देवी प्रतिमाओं की पूजा वाले देश में जिंदा देवियां बदहाल

संपादकीय
21 सितंबर 2017


भारत के एक बड़े हिस्से में बड़ी आस्था से मनाया जा रहा त्योहार नवरात्रि आज से शुरू हुआ है, और इन नौ दिनों में देश भर के देवी-मंदिरों में तो पूजा-अर्चना होगी ही, जगह-जगह सार्वजनिक पंडाल लगाकर देवी प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएंगी। अलग-अलग प्रदेशों में रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं, लेकिन यह शक्ति की प्रतीक महिला की पूजा सभी जगहों पर है। अब सवाल यह उठता है कि हर बरस साल में दो बार नौ-नौ दिनों तक देवी की उपासना, पूजा-अर्चना करने वाले हिन्दुओं के जीवन में जिंदा देवियों की क्या जगह है?
आज ही दो खबरें उत्तरप्रदेश की है कि किस तरह एक हिन्दू लड़की को भाजपा की एक नेता पीट रही है कि वह किसी दूसरे धर्म के लड़के से प्यार करती है। वहीं पर भाजपा के सांसद साक्षी महराज यह कह रहे हैं कि मोटरसाइकिलों पर लड़के-लड़कियों के चिपककर साथ बैठने की वजह से बलात्कार की घटनाएं बढ़ती हैं। तीसरी खबर है कि राजस्थान के अलवर में एक हिन्दू बाबा, फलाहारी महाराज को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उसके आश्रम और अस्पताल में तैनात है, उस पर छत्तीसगढ़ की एक कानून की छात्रा ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई है। पंजाब-हरियाणा से एक खबर और है कि वहां एक स्कूल के शौचालय में किस तरह एक छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया गया है। इससे परे देश भर में जगह-जगह शायद हर घंटे किसी न किसी लड़की या महिला से बलात्कार की रिपोर्ट सामने आती है, और हमारा अंदाज यह है कि ऐसे दर्जनों बलात्कार मेें से कोई एक मामला ही पुलिस तक पहुंच पाता है।
यह देश लड़कियों और महिलाओं के मामले में इस कदर अमानवीय हो गया है कि दुनिया भर में इसे लेकर यहां आने वाले पर्यटकों के बीच दहशत भी रहती है, और खुद देश के भीतर बच्चियों के मां-बाप चैन से सो नहीं पाते हैं कि वे किस भरोसे से बच्चियों को स्कूल भेजें, किस भरोसे से उन्हें खेलकूद के मुकाबलों में दूसरे शहर भेजें, या कि पढऩे के लिए बाहर भेजें। इस देश में बलात्कार किसी बुरे सपने से भी अधिक बुरी ऊंचाईयों पर पहुंच चुका है, और ऐसा लगता है कि यह इस देश के लोगों का एक राष्ट्रीय शगल हो गया है। सरकारों में, अदालतों में पहुंचने वाली शिकायतों का हाल यह है कि बरसों तक किसी को सजा नहीं हो पाती है, और अभी इस बरस देश की सबसे चर्चित बलात्कार की खबर वाले बाबा राम रहीम को उसके किए बलात्कारों के पन्द्रह बरस बाद सजा हो पाई। और भारत की अदालती व्यवस्था के मुताबिक निचली अदालत से हुई इस सजा के खिलाफ अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक बाबा के जाने की संभावना या आशंका बची हुई ही है।
छत्तीसगढ़ में हर कुछ महीनों में ऐसी खबर सामने आती है कि किस तांत्रिक ने या किस बाबा ने किसी लड़की या महिला से भूत उतारने के नाम पर, या कि कोई और झांसा देकर उसके साथ बलात्कार किया। ऐसे बहुत से मामले धर्म से जुड़े होते हैं, और आस्थावान लोगों के होते हैं। ऐसे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि देवी पर इस देश के धर्मालु लोगों की आस्था उन्हें जिंदा देवियों के साथ कोई जुर्म करने से जरा भी नहीं रोक पाती है। लोगों को अपनी आस्था को अंधविश्वास में नहीं बदलने देना चाहिए क्योंकि धर्म किसी को बेहतर इंसान नहीं बना पाता, बल्कि धर्म लोगों को एक प्रायश्चित करके पापमुक्ति का मौका देता है जिससे कि धर्मालु लोगों की छाती पर से उनके अपराध का बोझ हट जाता है। इसलिए लोगों को सावधान रहना चाहिए कि यह देश प्रतिमाओं की देवियों की पूजा तो अच्छे से करता है, लेकिन जिंदा देवियों के लिए इसके मन में अधिक सम्मान नहीं है। इसलिए लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है, और खासकर जितने किस्म के बाबा, धर्मगुरू, तांत्रिक हैं, उनसे खास तौर पर सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे अंधविश्वास बढ़ाकर, झांसा देकर लोगों को हर तरह से लूटने की अतिरिक्त ताकत रखते हैं।

देश के बाहर राहुल की कही बातों को गलत कैसे कहा जाए...

