हिरासत में अपमान करने वाले अफसरों से 5 लाख वसूल प्रताडि़त को दें-सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, 4 अगस्त ।  सर्वोच्च न्यायालय ने 1992 में एक आयुर्वेदिक डॉक्टर को  हिरासत में प्रताडि़त करने के लिए छत्तीसगढ़ के पुलिस अफसरों की कड़ी आलोचना करते हुए राज्य सरकार को  इस अपमान से हुई मानसिक यातना की भरपाई के लिए डॉक्टर को 5 लाख रुपये देने को कहा है। अदालत ने कहा है कि यह रकम दोषी पुलिस अफसरों से वसूलकर डॉक्टर को दी जाए।
यह आदेश जस्टिस के एस राधाकृष्णन और दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने डॉ. महमूद नय्यर आजम की अपील पर दिया।  सितम्बर 1992 में  इस डॉक्टर पर कई मामले दर्ज किए गए थे। रायपुर पुलिस ने हिरासत में इस डॉक्टर  को एक तख्ती लेकर खड़ा किया जिस पर लिखा था कि वह चोर धोखेबाज और बदमाश है। पुलिस ने इस हाल में उसकी तस्वीर खींचकर उसे बंटवा दिया था। नय्यर आजम खनन माफिया के खिलाफ लोगों को संगठित कर रहे थे, और उच्च न्यायालय ने पुलिस के इस कृत्य को मानव अधिकारों का गम्भीर उल्लंघन माना था।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा- इसमें कोई शक नहीं कि अभियुक्त के साथ हिरासत में अपमान, और मानसिक यातना देने वाला बर्ताव करना मानवीय गरिमा के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
खंडपीठ ने कहा कि आईपीसी और विद्युत अधिनियम 2003 के  तहत पकड़े गए अपीलकर्ता को मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत देने पर भी जेल ले जाने की बजाए अगले दिन पुलिस थाने लाया गया, और खुद के लिए अपमानजनक शब्द लिखी हुई  तख्ती पकड़कर खड़ा करके उनकी तस्वीर न केवल खींची गई, बल्कि उसे आम जनता के बीच बंटवा भी दिया गया। यह तस्वीर एक प्रतिवादी ने राजस्व प्रक्रिया में जमा भी करवाई।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा था  कि अपीलकर्ता को प्रताडि़त किया गया।
खंडपीठ के लिए फैसला लिखते समय जस्टिस मिश्रा ने कहा कि, हिरासत में रखे नागरिकों को संविधान की धारा 21 के तहत दिए गए नागरिक अधिकारों से वंचित न किया जाए। यह याद रखना पुलिस अधिकारियों का पुण्य कर्तव्य है। उसके मूलभूत अधिकारो में कटौती को कानून की मंजूरी मिली हुई है, लेकिन उसके बुनियादी अधिकार इतने भी खत्म नहीं कर दिए गए है कि पुलिस अधिकारी उसके साथ अमानवीय तरीके से बर्ताव कर सके।
खंडपीठ ने कहा, खुद को बहुत बड़ा समझने वाले कुछ खब्ती अफसरों की यह विकृत धारणा होती है कि वही कानून है, लेकिन वह भूल जाते हंै कि कानून,  हर बात में सही और न्यायोचित क्या है, यह तय करने, और एक सभ्य समाज की हिफाजत करने वाला विज्ञान है।
उल्लेखनीय है कि आजम के मानव अधिकारों का हिरासत में उल्लंघन होना मानने के बावजूद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कहा कि मुआवजे की उनकी याचिका खारिज करते हुए उन्हें यह आवेदन राज्य सरकार के सामने करना चाहिए,  और  उसके द्वारा खारिज हो जाने के बाद उन्हें इसके लिए एक दीवानी मुकदमा दायर करना चाहिए। उच्च न्यायालय के इस फैसले पर खंडपीठ ने कहा- यह न केवल एक व्यक्ति को सीजऱ की जगह सीजऱ की पत्नी से अपील करने को कहना हुआ, यह अभिशप्त सिसिफस को पहाड़ की चोटी तक चट्टान ले जाने को कहने जैसा है जो चट्टान वहां से लुढ़कने पर अनगिनत बार यह कवायद करने को मजबूर है।
