दीवारों पर लिक्खा है, 19 जनवरी

धर्म और आतंक को जोडऩे का नतीजा विज्ञान का अंत

संपादकीय
19 जनवरी 2018


पाकिस्तान में बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने के काम लगीं मां-बेटी को आतंकियों ने गोली मारकर मार डाला। इसके पहले भी इस्लामी आतंकी इस अभियान में लगे हुए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को कई बार मार चुके हैं। उनका तर्क है कि पोलियो के टीके से मुस्लिम बच्चों की प्रजनन शक्ति खत्म हो जाएगी, और यह एक पश्चिमी साजिश है जिसे वे पूरा नहीं होने देंगे। जाहिर है कि धर्म के आधार पर जो आतंक चलता है, उसका विज्ञान या अक्ल से कोई लेना-देना तो हो नहीं सकता। लेकिन हम सबसे पहले इस मां-बेटी के हौसले को सलाम करना चाहेंगे जो कि पोलियो-कार्यकर्ताओं की आतंकी-हिंसा के लंबे पाकिस्तानी इतिहास के बावजूद इस काम में लगी हुई थीं। अड़तीस बरस की सकीना, और सोलह बरस की रिजवाना इन दोनों को मारकर पाकिस्तान के इस्लामी-आतंकियों ने अपने देश के लाखों बच्चों को पोलियो के खतरे के हवाले कर दिया है। इसके बाद लोगों के बीच न तो पोलियो ड्रॉप्स देने की हिम्मत आसानी से आएगी, और न ही मां-बाप अपने बच्चों को ऐसा टीका दिलवाने की हिम्मत आसानी से कर पाएंगे।
पाकिस्तान दुनिया के उन तीन देशों में से एक है जिसने पोलियो को रोकने में कामयाबी नहीं पाई है। अफ्रीका का नाइजीरिया, पाकिस्तान के पड़ोस का अफगानिस्तान, और खुद पाकिस्तान। इन्हीं तीन देशों में पोलियो बाकी है, और यहां से अड़ोस-पड़ोस के देशों तक इसका जाने का खतरा भी बने रहता है। कल की इस हिंसा के सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान में जनवरी 2015 में एक टीकाकरण केन्द्र में आत्मघाती बमबारी से पन्द्रह लोगों को मार डाला गया था, और पाकिस्तानी तालिबानी ऐसे कई हमलों की जिम्मेदारी ले चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान के सिलसिले में हम एक दूसरी बात को भी याद करना चाहेंगे कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पाकिस्तान में ओसामा-बिन-लादेन की तलाश करने के लिए सीआईए ने टीकाकरण कर्मचारियों की शक्ल में जासूसी करवाई थी, और उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि ऐसा करना टीकाकरण जैसे जरूरी स्वास्थ्य कार्यक्रम की साख को चौपट करना है, और यह एक अंतरराष्ट्रीय जुर्म से कम कुछ नहीं है। खैर, वह बात तो आई-गई हो गई, लेकिन हमारा अभी भी यह मानना है कि जिस तरह किसी युद्ध के बीच भी एम्बुलेंस का फौजी-इस्तेमाल एक युद्ध अपराध माना जाता है, और पूरी दुनिया के सभ्य देशों के बीच ऐसा समझौता भी है कि रेडक्रॉस की एम्बुलेंस पर कोई भी फौज हमला नहीं करेगी, उसी तरह यह भी एक घोषित समझौता होना चाहिए कि टीकाकरण कार्यक्रम का कोई इस्तेमाल सेहत से परे के किसी काम के लिए नहीं किया जाएगा।
अब हम इस मुद्दे पर आएं कि किसी धर्म से जुड़े हुए आतंकी संगठनों को बढ़ावा देने का क्या नतीजा होता है। यह बात महज पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, हिन्दुस्तान में भी कई धर्मों से जुड़े हुए लोग अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग जगहों पर आतंक से भी जुड़े रहे हैं, और आतंक का पता नहीं कोई धर्म होता है या नहीं, किसी धर्म का कोई विज्ञान तो बिल्कुल नहीं होता। और जिस धर्म के लोग अपने बच्चों को टीकाकरण जैसी जरूरी चीज से दूर रख रहे हैं, वे लोग कुल मिलाकर अपने ही धर्म का बड़ा नुकसान भी कर रहे हैं। जहां कहीं भी धर्म को लेकर कट्टरता, उन्माद, धार्मिक नफरत, और पाखंड को बढ़ावा दिया जाता है, वहां पर वैज्ञानिकता पूरी तरह खत्म हो जाती है, और आज हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के बीच भी अंधविश्वास को विज्ञान के विकल्प की तरह फैलाया और बढ़ाया जा रहा है। जब टीवी चैनलों पर बहस के दौरान भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा जैसे विज्ञान पढ़े हुए लोग यह कहते हैं कि गोमूत्र से सोना निकाला जाता है, तो वे इस देश में गाय से जुड़े हुए लोगों की भावनाओं का शोषण करते हुए इस देश की वैज्ञानिक सोच को खत्म करने का काम भी करते हैं। संबित पात्रा खुद तो डॉक्टरी पढ़े हुए इंसान हैं, लेकिन लोगों के बीच में वैज्ञानिकता खत्म करने के काम में लगे हुए हैं। उनकी मास्टर ऑफ सर्जरी ऐसी ही काम आ रही है। लेकिन यह महज एक मिसाल है, हमने विज्ञान को छोड़कर धर्मान्धता और कट्टरता को फैलाते हुए और भी बहुत से लोगों को देखा है। आज खबरों में बने हुए डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा पेशे से कैंसर सर्जन हैं, लेकिन देश में पूरे वक्त वे साम्प्रदायिकता के कैंसर को फैलाने में लगे हुए दिखते हैं। इसलिए धर्म और आतंक को जोडऩे का क्या नतीजा होता है यह पाकिस्तान में कल सामने आया है, और हिन्दुस्तान को भी इससे सबक लेना होगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जनवरी