संपादकीय
20 सितंबर 2017


कांग्रेस उपाध्यक्ष और भावी अध्यक्ष राहुल गांधी पर यह तोहमत लग रही है कि वे अमरीकी विश्वविद्यालयों में मंच और माईक से भारत के घरेलू मुद्दों के बारे में बोल रहे हैं, और देश को बदनाम कर रहे हैं। लेकिन ऐसा कहने वालों की याददाश्त कुछ कमजोर है और वे यह भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब पहली बार अमरीका जैसे देशों का वीजा पाया, तो वहां के बहुत बड़े-बड़े सभागृहों में प्रवासी भारतीयों के बीच उन्होंने भारत की पिछले साठ-सत्तर बरस की सभी सरकारों के कामकाज को खारिज कर दिया था, जिसमें छह बरस की अटल सरकार का काम भी शामिल था, और उस जनता पार्टी सरकार का काम भी शामिल था जिसमें जनसंघ एक सबसे बड़ा घटक दल था, और जिसमें अटल-अडवानी जैसे दिग्गज जनसंघी मंत्री थे। आजादी के बाद से भारत सरकार के सारे कामकाज को मोदी ने इतनी बार खारिज किया, इतने देशों में जाकर खारिज किया कि इस बारे में उसी वक्त उनकी भारत में बड़ी आलोचना भी हुई थी। आज तो राहुल गांधी किसी सरकारी कुर्सी पर नहीं हैं, और उनका कहा हुआ तो महज विपक्ष के एक नेता का कहा हुआ है, और वे मोदी सरकार के पिछले तीन बरस के काजकाज को लेकर ही बोल रहे हैं, देश में आजादी के बाद से आई कई कांगे्रस-विरोधी केंद्र सरकारों को खारिज नहीं कर रहे हैं।
इसलिए हम राहुल को आज किसी तोहमत का हकदार नहीं पाते क्योंकि किसी विदेश का लोकतंत्र परंपराओं को न तो रातोंरात बनाता है, और न ही रातोंरात पाता है। भारतीय लोकतंत्र की परंपराएं लंबे समय में जाकर बनी थीं, और उनको पिछले तीन बरस में बड़ी रफ्तार से तबाह किया गया है। राहुल गांधी ने भारत में असहिष्णुता बढऩे जैसे कुछ मामलों को उठाया है, जो कि कोई भांडाफोड़ नहीं है, देश के अलावा दुनिया में जगह-जगह अमनपसंद लोग लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, और लोकतंत्र में इसे सरकार विरोधी या देश विरोधी काम मानना गलत है। यह मुद्दा देश की अदालतों में भी बार-बार उठ रहा है और सुप्रीम कोर्ट के अलावा बहुत से हाईकोर्ट देश के हाल पर फिक्र जाहिर कर चुके हैं। गायों को लेकर केंद्र सरकार ने जैसे कानून बनाए और जिस तरह भाजपा के राज वाले कई राज्यों में गाय के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले लोगों ने अभूतपूर्व हिंसा की, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट को अभी पूरे देश में हर जिले में अफसरों पर जिम्मेदारी तय करने का हुक्म देना पड़ा।
हमारा ख्याल है कि लोकतंत्र में अच्छी परंपराओं को स्थापित करना चाहिए जिनमें यह भी शामिल होना चाहिए कि अपने से पहले की सरकारों के कामकाज को उस तरह खारिज न किया जाए जिस तरह आज केंद्र सरकार के बहुत से लोग कर रहे हैं। भारत अपने बहुत से लोकतांत्रिक मूल्यों को खो रहा है, और पिछले आम चुनाव में मतदाताओं के बहुमत से मिले समर्थन को ऐसा करने की एक मंजूरी मानकर चल रहा है। जबकि चुनाव में मिली हुई जीत लोकतंत्र को खत्म करने के लिए, देश से सद्भाव को खत्म करने के लिए मंजूरी नहीं होती है। राहुल गांधी को देश के बाहर देश के मुद्दे न उठाने की सलाह देने का हक उन्हीं को हो सकता है जिन्होंने देश के बाहर देश की पिछली सरकारों के खिलाफ कुछ न कहा हो।

म्यांमार के शरणार्थियों के लिए दरवाजे बंद करके भारत इतिहास में जगह खो रहा है...

संपादकीय
19 सितंबर 2017


सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कहा है कि म्यांमार से आ रहे रोहिंग्या शरणार्थी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, और सरकार उन्हें बाहर निकालने जा रही है। सरकार ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, और अदालत इसमें दखल न दे। आज पूरी दुनिया के सामने रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की जो हालत है, उसे लेकर सबके दिल दहले हुए हैं। म्यांमार में सत्तारूढ़, नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित, आंग-सान-सू-ची की सरकार जिस तरह इन मुस्लिमों के खिलाफ फौज और बौद्ध समुदाय की हिंसा को बढ़ावा दे रही है, उसे पूरी दुनिया शर्मनाक मान रही है, यह एक अलग बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी म्यांमार हो आए, लेकिन उन्होंने वहां के इस अमानवीय पहलू पर सू-ची से मुलाकात में चर्चा भी नहीं की। अब सरकार का अदालत में हलफनामा और भी निराश करता है क्योंकि अभी पिछले बरसों में लगातार योरप के दर्जन भर देशों ने, और कनाडा ने जिस तरह सीरिया और इराक, लीबिया और दूसरे युद्धग्रस्त देशों से आ रहे शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं, उससे दुनिया मेें सभ्य लोकतंत्र की परिपक्वता स्थापित होती है। ये शरणार्थी तो ऐसे देशों से पहुंचे थे, पहुंच रहे हैं, जहां पर आईएसआईएस और अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन राज कर रहे हैं, और इनके आतंकी घुसपैठिये शरणार्थियों के बीच योरप के देशों में पहुंचने का एक बहुत बड़ा खतरा है। दूसरी तरफ भारत से म्यांमार की सरहद लगी हुई है, और वहां बड़े पैमाने पर चल रहे सरकारी और बौद्ध हिंसा के कत्लेआम से बचकर जो मुस्लिम आ रहे हैं, उनके लिए दरवाजे बंद करना एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से कतराना है।
भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि इन शरणार्थियों में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के एजेंट भी शामिल हैं, इसलिए देश की सुरक्षा के लिए इनको रोकना भी जरूरी है और आ चुके शरणाथियों को निकालना भी जरूरी है। हमारा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और समझौतों के तहत भी भारत को उदारता दिखानी चाहिए, और पड़ोसी होने के नाते यह इंसानियत भी दिखानी चाहिए कि बड़े पैमाने पर मारे जा रहे लोगों को अपने देश में जगह दे, और फिर चाहे तो इन्हें एक अलग हिफाजत और निगरानी में रखे। पाक आतंकी संगठनों के भारत में एजेंट इन्हीं शरणार्थियों के बीच नहीं घुसेंगे, वे तो कश्मीर और दूसरे इलाकों में वैसे भी लगातार काम करते हैं, और उनकी की हुई आतंकी घटनाएं सामने आती रहती हैं।
भारत का शरणार्थियों के मामले में बहुत लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। चीन के तिब्बत इलाके के शरणार्थियों और उनके मुखिया दलाई लामा को भारत ने पूरा सम्मान देकर केन्द्र सरकार के खर्च पर जगह दी, और देश में कई जगहों पर तिब्बती शरणार्थियों को रखा गया, जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। इसके बाद म्यांमार के शरणार्थी भी बरसों से भारत मेें रहते आ रहे हैं जो कि रोहिंग्या मुस्लिम नहीं थे, और बौद्ध धर्म के भी थे। फिर 1971 की याद सबको है जब पाकिस्तान की सरकार पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में जुल्म ढा रही थी, और वहां से लाखों शरणार्थी भारत में आ रहे थे, तब भारत ने न सिर्फ उन्हें जगह दी, उन्हें बसाया, बल्कि एक फौजी दखल देकर पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में पाकिस्तानी फौज को टक्कर दी, उसका आत्मसमर्पण करवाया, और बांग्लादेश बनवाया। भारत में दूसरे और कई देशों के शरणार्थियों को जगह दी गई जिनमें फिलीस्तीन से आने वाले छात्र-छात्राओं को कॉलेजों में दाखिला भी दिलवाया गया।
आज भारत की सरकार अगर महज एक कारोबारी की तरह नफा-नुकसान देखते हुए, हिसाब करके इंसानियत को भूल जाएगी, तो यह बात भी इतिहास में दर्ज होते चल रही है। भारत को एक बड़े देश की जिम्मेदारी निभाते हुए, और अपने गौरवशाली इतिहास का ध्यान रखते हुए म्यांमार के शरणार्थियों को जगह देनी चाहिए। ऐसा न करके भारत इतिहास में अपनी जगह खोने जा रहा है। 

