235 एकड़ जंगल फर्जी पट्टे बना 50 करोड़ में बेचा


माइनिंग कंपनी को फायदा पहुंचाने पूर्व कलेक्टर, डीएफओ भी फंसे
राजस्व मंडल में भी हुआ खेल अब निरस्त करवाने रिवीजन
शशांक तिवारी
रायपुर, 21 अगस्त। सरगुजा जिले के रामचंद्रपुर इलाके में करीब 50 करोड़ के जमीन घोटाला मामले की जांच पूरी हो गई है। सरकारी और घने जंगल की जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे बेचने की अनुमति देने के लिए तत्कालीन कलेक्टर जी.एस.धनंजय को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस मामले में डीएफओ और एसडीएम के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। राजस्व बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष टी.राधाकृष्णन ने जमीन को फर्जी पट्टे पर चढ़ाने की अनुमति दी थी। इस मामले में रेवेन्यू बोर्ड में रिवीजन केस दायर किया जा रहा है। 
जमीन घोटाले पर सरकार ने सरगुजा कमिश्नर से जांच रिपोर्ट मांगी थी। कमिश्नर एम.एस.पैकरा ने अपनी रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। रामचंद्रपुर  ब्लॉक के इंदरपुर में कोल ब्लॉक के लिए 94 हेक्टेयर (करीब 235 एकड़) सरकारी जमीन निजी कंपनी फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड को बेच दी गई। घोटाले का मास्टर माइंड लालजी यादव को बताया गया है। कमिश्नर ने जांच के बाद यादव समेत पटवारी, नायब तहसीलदार, उप पंजीयक सहित अन्य दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के भी निर्देश दे दिए हैं। जमीन बेचने की अनुमति निरस्त करने के आदेश कलेक्टर को दिए गए हैं। 
बताया गया कि इस मामले की जांच के लिए जल संसाधन मंत्री रामविचार नेताम ने भी अनुशंसा की थी। मुख्य सचिव सुनील कुमार ने भी स्थानीय नेताओं की शिकायत पर राजस्व विभाग से रिपोर्ट मांगी है। कमिश्नर श्री पैकरा ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में बताया कि उन्होंने जांच रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। सूत्रों के मुताबिक तत्कालीन कलेक्टर धनंजय के अलावा तत्कालीन डीएफओ वी.एस.ध्रुव, एसडीएम राठौर को गलत तरीके से अनुमति देने के  मामले में जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराया गया है। यह बताया गया कि पट्टा 34 लोगों को 1972 में आबंटित किया जाना बताया  गया। जबकि उक्त प्रकरण तहसील कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। 
राजस्व पट्टा को देखने से यह पता चलता है कि पुराने दस्तावेज हासिल कर नाम चढ़ाए गए हैं। जबकि वर्ष 72 में राजस्व पट्टे के दस्तावेज अलग तरीके के थे। जिन लोगों के नाम से पट्टे जारी किए गए उनमें से कई लोग उस वक्त पैदा भी नहीं हुए थे। यह भी पता चला है कि कथित पट्टाधारी लोगों में से कई पड़ोसी राज्य झारखंड के रहवासी हैं। सूत्र बताते हैं कि फर्जी तरीके से खरीद-बिक्री में जिला प्रशासन के ऊपर से नीचे तक तमाम अफसरों की भूमिका रही है। कथित पट्टाधारियों ने नायब तहसीलदार के यहां जमीन बेचने के लिए अनुमति मांगी।
नायब तहसीलदार ने जांच कर प्रतिवेदन कलेक्टर को भेज दिया और कलेक्टर ने जमीन बेचने की अनुमति दे दी। दिलचस्प बात यह है कि पट्टे की जमीन बेचने की अनुमति देने के मामले में कलेक्टर ही अधिकृत होते हैं। नायब तहसीलदार को अपने यहां प्रकरण दर्ज करने का भी अधिकार नहीं होता। लेकिन इस मामले में प्रक्रिया उलट दी गई। तत्कालीन डीएफओ ने अपनी रिपोर्ट में जमीन वृक्षारोपण योग्य बता दिया था। जबकि उसके बड़े हिस्से में अभी भी सघन वन है। इसे बेचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 
यह बात सामने आई है कि जमीन एसकेएस इस्पात को बेचने की कलेक्टर ने अनुमति दी थी। लेकिन फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड के नाम से रजिस्ट्री कर दी गई। इस पूरे मामले में उप पंजीयक को भी दोषी ठहराया गया है। पटवारी से लेकर नायब तहसीलदार और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश कमिश्नर द्वारा पहले ही दिए जा चुके हैं। 
फर्जी पट्टे बनाकर जंगल की जमीन को बेचने के इस षडय़ंत्र के खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है। 235 एकड़ जमीन को मात्र 50 करोड़ रुपए में बेच दिया गया है जबकि इस जमीन पर करोड़ों के सिर्फ पेड़ ही हैं। यह कोल ब्लाक एसकेएस इस्पात और प्रकाश इण्डस्ट्रीज को आबंटित हुआ है। जमीन की इस अफरा-तफरी के खुलासे से अधिकारी भी भौंचक हैं। इस मामले में प्रारंभिक तौर पर सिर्फ पटवारी और नायब तहसीलदार का ही निलंबन हुआ है। कमिश्नर की जांच रिपोर्ट के बाद जमीन की अनुमति देने वाले अफसरों के अलावा खरीद-बिक्री करने वालों पर भी कार्रवाई होने की संभावना है। शासन जल्द ही इस मामले में कार्रवाई कर सकता है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें