तीन-तलाक के बाद और भी कई रिवाज खत्म किए जाएं

संपादकीय
22 अगस्त 2017


सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के एक फैसले से मुस्लिम महिला के साथ लंबे समय से चली आ रही बेइंसाफी को खत्म करने की कोशिश की है और तीन-तलाक के प्रचलन को गैरकानूनी करार दिया है। पांच में से तीन जजों ने बहुमत से यह तय किया और केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह छह महीने में इसके लिए कानून बनाए। तब तक देश में तीन-तलाक गैरकानूनी रहेगा।
इस मामले के लिए एक अनोखी संविधानपीठ बनी थी जिसमें पांच अलग-अलग धर्मों के जज थे। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी। ऐसा लगता है कि बौद्ध धर्म को मानने वाले, आमतौर पर दलित कोई जज सुप्रीम कोर्ट में हैं नहीं, या फिर पांच धर्मों में उन्हें शामिल करना जरूरी नहीं समझा गया, और देश में गिनती के पारसियों के समुदाय से आए एक जज को इस बेंच में रखा गया। खैर, हम जजों के अपने धर्म का कोई ऐसा महत्व नहीं देखते कि देश की सबसे बड़ी अदालत जज के धर्म से ग्रस्त फैसले देती हो, वरना क्रिकेट के अंपायर की तरह तीसरे किसी देश के व्यक्ति की तरह सुप्रीम कोर्ट में तीसरे धर्म का जज रखना पड़ता। लेकिन इस चर्चा के बीच यह जिक्र जरूरी है कि इस मामले को मुख्य न्यायाधीश ने इतना महत्वपूर्ण माना कि इसके लिए गर्मी की छुट्टियां रद्द कर दीं, और पक्ष-विपक्ष के वकीलों को भी कह दिया गया कि जजों की तरह वे भी छुट्टी छोड़ इस मामले को निपटाने रोज अदालत आएं।
हम इस फैसले से सहमत हैं क्योंकि किसी धर्म की व्यवस्था के तहत अगर समाज धर्म के नाम पर, या कि धर्म के मुताबिक भी कोई ऐसे रीति-रिवाज लागू करके रखता है जो कि बुनियादी अधिकारों के खिलाफ हैं, मानवाधिकारों के खिलाफ हैं, या कि औरत-मर्द की बराबरी के खिलाफ हैं, तो उन रिवाजों को कानून बनाकर खत्म करना बेहतर और जरूरी दोनों ही हैं। एक वक्त हिंदू धर्म में सती प्रथा को सामाजिक मान्यता थी, आज भी हिंदुओं के बीच बालविवाह को सामाजिक मान्यता है, और विधवा-विवाह को समाज ठीक नहीं मानता, छुआ-छूत को मानता है, दहेज को मानता है, लेकिन इन सबके खिलाफ समय-समय पर कानून बने और लागू हुए। इनकी वजह से हालात काफी कुछ सुधरे और लोगों को धार्मिक-सामाजिक रीति-रिवाजों से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक न्याय और समानता की तरफ बढऩे के मौके मिले।
न सिर्फ मुस्लिम समाज में, बल्कि कई दूसरे समाजों में भी धर्म के नाम पर, या कि धार्मिक परंपरा के रूप में बेइंसाफी चलती रहती है। इनको खत्म करने के लिए सिर्फ समाज सुधार कभी काफी नहीं होते। वरना राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद की कोशिशें ही काफी होतीं। समाज के जो सबसे कट्टर और धर्मांध लोग होते हैं, वे कभी भी सुधार को आने नहीं देते क्यों उनकी अपनी नेतागिरी कट्टरता पर टिकी होती है। हमारा मानना है कि किसी भी धर्म की खाप पंचायतें हों, उनसे ऊपर देश के लोकतांत्रिक कानून को रखना ही होगा। किसी समाज के सबसे धर्मांध नेताओं को खुश रखने के चक्कर में यह देश एक बार मुस्लिम समाज की शाहबानो को कुचल चुका है। जब सुप्रीम कोर्ट ने उसे उसका हक दिलाया था तो कट्टर और दकियानूसी मुस्लिम नेताओं के आंदोलनों की धमकी से डरकर, और उन्हें खुश रखने के लिए तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद में अपने ऐतिहासिक बाहुबल से कानून बदल डाला था, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले और शाहबानो के हक दोनों को दफन कर दिया था। इस बार ऐसी उम्मीद है कि केंद्र सरकार चूंकि खुद ही लगातार तीन-तलाक के खिलाफ लगी हुई है, और मुस्लिम समाज के भीतर भी एक बड़ा तबका इस हिंसक प्रथा को खत्म करने का हिमायती है, इस बार संसद मुस्लिम महिला को हक दिलाने का कानून बनाएगी, और शाहबानो के साथ दशकों पहले हुए बेइंसाफी की कालिख अपने चेहरे से पोंछेगी।
हमारा यह साफ मानना है कि किसी धर्म के लोगों का आबादी में अल्पसंख्यक हो जाने से उस धर्म के तहत चलते रिवाजों की खामियों और बेइंसाफियों को जारी रखने देना गलत होगा। भारत को योरप की तरफ भी देखना चाहिए, वहां के जो विकसित और सभ्य देश हंै, वे एक तरफ तो अपनी मूल आबादी की नाराजगी भी झेलते हुए मुस्लिम देशों से पहुंच रहे लाखों शरणार्थियों को अपनी जमीन पर बसा रहे हैं, उन्हें बचा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ वे मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने के रिवाज के खिलाफ कानून बना रहे हैं जो कि उनकी अपनी अदालतों से लेकर यूरोपीय संसद तक सभी जगह सही ठहराए जा रहे हैं। इस मामले को लेकर दुनिया भर में एक मतभेद है, और बहस जारी है कि मुस्लिम महिला पर बुर्का एक बोझ है, बंधन है, या कि यह उसकी पोशाक की आजादी है। लेकिन हमारा यह मानना है कि मुस्लिम महिला का बुर्का हो या कि हिंदू महिला का घूंघट हो, यह सब महिला की आजादी के खिलाफ के रिवाज हैं, और इनको समाज सुधार से या कानून बनाकर खत्म करना बेहतर होगा, बजाय इसके कि इसे मुस्लिम महिला की आजादी माना जाए। कल तक तो हिंदू धर्म में पति खोने वाली महिला के लिए भी यही कहा जाता था कि वह अपनी मर्जी से सती होती है। लेकिन ऐसी मर्जी आमतौर पर महिलाओं पर थोप दी जाती है, और इसे उनकी आजादी का हक मानना गलत है। योरप के देश यह सही कर रहे हैं कि वे अपने कानून के मुताबिक इसे आजादी के बजाय बंधन मान रहे हैं, और कानून बनाकर इसे खत्म कर रहे हैं। भारत में भी महिलाओं की हालत सुधारने के लिए ऐसी बहुत से रिवाज खत्म करने की जरूरत है, और तीन-तलाक का खात्मा एक बड़ी शुरुआत होनी चाहिए, न कि किसी बात का अंत।

गुमनाम संदेश की नई तकनीक साराहा, पखानों के भीतर लिखने जैसी सुविधा?