सूक्तियों से मिले साहस से ही चल सकती है सच की लड़ाई

18 सितंबर 2017

बहुत से अखबारनवीसों से लेकर अखबारों में हर हफ्ते कॉलम लिखने वालों तक और सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति या विचार के लिए अभियान चलाने वालों तक, कलम के सिपाहियों से लेकर कलम के भाड़े के हत्यारों तक, इनका हौसला थकता ही नहीं है। वे पूरे वक्त अपने मकसद के लिए, या कि अपने रोजगार के लिए जुटे रहते हैं, और ऐसा करते हुए वे सच और झूठ का फर्क करने में अपना वक्त बर्बाद नहीं करते। जब हिटलर के सूचना मंत्री से लेकर अब तक यह माना जाता है कि एक झूठ को अगर काफी बार दुहरा दिया जाए, तो वह सच में तब्दील होने लगता है, या कम से कम सच का एहसास तो कराने लगता है। नतीजा यह है कि लोग सोचे-समझे, मकसदभरे झूठ को बार-बार दुहरा कर उससे सच बनाने में लगे रहते हैं। लोग झूठ को पकड़ भी लेते हैं, तो भी उन्हें शर्म नहीं लगती, क्योंकि वे शर्मिंदगी के हकदार अकेले नहीं रहते, और उनकी तरह और बहुत से लोग इसी काम में लगे रहते हैं।

लेकिन सच के बारे में यह कहा जाता है कि उसे अपने अस्तित्व को साबित करने में देर लगती है, खासी देर लगती है, बड़ी मेहनत भी लगती है, लेकिन फिर भी वह साबित तो हो ही जाता है, और आखिर में वह खड़ा रहता है। सवाल यह है कि यह खासी देर कितनी लंबी होती है, और इस बीच में झूठ की फसल जंगल की घास की तरह कितनी फैल चुकी रहती है, और आम लोग उस घास में कितने उलझते चलते हैं, उसके आरपार सच को देखने में उन्हें कितना वक्त लग जाता है, ये तमाम बातें परेशान करती हैं।
फिर दूसरी बात यह भी कि झूठ का कारोबार करने वालों के पास झूठों की फौज की एक वर्दी भी होती है, और टोली की ताकत भी। ऐसी गिरोहबंदी के मुकाबले सच बोलने वाले अक्सर किसी हमलावर मकसद के बिना होते हैं, उन्हें किसी वर्दी की ताकत भी नहीं होती, और न ही किसी गिरोह से उन्हें हिफाजत मिली होती है। नतीजा यह होता है कि सच का झंडा लेकर चलने वाले अक्सर अकेले दिखते हैं, और बहुतों को यह भी लगता है कि उनमें कोई दिमागी नुक्स है कि वे चैन से बैठने के बजाय यूं बेचैन फिरते हैं। आमतौर पर सच के लिए लडऩे वाले ऐसे लोग दुनिया में अकेले पडऩे लगते हैं, और बहुत से मामलों में सच की तकलीफ का बोझ उठाते परिवार के भीतर भी वे अकेले होने लगते हैं।
जिस तरह विज्ञान कथाओं की कुछ फिल्मों में मशीनी मानव दिखाए जाते हैं कि किस तरह वे गिनती में बढ़ते चलते हैं, और फौज सरीखे होकर इंसानों पर टूट पड़ते हैं, कुछ उसी तरह झूठ के भाड़े के हत्यारे फायदा पाते हुए इन दिनों सोशल मीडिया पर हमलावर बने हुए हैं, और पैसों की ताकत से उनकी गिनती बढ़ती चल रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने मिलकर विचारों के मुकाबले को ऐसा बना रखा है कि स्टेडियम में बैठे, मुकाबला देखते लोगों की गिनती फरेब की तरह बढ़ाकर दिखाई जा सकती है, और जनमत के आकार को अंधाधुंध बड़ा या छोटा साबित किया जा सकता है। यह कुछ उसी तरह का है जिस तरह कि कसरत की कुछ मशीनों, या शरीर को किसी आकार में ढाल देने का दावा करने वाले खाने-पीने के सामानों के इश्तहार होते हैं, जो कि हकीकत से परे हसरत की तस्वीरें दिखाते हैं, और ग्राहक जुटाते हैं।
सच और झूठ पर भरोसा रखने वाले लोगों की अलग-अलग गिनती भी मुमकिन नहीं होती, क्योंकि झूठ का झंडा लेकर चलने वाले बहुत से लोगों को भी इस बात का एहसास होता है कि असल में सच क्या है। वे झंडे के झूठ पर सचमुच ही खुद भरोसा नहीं करते, लेकिन एक पेशे की तरह, या कि एक नफरतजीवी मकसद के चलते वे उस झूठ को सच करार देते हुए एक अभियान चलाते हैं। ऐसे लोगों को झूठ पर भरोसा रखने वाला नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे झंडा तो झूठ का लिए चलते हैं, लेकिन अपने मन के भीतर उन्हें हकीकत का सच भी मालूम होता है। इसलिए सोशल मीडिया पर जो दिखता है, या कि आज के मीडिया के टीवी स्क्रीन पर, अखबारी पन्नों पर जो दिखता है, जरूरी नहीं है कि लिखने और लिखाने वाले लोगों का खुद का उस पर भरोसा हो। यह बात सही है कि मीडिया के एक बड़े तबके के लिए प्रॉस्टीट्यूट जैसी गाली जोड़कर, प्रेस को प्रेस्टीट्यूट करार देने का काम मोदी सरकार के एक बड़बोले फौजी बददिमागी मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने किया था, लेकिन आज मीडिया और सोशल मीडिया की जो हालत है, उसमें यह शब्द बहुत नाजायज नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि कौन सा तबका इस शब्द का ज्यादा बड़ा हकदार है। यह तमगा उन लोगों पर बेहतर सजता है जो रोज झूठ का गुब्बारा फुलाने के कारोबार में लगे हुए हैं।
अभी मुझे इस बात का ठीक-ठीक अंदाज नहीं है कि मीडिया और सोशल मीडिया पर सच और झूठ को देख और सुनकर पाठकों और दर्शकों का कितना हिस्सा झूठ-सच का फर्क कर पाता है, और कितना झांसे में आ जाता है। यह अंदाज इसलिए आसान नहीं है कि विचारधारा को समर्पित, नफरतजीवी, किसी नामौजूद दुश्मन के खिलाफ लडऩे को आमादा लोग जब किसी झूठ को सच मानते हुए दिखते हैं, तो यह समझ नहीं पड़ता कि वे झूठ को सचमुच सच मान रहे हैं, या कि वे उसे सच मानते हुए दिखना भर चाहते हैं। यह पूरा सिलसिला कुछ जटिल है, और कुछ उलझा हुआ है, बदनीयत से लदा हुआ है, और अनुपातहीन अधिक ताकत से लैस भी है। इसलिए किसी संक्रामक रोग की तरह, किसी कम्प्यूटर वायरस की तरह, गणेश के दूध पीने की अफवाह की तरह, झूठ पर जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे, सच की तरह, सच मानकर भरोसा करने वाले लोगों के बीच फर्क कर पाना नामुमकिन सा है।
लेकिन इंसानी सोच में जो एक आम बात है, उसके मुताबिक नफरत लोगों को बड़ी रफ्तार से जोड़ लेती है। मोहब्बत जब तक प्रेम का ढाई आखर लिख पाती है, तब तक नफरत झूठ के पर्चे छापकर शहर के हर चौराहे पर बांट चुकी होती है। सच को सोशल मीडिया की जंग के लिए मानो 80 रूपए लीटर का पेट्रोल मिलता है, और झूठ को अपनी लड़ाई के लिए 31 रूपए लीटर मिल जाता है जो कि दुनिया के बाजार में उसकी कीमत है। यह गैरबराबरी की लड़ाई कई बार सच का हौसला पस्त करती है, और वैसे में सच को लेकर कही गई सूक्तियां काम आती हैं जो हौसले को चार कदम और चलने को कहती हैं। लेकिन सच यह है कि ऐसे चार कदम उस डॉक्टरी दिलासे की तरह रहते हैं जो कि चार हफ्ते बाद कटने वाले प्लास्टर को लेकर मरीज को बस कुछ दिन और का भरोसा दिलाते चलते हैं। गैरबराबरी की यह लड़ाई अंतहीन भी दिखती है, लेकिन दुनिया का इतिहास गवाह है कि कोई लड़ाई कभी अंतहीन नहीं होती।

