दूध की धार भूखे पेटों की तरफ क्यों नहीं मोड़ता ईश्वर?


संपादकीय
20 फरवरी 2012
देश भर में आज हिंदू समुदाय शिवरात्रि मना रहा है। सरकारी दफ्तरों की छुट्टी है और शिवमंदिरों में लोगों की भीड़ लगी है। शिवलिंग पर से दूध की धार थम ही नहीं रही है। जितनी तस्वीरें हमारे फोटोग्राफर लेकर आए हैं या जो टीवी के परदे पर दिख रही हैं वे दूध से अभिषेक की तस्वीरें हैं। यही त्यौहार नहीं, बाकी त्यौहार भी और दूसरे धर्मों के भी त्यौहार भी, इसी किस्म के बहुत से रीति-रिवाज लेकर आते हैं जब ईश्वर के सामने लड्डुओं से लेकर तरह-तरह की कुर्बानी चढ़ाई जाती है। ऊपर वाले का दरबार चढ़ावों से लबालब होता है। सड़क किनारे से जब लोगों को हटाया जाता है तो रोज कमाकर रोज खाने वाले फुटपाथी लोग सबसे पहले हटाए जाते हैं, और ईश्वर की दूकान आखिर तक चलती रहती है।
इस बात की चर्चा आज जरूरी इसलिए है कि इस देश में भूख और कुपोषण से हर बरस आधा-एक करोड़ बच्चे मारे जाते हैं। एक तरफ इतनी बड़ी गरीब आबादी की जिंदगियों को जारी रखने का इंतजाम नहीं है, और दूसरी तरफ आज ही दक्षिण भारत के एक मंदिर की दौलत को गिनने का काम अदालती आदेश से शुरू हुआ है। आज ही एक दूसरी खबर है कि अमिताभ बच्चन की अच्छी सेहत के लिए उनका परिवार एक मंदिर पहुंच रहा है। इस परिवार में सुख और दुख के हर मौके पर मंदिर के भगवानों को उनके दर्शन होते हैं, लेकिन इस परिवार की किसी रहमदिली के दर्शन किसी गरीब को हुए हों ऐसी कोई खबर कभी पढऩे में नहीं आती। खैर, हर बरस ये आंकड़े भी आते हैं कि तिरूपति के मंदिर की इस बरस की कमाई कितनी रही और दूसरे किसी धर्म स्थान की कितनी। ईश्वर को जो लोग मानते हैं, वे कहते हैं कि दुनिया में एक पत्ता भी उसकी मर्जी के बिना नहीं हिलता। ऐसे में हमारे मन में यह सवाल उठता है कि कुपोषण से, भूख से दसियों लाख बच्चों को इस देश में ही मरते हुए देखने वाला ईश्वर अपनी पत्थर की मूर्ति पर बहाए जाने वाले दूध की धार को गरीबों की तरफ, भूखों मरते बच्चों की तरफ क्यों नहीं मोड़ पाता? और अगर यह मोडऩे में उसकी दिलचस्पी नहीं है, या यह उसकी ताकत से परे है तो फिर वह किस तरह सर्वशक्तिमान ईश्वर माना जा सकता है?
दुनिया में त्यौहारों के हर मौके पर आस्था का सैलाब देखने मिलता है। यह तो हिंदुस्तान का लोकतंत्र है जो हमें ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने की इजाजत देता है। दुनिया के कई ऐसे अधिक धार्मिक कट्टर देश हैं जिनमें ऐसे एक सवाल से लोग जेल चले जाते हैं और लंबी सजा या मौत की सजा तक पहुंच जाते हैं। लेकिन ऐसे लोकतंत्र में जहां पर कि गरीबी और भुखमरी की तस्वीरें आए दिन अखबारों में दिखती हैं वहां भी आस्थावान लोग ईश्वर के बजाय भूखों को दूध चढ़ाना, लड्डू खिलाना क्यों नहीं सोच पाते? हम पल भर के लिए बहस के लिए यह मान भी लें कि धर्म का लोगों पर कुछ अच्छा असर होता है और ईश्वर के प्रति आस्था रखने वाले लोग नास्तिकों से बेहतर होते हैं। लेकिन ऐसा एक भी सुबूत तो देखने नहीं मिलता कि उनके ईश्वर के बनाए हुए लोगों की भूख मिटाने को लोग पूजा समझते हों, और धर्म स्थलों की जगह लोग त्यौहारों पर गरीबों की बस्तियों में जाते हों। सच तो यह है कि धर्म और ईश्वर की सोच ही लोगों को कई किस्म के अपराधबोध और ग्लानि से उबरने में मदद करती है। अगर इस जन्म, पिछले जन्म और अगले जन्म की धारणा न हो, पाप और पुण्य जैसी सोच प्रचलित न हो, तो लोग गलत काम करने से हिचकेंगे और इसी जन्म में अच्छा काम करने लगेंगे। हर धर्म लोगों को हजार किस्म के खराब काम करने के बाद प्रायश्चित की छूट देता है और एक वाशिंग मशीन की तरह धर्म लोगों को अपनी आत्मा पर लगे दाग-धब्बों को धोने की बड़ी सस्ती सहूलियत देता है। दुनिया में लगभग तमाम लोग आस्तिक और आस्थावान हैं, नास्तिक तो उंगलियों पर गिने जाने वाले ही किसी को भी याद आएंगे। ऐसे में दुनिया में इतनी बेइंसाफी कैसे है? अगर ईश्वर की धारणा लोगों को गलत काम से रोकती होती तो फिर दुनिया में गलत काम खत्म ही हो जाने थे।
आज हम इस चर्चा को दूध की धार देखते हुए छेड़ रहे हैं, और बहस के लिए एक और पल के लिए मान लेते हैं कि ऊपर बैठा ईश्वर सब कुछ देख रहा है। तो फिर उसके बारे में लिखी गई इस बात को तो वो शर्तिया ही देख लेगा, और अगर वह सर्वशक्तिमान है तो फिर वह दूध की धार को भूखे पेटों की तरफ मोड़ भी देगा।
हम इसका इंतजार करेंगे।


1 comments:

  1. जो दूध बाज़ारों में बिक रहा है वो इंसानों के लिए मुफीद नहीं सो खुद ही ज़हर पी रहा है ईश्वर ! या यूं कहिये कि...

    बेचारे ईश्वर को ज़हर दे रहे हैं इंसान :)

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