केजरीवाल स्कूलों को बिग बॉस बना रहे, मां-बाप घर बैठे देखेंगे

संपादकीय
18 जनवरी 2018


दिल्ली सरकार तीन महीने में सरकारी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगाने जा रही है। सीएम अरविंद केजरीवाल का कहना है कि  सभी माता-पिता अपने फोन पर वास्तविक समय में बच्चों को कक्षा में पढ़ते हुये देख सकेंगे। इससे पूरी प्रणाली पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी। इससे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि इससे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। दिल्ली सरकार के इस फैसले से परे आज भी ऐसी सहूलियत टेक्नालॉजी ने मुहैया करा दी है जिससे कि लोग अपने छोटे बच्चों को किसी आया के साथ छोड़ते हुए उस कमरे में कैमरा लगाकर अपने फोन से उस कैमरे की रिकॉर्डिंग देख सकते हैं। कई लोग घर या कारोबार की हिफाजत के लिए भी इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। 
अब जहां तक बच्चों को उनके क्लासरूम में देखने की सुविधा घर बैठे मां-बाप को देने का फैसला है, तो यह कुछ अटपटा है। यह मान लिया गया है कि छोटे बच्चों को किसी निजी जीवन का हक नहीं है, और उनके बड़े हो जाने तक मां-बाप उनके पल-पल पर नजर रख सकते हैं। यह तरीका जापान में बरसों से चल रहा है कि वहां पर मां-बाप बच्चों के स्कूल बैग में एक ट्रांसमिटर लगा देते हैं, और फिर अपने फोन पर यह सुनते रहते हैं कि बच्चे कहां हैं, किनसे और क्या बात कर रहे हैं? अब क्लासरूम में अपने बच्चों को पढ़ते देखने का लालच बहुत से मां-बाप को उलझाकर रख सकता है। आज अपने मोबाइल फोन पर लोग जिस चीज को देख सकते हैं, उस चीज को टीवी के परदे पर भी देख सकते हैं, और उसे रिकॉर्ड करके भी रख सकते हैं। फिर क्लासरूम में बच्चे किन बच्चों के साथ उठ-बैठ रहे हैं, किनके साथ बात कर रहे हैं, इन सबको देखना, और पूरे वक्त देखने की सहूलियत बहुत से मां-बाप को एक बेचैनी से भर सकती है, और बच्चों का, मां-बाप का, टीचर का सबका जीना हराम हो सकता है। आज भी मां-बाप छोटे-छोटे बच्चों के लंबे-लंबे स्कूली घंटों के बाद भी उनकी ट्यूशन के लिए लाठी लिए उनके पीछे लगे रहते हैं। स्कूली बच्चे के परिवार को ऐसे निरंतर तनाव और बेचैनी से भरना एक बीमार समाज बनाकर छोड़ेगा।
अगर इसके सबसे करीब की मिसाल देखनी हो, तो टीवी पर एक बेहूदे रियलिटी शो, बिग बॉस, को देख सकते हैं जिसमें एक घर बनाकर उसमें जगह-जगह कैमरे लगाए गए हैं, और लोग माइक्रोफोन टांगकर चलते हैं। महीनों तक चलने वाले इस शो में हिस्सा लेने वालों पर पल-पल नजर रखी जाती है, और बिग बॉस हर किसी की निगरानी करते चलता है। स्कूल के क्लासरूम में माइक्रोफोन या कैमरा लगाकर अगर प्रिंसिपल पढ़ाई पर नजर रखे, तो भी बात समझ में आती है, घर बैठे मां-बाप या दफ्तर में काम करते हुए मां-बाप इस तरह की नजर रखने लगें, तो यह उन बच्चों की जिंदगी को पूरी तरह तबाह करना होगा जिन पर उनके मां-बाप वैसे ही पूरा काबू रखते हैं। आज भी अधिकतर बच्चे मां-बाप की मनमानी, जिद, और उनके फैसलों को ढोते ही हैं, भारी-भरकम स्कूल बैग के अलावा। अब इस कैमरेबाजी से बच्चे इस तनाव में घर पहुंचेंगे कि वहां मां-बाप से क्लास की किस बात के लिए लताड़ पड़ेगी। 
हिन्दुस्तान में लोगों की निजी जिंदगी पर किसी का भरोसा नहीं है। हर कोई दूसरों पर काबू पाने के लिए बावले रहते हैं, जिसे कंट्रोल-फ्रीक कहा जाता है। इस काबूपने को और बढ़ाना बिल्कुल ही समझदारी नहीं होगी। आज जब दिल्ली, बेंगलुरू, और बाकी भी बहुत से शहरों में स्कूली बच्चों पर तरह-तरह के सेक्स-हमले हो रहे हैं, और दूसरे तरह के हमले हो रहे हैं, तो सरकारें कुछ करती हुईं दिखना भी चाहती हैं। और इसी चाहत के चलते वे ऐसा कुछ करने की चूक भी कर सकती हैं कि जिससे नफा कुछ न हो, और नुकसान बहुत हो जाए। बच्चों के स्वाभाविक विकास के लिए उन्हें जिस तरह का एक माहौल चाहिए, घर बैठे मां-बाप की लगातार निगरानी में वैसा माहौल उन्हें मिल नहीं पाएगा। और हो सकता है कि दस-बीस बरस बाद जाकर ऐसे निगरानीशुदा बच्चों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो जो पूरे समय इस फोबिया के साथ जीने लगे कि उनकी निगरानी कर रहे हैं। पहली नजर में मां-बाप को यह इंतजाम आकर्षक और लुभावना लग सकता है कि उनके बच्चों पूरे वक्त उनकी नजरों के सामने रहें, लेकिन इससे बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा, और मां-बाप घर बैठे तय करने लगेंगे कि उनके बच्चे किन बच्चों के साथ उठे-बैठें, और यह सिलसिला बहुत नुकसानदेह और खतरनाक होगा। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जनवरी

