ भी लेना-देना नहीं है। 
देश के गांवों के लिए अगर बजट की जरूरत है, तो सरकार को किसी सक्षम और संपन्न तबके से वसूली-उगाही करनी चाहिए। डीजल-पेट्रोल की छोटी गाडिय़ों को, और मुसाफिर गाडिय़ों को इस बढ़ोत्तरी से अलग रखना चाहिए। अगर सरकार सिर्फ बड़ी गाडिय़ों वाले लोगों से डीजल-पेट्रोल पर अधिक टैक्स लेना चाहती है, तो वह पेट्रोल पंपों पर नहीं लिया जा सकता। उसके लिए ऐसी गाडिय़ों की बिक्री के वक्त ही उन पर एक सालाना टैक्स इतना लगाया जा सकता है कि जिससे उनकी ईंधन की औसत खपत पर टैक्स वसूली हो जाए। आज पन्द्रह बरस का टैक्स सभी गाडिय़ों पर लिया जाता है, सरकार बड़ी और आलीशान गाडिय़ों, महंगे दुपहियों पर इस टैक्स को बढ़ा सकती है ताकि उनको पेट्रोल-डीजल एक किस्म से महंगा पड़े। चूंकि देश में पेट्रोल-डीजल के दो किस्म के रेट केवल चोरी बढ़ाएंगे, इसलिए ऐसी वसूली गाड़ी लेते वक्त ही हो सकती है। लेकिन आज छोटी गाडिय़ों वाले लोगों को और डीजल-पेट्रोल के छोटे ग्राहकों को जो भारी टैक्स देना पड़ रहा है, वह बिल्कुल ही नाजायज है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई

ऐसे हिंसक और बेधड़क देश का भगवान मालिक

संपादकीय
21 मई 2018


गुजरात में साल दो साल पहले उना नाम की जगह पर दलितों को बुरी तरह से पीटने का वीडियो सामने आया था, और दुनिया का दिल दहल गया था कि सार्वजनिक जगह पर, सड़क पर दलितों को किस तरह से मारा जा रहा था। अभी एक दूसरा वीडियो सामने आया है जो गुजरात के राजकोट में एक कारखाने के अहाते में कचरा बीनने गए पति-पत्नी को पीटने का है। फैक्ट्री के लोगों ने मार-मारकर इस दलित नौजवान की जान ले ली, और इसमें फैक्ट्री के कर्मचारी भी शामिल थे, और मालिक भी। जिस तरह उसे बांधकर कोड़े की छड़ से उसको पीटा गया, वह देखते ही नहीं बनता। यह नौजवान मारा गया और उसकी बीवी बुरी तरह से जख्मी है। 
यह हालत देश के बहुत से राज्यों में दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गरीबों, और महिलाओं-बच्चों की है। ये तमाम वे तबके हैं जिनकी हिफाजत के लिए देश में अलग से कानून बना हुआ है। और ऐसे कानून के चलते हुए भी जब दलित-आदिवासी रात-दिन कहीं न कहीं हत्या-बलात्कार के शिकार होते हैं, किसी दलित दूल्हे के घोड़ी पर चढऩे पर दंगा होने लगता है, जहां पर कल ही मध्यप्रदेश में गोहत्या की आशंका में एक मुस्लिम को पीट-पीटकर मार डाला गया, और दूसरा बुरी तरह जख्मी है, वहां पर यह सोचना पड़ता है कि यह देश जा किधर रहा है? यह नौबत बहुत ही खराब है, और यह सुधरते दिख नहीं रही है। 