आजकल
21 अगस्त 2017

अभी एक नई मैसेंजर सर्विस शुरू हुई है, जिसका नाम है साराहा। इस शब्द का मतलब अरबी भाषा में ईमानदारी से या दिल खोलकर सच-सच कह देना होता है। इस नाम के मुताबिक ही इस मोबाइल एप्लीकेशन को गढ़ा गया है, इससे आप लोगों को संदेश भेज सकते हैं, लेकिन उन्हें आपका नाम पता नहीं चलेगा। भेजने वाले के नाम के बिना जाने वाले संदेशों का कोई जवाब भी नहीं दिया जा सकेगा। और आज की दुनिया में जब लोगों को एक-दूसरे तक संदेश भेजने के बावलेपन का दौर चल रहा है, लोग इसका इस्तेमाल करने पर टूट पड़े हैं। लेकिन इससे जुड़ी हुई कुछ बातों पर पहले सोच लेना बेहतर होगा, बजाय बिना सोचे इसका इस्तेमाल करने के।
पहली बात तो यह है कि कई बरस पहले जब फेसबुक जैसा एक सोशल मीडिया शुरू हुआ, तब भी लोगों को यह शक था कि यह अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए का एक औजार है, और इससे लोग अपनी निजी और गोपनीय बातों को भी संदेश के बक्से में, या अधिक दुस्साहसी लोग इन्हें खुले रूप में भी लिखने लगे हैं। यह लतीफा भी चल निकला था कि फेसबुक आने के बाद अमरीकी सरकार ने सीआईए का खुफिया बजट घटा दिया है क्योंकि अब उसे मेहनत की जरूरत नहीं रहती, लोग ही अपने आने-जाने, खाने-पीने, जान-पहचान के बारे में लिख देते हैं, और तस्वीरें पोस्ट कर देते हैं। कुछ लोगों का अब भी यह शक है कि दुनिया की खुफिया एजेंसियां फेसबुक पर निजी संदेश को भी देखने की ताकत रखती हैं, और कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता। इसके बाद वॉट्सऐप नाम का एक दूसरा मैसेंजर लोकप्रिय हुआ, और दुनिया की सरकारें इसके संदेशों पर निगरानी रखने का कानूनी हक पाने के लिए अदालतों में पहुंची हुई हैं।
अभी जो लोग यह मानकर चलते हैं कि निजी संदेश गोपनीय रहते हैं, और मिटा देने पर वे हमेशा के लिए मिट जाते हैं, वे गलती पर हैं। कम्प्यूटर, फोन या इंटरनेट पर एक बार का भेजा हुआ कुछ भी कभी नहीं मिटता, और आगे-पीछे ऐसी तकनीक विकसित हो जाएगी जो मिटाई गई तमाम बातों को भी दुबारा सुबूत की शक्ल में खड़ा कर देगी। अब ऐसी नौबत में यह एक नया संदेशवाहक आया है जो कि भेजने वाले के नाम-नंबर के बिना एक गुमनाम संदेश पहुंचा देता है। हो सकता है कि जो लोग आधुनिक तकनीक को ताबीज की तरह मान लेते हैं, वे लोग इस बात पर भी भरोसा कर लें कि ये संदेश सचमुच ही गोपनीय रहेंगे, और हमेशा के लिए गोपनीय रहेंगे। लेकिन ऐसे लोगों को यह याद रखना चाहिए कि दुनिया की सबसे ताकतवर अमरीकी सरकार के राजदूत अपनी सरकार को जो खुफिया ई-मेल भेजते थे, उन्हें विकीलीक्स ने करोड़ों की संख्या में चारों तरफ उजागर कर दिया था। इसके पहले और इसके बाद भी दुनिया की कुछ सबसे गोपनीय जानकारी उजागर हो गई थी, और कारोबार की दुनिया में बैंकों के कम्प्यूटरों को हैक करके सेंधमार अरबों-खरबों की चोरी करते ही रहते हैं।
ऐसे में अरब दुनिया से ईमानदारी के एक खिलौने की शक्ल में सामने आए इस मैसेंजर साराहा के बारे में सोचें, तो इसे इंसानी सोच के साथ जोड़कर देखना होगा। जब लोगों को गुमनाम कुछ करने की सहूलियत होती है, तो उनके भीतर की सबसे बुरी बातें निकलकर सामने आती हैं। किसी भी सार्वजनिक जगह पर पखानों के दरवाजों के भीतर लोगों की सारी भड़ास लिखी हुई दिखती है, और मौका मिलने पर खुली दीवारों और पेड़ों पर भी लोग अपनी हसरतों को गोद डालते हैं। ऐसे में जब लोगों को यह कहा जा रहा है कि उनके संदेश उनके नाम के बिना जाएंगे, तो लोगों के भीतर की हिंसा, उनकी भड़ास, उनकी अपूरित इच्छाएं, वे सब सामने आने लगेंगी। और देर रात अपने बिस्तर पर बैठे या लेटे हुए लोगों को बाकी दुनिया को परेशान करना कुछ वैसा ही सूझने लगेगा जैसा कि कुछ सार्वजनिक जगहों पर लोग अपने कपड़े हटाकर औरों को अपना बदन दिखाकर करने लगते हैं।
गुमनाम संदेश, यह सुनने में तो एक अच्छी सहूलियत है, लेकिन दूसरी तरफ जिन लोगों को ऐसे संदेश मिलेंगे, उनका दिमागी सुख-चैन हो सकता है कि बहुत से संदेशों से गायब होने लगे। लोग यही सोचते हैरान हो जाएंगे कि कौन उनसे मिलने की हसरत जाहिर कर रहे हैं, कौन उनके खुफिया राज जानते हैं, और कौन ऐसे लोग हैं जो कि उनसे इतनी नफरत करते हैं, या कि धमकी भेज रहे हैं। यह अपने आप में एक कानूनी दिक्कत की बात भी हो सकती है कि किसी को धमकी मिले, और वह उसके खिलाफ शिकायत भी न कर पाए। यह देश के कानून के खिलाफ भी हो सकता है कि ऐसा कोई मैसेंजर हो जो गुमनाम काम करे, और जिसे जांच एजेंसियां भी पकड़ न पाएं, रोक न पाएं। इसलिए यह लोगों के दिमागी सुख-चैन से लेकर देश के कानून तक के लिए परेशानी का मैसेंजर हो सकता है। दुनिया में टेक्नालॉजी बनती तो है लोगों की जिंदगी में सहूलियतें बढ़ाने के लिए, लेकिन धीरे-धीरे तकनीक के सारे औजारों का बेजा इस्तेमाल भी होने लगता है, और जब यह इस्तेमाल बढ़ते-बढ़ते गुमनाम इस्तेमाल तक पहुंचने लगे, तो उसके कुछ अलग खतरे होने लगते हैं।
लोगों को याद होगा कि जब विकीलीक्स ने अमरीकी सरकार और उसके राजदूतों के बीच के करोड़ों ई-मेल उजागर किए, तो दुनिया भर के देशों को, वहां के नेताओं को, और वहां के प्रमुख लोगों को यह देखकर सदमा लगा था कि अमरीकी लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। अब यह सोचें कि साराहा जैसे मैसेंजर कल के दिन कानूनी रूप से या तकनीकी सेंधमारी से यह उजागर करने को बेबस हो जाएगा, या कि उसका भांडा फूट जाएगा, और सारे संदेशों के साथ यह बात इंटरनेट पर तैरने लगेगी कि किसने किसको क्या लिख भेजा था, तो उस वक्त क्या होगा? यह कुछ उसी तरह का रहेगा कि पखाने के भीतर कैमरा फिट करके यह रिकॉर्ड कर लिया जाए कि दरवाजे के पीछे कौन सी गाली कौन लिख रहे हैं।
लोगों को अलग-अलग तरह की गोपनीयता देने वाले कुछ और मैसेंजर भी बाजार में है। सिग्नल नाम का एक मैसेंजर ऐसा माना जाता है कि उसे खुफिया एजेंसियां आसानी से हैक नहीं कर पातीं। यह मैसेंजर यह सुविधा भी देता है कि लोग अपने भेजे संदेशों के साथ यह तय कर सकें कि वे कितने सेकेंड बाद अपने आप मिट जाएंगे। अब ऐसी सुविधा के साथ लोग अधिक गोपनीय बातें, अधिक खतरनाक बातें लिखने को भी महफूज मान बैठने का खतरा उठा लेते हैं। लेकिन कल के दिन यह साबित हो जाए कि फोन की स्क्रीन से कुछ सेकेंड में गायब हो जाने वाले संदेश विकीलीक्स जैसे किसी भांडाफोड़ू ने इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिए हैं, तो क्या होगा?
इसलिए यह समझ लेना चाहिए कि टेक्नालॉजी कोई तिलस्म नहीं है, और दुनिया में सौ फीसदी गोपनीयता किसी चीज की नहीं होती। आज तो लोगों के दिल-दिमाग में जो सोच है, वह जरूर गोपनीय है, लेकिन इसके बारे में भी लोगों को यह मालूम रहना चाहिए कि दुनिया की कुछ सबसे आधुनिक प्रयोगशालाएं इसी बात का प्रयोग कर रही हैं कि लोगों के दिमाग को कैसे पढ़ा जा सके। जैसे-जैसे इसके लिए औजार बनते चलेंगे, वैसे-वैसे लोग अपनी सोच के साथ भी बिना कपड़ों की तरह हो जाएंगे, और मशीनें यह बताने लगेंगी कि किसके दिमाग में क्या चल रहा है। ऐसे में किसी भी टेक्नालॉजी, किसी भी मैसेंजर सर्विस पर एक अंधविश्वास करना ठीक नहीं है। साराहा नाम का यह नया मैसेंजर आने के कुछ दिनों के भीतर ही कई ऐसी फर्जी वेबसाइटें आ गई हैं जो यह दावा कर रही हैं कि वे आपके पास आए इस गुमनाम संदेश को भेजने वाले के नाम-नंबर बता सकती हैं। अभी तो ऐसे दावे फर्जी दिख रहे हैं, लेकिन असली दावे अधिक दूर भी नहीं होंगे। इसलिए टेक्नालॉजी के बजाय अपनी सोच, अपनी नीयत, और अपने चाल-चलन पर अधिक भरोसा करना बेहतर है।