धार्मिक आस्था पर सरकारी खर्च सभी किस्म का खत्म हो, तुरंत

संपादकीय
17 जनवरी 2018


मोदी सरकार ने हज सब्सिडी खत्म करने का फैसला लिया है। खुद मुस्लिम समाज के बहुत से संगठन इसकी मांग करते आ रहे थे, और ऐसा भी माना जा रहा था कि मुस्लिमों को हज की तीर्थयात्रा के लिए दी जाने वाली यह सब्सिडी मोटे तौर पर घाटे में चलने वाली सरकारी एयरलाईंस, एयर इंडिया को जिंदा रखने के लिए भी दी जाती थी। इसके अलावा शायद इसकी दो वजहें और थीं, एक तो यह कि मुस्लिम वोटों का फायदा पाने की कांग्रेस की उस वक्त की नीयत रही हो जब इसे लागू किया गया था, और दूसरी वजह यह कि मुस्लिमों का यह तीर्थ देश से खासे दूर है, और मुस्लिमों में गरीबों का अनुपात बहुत अधिक है, इसलिए उन्हें अपनी धार्मिक भावनाओं के मुताबिक हज करने के लिए मदद करना सरकार की जिम्मेदारी है। 
हम इन वजहों से सहमत नहीं हैं, और हमारा यह मानना है कि धर्मनिरपेक्ष देश होने का मतलब यह नहीं होता कि सरकार हर धर्म को खुश करने की कोशिश करे। सरकार को हर धर्म से दूरी बनाकर चलना चाहिए, और किसी धर्म पर खर्च नहीं करना चाहिए। वैसे हज सब्सिडी से परे कई और किस्म की सब्सिडी दूसरे धर्मों को भी दी जाती रही है, और दी जाती है। हिन्दुओं के कुंभ और अर्धकुंभ के इंतजाम के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए सरकारें मंजूर करती हैं जो कि पूरी तरह से एक ही धर्म के आयोजन पर खर्च है। कुंभ के नाम पर ही छत्तीसगढ़ में एक राजिम कुंभ शुरू हुआ, और वह पूरे का पूरा सरकारी पैसों से होने वाला हिन्दू आयोजन है। इस राजिम कुंभ में आने वाले साधुओं को सरकार की तरफ से कुछ नगद रकम या मेहनताना भी दिया जाता है, और उनके सारे खर्च सरकार उठाती है। छत्तीसगढ़ सहित देश के बहुत से राज्य हिन्दुओं के मानसरोवर तीर्थ पर जाने वाले लोगों को सरकारी अनुदान देते हैं, और अभी हाल की खबरों के मुताबिक उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने इस अनुदान को बढ़ाकर हज अनुदान से भी अधिक कर दिया है। 
देश में धार्मिक संस्थानों पर सरकार के खर्च को अगर देखें, तो छत्तीसगढ़ में जोगी सरकार ने कुतुबमीनार से भी ऊंचे जैतखंभ को बनाने का फैसला लिया था, और बनाना शुरू किया था जो कि एक सम्प्रदाय का आस्था केन्द्र है। सरकार के लंबे खर्च से यह जैतखंभ बाद में आने वाली भाजपा सरकार ने पूरा किया। इसी तरह कुछ और धर्मों को लेकर सरकार की मिसालों