देश में कानून की किसी को परवाह नहीं रह गई है, और कानून लागू करने वाली एजेंसियां, मुजरिमों को पकडऩे वाली एजेंसियां, इन सब पर भारी राजनीतिक दबाव दिखता है, और सत्ता को जो नापसंद हैं, उन पर तो कार्रवाई दिखती है, लेकिन बाकी लोगों पर अधिक से अधिक वक्त तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। एक दूसरी दिक्कत यह है कि पुलिस और बाकी जांच एजेंसियां जब लगातार राजनीतिक दबावतले काम करती हैं, तो वे भ्रष्ट भी होने लगती हैं। पुलिस को लगता है कि जब भेदभाव ही करना है, चुनिंदा मुजरिमों के साथ रियायत ही करनी है, तो ऐसी रियायत करते हुए वे खुद भी अपने फायदे के लिए कुछ और लोगों से रियायत क्यों न कर लें? ऐसी सोच धीरे-धीरे काम करने की क्षमता को घटाते चलती है, और लोगों का भरोसा कानून के राज पर से उठने लगता है। 
कई बार एक लतीफा बाजार में आता है कि एक जज से खुश होकर एक बुजुर्ग उसे दुआ देता है कि बेटा अगले जनम में दारोगा बनना। जज हैरान होकर बताता है कि वह तो आज भी दारोगा से बहुत बड़ा है, और फिर ऐसी दुआ क्यों दी जा रही है? तो वह बुजुर्ग कहता है कि आपने इस फैसले में दस बरस लगा दिए, दारोगा तो कहता था कि लाख रूपए ले आओ, दस दिन में मामला निपटा देगा। जब ऐसे किस्से लोगों की असल तकलीफों का असल बखान हो, तो फिर यह सोचना पड़ता है कि इस बिगड़ी हुई व्यवस्था को आखिर कौन सुधारेंगे, और क्या यह सचमुच ही कभी सुधर भी पाएगी? आज जब सार्वजनिक जगहों पर लोग मार-मारकर, पीट-पीटकर दूसरों की जान ले लेते हैं, और उनको यह अहसास भी रहता है कि हो सकता है कि कोई इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे हों। इसके बावजूद लोगों को कत्ल करने में हिचक नहीं होती अगर जान किसी दलित-आदिवासी की हो, या किसी गरीब की हो। आज जब हम इस बात को लिख रहे हैं उसी वक्त दिल्ली की एक खबर है कि झारखंड से वहां घरेलू कामकाज के लिए ले जाई गई एक नाबालिग लड़की ने जब तनख्वाह मांगी, तो मालिक ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब यह हाल जिस देश की राजधानी का हो, उस देश का फिर भगवान ही मालिक है। (Daily Chhattisgarh)