देश में वीआईपी अदालतों की तुरंत जरूरत है इंसाफ के लिए

संपादकीय
18 सितंबर 2017


जिस तरह हिंदुस्तान की राजनीति में होता है, ठीक उसी तरह पड़ोस के पाकिस्तान में भ्रष्टाचार की वजह से हटाए गए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पत्नी ने उनकी सीट से उपचुनाव जीतने के बाद कहा। उन्होंने कहा कि जनता की अदालत में सुप्रीम कोर्ट का फैसला खारिज हो गया है, और जनता की नजर में आज भी नवाज शरीफ प्रधानमंत्री है। भारत में अधिकतर नेता भ्रष्टाचार के मामलों में, या दूसरे खूंखार अपराधों में फंसने पर भी यही तर्क देते हैं कि वे अदालती फैसले के खिलाफ जनता की अदालत में जाएंगे। दूसरी तरफ जब जनता की अदालत उन्हें खारिज कर देती है, तो वे कानून या चुनाव आयोग की अदालत में जाने की बात करने लगते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि धरती पर उपलब्ध किसी भी तरह की अदालत से अपनी मनमर्जी का फैसला मिलने तक वे अपनी लड़ाई जारी ही बताते हैं।
हमारा यह मानना है कि जिस तरह पाकिस्तान की अदालत ने भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री को हटाने की हिम्मत दिखाई है, भारत की अदालतों को भी ताकतवर तबकों के मामलों में हिम्मत दिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि नेताओं की कुछ बरसों में ही आसमान पर पहुंच गई दौलत का हिसाब मांगने पर भी सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग या सरकार नजरें चुरा रहे हैं। लोग इस बात की खुलकर चर्चा भी नहीं करना चाहते कि नेताओं के पास अनुपातहीन दौलत आई कहां से है? ऐसे में न तो भ्रष्टाचार कम होने का कोई आसार है और न ही चुनावों में कालाधन कम हो सकता, सत्ता पर बैठे हुए लोगों के अपराध भी कम नहीं हो सकते।
पहली बार भारतीय सुप्रीम कोर्ट में यह सोच सामने आई है कि नेताओं की अनुपातहीन संपत्ति के मामले 3 या 6 महीने में निपटाए जाएं। हम बरसों से यह मांग कर रहे हैं कि देश में ऐसी वीआईपी अदालतें बनाई जानी चाहिए, जहां पर सांसद- विधायक, या उनके और उनके ऊपर के निर्धारित दर्जों के लोगों के भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई तेजी से हो। ऐसा न होने पर किसी भी तरह के अपराध के मामले निपट ही नहीं पाते हैं, अगर उनमें किसी ताकतवर नेता या अफसर को सजा का खतरा दिख रहा हो। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, क्योंकि ताकतवर लोग अगर मुजरिम हैं, और वे सत्ता पर भी हैं, तो वे आम नागरिकों के मुकाबले हजारों गुना अधिक बड़े जुर्म करने की ताकत रखते हैं। इसलिए देश में आम और खास का फर्क अगर करना हो, तो अदालती सुनवाई में सबसे पहले करना चाहिए। ऐसी फास्टट्रैक अदालतें तुरंत बनानी चाहिए, जो कि बड़े अफसर, बड़े नेता, बड़े जज और एक सीमा से अधिक सम्पन्नता वाले लोगों के मामलों को सुने। 

चाहे जिसे नफा-नुकसान हो कुनबापरस्ती पर चर्चा हो...

