अब अदालत या ईश्वर से ही कोई उम्मीद है...

संपादकीय
21 नवम्बर 2017


दिल्ली शहर के बीच सबसे व्यस्त इलाके में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके बनाई गई बजरंगबली की 108 फीट ऊंची प्रतिमा के बारे में हाईकोर्ट ने पूछा है कि क्या इसे हवाई रास्ते से वहां से हटाया जा सकता है? इस प्रतिमा के चारों ओर अवैध निर्माण और अवैध कब्जों को हटाने के लिए अदालत एक मुकदमे की सुनवाई कर रही है, और उसी के चलते यह सवाल पूछा गया। अभी दस बरस पहले ही तेरह बरस के निर्माण के बाद यह प्रतिमा पूरी हुई थी, और दिल्ली मेट्रो के बगल में बनाई गई यह प्रतिमा आते-जाते दिखती है।
न सिर्फ यह प्रतिमा, बल्कि देश भर में दसियों लाख ऐसे धर्मस्थल हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट का बरसों पहले का एक आदेश लागू होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह साफ किया है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर कोई भी अवैध धर्मस्थल बनाया जाए तो जिला प्रशासन उसे कड़ाई से हटाए। और उसके पहले के ऐसे धार्मिक अवैध निर्माणों को हटाने की योजना बनाई जाए। यह बात जाहिर है कि देश में अवैध धार्मिक निर्माण सड़कों को बर्बाद करते हैं, लोगों की जिंदगी तबाह करते हैं, और उनका शोरगुल रिहायशी इलाकों, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल जैसी जगहों में जीना हराम करता है। फिर एक धर्म के देखा-देखी दूसरी धर्म के लोग अपनी आस्था के अवैध निर्माण करते हैं, और एक गिरोह के मुकाबले दूसरा गिरोह हरकत में आ जाता है। धार्मिक अवैध कब्जे और अवैध निर्माण इसलिए भी अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि उनको हटाने पर धर्मांध-कट्टरपंथी लोग हिंसा पर आमादा हो जाते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बड़े साफ आदेश के बावजूद किसी भी राज्य में सरकारें उस पर अमल नहीं करती हैं क्योंकि वोटरों के एक पूरे तबके को नाराज करने का हौसला किसी में नहीं है। और तो और जिस पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का राज लंबे समय तक रहा, वहां भी धार्मिक अवैध निर्माण हटाने की कोई कार्रवाई न उस वक्त हुई, और न ही अब ममता बैनर्जी की सरकार कर पाई है।
देश में जिस तरह का धार्मिक और साम्प्रदायिक माहौल बनाया और बढ़ाया जा रहा है, उसमें अदालत की आवाज खत्म हो गई है। अदालतों ने शोरगुल के खिलाफ, सड़कों पर जुलूसों के खिलाफ, सड़कों पर धार्मिक पंडालों के खिलाफ समय-समय पर कई आदेश दिए हैं। लेकिन वे सब धरे रह जा रहे हैं, और सरकारें कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें अनदेखा करने के रास्ते तलाशती रहती हैं। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को और सख्ती करनी होगी क्योंकि जजों को चुनाव नहीं लडऩा होता, और वे ही कड़ी कार्रवाई कर सकते हैं। देश का बहुत सा समय, बहुत सी ताकत धार्मिक कब्जों को हटाने में बर्बाद हो रही है, और यह सिलसिला कहीं न कहीं जाकर थमना चाहिए। एक बार धार्मिक अवैध निर्माण हो जाए, तो फिर उसे हटाना जनता की जेब पर बहुत भारी भी पड़ता है। अब आज अगर दिल्ली हाईकोर्ट यह जानना चाह रहा है कि क्या 108 फीट के बजरंगबली हवाई रास्ते से हटाए जा सकते हैं, तो वह अगर मुमकिन भी हो, तो भी वह होगा तो जनता के ही खर्च पर। एक दूसरा रास्ता यह भी हो सकता है कि अगर ईश्वर में ताकत हो तो उसके नाम पर अवैध कब्जा और अवैध निर्माण करने वाले लोगों को वही नष्ट या भस्म कर दे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 November