गोरखपुर की मौतों से भी कुछ सीखा नहीं छत्तीसगढ़ ने

संपादकीय
21 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, राजधानी के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, में ऑक्सीजन की गड़बड़ी से तीन बच्चों की मौत की खबर है, और स्वास्थ्य विभाग के अफसर अस्पताल की गड़बड़ी को छुपाने में लग गए हैं। स्वास्थ्य सचिव को आनन-फानन प्रेस कांफ्रेंस लेनी पड़ी, और उसमें यही उजागर हुआ कि वे मीडिया को सफाई तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें खुद पूरी जानकारी नहीं है। दूसरी बात यह कि सरकार ने इसी विभाग के अफसरों को जांच का जिम्मा दिया है, जिनके मातहत ये मौतें हुई हैं। तीसरी बात यह कि स्वास्थ्य सचिव ने किसी भी जांच के शुरू होने के पहले ही अस्पताल और विभाग को एक तरह से क्लीन चिट दे दी, ऐसे में किसी जांच से हकीकत सामने आने की संभावना बुरी तरह मार खाती है।
जिन लोगों को प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में जाने की नौबत आती है, वे इसे नर्क सरीखा पाते हैं। और यह अस्पताल प्रदेश के सबसे ताकतवर लोगों के आने-जाने के रास्ते में है, मुख्यमंत्री-राज्यपाल से लेकर मंत्री और सचिव तक यहां आते-जाते हैं, और इसकी बदहाली इस बात का सुबूत है कि प्रदेश के बाकी सरकारी अस्पताल इसके मुकाबले और खराब हालत में होंगे। आज की इन मौतों के बाद सिलेंडर-कर्मचारी को शराबी और नशे में होने की वजह से निलंबित किया गया है, और यह हाल अस्पताल में सैकड़ों डॉक्टर-कर्मचारियों का है जो कि निलंबित किए जाने के लायक हैं। दरअसल प्रदेश के ताकतवर लोगों के अपने इलाज के लिए सरकार ने निजी अस्पतालों मेें खर्च करने की छूट दे रखी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि सरकारी अफसर, मंत्री, और सरकारी खर्च पर इलाज पाने वाले बाकी लोग अपने और अपने परिवार के लिए सरकारी इलाज के मोहताज नहीं रह गए हैं, और सरकारी अस्पतालों को ऐसा लगता है कि एक सोची-समझी साजिश के तहत बर्बाद किया जा रहा है ताकि सरकार के सैकड़ों करोड़ रूपए निजी अस्पतालों को दिए जा सकें।
ऑक्सीजन की कमी या गड़बड़ी से मौत होने की नौबत इसलिए नहीं आनी चाहिए थी कि अभी-अभी उत्तरप्रदेश में एक बड़ा जुर्म हुआ है, और साठ बच्चे मारे गए हैं। उस घटना से पूरे देश के बाकी सरकारी अस्पतालों को एक सबक लेना था।  पिछले हफ्ते गोरखपुर पर लिखते हुए हमने इसी जगह आधा दर्जन बार छत्तीसगढ़ के बारे में भी सरकार को सचेत किया था। हमारे नियमित पाठकों ने पढ़ा होगा-
...छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।...
...सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी  बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।...
...छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है।...
ऊपर के ये सारे पैराग्राफ हमने पिछले हफ्ते-दस दिन में इसी जगह लिखे थे, और उन्हें आज फिर दुहराने की जरूरत लग रही है। अस्पताल के इस ताजा हादसे की जांच तो हो जाएगी, और उसमें भी कुसूरवार को बचाने की पूरी कोशिश भी हो जाएगी, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों के हाल सुधारने के लिए अगर कोई गंभीर कोशिश नहीं होगी, तो सरकार को यह बात समझ लेना चाहिए कि सरकारी अस्पताल से भुगत कर लौटने वाले लोग इतने जख्मी होकर आते हैं कि अगले चुनाव तक उनके जख्म सूखेंगे नहीं।