को देखें तो अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में सुबह होने वाले शबद कीर्तन को आकाशवाणी से सीधे प्रसारित किया जाता है, और जो कि अपने किस्म का एक अलग ही विशेष दर्जा है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्य ऐसे हैं जो अपने बुजुर्गों को सरकारी खर्च पर तीर्थयात्राओं पर भेजते हैं। 
अब जब सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर हज सब्सिडी खत्म की जा रही है, तो बिना अगली किसी जनहित याचिका के, बिना सुप्रीम कोर्ट के अगले किसी आदेश के, केन्द्र और राज्य सरकारों को धर्म के मामले में अपने खर्च खत्म कर देने चाहिए। कुंभ या किसी उर्स जैसे किसी बड़े आयोजन के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का इंतजाम चाहे सरकार करती रहे, लेकिन किसी भी तरह के निजी तीर्थ के लिए किसी भी व्यक्ति को सब्सिडी देना खत्म होना चाहिए, धार्मिक इमारतों पर सरकारी खर्च खत्म होना चाहिए। लगे हाथों आज पूरे देश को उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट के इस फैसले को भी देखने की जरूरत है कि सारे धर्मस्थानों से लाउडस्पीकर हटाए जाएं। आज धर्म और आध्यात्म से जुड़ी हुई जगहों पर सुबह से रात तक, और कहीं-कहीं पूरी रात भी लाउडस्पीकर बजते हैं, और लोगों का जीना हराम करते हैं। बुजुर्गों, बीमारों, छात्र-छात्राओं को खासी अधिक दिक्कत होती है, लेकिन ऐसे शोरगुल से बाकी लोगों को भी तनाव होता है, उनकी उत्पादकता घटती है, और उनकी सेहत तबाह होती है। इसलिए सभी सरकारों को कड़ाई बरतते हुए धार्मिक कोलाहल को पूरी तरह से खत्म करना चाहिए, इसे लेकर सैकड़ों बरस पहले कबीर जो कह गए हैं, आज उतनी खरी-खरी, और उतनी कड़ी-कड़ी बात कहने की हिम्मत किसी में है नहीं, और न ही लोगों में इतना बर्दाश्त है। आज तो कोई पाखंड के खिलाफ कबीर की सोच को दुहरा भी दे, तो उसे सूली पर चढ़ाने की तैयारी होने लगेगी। ऐसे में अदालत और सरकार को धार्मिक पाखंड और मनमानी को खत्म करना चाहिए, और धर्म पर खर्च करना भी बंद करना चाहिए। अभी हम हज सब्सिडी को लेकर अलग से कोई बात नहीं कह रहे, लेकिन हज के बाद मानसरोवर, और मानसरोवर के बाद वैटिकन, और वैटिकन के बाद जेरूशलम, यह सिलसिला आखिर कहां तक जाएगा? सरकार को धार्मिक आस्था को निजी मानकर उस पर सार्वजनिक खर्च खत्म करना चाहिए। 
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जनवरी