ऐसे देश को बचाने के लिए एक भगवान बहुत जरूरी

संपादकीय
20 नवम्बर 2017


एक फिल्म पद्मावती में एक राजपूत रानी की कहानी को लेकर राजस्थान के राजपूत संगठनों से लेकर बाकी देश के राजपूतों तक में बड़ी नाराजगी है। आज सुबह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री निवास पर राजपूत नेताओं की एक सभा हुई, और उसमें शिवराज ने यह घोषणा की कि मध्यप्रदेश में इस फिल्म को इजाजत नहीं दी जाएगी। एक-एक फिल्म की कहानी पर अब एक-एक जाति या धर्म के लोग इस बड़े पैमाने पर उबलने लगे हैं कि फिल्म निर्माता-निर्देशक का सिर काटकर लाने पर करोड़ों के ईनाम रखे जा रहे हैं। भाजपा के हरियाणा के प्रवक्ता ने कल शायद दस करोड़ के ईनाम का ऐलान किया है, और पार्टी को आज उसे एक कारण बताओ नोटिस देना पड़ा है। लेकिन जैसा कि किसी भी क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है, इस फिल्म के विरोध की एक प्रतिक्रिया सामने आ रही है, जो लोग इस बात को भूल चले थे कि राजस्थान में महिलाओं के साथ कितना भेदभाव है, वे अब याद कर रहे हैं कि सैकड़ों बरस पहले की एक रानी के गौरव के लिए जो लोग मरने-मारने पर उतारू हैं, वे आज अपने प्रदेश की जिंदा लड़कियों और महिलाओं के साथ कैसा सुलूक कर रहे हैं। यह याद करते हुए आलोचक जातियों की बात भी कर रहे हैं कि कौन सी जाति ने तब क्या किया था जब नीची समझी जाने वाली किसी जाति की महिला के साथ बलात्कार किया गया था। लोगों को ऐसे में डकैत रह चुकी फूलन की याद भी आ रही है कि किस तरह के बर्ताव उसके साथ किया गया था, कैसा सामूहिक बलात्कार हुआ था, और फिर किस तरह उसके जवाब में उसने बलात्कारियों की जाति की महिलाओं के साथ वैसा ही जुल्म करवाया था।
आज भारत में एक तरफ तो इसरो के अंतरिक्षयान चांद पर जाकर लौट रहे हैं, और मंगल पहुंच रहे हैं। दूसरी तरफ इतिहास के तथ्यों के खिलाफ जाकर, एक काल्पनिक और मनपसंद इतिहास गढऩे वाले लोग आए दिन कभी किसी फिल्म के खिलाफ, कभी किसी किताब के खिलाफ, तो कभी किसी नाटक, और यहां तक कि इतिहास के शोध केन्द्रों के खिलाफ भी हिंसा कर रहे हैं। आज देश में हालत यह हो गई है कि जिस जाति या विचारधारा के लोगों की बड़ी संख्या है, उनकी किसी कल्पना या मान्यता के खिलाफ हकीकत की कोई बात कहना भी खतरे से खाली नहीं है। देश को एक