अखबारों को मीडिया के व्यापक दायरे से बाहर निकलना चाहिए

संपादकीय
20 अगस्त 2017


कल अंधेरा होने के बाद उत्कल एक्सप्रेस बेपटरी हुई, करीब दो दर्जन मौतें हुईं, और आबादी के बीच का इलाका होने की वजह से मीडिया अपने कैमरों सहित आनन-फानन वहां पहुंच गई। नतीजा यह हुआ कि बिखरे हुए टूट-फूटे डिब्बों के नीचे से पटरियों और वहां पहले से चल रही, और शायद हादसे के लिए जिम्मेदार भी, मरम्मत के औजारों को दिखा-दिखाकर टीवी समाचार चैनलों के कैमरे अपने दर्शकों को नजारा दिखा रहे थे। कोई टीवी रिपोर्टर पटरियों पर ट्रेन के ब्रेक लगने के निशान छू-छूकर दिखा रहा था, तो उनमें से कई एक-एक औजारों को उठा-उठाकर साबित कर रहे थे कि यहां मरम्मत चल रही थी।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे बड़े रेल हादसे के बाद जब यह जांच शुरू होनी है कि कौन सी बातें इस हादसे के लिए जिम्मेदार रहीं, तो पटरियों के निशान, और औजारों को हटा-हटाकर की जा रही रिपोर्टिंग क्या सुबूतों को चौपट भी करेगी? किसी छोटे से हादसे या छोटे से जुर्म में भी सुबूतों की इज्जत की जाती है, और एक घेरा डालकर उस जगह से सभी लोगों को दूर रखा जाता है। खुले में हुए रेल हादसे में लोगों की जिंदगी बचाना सबसे अधिक जरूरी रहता है, और इसलिए वहां पर ऐसा कोई घेरा नहीं डाला जा सकता, लेकिन क्या अरबों के कारोबार वाले मीडिया में अपने लोगों को इतना सिखाने की जहमत उठाई जा सकती है कि वे सुबूतों के साथ ऐसी छेड़छाड़ न करें? लेकिन आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल यह है कि उसके चैनलों के बीच पल-पल का गलाकाट मुकाबला रहता है। अखबारों में तो चौबीस घंटे में एक बार का मुकाबला रहता है, लेकिन चैनलों में मिनट भर की देरी भी एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के प्रचार में काम आती है। नतीजा यह होता है कि सब कुछ, सबसे पहले, और सबसे अधिक खुलासे से दिखाने की होड़ किसी और बात की इज्जत नहीं छोड़ती।  किसी जुर्म के नजारे को दिखाते हुए आसपास के बच्चों के चेहरे धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों या महिलाओं की शिनाख्त भी कई तरह से उजागर होती रहती है।
अब टीवी चैनलों से परे एक और मीडिया आगे बढ़ रहा है जो कि इंटरनेट का इस्तेमाल करता है, और वहां पर सबसे पहले खबरों को डालने के मुकाबले में लगा हुआ है। वेब-आधारित मीडिया को टीवी चैनलों की तरह किसी उपग्रह की जरूरत भी नहीं पड़ती, और न ही महंगे या बड़े कैमरों की। नतीजा यह होता है कि एक मोबाइल फोन से रिकॉर्डिंग भी हो जाती है, और तस्वीरें या वीडियो पोस्ट भी हो जाते हैं। इनकी हड़बड़ी टीवी चैनलों से भी अधिक होती है, और एक समय पत्रकारिता जिस तरह की जिम्मेदारी का काम होता था, सामाजिक सरोकार और नीति-सिद्धांत का काम होता था, वह अब कमजोर होते-होते पहले तो मीडिया बना, और अब वह मीडिया और सोशल मीडिया के बीच की एक नई संकर-नस्ल बन गया है जो पूरी तरह से बेकाबू है, और जवाबदेही से भी परे है। अखबारों में एक वक्त छपकर प्रेस से निकल चुके पन्ने पुख्ता सुबूत रहते थे, और गलती की कतरनें पूरी जिंदगी मुंह चिढ़ाती थीं, वह नौबत अब वेब-आधारित खबरों से गायब हो गई है, क्योंकि पहले पोस्ट करो, फिर जांचों-परखो के दौर में अपनी जानकारी गलत मिलने पर लोग बिना किसी सफाई के, सीधे पोस्ट हटा देते हैं, और बात को आई-गई मान लेते हैं।
इसलिए कम से कम छपे हुए मीडिया को अपने पुराने नाम, प्रेस, या अखबारनवीसी, या पत्रकारिता की तरफ लौटना चाहिए। इसके बाद आज इस्तेमाल हो रहे मीडिया शब्द को बाकी तमाम लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए, ताकि वे टीवी के लिए या कि इंटरनेट के लिए इसका मनचाहा इस्तेमाल करें। अखबारनवीसी एक वक्त बड़ी जिम्मेदारी और बड़ी इज्जत का काम माना जाता था, फिर चाहे वह चौबीस घंटे में महज एक बार समाचार-विचार देता था। अखबारों को अपने उसी रूख की तरफ लौटना चाहिए क्योंकि छपे हुए शब्द आज भी अधिक जिम्मेदारी के साथ तय होते हैं, फिर चाहे उन्हीं अखबारों के वेब-संस्करण गैरजिम्मेदारी से क्यों न बनते हों। आज मीडिया नाम के एक बहुत ही व्यापक दायरे से प्रेस को बाहर निकल जाना चाहिए, और अपनी पुरानी पहचान बनाकर, पुराने तौर-तरीकों से, अधिक ईमानदार काम करना चाहिए।

सरकारी अनुदान पर गायों को ऐसी मौत कोई और देता तो?