शहीदों और फौजियों के गांव की दर्दभरी कहानी

संपादकीय
16 जनवरी 2018


कल पन्द्रह जनवरी को देश भर में आर्मी डे मनाया गया। देश की हिफाजत में थलसेना की योगदान को याद करने के लिए हर बरस इस दिन आर्मी डे मनाया जाता है, इसी दिन 1949 में फील्ड मार्शल केएम करियप्पा ने ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बूचर से सेना की कमान सम्हाली थी तब से इसी दिन यह जलसा होता है। लेकिन इस जलसे के दिन भी राजस्थान के झुंझनू जिले के एक गांव धनूरी में यादें तो बहुत ताजा हुईं, लेकिन जिंदगी की दिक्कतें कायम रहीं। आर्मी डे के सिलसिले में इस गांव का जिक्र इसलिए जरूरी है कि मुस्लिम आबादी वाला यह गांव राजस्थान में सबसे अधिक सैनिक शहादत देने वाला गांव है। प्रथम विश्व युद्ध से लेकर अभी हाल तक इस गांव के लोग बढ़-चढ़कर हिन्दुस्तानी फौज में जाते रहे, और अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए शहीद भी होते रहे। गांव का शायद ही ऐसा कोई घर हो जहां से कोई न कोई सेना में न हो। और सेना से परे भी कुछ वक्त पहले छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सल हमले में शहीद सीआरपीएफ जवान बन्नाराम भी इसी गांव के पास के इलाके के थे। देश की आज की फौज में राजस्थान के इस शेखावाटी इलाके के सीकर-झुंझनू जिले के सबसे अधिक लोग किसी भी एक गांव से आए हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि आज हिन्दुस्तानी सेना में इस गांव के 270 जवान हैं, करीब 450 रिटायर्ड जवान यहां बसे हैं, और गांव से 17 शहीद हुए हैं, सारे के सारे मुस्लिम। इस गांव की कहानी देखें तो तमाम मुस्लिम परिवारों के साथ वहां के हिन्दू परिवार सुख-दुख में जुड़े हुए हैं, किसी को किसी से शिकायत नहीं है, और शहीद के परिवार का साथ देने के लिए सारे लोग खड़े हो जाते हैं, हालांकि अब वहां गौरक्षक बने कुछ लोग हमलावर भी हो चले हैं। इस गांव और इस इलाके में शहीद की पत्नी को वीरांगना कहा जाता है, और सम्मान का यह दर्जा सभी तरफ नजरों में भी दिखता है।
लेकिन इस बारे में लिखने की जरूरत आज इसलिए है कि इस गांव में भी लोगों को, शहीदों के कुनबों को छोटी-छोटी बातों के लिए सरकारी दफ्तरों के खूब चक्कर लगाने पड़ते हैं, और किसी को यह परवाह नहीं रहती कि वहां पहुंचा मामला शहीद की पत्नी या उसके बच्चों का है। शहीद के बच्चों के लिए स्कॉलरशिप पाने को पत्नी बीमार हालत मेें दफ्तरों के चक्कर काटती है, और कोई सुनवाई नहीं होती। वहां के रिटायर्ड फौजी बताते हैं कि