बौद्धिक बेईमानी की तरफ धकेला जा रहा है, और पौराणिक कथाओं को इतिहास की तरह दर्ज करने की जिद को चुनाव में देख लेने तक ले जाया जा रहा है। वोट न देने की धमकी से परे यह धमकी भी दी जा रही है कि सिर काटकर लाएं तो नोट दिए जाएंगे, और ऐसी खुली धमकी टीवी चैनलों पर प्रसारित होने के बाद भी ऐसे फतवे देने वाले तालिबानियों के खिलाफ किसी राज्य या केन्द्र की सरकार कोई जुर्म दर्ज नहीं कर रही हैं। लोगों को सरकारों की ऐसी चुप्पी को देखते हुए यह भी याद पड़ता है कि कई बरस पहले एक मुस्लिम लेखक सलमान रूश्दी के एक उपन्यास को लेकर मुस्लिमों ने उसके सिर पर एक बड़ी रकम का फतवा जारी किया था, और आज जो फतवा जारी हो रहा है, क्या यह उसी किस्म का, वैसा ही नहीं है?
वह समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता जिसमें कल्पनाओं के लिए भी जगह नहीं है, और अपने इतिहास को, अपनी ऐतिहासिक हकीकत को बर्दाश्त करने की ताकत नहीं है। वह समाज भी आगे नहीं बढ़ सकता जो इतिहास में इस हद तक उलझ जाता है कि जिसे न वर्तमान की फिक्र रहती, और न भविष्य की। जिसे यह दिखता है कि भविष्य तो वही मायने रखेगा जो कि अपने पसंदीदा और काल्पनिक इतिहास की बुनियाद पर बना हुआ होगा, तो ऐसा भविष्य किसी काम का नहीं रहता है। जिन लोगों को आज किसी जाति या किसी चरित्र के गौरव की सूझ रही है, और इतनी सूझ रही है कि वे मरने-मारने पर उतारू हैं, तो इतिहास से ही जानकारियां लेकर लोग अब यह भी गिनाने लगे हैं कि इतिहास में किसने क्या किया था, और कौन-कौन सी बातें बहुत गौरवशाली नहीं भी थीं।
आज भारत या तो कुछ दूसरी जरूरी चर्चाओं से बचने के लिए बेवजह के ये बवंडर खड़े कर रहा है, या कि लोगों के पास अपने वर्तमान और भविष्य की कोई फिक्र नहीं है, और वे केवल इतिहास निर्माण में लगे रहने को सब कुछ मान रहे हैं। इन दोनों में से कोई बात हो, या कि कोई तीसरी-चौथी बात हो, यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, और यह इस देश को बाकी दुनिया की नजरों में एक पाखंडी, कट्टरपंथी समाज साबित कर रहा है। यह देश वैज्ञानिकता को खो रहा है, और बड़ी तेजी से यह धर्मान्ध और अंधविश्वासी बनते जा रहा है। ऐसे देश को बचाने के लिए एक भगवान बहुत जरूरी है। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 20 November