आस्तिक को तमाम किस्म की सहूलियतें

21 मई 2018

उत्तरप्रदेश में एक बलात्कार और फिर उसकी शिकार के पिता की पुलिस हिरासत में पिटाई, जेल में मौत के मामले में जब राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की, और पूरे देश के मीडिया में योगी सरकार की धिक्कार होने लगी, तब मामला सीबीआई को गया जिसने शायद दो दिनों के भीतर ही भाजपा के विधायक को बलात्कार के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया। इसके पहले से यह महिला अपने पिता और परिवार सहित लगातार इस विधायक पर, उसके भाई पर कार्रवाई की मांग कर रही थी। उन्नाव रेप केस नाम से कुख्यात हो गया यह हादसा ताकतवर सत्तारूढ़ लोगों की गुंडागर्दी का एक अव्वल दर्जे का नमूना था, और अगर पूरे देश में इसे लेकर हल्ला नहीं होता तो शायद यह गुंडागर्दी जारी भी रहती।
अभी दो दिन पहले इस विधायक की सीबीआई हिरासत की जो तस्वीर सामने आई है, वह बड़ी दिलचस्प है। उसके हाथ में पूजा की मौली बंधी हुई है, और ऊंगलियों में कम से कम तीन पर अंगूठियां चढ़ी हुई हैं। जाहिर है कि आदमी धर्मालु था, और कुछ ही समय पहले उसने पूजा-पाठ में हिस्सा भी लिया होगा जहां उसकी कलाई पर यह मौली बांधी गई होगी। जब हाथों में इतनी अंगूठियां हैं, तो जाहिर है कि विधायक का रत्नों पर और ग्रहों के प्रभाव पर भी भरोसा रहा होगा। इसके पहले की उसकी तस्वीरें भी पूजा के तिलक वाली छपती रही है जो कि उसे आस्थावान बताती हैं।
लेकिन उसकी आस्था ने, उसके धर्म ने, ग्रह-नक्षत्रों वाले रत्नों ने, और पूजा के धागे ने उसे बलात्कार से नहीं रोका, और बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लड़की के पिता को मौत तक पहुंचाने से नहीं रोका। विधायक के साथ-साथ उसका भाई भी इसमें शामिल था, इसलिए यह भी जाहिर है कि परिवार के और लोगों ने भी उसे नहीं रोका। कुल मिलाकर नतीजा यह है कि धर्म, आध्यात्म, समाज या परिवार, ग्रह-नक्षत्रों वाले पत्थर किसी काम के नहीं रहते, और जब जुर्म करना रहता है, तो ये सब मिलकर भी जुर्म को नहीं रोक पाते।
हकीकत तो यह है कि इस किस्म की तमाम अवैज्ञानिक बातें लोगों को जुर्म करने का एक हौसला देती हैं। मुजरिमों को लगता है कि वे पूजा-पाठ से, गंगा में नहाकर, गौदान करके, या अलग-अलग पत्थरों और धातुओं की अंगूठियां पहनकर अपने पापों से मुक्ति पा लेंगे। और ऐसा दिलासा या भरोसा बहुत बड़ी ताकत होता है। और यह सब महज हिन्दू धर्म के साथ हो, ऐसा भी नहीं है। ईसाईयों की चर्चों में प्रायश्चित करने को एक कमरा होता है जहां बैठकर अपनी शिनाख्त उजागर किए बिना बगल के चेम्बर में बैठे पादरी को अपने पाप गिनाकर लोग अपनी छाती पर से बोझ हटा लेते हैं, और धर्म यह कहता है कि ऐसे प्रायश्चित के बाद ईश्वर पापी को माफ कर देता है। मतलब यह कि गंगा या मंदिर की तरह चर्च का यह चेम्बर एक लॉंड्री की वॉशिंग मशीन है जिसमें आत्मा को डालकर सारे दाग-धब्बे निकालकर फिर आगे पाप करने का रास्ता खुल जाता है।