संपादकीय
17 सितंबर 2017


अभी अमरीका के एक बड़़े प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में राहुल गांधी ने अपने भाषण के बीच भारत के वंशवाद को लेकर कुछ बातें कहीं, जो कि उनकी अपनी वंशवादी विरासत की वकालत करने वाली भी थीं, और भारतीय राजनीति से लेकर भारतीय फिल्मों तक अलग-अलग तरह के वंशवाद का जिक्र करने वाली भी थीं। नतीजा यह निकला कि इन दिनों ट्विटर पर मुखर ऋषि कपूर ने तुरंत ही जवाबी हमला किया, और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राहुल के बयान का जिक्र किए बिना वंशवाद पर कहा- मैं पहले भी यह बात कहते आया हूं, लेकिन अब यह बात कहने में हिचकिचा रहा हूं क्योंकि अब मैं राजनीति से बाहर हूं। भारतीय लोकतंत्र में डायनेस्टी (वंशवाद) नेस्टी (शरारती, बुरा, अप्रिय, बदमजा) है लेकिन यह कुछ लोगों को टेस्टी (मजेदार) लगता है, और यह हमारे लोकतंत्र की कमजोरी है। उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया है और उन्हें याद दिलाया है कि उपराष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें दलगत राजनीति में इस तरह की अवांछित बातें नहीं करनी चाहिए, वरना दूसरे लोग भी उनके प्रति एक संवैधानिक शिष्टाचार और सम्मान भूल जाएंगे।
वेंकैया नायडू के बयान में ऐसी कोई बुरी बात नहीं है जो कि उपराष्ट्रपति के ओहदे के खिलाफ जाती हो। कुनबापरस्ती की तोहमत अकेली कांग्रेस पार्टी पर नहीं लगती है, यह देश के दर्जनों नेताओं की दर्जन भर से अधिक पार्टियों पर माकूल बैठने वाली तोहमत है, और लोकतंत्र के भीतर इसकी चर्चा करना नाजायज नहीं है। कांग्रेस तो देश की सबसे बड़ी कुनबापरस्त पार्टी होने के नाते वंशवाद की तोहमत सबसे अधिक झेलने की सबसे अधिक हकदार पार्टी है ही, लेकिन वह अकेली नहीं है, और कुनबापरस्ती के मामले में सबसे बुरी भी नहीं है। इसका एक लंबा इतिहास है, जिसे या तो कैलेंडर के मुताबिक देखा जा सकता है, या कि देश के नक्शे के मुताबिक देखा जा सकता है जो कि शायद अधिक आसान होगा। बात कश्मीर से शुरू करें, तो वहां अभी दूसरी पीढ़ी की मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने तीसरी पीढ़ी के मुख्यमंत्री से सत्ता हासिल की है। वहां से जरा नीचे उतरें, तो पंजाब की कुख्यात कुनबापरस्ती है जिसमें प्रदेश के हितों पर लंबे अरसे से काले बादल छाए हुए हैं, और उनके दामाद तक छाए हुए हैं जो कि हर तरह की तोहमतों से घिरा हुआ कुनबा रहा है। इसी पंजाब से जो हरियाणा अलग राज्य बना है, उस हरियाणा में कुनबापरस्ती न सिर्फ कांग्रेस की रही है, बल्कि उसका दूसरा सबसे बड़ा कुनबा, चौधरी देवीलाल, उनकी औलादें अभी जेल में हैं, मुख्यमंत्री रहते हुए किए गए अपने बड़े भयानक भ्रष्टाचार की वजह से, और बाहर लोगों का अंदाज है कि हजारों करोड़ की दौलत मालिक के बरी होकर आने की राह देख रही है। बगल के उत्तराखंड में जाएं तो कांग्रेस की कुनबापरस्ती भाजपा तक फैली हुई दिखती है, इंदिरा के मंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा के बेटा-बेटी कांग्रेस को खून निकलने तक दुहकर अब उसे डुबाकर दोनों ही भाजपा में चले गए हैं।
यहां से कुछ आगे बढ़ें तो बिहार में लालू यादव की भयानक अश्लील कुनबापरस्ती है जिसमें परिवार से बाहर किसी लोकतंत्र की कोई गुंजाइश नहीं है। बगल के उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह का कुनबा इस तरह सत्ता पर काबिज रहा और उसे इस तरह जकड़कर बैठा रहा कि कुनबे के भीतर ही विपक्ष भी खड़ा होने लगा, और कई रगों का एक ही खून बिखरने लगा। लेकिन एक दूसरी कुनबापरस्ती को भी देखने की जरूरत है जो कि उत्तरप्रदेश में सत्ता पर काबिज रह चुकीं मायावती की है। बहुजन समाज पार्टी में अपने नेता कांशीराम की सबसे करीबी रहते हुए मायावती ने एक नए राजनीतिक कुनबे की विरासत पाई, ठीक उसी तरह की जिस तरह कि दूर दक्षिण में एमजीआर से उनकी सबसे करीबी जयललिता ने पाई थी। यहां पर कुनबे का रक्त संबंध धरा रहा, और उससे परे सबसे करीबी को विरासत मिली जिससे कि पार्टी उसी एक कमरे में जारी रही।
पूरब की तरफ आगे बढ़ते हुए पहले अगर मध्यप्रदेश को देखें तो बड़े लंबे समय तक रविशंकर शुक्ल और उनके दो बेटे, अर्जुन सिंह और उनका बेटा, दिग्विजय सिंह और उनके भाई, ऐसे ढेरों परिवार सत्ता पर काबिज रहे। कुछ नीचे ओडिशा में पटनायक परिवार की दूसरी पीढ़ी चल रही है, उधर पश्चिम में जाएं तो महाराष्ट्र में  पवार से लेकर दूसरे अनगिनत कुनबे दूसरी और तीसरी पीढ़ी की राजनीति कर रहे हैं। आन्ध्र में कांग्रेस विरोधी राजनीति करने वाले एन.टी. रामाराव का दामादवाद आज राज कर रहा है, और उसका बेटावाद सत्ता में दाखिल हो चुका है। यह लिस्ट पूरी नहीं बन सकती क्योंकि यहां जगह सीमित है, और नेताजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा, यह हसरत भारतीय लोकतंत्र में असीमित है।
भारतीय जनता पार्टी के भीतर गिनाने के लिए सिंधिया जैसे दो-चार परिवार हो सकते हैं जिनकी दूसरी पीढ़ी राजनीति में है, लेकिन पूरी की पूरी पार्टी कभी भी किसी एक परिवार की गुलाम नहीं रही, और वंशवाद से मोटे तौर पर आजाद रही। इसलिए भाजपा से आए हुए वेंकैया नायडू किसी पार्टी पर हमला न करते हुए भी पूरी ईमानदारी से वंशवाद के खिलाफ सोच सकते हैं, और बोल सकते हैं, उसमें न कुछ नाजायज है, न कुछ अटपटा है, और न ही कुछ कांग्रेस पार्टी के अकेले के खिलाफ है। उपराष्ट्रपति बनने का यह मतलब नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र को जो बातें खाए जा रही हैं, उनके बारे में चर्चा न की जाए। ऊपर हमने कुनबापरस्ती की जो लंबी लिस्ट गिनाई है, उसमें से बहुत से लोग वेंकैया नायडू की पिछली पार्टी, भाजपा के सहयोगी दलों की है। अगर किसी बहाने से ही सही, भारत की राजनीति में कुनबापरस्ती के खिलाफ एक चर्चा छिड़ सकती है, जिससे कि एक जनमत तैयार हो, तो उससे चाहे जिसे नफा हो, चाहे जिसे नुकसान हो, वह होना चाहिए। 