दीवारों पर लिक्खा है, 20 November

अंतरराष्ट्रीय रेटिंग इस देश की जनता की हकीकत नहीं

संपादकीय
19 नवम्बर 2017


हर कुछ महीनों में देश या विदेश की किसी रेटिंग एजेंसी या आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक जैसी किसी संस्था द्वारा दुनिया के अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्था पर अपना आंकलन जारी किया जाता है। जिन देशों की सरकारों को ऐसे सर्वे सुहाते हैं, वे इन्हें अपने लिए एक प्रमाणपत्र मानकर खुशी मनाती हैं, या फिर जब उन्हें ये नतीजे नहीं सुहाते, तो सर्वे के पैमानों को गलत बताकर नतीजों को खारिज कर देते हैं। लेकिन इन दोनों ही मामलों में अधिकतर सर्वे देश की अर्थव्यवस्था को ऐसे पैमानों पर पेश करते हैं कि वे देश के अधिक कमाई वाले कारोबारियों के सर्वे होकर रह जाते हैं। और फिर जब इन्हें पूरे देश की पूरी जनता पर लागू करना हो तो प्रति व्यक्ति आय जैसे आंकड़े और दिखा दिए जाते हैं, जो कि एक बहुत ही झूठी तस्वीर सामने रखते हैं। जैसे छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एनएमडीसी की कमाई के आंकड़ों की वजह से उस जिले के सबसे गरीब आदिवासियों की औसत आय आसमान छूती बताई गई थी।
दरअसल भारत और इंडिया इन दो शब्दों के अलग-अलग मायने लंबे समय से बताए जाते रहे हैं, और आर्थिक सर्वे के मामले में यह बात और अधिक बढ़-चढ़कर दिखती है। देश के एक फीसदी से भी कम के कारोबारियों की बेहतरी को देश की पूरी जनता की बेहतरी बता देने एक भयानक झूठ है। पश्चिम के एक बड़े नेता ने एक वक्त कहा था कि झूठ तीन किस्म के होते हैं, झूठ, सफेद झूठ, और आंकड़े। ये आंकड़े जैसे चाहे वैसे तोड़-मरोड़कर मनचाहे निष्कर्ष सामने रखे जा सकते हैं, और इससे ऐसा लग सकता है कि पूरा देश बड़ा खुशहाल हो गया है। देश की सबसे गरीब जनता केन्द्र सरकार के कुछ सर्वे में तो जगह पा भी लेती है, लेकिन दुनिया के अधिकतर आर्थिक-कारोबारी सर्वे आम लोगों से अछूते रहते हैं, वे पूंजीनिवेश, आयात-निर्यात, सकल राष्ट्रीय उत्पाद जैसे आंकड़ों पर आधारित रहते हैं जिनमें अगर गरीब भूखे भी मर रहे हैं, तो भी वह देश इन पैमानों पर खुशहाल नजर आ सकता है।
भारत जैसे मिलीजुली अर्थव्यवस्था वाले देश में पैमानों को फिर से तय करने की जरूरत है ताकि ऊपर की एक फीसदी जनता का हिसाब अलग हो, उसके नीचे के लोग दो-तीन तबकों में बांटकर अलग-अलग नजरिए से देखे जाएं। अडानी-अंबानी और देश के गरीबी की रेखा के नीचे के लोग किसी भी तरह से एक कागज पर एक साथ रखना फर्जीवाड़े से कम कुछ नहीं है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के सर्वे के मुकाबले भारत सरकार के सर्वे भारत की गरीब जनता का अंदाज लगाने के लिए बेहतर होते हैं। हमने छत्तीसगढ़ की मानव विकास रिपोर्ट देखी हुई है जो कि छत्तीसगढ़ की जनता की एक अधिक सही तस्वीर पेश करती है।
इस देश की एक बड़ी दिक्कत यह भी हो गई है कि जो मीडिया अंतरराष्ट्रीय रेटिंग की व्याख्या करके देश के सामने एक विश्लेषण रखता है, वह मीडिया खुद कारोबारी दुनिया के इश्तहारों पर टिका रहता है, और उसी से उसकी रोजी-रोटी चलती है। इसलिए उसका उस सबसे गरीब आधी आबादी से कोई लेना-देना नहीं रहता जो कि विज्ञापनदाता की प्राथमिकता नहीं रहती। इस पूरी चर्चा का बड़ा साधारण सा मकसद यह है कि न तो भारत को किसी विदेशी रिपोर्ट को लेकर खुशियां मनाने में जुट जाना चाहिए, और न ही गम गलत करना शुरू कर देना चाहिए। भारत की सामाजिक और आर्थिक हकीकत इसी जमीन से तय होनी चाहिए, और वह हो सकता है कि देश के सबसे ऊपर के एक फीसदी से भी कम के लोगों की सीमित हकीकत न बताए, लेकिन वह देश की एक व्यापक तस्वीर अधिक ईमानदारी से जरूर बताएगी। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 19 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 19 नवंबर