संपादकीय
19 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में एक भाजपा नेता और म्युनिसिपल में निर्वाचित पद पर बैठे हुए स्थानीय मुखिया की गौशाला में पिछले दो-चार दिनों में दर्जनों गायों की बहुत ही बुरी हालत में मौत पाई गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो सौ से अधिक गायें मारी गई हैं क्योंकि उन्हें खाना भी नहीं मिला। जब थोक में इतनी मौतें हो गई हैं, और इतनी लाशों को ठिकाने लगाना मुमकिन नहीं था, तो गौसेवा आयोग ने पुलिस रिपोर्ट की, और यह भाजपा नेता गिरफ्तार किया गया। अब जानकारी सामने आ रही है कि इसकी गौशाला को पिछले पांच बरस में करीब एक करोड़ रूपए का सरकारी अनुदान मिला था, और अनुदान के बेजा इस्तेमाल से लेकर गायों की बदहाली तक के लिए इसे सरकारी नोटिस मिलते रहे। यह सब भाजपा का एक हिन्दू नेता करते रहा, और इसके बाद जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि किस तरह सरकारी अनुदान पर गौशाला चलाकर हिन्दू नेता कमाई कर रहे हैं, और उनकी गऊमाता भूखों मर रही है।
यह मामला भयानक इसलिए भी है कि देश भर में जगह-जगह दो-चार गायों को लेकर भी दलितों और अल्पसंख्यकों को पीट-पीटकर मार डाला गया है, और देश में कुछ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि इसमें इंसानों के रहने की गुंजाइश चाहे न बचे, गायों का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए। ऐसे में जब शहरी घूरों पर जगह-जगह गायें गंदगी, मैला, और प्लास्टिक का कचरा खाते दिखती हैं, तो लगता है कि उनकी वो राष्ट्रवादी संतानें कहां हैं जिन्हें गाय की निकलती हुई सांस में भी ऑक्सीजन दिखता है, गोमूत्र में सोना दिखता है, गोबर में रेडियो एक्टिविटी रोकने की ताकत दिखती है, और इन सबमें कैंसर का इलाज दिखता है? गाय के नाम पर साम्प्रदायिक और हिंसक राजनीति करने वाले तब क्या करते जब छत्तीसगढ़ की इस गौशाला में हुई सैकड़ों मौतों के पीछे कोई गैरहिन्दू, कोई दलित या कोई अल्पसंख्यक जिम्मेदार होता?
यहां दो बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं। एक तो गाय को लेकर देश में जो साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है, उसे जिस तरह राष्ट्रवाद से जोड़ा जा रहा है, और उसे लेकर जिस तरह की अवैज्ञानिक बातें फैलाई जा रही हैं, उन्हें वैज्ञानिक सच ठहराया जा रहा है, वह सब अपने आपमें बड़ी फिक्र का सामान है। अब उसके साथ-साथ यह भी है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी अनुदान से सैकड़ों करोड़ रूपए लेकर गौशाला चलाने वालों ने अपनी संतानों के लिए कई पीढिय़ों का भ्रष्टाचार जमा कर लिया, और गाय की कई पीढिय़ों को मार डाला। बिहार में नीतीश-भाजपा गठबंधन सरकार के वक्त भाजपा के नेताओं ने सृजन नाम के एनजीओ के नाम पर सरकारी खजाने से करीब हजार करोड़ रूपए पार कर दिए, और अब वे लोग फरार हैं। लेकिन उसमें कम से कम किसी गाय का नाम नहीं था, इसलिए भाजपा के उन नेताओं ने कोई राष्ट्रद्रोह नहीं किया था, गऊमाता का कोई निवाला नहीं छीना था, महज गरीब जनता के खजाने के हजार करोड़ रूपए पार कर दिए थे। लेकिन छत्तीसगढ़ में तो इन हिन्दू नेताओं ने गाय पालने की गौशाला के नाम पर जगह-जगह फर्जीवाड़ा किया, और गाय को भूखे मार डाला। यह अनुदान देने वाला छत्तीसगढ़ सरकार का पशुपालन विभाग है जिसके मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अभी इजराइल के दौरे से ऐसी गौशालाओं पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भेज रहे हैं। लेकिन उनके विभाग से बंटने वाले ऐसे अनुदान पाकर भयानक भ्रष्टाचार करने की शिकायतें तो खुद विभाग की जांच में बरसों से साबित होती रही हैं, और इस पर अगर उन्होंने कार्रवाई की होती, तो उसके बाद से अब तक ऐसी हजारों गायों को भूखे और बीमार नहीं मरना पड़ता। बृजमोहन अग्रवाल से यह उम्मीद इसलिए भी की जाती थी कि उनके पिता पूरी जिंदगी से राजधानी रायपुर की एक सबसे बड़ी गौशाला से जुड़े हुए हैं। हमने इसी अखबार में गौशालाओं को सरकारी अनुदान में करोड़ों के घोटाले की रिपोर्ट एक-दो बरस पहले ही सरकारी जांच के हवाले से छापी थी, लेकिन जाहिर है कि उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। आज जब यह बात लिखी जा रही है, तब इजराइल के प्रवास से कृषि एवं पशुपालन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का भेजा समाचार मिला है कि वे वहां पर अत्याधुनिक डेयरी देख रहे हैं। उन्हें वहां से यह भी देखकर लौटना चाहिए कि बिना खाना दिए गायों को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है, ताकि छत्तीसगढ़ में उनकी सरकार की बदनामी न हो।
सैकड़ों गायों की लाशों का हिसाब अब सामने आ रहा है, और छत्तीसगढ़ के टीवी चैनलों पर भयानक तस्वीरें दिख रही हैं कि किस तरह ट्रैक्टर ट्रॉली भर-भरकर लाशों को छुपाया गया है। ऐसे एक गौशाला संचालक को गिरफ्तार करना काफी नहीं है, और राज्य सरकार ने सभी जिलों में गौशाला की जांच का जो आदेश दिया है, उस पर अगर ईमानदार रिपोर्ट आएगी, तो दर्जनों लोग सरकारी अनुदान में अफरा-तफरी के जुर्म में गिरफ्तार हो जाएंगे। दूसरी तरफ जिन गौभक्तों को गाय में ईश्वर दिखते हैं, उनको गाय या ईश्वर से यह सवाल भी करना चाहिए कि गाय को भूखे मारने वाले लोगों को क्या कोई सजा मिलेगी? या फिर गाय की जिंदगी महज घूरों पर ही गुजरेगी? एक अखबार में यह भी लिखा हुआ है कि गौशाला घोटाला करने वाला यह भाजपा नेता मरी गाय की खाल को मछलियों की चारे की तरह इस्तेमाल करता था, और तालाब में डालता था। देश भर में दलितों और अल्पसंख्यकों को जितने तरह की गौ-हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराया जा रहा है, उसमें कई नई मौलिक किस्में छत्तीसगढ़ में जुड़ रही हैं, और राज्य सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग गायों को ऐसा भूखा मारने की रिपोर्ट पढ़ते हुए क्या खुद खाना खा सकेंगे?
आज देश भर में गाय को लेकर जिस तरह का अवैज्ञानिक और हिंसक-साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है, केन्द्र और राज्य तरह-तरह के कानून बना रहे हैं, उन सबको लेकर देश की खेती से पशुओं का खात्मा हो रहा है। अब कोई किसान जानवर पालने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे, और छोटे-छोटे डेयरी वाले भी डर-सहमकर अपने कारोबार बदल देंगे। तो क्या यह पूरा गौ-उन्माद डेयरी के अरबपति-खरबपति कारोबार को बढ़ावा देने का एक हथियार भी है? ऐसी कई बातें मन में उठती हैं क्योंकि गौ-उन्माद में बनाए गए कानूनों से देश में करोड़ों लोगों का पशु आधारित रोजगार खत्म हो चुका है जिसमें डेयरी से लेकर खेती तक, और चमड़े से लेकर हड्डियों तक का कारोबार है। गाय-भैंस के मांस का कारोबार आज देश के खरबपति कारखानों में धड़ल्ले से जारी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसे जुर्म बनाकर खत्म कर दिया गया है। इस तरह यह धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद करोड़ों के रोजगार छीनकर कुछ सौ लोगों को अरबपति बनाने का एक अभियान भी साबित हो रहा है। 