धर्म बेजुबान नन्हें बच्चों के हित ऊपर रखे, और संन्यास को नीचे

संपादकीय
16 सितंबर 2017


मध्यप्रदेश के नीमच के एक जैन पति-पत्नी की खबर पिछले दो-तीन दिनों से अखबारों में है कि वे तीन बरस की बेटी और सैकड़ों करोड़ की संपत्ति छोड़कर साधु-साध्वी जीवन अपनाने जा रहे हैं। जैन समाज में कम उम्र में संन्यास ले लेना अनोखी बात नहीं है, और किसी भी दूसरे धर्म के मुकाबले इस धर्म में ऐसी घटनाएं अधिक होती हैं। कुछ मामलों में तो समाज के भीतर, और समाज के बाहर से भी इस बात का विरोध हुआ कि किस तरह नाबालिग बच्चे संन्यास ले लेते हैं। कई बरस पहले नौ बरस की एक बच्ची जब जैन साध्वी बनी, तो लोग उसके खिलाफ अदालत तक गए थे, और इस प्रथा को अमानवीय बताया था।
लेकिन इस ताजा समाचार में एक दूसरी बात सोचने की है क्योंकि ये पति-पत्नी तो बालिग हैं, और उन्होंने सोच-समझकर पिछले कुछ बरसों से लगातार इस सन्यास की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था। अब सवाल यह उठता है कि तीन बरस की बेटी को उसके नाना के हवाले करके संन्यास लेने से क्या उस बच्ची के कुछ अधिकारों का भी हनन होता है? अभी हमें जितना याद पड़ता है, ऐसा कोई मामला कानून की अदालत में बहस में आया नहीं है जिसमें मां-बाप को कटघरे में खड़ा किया जाए कि वे बच्ची को छोड़कर कैसे जा सकते हैं? दूसरा यह भी है कि संन्यास की इन खबरों की वजह से तो यह सार्वजनिक रूप से घोषित और स्थापित हो गया है कि वे बच्ची को नाना के हवाले कर रहे हैं, वरना दूसरे बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें मां-बाप बच्चों को बेच भी देते हैं, या कि उन्हें अनाथाश्रम में छोड़ देते हैं, या कि सड़कों पर ही छोड़कर चले जाते हैं, ट्रेन में बिठाकर चले जाते हैं। बच्चों की बिक्री से परे, बच्चों को छोड़ देने का कोई और तरीका अब तक सामने आया नहीं है जिसमें मां-बाप के खिलाफ कोई जुर्म बना हो। लेकिन बहुत सी बातें जो कि कल तक जुर्म नहीं रहती थीं, वे अब जुर्म के दायरे में आती हैं, और लोगों को याद होगा कि एक समय सतीप्रथा को पूरी तरह से सामाजिक मान्यता प्राप्त थी, लेकिन बाद में उसे जुर्म करार दिया गया।
इस नौजवान शादीशुदा जोड़े के संन्यास को लेकर यह सवाल उठता है कि क्या किसी धर्म या सम्प्रदाय में इतनी कम उम्र के बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़कर औपचारिक और घोषित संन्यास लेने को पंथ की मान्यता होनी चाहिए? मां-बाप में से कोई एक संन्यास ले तो दूसरे के भरोसे बच्चे की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन दोनों ही एक साथ चले जाएं, तो उससे बच्चे पर, उसके रख-रखाव पर कैसा फर्क पड़ेगा यह सोचने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि धार्मिक रीति-रिवाज भी समय के साथ-साथ बदलते हैं, और देश और दुनिया में बदलती हुई सोच को देखते हुए भी कई धार्मिक प्रथाओं में बदलाव लाया जाता है। मुस्लिमों में हज पर जाने के लिए नियमों की एक लंबी लिस्ट है जिसे पूरा करने पर ही लोग हज जा सकते हैं। इसमें पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करना, परिवार की आर्थिक स्थिति इस तीर्थयात्रा के लायक रहना, और इस तरह की बहुत सी और बातें हैं जो कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही धार्मिक मान्यता को पूरा करने की इजाजत देती हैं। हमारा ख्याल है कि नाबालिग बच्चों के संन्यास लेने पर पूरी रोक रहनी चाहिए, और बच्चों को इतनी कम उम्र में छोड़कर मां-बाप के संन्यासी बनने पर भी रोक रहनी चाहिए। आज किसी भी धर्म का काम किसी एक जोड़े के बिना चल सकता है, लेकिन किसी बच्चे का काम उसके मां-बाप के बिना नहीं चल सकता। इसलिए जब किसी धर्म पर यह जिम्मेदारी रहती है कि वह किन लोगों को संन्यास दिलाए, तो उसे जिम्मेदारी से यह सोचना-विचारना चाहिए कि किन लोगों को किन जिम्मेदारियों के पूरे हो जाने के बाद ही संन्यास की इजाजत दी जाए।
हम इस एक मामले को महज मिसाल के तौर पर लेकर यह चर्चा कर रहे हैं, और हमें इस परिवार के भीतर इस बच्ची के रख-रखाव को लेकर अलग से कोई जानकारी नहीं है। इस बच्ची के दोनों तरफ परिवार हैं, और संपन्न परिवार हैंं, इसलिए यह मामला उसे बेसहारा छोड़ देने जैसा नहीं है, लेकिन मां-बाप के जिंदा रहते मां-बाप के साए से एकदम इस तरह से अलग कर देना हमारे हिसाब से उस बच्ची के बुनियादी अधिकारों को छीनने सरीखा है, और किसी भी धर्म को ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों को धर्म यह कह सकता है कि वे अपनी बच्ची के बालिग होने का इंतजार करें, और उसके बाद संन्यास के बारे में सोचें। संन्यासियों की कमी से किसी धर्म का काम ऐसा नहीं रूकता है कि एक जोड़ा पति-पत्नी संन्यासी न बनें तो धर्म का नुकसान हो जाएगा। इसलिए धर्म को सबसे पहले उस छोटी बच्ची के भले के बारे में सोचना चाहिए जो कि न अपनी मर्जी से इस दुनिया में आई है, और न ही मां-बाप को रोकने की उसकी कोई क्षमता है। जैन धर्म बड़ा अहिंसक माना जाता है, और हवा में न दिखने वाले कीटाणुओं तक को तकलीफ न देने की कोशिश करता है। ऐसे धर्म को अपने समुदाय के बेजुबान नन्हें बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखना चाहिए, और संन्यास को उसके बहुत नीचे।

ऐसा होने पर गधे गाली खाने से बचेंगे, और बाबा लोग जेल...