सरहद से बड़ी जंग देश में फाईलों पर लडऩी पड़ती है और उनका अफसोस है कि वहां तो पता होता है कि दुश्मन कौन है, लेकिन यहां तो अपने ही लोग हैं। जिस गांव के हर घर में फौज को एक-एक औलाद दी है, वहां पर हायर सेकेंडरी स्कूल खोलने को भी राजस्थान सरकार को फुर्सत नहीं है। जो छोटी स्कूल है उसकी बरसों से मरम्मत नहीं हुई है। और तो और ऐसे और इस गांव के स्कूल में एनसीसी थी जिसमें बच्चों को पारिवारिक परंपरा के मुताबिक दिलचस्पी रहती थी, लेकिन उसे भी यहां से हटाकर दूर के एक निजी स्कूलों में भेज दिया है। फौजियों का दर्द है कि घायल सैनिक को नियमों के मुताबिक जमीन से लेकर बाकी चीजों के लिए बिना रिश्वत कोई रास्ता नहीं है।
जो गांव शहादत की मिसाल है, वहां का यह सरकारी हाल भाजपा की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राज में है। अब यह अलग बात है कि वसुंधरा का माता-पिता का सिंधिया परिवार अंग्रेजों का साथ देने के लिए जाना जाता है। भाजपा पूरे देश में सैनिकों को लेकर राष्ट्रवाद चलाती है, और सेना की किसी गड़बड़ी पर भी सवाल उठाने को देश के साथ गद्दारी मानती है। अब शहीदों के इस गांव में शहीदों के परिवारों के साथ  सरकारी सुलूक अगर यह है तो बाकी देश में इक्का-दुक्का बिखरे हुए सैनिक-परिवारों के साथ क्या होता होगा? दरअसल जिस तरह की भावनाएं और जैसा राष्ट्रवाद गायों को लेकर है, और भावनाओं से परे हकीकत यह है कि उन्हें घूरों पर चरने और मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, ठीक वैसा ही हाल रिटायर्ड सैनिकों, शहीदों के परिवारों, और मौजूदा सैनिकों के साथ भी होता है कि जब उनके परिवार को सरकार से कोई काम पड़ता है, तो राष्ट्रवादी सरकारें भी रिश्वत लिए बिना काम नहीं करतीं। राष्ट्रवाद और देशभक्ति के फतवे किसी काम के नहीं हैं, अगर उन पर चलती सरकारों में भी बिना रिश्वत शहीद परिवार को न इलाज मिले, न स्कॉलरशिप, और न ही हक की जमीन। इसलिए सेना की बहुत बात करने वालों को नारों से परे अपना चाल-चलन देखना चाहिए कि असल जिंदगी में क्या अपने को देशभक्त साबित करने, और दूसरों को देशद्रोही साबित करने की बदनीयत से परे, क्या सचमुच उनके मन में सेना और सैनिकों के लिए कुछ करने की हसरत है? राजस्थान का यह गांव सुबूत है जहां के हर मुस्लिम परिवार का कोई न कोई सैनिक है या शहीद है, और फिर भी मुस्लिमों को देश भर में यह हलफनामा टांगकर घूमना होता है कि वे देशभक्त हैं!(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 जनवरी