दिग्विजय का एक अनोखा कदम छह महीने की नर्मदा परिक्रमा

संपादकीय
18 अगस्त 2017


मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह सत्ता के बाहर रहते हुए भी कभी खबरों के बाहर नहीं रहते। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद जब 2003 में विधानसभा चुनाव हुए, तो दिग्विजय सिंह दस बरस की सत्ता को खो बैठे, और कांग्रेस को बड़ी शर्मनाक हार हुई। उसके बाद उन्होंने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक फैसला लिया, और अपने आपको दस बरस के लिए चुनावों और सत्ता से परे कर लिया। कांग्रेस संगठन में उन्हें पार्टी के सबसे आक्रामक संघ-विरोधी के रूप में महत्व मिलता रहा, और एक वक्त ऐसा था जब उन्हें राहुल गांधी के राजनीतिक शिक्षक-प्रशिक्षक के रूप में भी देखा जाता था। हालांकि इस कुनबापरस्त पार्टी में जिसके भविष्य की हत्या करनी हो, उसके बारे में ऐसे विशेषण चला देना काफी होता है, और दिग्विजय सिंह के मौजूदा संगठन-पतन के पीछे हो सकता है कि यह भी एक वजह रही हो। जिस कुनबे के लोग अपनी वंशावली की वजह से देश को चलाने के हकदार माने जाते हों, पार्टी के मालिक रहते हों, उन्हें भी किसी से कुछ सीखना पड़ता है, ऐसी अपमानजनक बात कांग्रेस में किसी को आगे नहीं बढ़ा सकती। लेकिन दिग्विजय सिंह को कांग्रेस संगठन ने फिलहाल खारिज सरीखा कर दिया है, और एक-एक करके तमाम राज्यों का जिम्मा उनसे ले लिया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि गोवा में अधिक विधायक होते हुए भी उनकी चूक से वहां कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई, और इसलिए अब उनके प्रभार से सभी राज्य ले लिए जा रहे हैं।
दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह ने यह घोषणा की है कि वे छह महीने की एक नर्मदा परिक्रमा पर निकल रहे हैं, और मध्यप्रदेश से शुरू करके गुजरात तक वे एक गैरराजनीतिक पदयात्रा करेंगे जो कि उनके अपने धार्मिक और आध्यात्मिक उपयोग के लिए होगी। ऐसी खबरें हैं कि उन्होंने इसके लिए पार्टी से छह महीने की छुट्टी मांगी है, और सभी पदों से मुक्त करने का आग्रह किया है। कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि दिग्विजय सिंह अपने प्रदेश में खोई हुई जमीन वापिस पाना चाहते हैं, और वे इस यात्रा के बहाने मध्यप्रदेश और गुजरात की करीब डेढ़ सौ विधानसभा सीटों को विधानसभा चुनावों के पहले छू लेंगे, उनके भीतर से गुजरेंगे, और यह पदयात्रा भोपाल की सत्ता की तरफ वापिसी की यात्रा भी हो सकती है, जो कि अमरकंटक से गुजरात की ओर जाती तो दिखेगी, लेकिन वह अमरकंटक से भोपाल के श्यामला हिल्स पर मुख्यमंत्री निवास की तरफ जाने के मकसद से की जा रही होगी।
दिग्विजय सिंह में कुछ बात तो है जो कि उन्हें मिटने से बचाकर रखती है। वे आरएसएस और हिन्दू साम्प्रदायिकता के इतने कट्टरविरोधी हैं कि वैसी कट्टरता कांग्रेस पार्टी की नीति में भी नहीं दिखती। दूसरी तरफ वे हिन्दू-मुस्लिम सद्भावना के इतने बड़े हिमायती हैं कि वे कई मौकों पर मुस्लिम समाज को बचाते हुए उसकी चापलूसी की तोहमत भी झेल लेते हैं। आज जब पूरे देश में एक बहुत ही हिंसक और आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद फैल चुका है, और फैलाया जा रहा है, तो दिग्विजय सिंह मानो इस बिफरे हुए सांड को सींग से पकड़कर रोकने की कोशिश करते भी दिखते हैं। फिर ऐसा करते हुए उन्हें सोशल मीडिया पर लोग डॉग्विजय सिंह लिखते रहें, या कि पिग्विजय सिंह लिखते रहें, वे उसके परवाह नहीं करते। हमारा ख्याल है कि आक्रामक हिन्दुत्व और हिन्दू साम्प्रदायिकता से लडऩे के मामले में कांग्रेस पार्टी के भीतर दिग्विजय जितना हौसला और किसी का नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि वोटों की राजनीति में कांग्रेस पार्टी एक संगठन के रूप में इतनी आक्रामकता पसंद करती है, या नहीं। यह भी है कि जिस तरह दिग्विजय ने अपने आपको सत्ता से दस बरस के लिए खुद होकर बाहर कर लिया, वैसा कोई फैसला बाकी कांग्रेसी अपने खुद के बारे में कभी पसंद नहीं कर सकते। लेकिन दिग्विजय सिंह का ऐसी लंबी पदयात्रा का फैसला कांग्रेस पार्टी या कि कांग्रेसी सोच के लिए फायदे का हो सकता है, और कांग्रेस पार्टी को यह भी देखना चाहिए कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विचारधारा से मजबूत ऐसे और कौन से नेता हो सकते हैं जो कि पार्टी के लिए इस तरह की मेहनत कर सकें। भाजपा की संगठन की राजनीति में एक शब्द सुनाई पड़ता है, समयदानी। जो लोग पार्टी के काम के लिए अपने एक बरस या उससे कुछ कम समय को देने को तैयार हों। आज भाजपा तो विजयरथ पर सवार चारों तरफ फैल रही है, लेकिन अगर कांग्रेस को अपने अस्तित्व को बचाना है, तो उसे अपने संगठन में अच्छी साख वाले ऐसे समयदानी नेता ढूंढने होंगे जो कि देश के हर हिस्से में जाकर पार्टी की विचारधारा को बताएं, देश के सामने खड़े हुए मौजूदा खतरों को बताएं, और कांग्रेस की जमीन तैयार करें। इस हिसाब से दिग्विजय की यह पहल कांग्रेस के सामने एक अच्छी मिसाल भी हो सकती है कि गांव-गांव तक जाकर किस तरह लोगों से बात की जानी चाहिए।

बाढ़ से निपटने के क्या-क्या तरीके हो सकते हैं भारत में

संपादकीय
17 अगस्त 2017


भारत के बहुत से हिस्सों में हर बरस बड़ी बुरी बाढ़ आती है। और यह बाढ़ भारत के साथ-साथ बांग्लादेश में भी दिखती है जहां भारत से जुड़ी हुई नदियां पहुंचती हैं। दूसरी तरफ अभी बिहार की बाढ़ में आई हुई खबर बताती है कि नेपाल ने वहां बाढ़ को देखते हुए अपने बांध से पानी छोड़ा, और उसकी वजह से बिहार में नौबत और बुरी हो गई। अभी चीन के साथ सरहद पर जो फौजी तनाव चल रहा है, उसके चलते  ऐसी आशंका है कि हथियारों की जंग के पहले चीन वहां से पानी छोड़कर भी एक जंग शुरू कर सकता है। कुल मिलाकर बात यह है कि एक तो कुदरत की नाराजगी, और फिर पड़ोस में बसे हुए देशों से बिगड़े हुए रिश्ते, ये दोनों मिलकर बाढ़ की तबाही को और बुरा कर सकते हैं। साथ-साथ यह भी याद रखने की जरूरत है कि दुनिया में एक्स्ट्रीम वेदर कहे जाने वाली स्थितियां बढ़ती चल रही हैं, यानी अगर बारिश होती है तो अंधाधुंध हो जाती है, ठंड पड़ती है तो कई-कई फीट बर्फ शहरों को दबा देती है, और गर्मी पड़ती है तो लू में सैकड़ों लोग मरने लगते हैं। मौसम की मार के ऐसे दिन हर बरस बढ़ते चले जा रहे हैं, और यह फिक्र छोटी नहीं है, किसी एक देश तक सीमित नहीं है, और सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं है।
लेकिन पूरी दुनिया में मौसम में बदलाव को रोकना तो एक इतना बड़ा अभियान है कि जब तक अमरीका जैसे गैरजिम्मेदार देश मौसम के समझौतों को तोडऩे पर आमादा रहेंगे, तब तक बाकी दुनिया मिलकर भी इस बदलाव को पूरी तरह थाम नहीं सकती। फिर इंसान लगातार ऐसी नौबत ला रहे हैं कि उससे बाढ़ बढ़ती चले। हिन्दुस्तान में ही नदियों के आसपास के जंगल कटते चले जा रहे हैं, और उनकी जड़ों को थामकर रखने वाली मिट्टी ढीली होकर पानी में बहकर नदियों तक पहुंचने लगी है, और नदी की पानी सम्हालने की क्षमता को घटा चुकी है। नतीजा यह है कि बाढ़ बढ़ती जा रही है। फिर इंसान नदियों के किनारों को रेत के लिए खोद रहे हैं, नदियों के बहुत करीब तक जाकर शहर और बस्तियां बसा रहे हैं, और यह मानकर चल रहे हैं कि हर मानसून में सरकार और फौज आकर उन्हें बचाने का अपना जिम्मा पूरा करेंगी।
इस सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पर्यावरण के लिए खतरनाक और अच्छी दोनों तरह की समझी जाने वाली नदी जोड़ योजना पर अभी काम शुरू भी नहीं हुआ है, और भारत की सबसे बड़ी अदालत लाठी लेकर इसे पूरा करवाने में लगी हुई है। नदियों के जोडऩे से पर्यावरण पर कितना फर्क पड़ेगा, इसका अभी अंदाज नहीं है। लेकिन नुकसान से परे एक फर्क यह भी पड़ सकता है कि बाढ़ का अतिरिक्त पानी उन नदियों तक चले जाए जिनके इलाके में बाढ़ नहीं है, बिजली बनाना बढ़ जाए, सिंचाई बढ़ जाए, और हो सकता है कि जल परिवहन शुरू हो जाए। हम आज यहां इस जगह नदी जोड़ परियोजना के नफे-नुकसान पर अधिक खुलासे से चर्चा करना नहीं चाहते क्योंकि इससे बाढ़ के मौजूदा खतरे की बात धरी रह जाएगी। आज भारत में असम और बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ जितनी विकराल दिख रही है, उसका लंबे वक्त के लिए कोई इलाज ढूंढना जरूरी है। हो सकता है कि आबादी को नदियों के किनारे से कुछ दूरी पर ले जाना एक समाधान हो, दूसरा समाधान नदियों को जोडऩे से हो सकता है, और तीसरा समाधान यह हो सकता है कि जिस-जिस इलाके में बाढ़ आती है, वहां पर समय रहते जमीन के भीतर पानी को डालने का काम व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जाए ताकि बिना प्रदूषण भूजल स्तर बढ़ सके। ऐसा तो उन इलाकों में भी होना चाहिए जहां बाढ़ से अधिक तबाही नहीं आती है। जो इलाके डूबते नहीं है, वहां भी जमीन के भीतर बारिश के पानी को डालने के लिए बड़े-बड़े तालाब बनाए जाने चाहिए, और वे ऐसे रास्तों पर हों जहां से होकर पानी नदियों तक जाता है। नदियों में बाढ़ आए, और वे ही इलाके गर्मियों में सूख जाएं, यह एक अदूरदर्शिता की वजह से पैदा होने वाली नौबत है। बारिश और बाढ़ के अतिरिक्त पानी को समंदर तक जाना घटाना चाहिए, और उस पानी का जमीन के भीतर इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसी टुकड़ा-टुकड़ा बहुत सी बातें हैं जिन पर बाढ़ के दौरान सोचा-विचारा जा सकता है।