संपादकीय
15 सितंबर 2017


अभी देश में यह बहस चल रही है कि कौन बाबा असली है, और कौन नकली। कुछ बाबाओं ने एक बैठक करके कुछ दूसरे बाबाओं को नकली घोषित कर दिया, तो जवाब में मानहानि के नोटिस की चर्चा है। अब एक नाबालिग के साथ बलात्कार के आरोप में बरसों से जेल में बंद, एक वक्त बापू कहलाने वाले, आसाराम से अभी मीडिया ने पूछा कि वे किस श्रेणी के बाबा हैं। तो इसके जवाब में आसाराम ने कहा कि वे गधों की श्रेणी में आते हैं। बरसों से जेल में बंद एक बुजुर्ग का आपा खोना समझ में आता है क्योंकि आराम और इज्जत की लंबी जिंदगी के बाद जब ऐसी जेल नसीब होती है, और आगे का भविष्य अंधकारमय दिखता है, तो कोई भी अपना आपा खो सकते हैं। लेकिन फिर भी गधे से अपनी तुलना करना ठीक नहीं है, क्योंकि दुनिया में किसी भी गधे पर कभी बलात्कार का कोई मुकदमा नहीं चला है, और इंसानों से परे जानवरों की दुनिया में न तो इस तरह के बलात्कार होते हैं, और न ही जानवर अपनी प्रजातियों के नाबालिग बच्चों से ऐसी हरकत करते हैं। फिर भी जानवरों के अधिकारों के लिए लडऩे वाले लोग अब तक महज उनके साथ हिंसा के मामलों को लेकर लड़ते हैं, उन्हें गाली देने वाले लोगों के खिलाफ मुकदमा लडऩे का समय अभी किसी के पास आया नहीं है।
लेकिन आसाराम ने चाहे झल्लाहट में यह बात कही हो, और चाहे अपने को गधा कहने के पीछे उनकी नीयत गधे को एक बेवकूफ जानवर साबित करने की रही हो, हकीकत यही है कि सेक्स के बहुत से अपराधों में जो लोग पकड़ाते हैं, वे गधे तो नहीं रहते, बेवकूफ जरूर रहते हैं। आज हिन्दुस्तान में सेक्स की खरीद-बिक्री गैरकानूनी है, और इस पर सजा हो सकती है। लेकिन दुनिया के दर्जनों ऐसे देश हैं जहां पर इसे कानूनी दर्जा मिला हुआ है, और बैंकाक जैसे भारत के पास के कुछ देश ऐसे भी हैं जहां पर सेक्स-पर्यटन एक बड़ा कारोबार है। ऐसे में भारत के जो अतिसंपन्न लोग हैं, वे अगर अपनी सेक्स-जरूरतों के लिए नाबालिग लड़कियों या अनुयायी महिलाओं पर हमला करते हैं, तो इसके बजाय बेहतर यह होता कि वे दुनिया के दूसरे देशों में चले जाते, और वहां सेक्स खरीदकर अपनी जरूरत पूरी कर लेते। इससे भारत में उनका आडंबर भी बचे रह जाता, भारत की मासूम बच्चियां भी बची रह जातीं, और दुनिया के दूसरे देशों में सेक्स-कर्मियों को एक ग्राहक भी मिल गया होता। हमको इस बात का पक्का भरोसा है कि अगर इन बाबाओं जितनी दौलत किसी गधे के पास होती, और उस गधे की ऐसी सेक्स जरूरतें होतीं, तो वह गधा उन देशों में चले जाता जहां सेक्स खरीदना कानूनी है, और मजे करके लौट आता। लेकिन इंसानों में समझ गधे से कुछ कम ही है, इसलिए सैकड़ों करोड़ की, शायद हजारों करोड़ की दौलत वाले लोग भी बलात्कार के जुर्म में जेल में हैं।
दरअसल होता यह है कि जब किसी बहुत कामयाब और मशहूर, लोकप्रिय या भक्तों से घिरे हुए इंसान को कानून का खतरा समझना बंद हो जाता है, तो फिर वे ऐसी चूक कर बैठते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि देश का कानून उनके ऊपर लागू नहीं होता। ऐसी बददिमाग और बेदिमाग ताकत दुनिया के दूसरे देशों में इस्तेमाल नहीं होती, खासकर जहां पर लोकतंत्र मजबूत है, और अदालतों को खरीदना मुमकिन नहीं है। यही वजह है कि भारत में लोकतंत्र की कमजोरी की वजह से अरबपति-खरबपति लोग भी बलात्कार के मामलों में जेल में हैं। हमारी सलाह तो देश की सरकार और जनता को यह है कि वेश्यावृत्ति को भारत में कानूनी दर्जा देना चाहिए, ताकि ऐसे संभावित बलात्कारियों से बाकी लोगों को बचाव मिल सके। वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने से वेश्याओं को भी बहुत बड़ी सामाजिक और कानूनी सुरक्षा मिलेगी जो कि आज बिल्कुल भी नहीं है। आज पुलिस, दूसरे सरकारी अमले, इलाके के गुंडे, और कई मामलों में स्थानीय नेता, ये सब वेश्याओं से उगाही करते हैं, और अपना बदन बेचकर मिलने वाली उसकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन लोगों पर लुट जाता है। इसलिए सेक्स-अपराधों को घटाने के लिए, और सेक्स-कर्मियों को सुरक्षा देने के लिए भारत में वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने की जरूरत है। कहने के लिए हिन्दुस्तान की संस्कृति में भी नगरवधुओं की पुरानी परंपरा है, और सैकड़ों बरस से इसे दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा भी जाता है, लेकिन सरकारों में इतना नैतिक साहस नहीं रहता है कि वे वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने जैसा फैसला ले सकें। ऐसा होने पर गधे गाली खाने से बचेंगे, और बाबा लोग जेल जाने से। 

दानवाकार बुलेट ट्रेन योजना गरीब देश की प्राथमिकता?

संपादकीय
14 सितंबर 2017


मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलने के लिए देश की पहली बुलेट ट्रेन का भूमिपूजन आज जापान और भारत के प्रधानमंत्रियों ने मिलकर अहमदाबाद में किया। बुलेट ट्रेन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शुरुआती घोषणाओं में से एक थी और इसे भारत के बहुत से अर्थशास्त्री और जानकार लोग एक दैत्याकार और बिना जरूरत का अहंकार भी बताते हैं। कई लोगों ने विश्लेषण करके यह बताया है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच अनगिनत उड़ानें हैं, और रेलगाडिय़ां हैं। पांच बरस बाद जब बुलेट ट्रेन एक लाख दस हजार करोड़ की लागत से शुरू होगी, तब उसकी रफ्तार आज की ट्रेन और आज की प्लेन के बीच की होगी, और ऐसा ही उसका भाड़ा होगा, हवाई किराए से थोड़ा कम। लोग इस बात पर हैरान हैं कि इतनी बड़ी लागत केवल समय को कम करने के लिए लगाना क्या ठीक है? लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री सहित कुछ दूसरे समर्थकों का यह कहना है कि बुलेट ट्रेन से इन दो महानगरों के बीच के दस और शहर भी जुड़ेंगे, और इन दर्जन भर शहरों की जिंदगी, उनके रोजगार, और उनके कारोबार पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। मोदी का यह भी कहना है कि जितने कम ब्याज पर, लगभग बिना ब्याज के यह पूरा प्रोजेक्ट जापान से बहुत रियायती किश्तों पर मिल रहा है, और भारत को मानो यह मुफ्त ही मिल रही है। उनका यह भी अंदाज है कि इससे सीधे-सीधे और आर्थिक गतिविधियां बढऩे से दसियों हजार रोजगार बढ़ेंगे, और देश में एक नई टेक्नॉलॉजी भी आ जाएगी।
हमारा ख्याल है कि ऐसे दानवाकार प्रोजेक्ट लोगों की जिंदगी में कोई अभूतपूर्व और नई सहूलियत लाने वाले हों, तो उनका एक महत्व हो सकता है। लेकिन महज समय घटाना अभूतपूर्व नहीं कहा जा सकता। आज देश में निजी विमान कंपनियां आने वाले बरसों में सैकड़ों विमान अपने बेड़े में जोडऩे जा रही हैं। आज भी हवाई सफर का मुकाबला बहुत से लोगों के फायदे का साबित हो रहा है, और विमानतलों पर मध्यम वर्ग के लोगों की भीड़ दिखती है। दूसरी तरफ रेलगाडिय़ों के भाड़े को इस तरह से बढ़ाया गया है कि बहुत सी गाडिय़ों में भाड़ा विमान से भी अधिक पडऩे लगा है, और वे खाली चलने लगी हैं। इसलिए ट्रेन और प्लेन का यह मुकाबला पांच बरस में खुले बाजार के मुकाबले के चलते कहां पहुंचेगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिर मोदी की यह बात सही नहीं है कि यह ट्रेन भारत को मुफ्त में मिल रही है। यह ट्रेन भारत को कुल एक फीसदी ब्याज पर मिल रही है, इतना ही ठीक है, बाकी तो सच यह है कि जापान अगले पचास बरस तक भारत से इस कर्ज को वसूलता रहेगा, और इस पूरी बुलेट ट्रेन योजना को जापान ही बनाने जा रहा है जिससे वहां की कंपनियों को सीधे कारोबार मिलेगा, वहां के हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा, और यह एक कारोबारी-साहूकार की लुभावनी योजना सरीखी है।
अब जब यह साफ है कि भारत अगले पचास बरस तक इस एक लाख दस हजार करोड़ के कर्ज को पटाते रहेगा, तो यह पैसा मोदी के बाकी कार्यकाल के बाद भी सैंतालीस बरस तक पटाया जाता रहेगा। और इतनी बड़ी लागत से देश में और कौन-कौन सी उत्पादक योजनाएं बन सकती थीं जिनसे करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता, और हजारों करोड़ का मुनाफा भी हुआ रहता। भाजपा और मोदी सरकार बार-बार यह कहते हैं कि सरकार को कोई भी कारोबार नहीं करना चाहिए, और सारे कारोबार का निजीकरण होना चाहिए, ऐसे में सरकार देश का यह सबसे बड़ा अकेला कारोबार शुरू करने जा रही है जिससे मुंबई-अहमदाबाद के बीच महज कुछ हजार मुसाफिर ही तेज सफर का फायदा रोज पाएंगे, बाकी लोगों के लिए तो इससे धीमी ट्रेन भी बनी रहेगी, और इससे तेज प्लेन भी बने रहेंगे, और इन दोनों की गिनती भी 2022 तक बढ़ती भी रहेगी। यह लागत देश में सिर्फ रफ्तार बढ़ाने के लिए बहुत अधिक लग रही है, और सरकार का इससे रोजगार-कारोबार बढऩे का अंदाज कहीं वैसा ही साबित न हो जैसा कि नोटबंदी से कालेधन के सामने आने और देश की कमाई होने का अंदाज पूरी तरह, और बुरी तरह गलत साबित हुआ। किसी नेता या सरकार की निजी प्रतिष्ठा के लिए तो ऐसी दानवाकार योजना ठीक हो सकती है कि इतिहास में वह उनके नाम से दर्ज होगी, लेकिन देश की आम जनता के लिए इतनी बड़ी रकम की कोई योजना जब तक ठोस फायदे साबित करने वाली न हो, वह देश की प्राथमिकता नहीं हो सकती है। 