खंडपीठ ने कहा- इसमें शक नहीं कि  अपीलकर्ता असंवेदनशील पुलिस अधिकारियों के हाथों अपमानित हुआ है।  हो सकता है उसे  गरीबों, और बेसहारा लोगों की खातिर गुस्सा आया हो, लेकिन उसे दिया गया सामाजिक अपमान ऐसे हौसले पस्त करने वाला है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट के फैसले में

पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव को दोषी अधिकारियों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई करने निर्देश जारी करने को कहा। जज ने कहा कि याचिकाकर्ता को तख्ती पकडऩे मजबूर करके न केवल उसकी तस्वीर ली गई बल्कि उसे जनता में बांट भी दिया गया जिससे उसके स्कूल में पढ़ते बच्चों को मानसिक यातना पहुंची।
उच्च न्यायालय के जज ने अभियुक्तों से दुव्र्यवहार करने वाले अधिकारी पर उसके वरिष्ठ अधिकारी द्वारा कार्रवाई से संबंधित छत्तीसगढ़ पुलिस नियमन अधिनियम के नियम 737 का हवाला दिया।
विभिन प्रावधानों का जिक्र करते हुए जज ने राज्य के मुख्य सचिव से इस पर रिपोर्ट मांगी लेकिन 18 नवंबर 2005 को अदालत  को बताया गया कि मुख्य सचिव ने कोई  रिपोर्ट तब तक नहीं भेजी थी। आखिरकार दायर की गई रिपोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र जारी करने समेत कई आपराधिक मामलों में शामिल था और 1992 में उसकी तस्वीर खींचने का निर्देश जारी किया गया था जो उसके नाम के आगे चस्पा की गई थी लेकिन 7 सितम्बर 1992 के बाद उसे हटा दिया गया था। मुख्य सचिव ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की बात भी कही।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में बताया है कि आखिरी सुनवाई का वक्त आने पर उक्त जज ने मामला खंडपीठ को सौंप दिया जिसने उक्त जज के दिए गए विभिन्न आदेशों का उल्लेख करते हुए अपीलकर्ता को मुआवजे के लिए मुख्य सचिव को ज्ञापन देने को कहा, जिसे 19 मार्च 2010 को मुख्य सचिव के ओएसडी ने खारिज कर दिया।
इस आदेश में अपील कर्ता से कहा गया कि उसकी गिरफ्तारी और उसके खिलाफ आरोपपत्र कानूनी कार्रवाई थी जबकि पुलिस अधिकारियों द्वारा आपत्तिजनक  शब्दों के साथ  अपीलकर्ता की तस्वीर लेना कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ था जिसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है।
मुख्य सचिव ने मुआवजे का आवेदन खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पत्नी की मानसिक अस्वस्थता, बच्ची की शादी में दिक्कत आदि कारणों से अवमानना के बदले मुआवजा मांगने की जहां तक बात है तो अवमानना का फैसला  कोई सक्षम अदालत  ही कर सकती है, और अदालत से अवमानना संबंधी कोई फैसला नहीं आया है इसलिए राज्य सरकार के लिए इस बारे में कोई फैसला लेना उपयुक्त नहीं होगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने जोगिन्दर कुमार बनाम उ प्र सरकार मामले में फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यातना आत्मा पर लगा ज़ख्म है, जो हमेशा हरा रहता है, कभी नहीं भर पाता।
अदालत  ने सुनीलगुप्ता  व अन्य बनाम म प्र सरकार के फैसले का उल्लेख भी किया जिसमें अभियुक्तों को अदालत लाते ले जाते हथकड़ी पहनाने की वजह अदालत ने पूछी थी ताकि उसे मंजूर या ना मंजूर किया जा सके। अदालत को पता लगने पर  कि अभियुक्तों ने जनहित में धरना प्रदर्शन किया था उसने उन्हें हथकड़ी लगाने को अमानवीय करार दिया था। ऐसे अनेक उदाहरण देते हुए अदालत ने कहा कि यातना  के कई रूप हो सकते हंै, लेकिन हर बार वह अपनी ताकत दिखाने, और शारीरिक और  गहरी मानसिक चोट लगाने यातना पहुंचाने यातना दी जाती है।