माणिक सरकार को अब त्रिपुरा के बाहर बाकी दुनिया ने भी पढ़ा

संपादकीय
16 अगस्त 2017


अबकी बार स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह पर भारत में पहली बार एक बात हुई जो कि शायद इसके पहले कभी नहीं हुई थी। त्रिपुरा के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री माणिक सरकार का भाषण दूरदर्शन ने रिकॉर्ड करने और प्रसारित करने से मना कर दिया, और मुख्यमंत्री को बता दिया गया कि उन्होंने जो बातें लिखी हैं उनके साथ उसे प्रसारित नहीं किया जा सकता। दूरदर्शन को नियंत्रित करने वाली केन्द्र सरकार की स्वायत्तशासी संस्था प्रसार भारती की तरफ से मुख्यमंत्री को बताया गया कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों के भावनाओं के अनुरूप बनाएं। माणिक सरकार ने अपने भाषण में कोई फेरबदल करने से मना कर दिया। अब उनकी पार्टी ने वह भाषण सार्वजनिक किया है, और उसके मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए।
त्रिपुरा के एक दुर्लभ साख वाले, बहुत ही किफायत और सादगी से चलने वाले, ईमानदारी के लिए मशहूर मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपने भाषण में आज देश में फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता, और गाय के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों पर किए जा रहे हमलों की चर्चा की है। उन्होंने अनेकता में एकता वाली भारत की संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा कि आज कुछ ताकतें देश को तोडऩे की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने बिना किसी पार्टी या संगठन का नाम लिए हुए यह लिखा जो लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, बल्कि अंग्रेजों के साथ मिलकर जिन्होंने आजादी के आंदोलन का विरोध किया था, आज वे लोग देश की जड़ों पर हमला करके देश को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। उनके भाषण में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद के नाम पर देश में फैलाए जा रहे तनाव के खिलाफ पूरी तरह से अहिंसक और शांतिवादी बातें कही गई हैं।
केन्द्र सरकार के हाथ महज इतना ही तो है कि दूरदर्शन या आकाशवाणी पर किसी मुख्यमंत्री के भाषण को रोक दे। इससे अधिक तो सरकार कुछ कर नहीं सकती। केन्द्र का यह रवैया भी हैरान करने वाला है जिसमें एक मुख्यमंत्री को कहा गया है कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं। यह तो अपना-अपना नजरिया है, भाजपा के कोई मुख्यमंत्री अपने नजरिए से कोई बात कह सकते हैं, वामपंथी मुख्यमंत्री का अपना नजरिया हो सकता है, और कश्मीर में महबूबा की बात किसी तीसरी तरह की हो सकती है। अगर यह कहा जाए कि वे अपने भाषण को लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं, तो यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि किन लोगों की भावनाओं के अनुरूप? माणिक सरकार का भाषण देश के अल्पसंख्यक तबके, दलित और आदिवासी तबके, गरीब और धर्मनिरपेक्ष तबके की भावना के अनुरूप है, और यह आबादी ही देश में आधी से अधिक आबादी है। देश में एक बहुत छोटी आबादी बाकी पूरी आबादी के खान-पान, उसकी देशभक्ति के पैमाने, उसकी भाषा, और उसके पहरावे पर काबू पाने में लगी है। ऐसी ताकतों के बीच माणिक सरकार ने देश को बचाने और एक बनाए रखने की एक समझदारी की बात कही है, जो कि सरकारी रेडियो-टीवी के बिना भी अहमियत रखती है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की जनता से यह सलाह मांगते दिख रहे थे कि वे लालकिले से आजादी की सालगिरह पर अपने भाषण में कौन सी बातों को शामिल करें। और दूसरी तरफ जब देश के एक सबसे अच्छे मुख्यमंत्री ने देश को एक रखने की बात कही, तो उसके भाषण को ही रोक दिया गया! प्रधानमंत्री को यह सोचने की जरूरत है कि उन्होंने सलाह मांगने का जो सार्वजनिक आव्हान किया था, उसका क्या हुआ? देश के संघीय ढांचे में एक राज्य के मुख्यमंत्री की अहिंसक और धर्मनिरपेक्ष बातों को रोक देने का अधिकार केन्द्र को कैसे मिला है, इस बारे में भी प्रधानमंत्री को इसलिए बात करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने लालकिले से भारत के ढांचे को एक कोऑपरेटिव फेडरलिज्म कहा है। अब एक मुख्यमंत्री के भाषण को रोकना किस तरह से एक सहकारी-संघवाद कहा जा सकता है? दरअसल माणिक सरकार की सोच तो उनके राज्य में लोग अच्छी तरह जानते हैं, अब उनके भाषण को रोककर केन्द्र सरकार ने पूरी दुनिया को उनकी वामपंथी सोच को जानने का मौका दिया है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों का हुआ है जिन्हें आलोचना से बचाने के लिए केन्द्र सरकार ने माणिक सरकार को रोका।