डिजिटल तकनीक इस्तेमाल में सावधानी सिखाना जरूरी

संपादकीय
13 सितंबर 2017


एक खबर है जिसकी सच्चाई परखना अभी बाकी है, लेकिन वह खतरनाक है और हिन्दुस्तान के डिजिटल-राह पर बढऩे में एक बड़ा रोड़ा और खतरा साबित हो सकती है। एक किसी छोटे दुकानदार ने पेटीएम से भुगतान लेना शुरू किया, और जब उसने अपने बैंक खाते में रकम डालने की कोशिश की, तो साढ़े 17 लाख रूपए की रकम गायब हो गई। ऐसी चार घटनाएं, और उसकी चार लाख जगहों पर पढ़ी गई खबरों से हो सकता है कि लोग कैशलेस होने का इरादा छोड़ दें। आज भी रात-दिन ये खबरें आती हैं कि किस तरह किसी के एटीएम कार्ड से जालसाजी हो गई, और उसकी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुट गई। जब लोगों के बीच साक्षरता और जागरूकता की तैयारी डिजिटल होने की नहीं है, तब आंधी-तूफान की रफ्तार से डिजिटलीकरण के खतरे कम नहीं हैं। और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही जहां मुख्यमंत्री ने यह तय किया है कि कुछ महीनों में ही दस लाख लोगों को डिजिटल लेन-देन के हिसाब से तैयार किया जाएगा, तो ऐसी कई तरह की ठगी के बारे में भी सोचना होगा। और लोगों के घर जाकर नोट लूटकर लाना आसान नहीं होता है, लेकिन ऑनलाईन किसी की भी जानकारी को हासिल करना भी आसान है, और उसे लूट लेना भी आसान है।   इस मुद्दे पर हमने पहले भी लिखा है कि केन्द्र सरकार को एक ऐसी योजना लानी चाहिए कि कैशलेस और डिजिटल लेन-देन में जो लोग ठगी या जुर्म के शिकार होते हैं, उनकी भरपाई करने के लिए एक बीमा योजना लाई जाए, उसके बिना यह पूरा सिलसिला जनता के हितों के खिलाफ जाएगा।
आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में साइबर जुर्म से निपटने के लिए पुलिस भी तैयार नहीं है, और साइबर अपराध दर्ज तो हो जाते हैं, लेकिन मुजरिमों तक पहुंचकर लूट को वापिस लाने के मामले बहुत कम हैं। इसलिए आज जब सरकार लोगों के डिजिटल-शिक्षण के काम को युद्धस्तर पर शुरू कर रही है, तो पहले से ही लोगों को सावधानी सिखाना जरूरी है, और ऐसा सिखाने वाले लोगों को भी पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों से प्रशिक्षण दिलवाना जरूरी है, ताकि पहले वे खुद समझें, और फिर प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाले, फोन से भुगतान करने वाले लोगों को समझा सकें। यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि चारों तरफ फैले हुए छोटे-छोटे दुकानदारों और छोटे-छोटे ग्राहकों को संगठित रूप से सिखाने का मौका भी आसान नहीं होगा। और आज जब बाजार पूरी तरह चौपट है, तो ऐसे में किसी छोटे दुकानदार को प्रशिक्षण के लिए किसी जगह बुलाना भी उसके जख्मों पर नमक छिड़कने की तरह का होगा। इसलिए सरकार को अखबार, टीवी, और सीधे जनसंपर्क से भी लोगों को जुर्म से सावधान रहने का प्रशिक्षण देना पड़ेगा। आज तो जो बुजुर्ग लोग हैं, वे भी अपने बचपन से पहले सिक्के, और फिर नोट देखते और इस्तेमाल करते आए हैं। और इसलिए वे इसमें धोखे से आमतौर पर बचना जानते हैं। लेकिन हम अखबारों में जब साइबर धोखाधड़ी की खबरें पढ़ते हैं, तो दिखता है कि बहुत पढ़े-लिखे और पेशेवर, परिपक्व और कामयाब लोग भी ठगी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए आज जब लोगों को मोबाइल बैंकिंग, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, फोन से भुगतान जैसे कई चीजों की तरफ मोड़ा जा रहा है, तो ऐसी तमाम सावधानी बहुत जरूरी है क्योंकि लोगों का भरोसा इस नई तकनीक पर अगर बैठ नहीं पाया, तो इसका इस्तेमाल कामयाब भी नहीं होगा, और लोग सुरक्षित भी नहीं रहेंगे।