दिल्ली के प्रदूषण को दूर से देखने के बजाय यहां भी जागना जरूरी

संपादकीय
18 नवम्बर 2017


कभी दिल्ली शहर में प्रदूषण के चलते छा जाने वाले कोहरे-धुएं, स्मॉग, की खबरें आती हैं, तो अदालत से लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक और केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक सभी हड़बड़ाते हैं, और कुछ न कुछ करने की कोशिश करते दिखने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। लेकिन दूसरी तरफ भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग की आक्रामक मार्केटिंग के चलते हुए सभी तरह की गाडिय़ां सड़कों पर लगातार बढ़ते चल रही हैं। जहां तक हमारी नजर जाती है, हम देख रहे हैं कि जरूरत से कई गुना अधिक गाडिय़ां सड़कों पर आ गई हैं, और उनके मालिक उन्हें सड़कों पर ही खड़ा करके रख देते हैं। इन गाडिय़ों के लिए पार्किंग की कोई निजी जगह नहीं होती, और इन्हें फुटपाथों पर, सड़क के किनारे, घर-दफ्तर के बाहर रखा जाता है।
आज देश में एक ऐसी नीति की जरूरत है कि किसी भी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन उसी हालत में किया जाए जबकि उसे रखने के लिए निजी जगह का इंतजाम हो। आज सार्वजनिक जगहों पर, हाईवे की पूरी की पूरी सर्विस लेन पर, और शहरों के बीच की हर खुली जगह पर कारोबारी गाडिय़ों की पार्किंग दिखती है, और ये गाडिय़ां लगातार बढ़ती चल रही हैं। भारत की उदार अर्थव्यवस्था में निजी गाडिय़ों की खरीदी पर शायद सरकार कोई रोक न लगा सके, लेकिन हर कारोबारी गाड़ी का इस्तेमाल तय रहता है। वह मुसाफिर ढोती है, या कि सामान ढोती है, या फिर वह क्रेन-बुलडोजर किस्म की कोई मशीन होती है। हर कारोबारी गाड़ी के लिए पार्किंग की जगह को तुरंत अनिवार्य करना चाहिए, तभी पुरानी गाडिय़ां घटेंगीं, और नई गाडिय़ों के लिए लोग पार्किंग की जगह का इंतजाम करेंगे। आज तो हालत यह है कि बड़े-बड़े शहरों के व्यस्त इलाकों में भी गाडिय़ों के कंकाल बरसों तक सड़क किनारे खड़े रहते हैं, उन्हें कोई जब्त भी नहीं करते।
प्रदूषण घटाने के लिए कारखानों और निर्माण सामग्री पर कड़ाई से रोक लगानी  जरूरी है, इसके साथ-साथ लोगों के चलने के लिए सार्वजनिक बसों का, मेट्रो या दूसरे साधनों का इंतजाम होना चाहिए। भारत के शहर अपनी बड़ी आबादी और चुक चुके ढांचे के चलते और आबादी की और गाडिय़ां नहीं झेल सकते। ऐसे में रात-दिन ट्रैफिक जाम के चलते गाडिय़ों का प्रदूषण कई गुना अधिक हो जा रहा है, और आज अगर केवल दिल्ली को लेकर सरकारों की नींद खुल रही है, तो बाकी देश में भी लोगों के फेंफड़े छलनी होना जारी हैं। यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्रदूषण की सबसे बुरी मार उस गरीब तबके पर पड़ती है जो कि जाम सड़क-चौराहों पर धुआं और धूल झेलने को मजबूर रहता है। ऐसे गरीब के इलाज का बोझ भी सरकार पर आता है, और उसकी उत्पादकता भी घट जाती है। इसलिए प्रदूषण को सिर्फ हवा के जहर तक सीमित खतरा मानना तंगनजरिया होगा, और यह याद रखने की जरूरत है कि इंसान के साथ-साथ कुदरत के दूसरे पहलू भी इंसान के पैदा किए हुए, और लगातार बढ़ाए जा रहे इस भयानक प्रदूषण का शिकार होते चल रहे हैं।
देश का सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर दिल्ली को सुधारने में अपनी खासी ताकत लगा देता है, और ऐसे में बाकी देश को दिल्ली को एक मिसाल मानकर चलना चाहिए, और अपने आपको खुद भी सुधारना चाहिए। प्रदूषण को लेकर सरकारों की गंभीरता का हाल यह है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अभी चार दिन पहले रायपुर और बिलासपुर जैसे सबसे बड़े शहरों में नल के पानी में बीमारी को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया, और कल उसने यह पूछा कि राज्य सरकार इतने खर्च के बावजूद शहरों में शोरगुल से हो रहे प्रदूषण को रोक क्यों नहीं पा रही है? आज जिस समय हम यह लिख रहे हैं, पर्यावरण को बचाने के लिए राज्य सरकार उद्योगपतियों से बात कर रही है, और इसी बातचीत में कई दूसरे पहलुओं पर भी चर्चा हुई है। हमारा मानना है कि इस प्रदेश, देश और धरती को बचाने के लिए बड़ी कड़ी मेहनत की जरूरत है, वरना हम महज दिल्ली को देखते रह जाएंगे, तो दिल्ली सरीखा स्मॉग, उससे भी जहरीली हवा हमें अपने ही शहर में घेर लेगी। जनता की जागरूकता तो जरूरी है, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की बनती है, और उसे शहरी योजना के जानकारों और विशेषज्ञों से बात करनी चाहिए, खासकर ऐसे लोगों से जो कि सरकार के बाहर हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 November