गोरखपुर की मौतों से निकलते हुए सबक

संपादकीय
14 अगस्त 2017


गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में पिछले दो दिनों से हमने काफी कुछ लिखा है, लेकिन आज कुछ और बातें हैं जिन पर लिखना जरूरी है। उत्तरप्रदेश के सांसद वरूण गांधी ने इस हादसे को देखते हुए अपने संसदीय क्षेत्र सुल्तानपुर में सांसद निधि के पांच करोड़ रुपये देकर तुरंत ही एक बाल चिकित्सा केंद्र का काम शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि वे इस काम के लिए अलग-अलग कंपनियों के सामाजिक सरोकार मद से पांच करोड़ रुपये  और जुटाएंगे। इस बात पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि गोरखपुर न केवल उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मठ वाला शहर है, बल्कि वे लगातार पांच बार वहां से सांसद रहे और अब सांसद रहते-रहते मुख्यमंत्री भी बने। अब अगर वे ताजा मौतों को लेकर यह सफाई दे रहे हैं कि यह इलाका हमेशा से ही बीमारियों की वजह से ऐसी मौतों वाला रहा है, तो सवाल यह उठता है कि इतने बरसों तक लगातार सांसद रहते हुए वे अब तक इस बारे में पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर पाए थे? उनके पांच बार के सांसद कार्यकाल में तो पहले भी छह बरस अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केंद्र में थी, और वाजपेयी खुद भी उत्तरप्रदेश से ही सांसद थे। अब अगर सत्ता की इतनी ताकत के रहते हुए योगी आदित्यनाथ अपने ही शहर के लिए कुछ नहीं कर पाए थे, तो इससे उनकी क्षमता पता लगती है। वे सांसद रहते हुए भी हिंदू-मुस्लिम पे्रम संबंधों के खिलाफ एक हिंसक और हमलावर अभियान के अगुवा रहते आए हैं, और उनका निजी संगठन आज भी भाजपा सरकार के रहते हुए भी अलग से एक साम्प्रदायिक और हिंसक कार्रवाई चलाते रहता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका एक साम्प्रदायिक एजेंडा चल रहा है जिसके तहत उत्तरप्रदेश के हर मदरसे को आजादी की सालगिरह पर झंडा फहराकर अपनी देशभक्ति का वीडियो सुबूत बनाकर सरकार को देना है। जाहिर है कि अपने इलाके के बीमार बच्चों, या कि वहां हर बरस फैलने वाली दूसरी बीमारियों को रोकने के बजाय योगी का ध्यान हिंदुत्व को लागू करवाने में लगा हुआ था। आज ही एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह गोरखपुर में ही इंसेफलाइटिस से विकलांग मरीजों के इलाज और पुनर्वास के लिए बने विभाग के ग्यारह कर्मचारियों को सत्ताईस महीने से वेतन नहीं मिला, और वहां से तीन डॉक्टर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। यह हाल केंद्र में मोदी की पार्टी की सरकार आने के तीन बरस बाद का है, उत्तरप्रदेश से नरेन्द्र मोदी के सांसद बनने के ढाई बरस बाद का है, और योगी के मुख्यमंत्री बन जाने के आधे बरस बाद का तो है ही।
हम वरूण गांधी की खबर को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि किसी एक जगह अगर आग लगती है, तो बाकी लोगों को भी अपने-अपने घर संभाल लेने चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।

परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है..

संपादकीय
13 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में जिस तरह ऑक्सीजन की कमी से साठ या अधिक बच्चे दो-चार दिनों में मारे गए हैं, वह मामला एक न्यायिक जांच से कम का नहीं है, लेकिन न तो उत्तरप्रदेश सरकार इसकी परवाह कर रही, न ही उत्तरप्रदेश में हाईकोर्ट ने खुद होकर इसका कोई संज्ञान लिया, सरकार से जवाब मांगा, या कि किसी जांच का आदेश दिया। केन्द्र सरकार का रूख भाजपा के राज वाले प्रदेशों में बड़ा साफ है कि जितनी मौतों पर प्रधानमंत्री दुनिया के किसी और देश के लिए भी हमदर्दी ट्वीट कर देते हैं, उससे दस गुना मौतें भी अगर भाजपा राज में हो जाएं, तो वे चुप्पी साधे रहते हैं। यह सिलसिला देश के लोगों को बहुत विचलित कर रहा है, और परंपरागत मालिकाना हक वाले मीडिया से परे आज देश और दुनिया में बागी तेवरों वाला और अभूतपूर्व आजादी वाला जो सोशल मीडिया अतिसक्रिय है, वह इन बातों पर गौर कर रहा है। उस पर बागी तेवर भी दिखते हैं, बिके हुए तेवर भी दिखते हैं, और गुलाम तेवर भी देखते हैं। इन तमाम पहलुओं के पूर्वाग्रहों के साथ सोशल मीडिया पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह सत्ता और मीडिया के एकाधिकार को एक बड़ी चुनौती है, और बेजा इस्तेमाल के तमाम खतरों के बीच भी सोशल मीडिया आजादी की ताजी हवा का एक झोंका बना हुआ है।
जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, और भाजपा के अश्वमेधी घोड़े की लगाम थामने को अब हाथ नहीं बचे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि चुनावों से परे लोकतंत्र इतिहास दर्ज करते चलता है। चुनाव का इतिहास तो चुनाव आयोग दर्ज कर देता है, वह बहुत मेहनत का काम भी नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र की बाकी बातों, बाकी पहलुओं का इतिहास बहुत सी ताकतें, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब बहुत से कमजोर तबके भी, लिखते हैं, और लिख रहे हैं। लोग यह भी देख रहे हैं कि किस तरह कल लाशों के बीच किसी एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती मंच पर जोर-जोर से हॅंस रहे थे। लाशों के बीच की यह हॅंसी महज एक तस्वीर से ही दर्ज हो जाती है, और उसके लिए वामपंथी या दक्षिणपंथी इतिहासकारों की जरूरत नहीं पड़ती। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि ऐसी ही हॅंसी बिलासपुर की नसबंदी मौतों की लाशों के बीच उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की भी दर्ज हुई थी, और मुख्यमंत्री जब दम तोड़ती महिलाओं से बात कर रहे थे, तब सरकारी अस्पताल के वार्ड में स्वास्थ्य मंत्री देर तक जोरों से हॅंसते जा रहे थे। उस वीडियो को किसी और टिप्पणी या इतिहास लेखन की जरूरत नहीं थी।
लेकिन सोशल मीडिया की सारी मौजूदगी के बीच भी हैरानी इस बात की है कि उत्तरप्रदेश के मंत्रियों से लेकर केन्द्र सरकार के भाजपा मंत्रियों तक के पास इस बात का भारी हौसला बचा है कि गोरखपुर में बच्चों की लाश थामे रोते-बिलखते मां-बाप के दिलों के जख्म पर और नमक छिड़कें। इन मंत्रियों और नेताओं के बयान अगर सुनें, तो ऐसा लगता है कि जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह तो इनके भीतर बाकी ही नहीं है, और वह सामान्य समझ भी बाकी नहीं है कि इस चुनावी दुनिया में जिंदा रहने के लिए जिस जनता की जरूरत इंदिरा से लेकर मोदी तक हर किसी को पड़ती है, उस जनता की भावनाओं को बिना वजह अपने बूटों से कुचलते जाना समझदारी नहीं है। इतिहास ऐसी छोटी-छोटी वीडियो क्लिप भी अब सम्हालकर रख रहा है, प्रधानमंत्री सहित बाकी लोगों की चुप्पी को सम्हालकर रख रहा है, और दम तोड़ते बच्चों की सांसों की कीमत पर आक्सीजन-कमीशनखोरी करते योगी के अफसरों को भी दर्ज कर रहा है। इन मौतों के कुछ ही घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बेटी के कुछ महीने बाद भारत आने की तारीख तय होने पर ट्वीट करके उनका स्वागत किया था। गोरखपुर में दर्जनों नवजात बच्चों की ऐसी अकाल मौत पर हमदर्दी ट्वीट न करके वे उत्तरप्रदेश की अपनी सरकार की मदद नहीं कर रहे हैं, खुद अपनी चुप्पी को अपने ही हाथों इतिहास में दर्ज कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया के मार्फत लिखा जा रहा इतिहास अब तक के परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है।