मुम्बई के तस्करों ने हाजी मस्तान से लेकर और कितने ही थे जो कि हाजी थे। हज करके आ चुके थे, और चूंकि हज के पहले की स्लेट साफ हो चुकी थी, इसलिए आगे वे फिर अपनी पुरानी इबारत उस पर लिखना जारी कर चुके थे। आज अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक, और यमन से लेकर निगर तक जाने कितने ही ऐसे देश हैं जहां पर ईश्वर के नाम पर इस्लामी आतंकी रोजाना सैकड़ों कत्ल कर रहे हैं, बलात्कार कर रहे हैं, और महिलाओं को गुलाम बनाकर सेक्स-बाजार में नीलाम कर रहे हैं।
लोगों को इंदिरा गांधी के वक्त का स्वर्ण मंदिर याद होगा जब वहां भीतर भिंडरावाले के आतंकी दस्ते खूंखार और जानलेवा हथियारों के जखीरे के साथ बसे हुए थे, और वहां से निकलकर बाहर जाकर दर्जनों कत्ल करके वापिस स्वर्ण मंदिर के भीतर डेरा डाल देते थे। लेकिन बेकसूरों के कत्ल के खिलाफ, स्वर्ण मंदिर के ऐसे बेजा इस्तेमाल के खिलाफ न उस वक्त के धर्म ने कुछ कहा था, और न आज का धर्म उसमें कोई खोट याद करता है।
उधर इजराईल और फिलीस्तीनी सरहद को देखें, तो दुनिया में सबसे अधिक धार्मिक नस्लों में से एक, इजराईल की यहूदी सरकार और फौज निहत्थे और बेकसूर फिलीस्तीनियों को थोक में मार रही हैं, और उनका धर्म कुछ नहीं कह रहा।
ईसाईयों के सबसे बड़े धर्मकेन्द्र, वेटिकन के तहत आने वाले अनगिनत चर्चों में पादरियों पर बच्चों से बलात्कार के मामले सही साबित होने के बावजूद वेटिकन के मुखिया पोप ने हमेशा ही अपने ऐसे पादरियों को बचाने में जान लगा दी, और उन्हें जेल नहीं जाने दिया।
उधर हिन्दुस्तान में देखें तो आसाराम से लेकर राम-रहीम तक, धर्म और आध्यात्म का चोला ओढ़े हुए लोगों में से किसी को धर्म ने बलात्कार से नहीं रोका, और दूसरे किस्म के जुर्मों से नहीं रोका।
आज एक सर्वे करने की जरूरत है कि जेलों में बंद सजायाफ्ता मुजरिमों में से नास्तिक कितने हैं, और आस्तिक कितने? मेरा ख्याल है कि आस्तिकों को जुर्म करने के पहले सौ बार सोचना होता है क्योंकि उसके जुर्म की ढाल बनकर ईश्वर आकर खड़े होंगे, और न ही ईश्वर के एजेंट। किसी प्रायश्चित से पापमुक्ति का उसे कोई भरोसा नहीं होगा, और उसे अपनी बाकी जिंदगी अपने जुर्मों का बोझ अपने सीने पर लेकर ही सोना होगा। इसलिए नास्तिक के मुजरिम होने का खतरा कम रहता है, लेकिन आस्तिक को तमाम किस्म की सहूलियतें रहती हैं। लोग अपने ईश्वर और अपने धर्मगुरू से यह सवाल जरूर करें कि वे मिलकर भी किसी को जुर्म से रोक क्यों नहीं पाते? (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मई