हरियाणा की जेलों में गौसेवा के फैसले से सूझती कई बातें

15 जनवरी  2018

हरियाणा सरकार ने तय किया है कि वहां की जेलों में गौशाला खोली जाएंगी, कैदी गायों की सेवा करेंगे, और गोबर से गैस बनेगी, दूध से कई तरह के सामान बनेंगे, और कैदियों की, जेल की कमाई भी होगी, गायें सड़कों पर भटकने से बचेंगी। इसके पीछे हरियाणा सरकार की नीयत चाहे गाय के अपने हिन्दुत्व के एजेंडे की क्यों न हो, यह सोच सही है, और इससे कई किस्म के फायदे हो सकते हैं, होंगे।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मैंने अपने बचपन से शहर की सेंट्रल जेल के सामने जेल की बहुत बड़ी जमीन पर कैदियों को लकड़ी के ल_े कुल्हाडिय़ों से काटकर जलाऊ लकड़ी तैयार करते देखा है, जिसे लकड़ी के ही तराजू पर तौलकर बेचा जाता था। जेल के पास बहुत सी खाली जमीन रहती थी जिस पर इस तरह के कई काम होते थे। बाद में शहर के बीच खाली जमीन पर दूसरी जरूरतें आकर खड़ी हो गईं, और उस जगह पर मेडिकल कॉलेज, कॉलेज का हॉस्पिटल, और हॉस्टल वगैरह सब बन गए। जेल के कैदियों के पास से रोजगार का वह एक जरिया खत्म हो गया। इसी जमीन के बगल में म्युनिसिपल की एक गरीब स्कूल में मेरी पढ़ाई होती थी, और वहां से घूमते हुए हम लोग कैदियों के इस बाड़े में भी पहुंचते थे, और इसके ठीक पीछे एक तालाब था जिसमें कैदियों को नहाने के लिए किस्तों में लाया जाता था, और उसका नाम भी कैदी तालाब पड़ गया था।
बाद के बरसों में जब मैंने अखबार में काम शुरू किया, तो जेल को लेकर एक दिलचस्पी बनी हुई थी, और अठारह-उन्नीस बरस की उम्र में एक छोटे रिपोर्टर की हैसियत से मुझे जेल में जाने का मौका मिला, तो वहां पर कई तरह के काम होते दिखते थे। वहां का लकड़ी टाल तो बंद हो चुका था, लेकिन भीतर कैदी गिनीपिग पालते थे जिन्हें मेडिकल कॉलेज के छात्रों की पढ़ाई के लिए बेचा जाता था। कैदी वहां पर बकरियां भी पालते थे, मुर्गी और बत्तख भी पालते थे, और डेयरी तो चलती ही थी। जेल के पीछे बहुत सी खाली जगह थी जहां पर कैदी खेती करते थे। जैसे-जैसे शहर घना होता गया, जेल की जमीन छिनती चली गई, और कैदियों के रोजगार के मौके घटते चले गए। लेकिन शहर के बीच जेल होने का एक फायदा यह भी हुआ कि जेल ने अपने अहाते में एक पेट्रोल-डीजल पंप खोल लिया जो कि शहर बंद होने पर भी चालू रहता है। इसके अलावा कैदी इस पंप के बगल में ही मंगौड़े की एक दुकान चलाते हैं, जो बड़ी कामयाब है, और लोग यहां खाने आते हैं। जेल के भीतर उस वक्त भी कपड़ा बुना जाता था, और आज भी बुना जाता है, कैदियों के कपड़े सिले जाते हैं, फर्नीचर बनाया जाता है।
शहर के बीच होने का एक नुकसान जेल को हुआ कि उसके हाथ से जमीन जाती रही। जिस तरह एग्रीकल्चर कॉलेज के लिए जमीन खेती के प्रयोग के लिए जरूरी होती है, उसी तरह जेल के लिए जमीन रोजगार की आदत के लिए जरूरी होती है ताकि कैदी जब सजा काटकर निकलें, तो बाहर की दुनिया में जिंदा रह सकें, और बस सकें। लेकिन जमीन घटती चली जाने से ऐसी संभावनाएं कम होती जा रही हैं।
हरियाणा की भाजपा सरकार का यह फैसला चाहे गायों को बचाने की नीयत से हो, इसके बारे में सोचने की जरूरत है। एक बात तो यह समझ आती है कि जेलों को शहरों के बाहर ले जाने की जरूरत है ताकि उन्हें बड़ी सी जमीन मिल सके, और वहां पर कैदियों को इंसानों की तरह कामकाज में लगाया जा सके। आज जहां-जहां जेलें शहरों के बीच हैं, वहां उनकी जमीन की कीमत इतनी बढ़ चुकी है कि उस जमीन को किसी प्रमोटर बिल्डर को नीलाम करके उससे शहर के बाहर बहुत बड़ी सरकारी जमीन पर इमारतें बनवाई जा सकती हैं, या सरकार खुद भी अपनी लागत से बाहर ऐसी जेल बनवा सकती है, और शहर के भीतर जेल की इमारत को कोई संग्रहालय बनाया जा सकता है।