अदालत ने कहा कि इसमें शक नहीं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता राज्य की सुरक्षा से जुड़ी है लेकिन उसकी स्वतंत्रता  में कटौती  कानून के मुताबिक ही की जा सकती है। अदालत ने कहा कि  इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि धारा 499 में अवमानना के बारे में क्या कहा गया है। हमें यह देखना है  कानून से बंधे देश में संविधान की धारा 21 को सम्मान दिया जाए और एक नागरिक की गरिमा और सामाजिक छवि को चोट पहुंची है।
अदालत ने पूर्व के कई मामलों का जिक्र करते हुए अपीलकर्ता को 6 हफ्तों के भीतर 5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने यह रकम दोषी अफसरों से वसूलने का आदेश भी दिया।

कोल माफिया और अफसरों से लडऩे का इतना लंबा नुकसान हुआ
-डॉ. आजम 

विशेष संवाददाता
रायपुर, 4 अगस्त (छत्तीसगढ़)। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला डॉ. महमूद नय्यर आजम की एक लंबी लड़ाई के बाद आया है। इस बारे में आज जब उनसे इस अखबार ने फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि वे सरगुजा में ताकतवर कोल माफिया के खिलाफ देश-प्रदेश के अखबारों में लगातार लिखते थे और इससे पुलिस से लेकर कोल इंडिया के बड़े अफसरों तक, और अपराधियों तक में उनके खिलाफ नाराजगी थी।
उन्होंने पूरी घटना याद करते हुए जुबानी एक सांस में बता दिया कि किस तरह 1992 में 22 सितंबर की रात उनको घर से ले जाकर पुलिस ने थाने में बंद कर दिया और उनके हाथ में एक स्लेट पट्टी थमाई जिसमें लिखा था-मैं चोर, बदमाश, ... हूं। और यह तस्वीर खिंचवाकर साजिश
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करने वालों ने किसी मामले में तहसीलदार की अदालत में फाईल में लगवा दी और इस तस्वीर की कॉपियां बसों में बांटी। कोल माफिया और अफसरों से लडऩे का इतना लंबा नुकसान हुआ।
डॉ. आजम ने बताया कि उनके बच्चों का स्कूल आना-जाना भी इस तिरस्कार के कारण मुश्किल हो गया था। जब पुलिस और सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की तो फिर 1998 में पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गए, और फिर हाईकोर्ट में उन्होंने केस किया। बिलासपुर हाईकोर्ट से 2010 में न्यायमूर्ति कुद्दूसी की दो सदस्यों की बेंच ने उनके पक्ष में आदेश तो दिया, लेकिन सरकार को मुआवजा देने की रकम नहीं बताई। इस फैसले के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट गए और वहां अभी उनके पक्ष में आदेश हुआ और राज्य सरकार को 5 लाख रूपये देने का आदेश हुआ है।
डॉ. आजम ने उनके साथ ज्यादती करने वाले पुलिसवालों के नाम भी बताए जिनमें एक सब इंसपेक्टर पीटर और एक एएसआई अनंत राम साहू थे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अफसरों से वसूली करके यह मुआवजा देने को कहा है।
उन्होंने बिना कोई नाम बताए यह भी कहा कि इस पूरी साजिश में वहां का एक पत्रकार भी शामिल था, लेकिन वे अभी उस नाम पर चर्चा करना नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि कोयले की अवैध खुदाई और अवैध कारोबार के खिलाफ अभियान चलाने का नतीजा उन्हें भुगतना पड़ा था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने चालीस पेज लंबे इस आदेश में उनके साथ इंसाफ किया है।

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