बेंगलुरू की विधानसभा से निकला हुआ संदेश

संपादकीय
20 मई 2018


कर्नाटक विधानसभा में कल बहुमत साबित करने के पहले ही भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने इस्तीफे की घोषणा कर दी, और इधर राष्ट्रगान बजते रहा, उधर वे अपने विधायकों के साथ राजभवन रवाना हो गए ताकि उस राज्यपाल को इस्तीफा दे सकें जिसने नाजायज तरीके से उन्हें न्यौता देकर शपथ दिलाई थी। यह इस्तीफा कई किस्म का था। यह भाजपा की तैयारी का इस्तीफा भी था, और सबसे बड़ा इस्तीफा तो यह राज्यपाल का अपनी जिम्मेदारियों से था। जिस राज्यपाल को असीमित अधिकार दिए गए हैं कि वह किसे सरकार बनाने न्यौता दे, उस राज्यपाल ने उसका असीमित बेजा इस्तेमाल करके एक ऐसी सरकार बनवाई जो बिना दल-बदल या खरीद-फरोख्त के बहुमत साबित नहीं कर सकती थी। इसलिए सामाजिक जीवन की मर्यादा यह मांगती है कि ऐसा राज्यपाल बिना देर किए इस्तीफा दे। 
कहने के लिए राज्यपाल और भाजपा के सामने कई किस्म की मिसालें जुट जाएंगी कि जब केन्द्र पर कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार था तब बहुत से राज्यपालों ने बहुत से राज्यों में कैसा-कैसा बर्ताव किया था, और तब किसने इस्तीफा दिया था। वैसी तमाम बातें इतिहास की किताबों में अच्छी तरह दर्ज होंगी, लेकिन हमारे सरीखे रोजाना के अखबारनवीसों की नसीहत या मांग उस दिन की जरूरत पर रहती है जिस दिन वह अखबार छपना है। इसलिए इतिहास को देखने की एक सीमा रहती है, और वर्तमान की यह मांग रहती है कि भविष्य को और अधिक तबाह होने से बचाया जाए। इसलिए भाजपा एक पार्टी के रूप में चाहे जैसा बर्ताव करे, जिस राज्यपाल को संविधान की रक्षा की शपथ दिलाई गई थी, और जिसका दर्जा निर्वाचित राज्य सरकार से ऊपर रहता है, उसे अपने ऐसे बेईमान बर्ताव के बाद तुरंत कुर्सी छोड़ देना चाहिए। और यह पैमाना बाकी राज्यपालों पर भी, बाकी मामलों में भी लागू होना चाहिए। लोगों को याद होगा कि बीच-बीच में कुछ लोग राज्यपाल के ओहदे को ही बेईमानी के खतरों से भरा हुआ, और निहायत गैरजरूरी बताते आए हैं। हम खुद इस अखबार मे इसी जगह पर बरसों से यह लिखते आए हैं कि ऐसी सामंती व्यवस्था खत्म होनी चाहिए जो कि एक निर्वाचित सरकार और मुख्यमंत्री के ऊपर एक अनैतिक नियंत्रण के लिए अंग्रेजी राज की बनाई हुई दिखती है। भारत में राज्यपालों की व्यवस्था में लोकतंत्र के साथ बेईमानी ही अधिक की है, न कि कोई संवैधानिक योगदान दिया है। 
जहां तक कल की भाजपा की शिकस्त का सवाल है तो वह कर्नाटक से अधिक है, और कर्नाटक से दूर-दूर तक है। कल का नुकसान बेंगलुरू शहर तक सीमित नहीं रहने वाला है, यह देश भर में भाजपा के खिलाफ गैरएनडीए पार्टियों की एक नई एकजुटता की संभावना की शुरुआत हो सकता है। जब बिल्ली किसी घर में घुसकर दूध पी जाती है, तो वह नुकसान महज दूध का नहीं होता, बड़ा और असल नुकसान यह होता है कि बिल्ली ने घर देख लिया, और दूध का बर्तन पहचान लिया। इसी तरह आज गैरएनडीए पार्टियों ने एक नई संभावना की शिनाख्त कर ली है जो कि देश के दर्जन भर राज्यों में जगह-जगह आगे बढ़ सकती है जहां पर कि कांग्रेस या दूसरी पार्टियां चुनाव के पहले या चुनाव के बाद एक गठबंधन या तालमेल बना सकती हैं, और भाजपा-एनडीए के सामने एक सचमुच की चुनौती बन सकती हैं। जैसा कि कर्नाटक को लेकर कुछ लोगों का यह मानना है कि भाजपा के भीतर कुछ लोग ऐसे भी थे जो सरकार बनाने का ऐसा दुस्साहसी दावा करने के खिलाफ थे, और चाहते थे कि कांग्रेस-जेडीएस मिलकर सरकार बनाएं, एक-दूसरे को गिराएं, और तब भाजपा के लिए एक बेहतर मौका सामने आएगा। लेकिन वैसा हुआ नहीं, और सुप्रीम कोर्ट की दखल के अंदाज के बिना भाजपा ने एक पखवाड़े के वक्त को जुगाड़ के लिए काफी मान लिया। अपनी मर्जी का राज्यपाल होने का भी यह नुकसान हुआ कि अपनी ताकत और संभावना तौलने की जरूरत सूझी ही नहीं। अब देश में जगह-जगह कांग्रेस हो सकता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एक बेहतर तालमेल को अच्छा समझे, और अपनी सीमित रह गई औकात की हकीकत जानकर, मानकर, छोटी-छोटी भागीदारियों को इज्जत का मुद्दा न बनाकर जिंदा रहना सीखे। कर्नाटक से भारत की क्षेत्रीय पार्टियों को भी कांग्रेस के साथ मिलकर बात करने की एक संभावना दिखेगी, और यही बेंगलुरू की विधानसभा से निकला हुआ संदेश है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 20 मई

भारत में लोकतंत्र को फिर साख दिलाई जा सकती है?

संपादकीय
19 मई 2018


कर्नाटक में इस वक्त विधानसभा में जो नाटक चल रहा है, उसे देखकर देश भर के लोगों के मन में भारतीय संसदीय राजनीति के लिए हिकारत बढ़ती जा रही है। यह पहला मौका नहीं है कि लोगों के मन में राजनीति के लिए नफरत हुई हो, इसके पहले भी कई ऐसे मौके आए, कई ऐसी पार्टियां आईं जिन्होंने खरीद-बिक्री का काम किया। कई बार पार्टियों ने खरीद-बिक्री नहीं की, तो सांसदों ने खुद ही अपने स्तर पर संसद में सवाल पूछने के लिए अपनी आत्मा को बेचने का काम किया, कैमरे पर कैद हुए, और संसद की सदस्यता गई, जेल शायद बाकी है। ऐसे में जब पिछले दो-चार दिनों से यह चर्चा चल रही है कि किस तरह कर्नाटक में एक-एक विधायक की खरीदी के लिए सौ-सौ करोड़ रूपए की बोली लग रही है, तो लोगों को लग रहा है कि क्या ऐसे चुनावों में वोट देने जाने का कोई मतलब है जिसमें बेईमान ही चुने जाएं, और वे अपने से बड़े बेईमान के हाथ बिककर पांच बरस तक राज्य को लूटने का ठेका दे दें? 
ऐसे मौके पर जब देश की अदालत को देखें, तो लगता है कि वह महज तकनीकी आधार पर छोटे-छोटे आदेश कर रही है, और अपनी छवि बचाने में कामयाब हो रही है। लेकिन जो बड़ी बेइंसाफी, बड़ी बेईमानी सामने दिख रही है, उस पर या तो सुप्रीम कोर्ट का कोई काबू नहीं है, या फिर सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी से कतरा रही है, और राजनीतिक भ्रष्टाचार की परंपरा में दखल देने से बच रही है। इन दोनों में से चाहे जो बात हो, देश की आम जनता बहुत ही निराश है कि जब संसदीय संस्थाएं इस किस्म की मंडी बन गई दिख रही हैं, जब अदालतें बेबस हैं, जब सरकार का कोई रोल ऐसी नौबत में रह नहीं गया है, जब मीडिया भरोसेमंद नहीं रह गया है, तो अकेली जनता ही भला किस भरोसे पर, और भला किस उम्मीद में वोट देने जाती रहे? 
हमने छत्तीसगढ़ की पहली सरकार के वक्त भाजपा के दर्जन भर विधायकों को मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जेब में जाते देखा था। उसके बाद जब राज्य के पहले चुनाव हुए, तो बहुमत से आई भाजपा से सरकार बनाने का मौका लूटने की कोशिश करते फिर जोगी को देखा था, और छत्तीसगढ़ के लोगों को अच्छी तरह याद है कि इस तमाम खरीद-बिक्री की रिकॉर्डिंग किस तरह नोटोंभरे बैग के साथ अरूण जेटली ने रायपुर में प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई थी। वह शायद भारतीय राजनीति का पहला मौका था जब कोई मुख्यमंत्री अपनी ही कांग्रेस पार्टी से निलंबित किया गया था। इसलिए आज जब भाजपा पर खरीद-बिक्री की तोहमत लगती है, तो छत्तीसगढ़ में इस तोहमत को दोहराते हुए राहुल गांधी या कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि अपने संपन्न दिनों में कांग्रेस ने ऐसी बहुत सी खरीदी की हुई है। अब आज शायद विधायक-सांसद महंगे इतने अधिक हो गए हैं, और कांग्रेस इतनी कंगाल हो गई है कि वह थोक में खरीद-बिक्री कर नहीं पा रही है। 
भारतीय संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता इतनी बुरी तरह बर्बाद होने का एक नुकसान यह हुआ है कि लोग चुनाव के वक्त अपने वोट बेचने में कुछ भी बुरा नहीं मानते क्योंकि उनको मालूम है कि उनके वोट पाकर जो सांसद या विधायक बनेंगे वो बाद में हो सकता है कि अपनी आत्मा ऊंचे दाम पर बेचने को मंडी में एक पैर पर खड़े रहें। इसका दूसरा नुकसान यह है कि देश में नेता और राजनीति सबके भ्रष्ट हो जाने की तस्वीर ऐसी बन गई है कि लोग अब सरकार को कोई भी टैक्स देना नहीं चाहते कि चोरों के हाथ क्यों कुछ दिया जाए। यह नौबत लोकतंत्र में आस्था की कमी का एक ऐसा बड़ा खतरा है जो कि जल्द दूर नहीं होने वाला है। अगर देश में कोई ईमानदार नेता, ईमानदार पार्टी आ भी जाए, तो भी उसकी ईमानदारी की साख बनते कई बरस लगेंगे। जनता दूध की जली हुई है, और वह छांछ भी फूंक-फूंककर पिएगी। 
अब से कुछ घंटों में कर्नाटक का फैसला आ जाएगा। अभी उसके बारे में हम कोई अटकल लगाना नहीं चाहते लेकिन इस चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गज और प्रामाणिक भ्रष्ट लोगों का जैसा बोलबाला देखने मिला है, उससे ही देश में लोकतंत्र की साख कमजोर हुई है। अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को एक खुली सुनवाई करके इस बारे में विचार करना चाहिए कि क्या देश में लोकतंत्र को एक बार फिर साख दिलवाई जा सकती है? (Daily Chhattisgarh)