जेलों के बारे में अभी कल ही एक रिपोर्ट आई है कि किस तरह देश की जेलों में क्षमता से बहुत अधिक कैदियों को रखा गया है। ऐसे में यह जरूरी है कि जेलों को बाहर ले जाएं, वहां कैदियों को खुले में काम करने के लिए बढ़ावा दिया जाए, तरह-तरह के रोजगार से उनकी उत्पादकता बढ़ाई जाए, वहां आसपास ऐसे गेस्ट हाऊस बनाए जाएं जिनमें कैदियों के परिवारों के लोग पहुंचकर एक-दो दिन अपने घरवालों से मिलकर उनके साथ रह सकें, और उनका हौसला बढ़ा सकें।
जेल की ऐसी बहुत सी बातों के लिए सबसे पहली शर्त तो बड़ी सी जमीन है, और अगर शहर के बाहर ऐसा किया जा सकता है, तो फिर जेलों से लगकर ही वृद्धाश्रम बनाए जा सकते हैं, और वहां रखे गए गरीब, बेघर, बेसहारा, या बीमार लोगों की मदद और सेवा करने के काम में कैदियों को लगाया जा सकता है। जब एक प्रदेश की सरकार गायों की सेवा के लिए कैदियों को लगाने का सोच सकती है, तो दूसरे प्रदेशों की सरकारें भी इंसानों की सेवा के लिए कैदियों की क्षमता का इस्तेमाल कर सकती है।
जेलों को कहने को तो सरकारें सुधारगृह कहती हैं लेकिन आज जेलों का जो माहौल सुनाई पड़ता है, वह इस सोच के साथ मेल नहीं खाता। इसलिए सचमुच ही सुधार अगर करना है, तो भीड़ भरी जेलों के बजाय ऐसे खुले ढांचे विकसित करने का एक बुनियादी फर्क लाना पड़ेगा जो कि समाज के लिए भी अधिक उत्पादक होगा। जेलों में बंद कैदी बाहर के कामगारों की तरह छुट्टी या त्योहार नहीं मनाते, रिश्तेदारियों में नहीं जाते, वे तकरीबन पूरे ही वक्त, तकरीबन हर दिन काम करते हैं, और वे बाहर खुले में काम करने वाले लोगों के मुकाबले अधिक उत्पादक भी रहते हैं, या कि रह सकते हैं।
आज जब देश में कौशल विकास या कौशल उन्नयन नाम से केन्द्र और राज्य सरकारों की अनगिनत योजनाएं चल रही हैं, जब स्किल डेवलपमेंट को देश को आगे बढ़ाने का एक बड़ा औजार मान लिया गया है तब कैदियों का स्किल डेवलपमेंट, या उनके हुनर का इस्तेमाल करते हुए बाकी लोगों को तरह-तरह के काम सिखाना आसानी से किया जा सकता है। देश में और कहीं भी कैदियों सरीखी संगठित वर्कफोर्स नहीं हो सकती जिनकी रोजाना की जिंदगी का एक-एक मिनट सरकार के हाथ में होता है।
जेल का बाकी दुनिया से मोटे तौर पर दो किस्म का रोजाना का कामकाज रहता है, एक तो वहां से कैदियों को अदालत या अस्पताल लाने ले जाने की नौबत आती है, दूसरा यह कि उनसे मिलने के लिए उनके परिवार के लोग आते हैं। ये दोनों ही काम थोड़ी सी बसों को लगाकर आसानी से किए जा सकते हैं, और इसके लिए शहर के बाहर से आना-जाना बहुत महंगा भी नहीं पड़ेगा। हकीकत तो यह है कि अगर सरकार शहर के बाहर की ऐसी जेलों के आसपास सरकारी अस्पताल बनाए, तो कैदी वहां पर काम कर सकते हैं, अगर सरकार इनके आसपास आईटीआई या पॉलीटेक्निक जैसे औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान खोलती है, तो ये कैदी वहां पर ट्रेनिंग दे सकते हैं, ये कैदी पशुपालन, मछलीपालन, पेड़ों की नर्सरी जैसे काम कर सकते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि सरकार के भीतर अगर कुछ उत्साही और कल्पनाशील लोग रहेंगे, तो शहर के बाहर की ऐसी बड़ी जेलों के आसपास एक पूरी बस्ती ऐसी बढ़ा सकते हैं जो कि पूरी तरह से उत्पादक हो।
इसके लिए पहली जरूरत यह लगती है कि अंग्रेजों के वक्त में जेलों के आसपास जिस तरह बड़ी-बड़ी जमीनें रखी जाती थीं, उस तरह की बड़ी जमीनों वाले किसी खुले इलाके में जेलों को ले जाया जाए। एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की राजधानी में जेल के लकड़ी टाल की जमीन पर मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, हॉस्टल बने थे, आज वक्त आ गया है कि पूरी की पूरी जेल इसी मेडिकल कॉलेज को देकर जेल को शहर के बाहर बना दिया जाए, और उससे इसी एक जेल में बंद हजारों कैदियों की एक नई जिंदगी शुरू हो सकती है। (Daily Chhattisgarh)