गरीब देश में महंगी प्रतिमाओं की हिफाजत कौन करेगा?


8 अगस्त 2012
संपादकीय
तमिलनाडु में अभी देश के दलितों के एक सबसे बड़े आदर्श और देश के एक सबसे महान नेता डॉ. भीमराव बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा का सिर कुछ लोगोंं ने तोड़ दिया और साथ-साथ एक स्थानीय दलित नेता की प्रतिमा को भी ऐसा ही नुकसान पहुंचाया। उत्तरप्रदेश में पिछले कुछ हफ्तों से मायावती की प्रतिमाएं तोड़ी जा रही हैं, और ऐसा करने वाला कम से कम एक नौजवान ऐसा है जिसने गिरफ्तारी के अदालत में यह तर्क दिया है कि मायावती की प्रतिमाएं जनता के पैसों से बर्बादी करके बनी थीं, इसलिए उसने उन्हें तोड़ा है।
प्रतिमाओं को तोडऩे और उन्हें नुकसान पहुंचाने का सिलसिला नया नहीं है। गांधी की प्रतिमाएं भी जगह-जगह खराब की जाती हैं, और कभी-कभी कोई शराबी किसी प्रतिमा से तलवार लेकर भी चले जाता है जिसे लेकर तनाव खड़ा हो जाता है। प्रतिमाओं का पूरा सिलसिला गलत है। हमारे हिसाब से देश, प्रदेश या शहर की किसी एक सुरक्षित जगह पर किसी बड़े नेता की एक प्रतिमा लगा दी जाए, तो उसे बहुत मानना चाहिए। आम तौर पर यह भी होना चाहिए कि इसके लिए जनता के बीच से पैसे इक_े किए जाएं, ताकि जनता का ऐसे बुतों से लगाव भी रहे, और उस पर मायावती की तरह सरकारी पैसे बर्बाद भी न हों। उत्तरप्रदेश में जिस हिंसक अश्लीलता के साथ मायावती ने अपनी और दूसरे दलित नेताओं की प्रतिमाएं सैकड़ों करोड़ खर्च करके स्मारकों के साथ खड़ी करवाई हैं, वह दलित-न्याय के नाम पर एक अलग किस्म की ज्यादती रही है। आज मायावती जितने किस्म के अदालती मामलों में फंसी हुई हैं, उनके फैसले के बाद अगर उनको जेल होती है तो जनता के पैसों से लगी हुई ऐसी प्रतिमाओं को क्या एक सजायाफ्ता मुजरिम की प्रतिमाओं की तरह लगे रहने दिया जाएगा? या फिर सरकारी पैसों से इन प्रतिमाओं के इर्दगिर्द जेल के दरवाजे की तरह की सलाखें और लगा दी जाएंगी? 
भारत जिस तरह के दौर से गुजर रहा है, उसमें सत्ता की राजनीति से जुड़े हुए लोगों के मर जाने के दस-बीस बरस बाद ही उनके बुत लगाने चाहिए, ताकि यह पुख्ता भरोसा हो जाए कि अपनी जिंदगी में उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। जिनके जीते-जी उनके कामकाज और उनके चाल-चलन से लोगों के मन में कोई इज्जत पैदा न हो, उनकी प्रतिमाएं जनता के पैसों से बनवाने में न्यायसंगत क्या है? जिस किसी को अपने आदर्श, अपने नेता या अपने खुद के बुत बनवाने और लगवाने का शौक हो, उनको यह भी सोचना चाहिए कि वैचारिक विविधता वाले इस देश में उन बुतों पर हमला करने की बात भी कुछ लोग सोचेंगे, और सरकारें क्या इन्हीं की हिफाजत करती रहेगी? जिनको अपने नाम को अमर करना हो, या किसी और के नाम को अमर करना हो, उनके नाम पर सच में ही समाज के काम के अस्पताल या स्कूल शुरू करने चाहिए ताकि उस लागत का इस्तेमाल हो सके। आज जहां जिसकी सत्ता होती है, वे अपनी विचारधारा के लोगों की मूर्तियां चौराहों पर लगवाने लगते हैं।  यह काम करने के बजाय उनको उस विचारधारा के विस्तार के लिए कोई दूसरा काम करना चाहिए। लोगों को मूर्तियां लगवाने का तो शौक होता है, लेकिन फिर वे प्रतिमाएं बिना तोड़-फोड़ के भी, मौसम की मार से जर्जर हो जाती हैं, और उनके आसपास कहीं घूरा इक_ा हो जाता है, तो कहीं जानवरों का डेरा बन जाता है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि किस तरह देश-प्रदेश में किसी एक ताकतवर नेता के कुनबे के बुत हर शहर में कई-कई जगह लग जाते हैं, जो कि उनका सम्मान बढ़ा सकें या नहीं, दूसरे नेताओं को सम्मान से परे रख देते हैं।
इस गरीब देश में जहां कैदियों को जेल से अदालत तक ले जाने के लिए भी पुलिस कम पड़ती है और मामले झेलते कमजोर लोग संभावित सजा से ही अधिक वक्त अदालत के इंतजार में जेल में गुजार देते हैं, उस देश में मूर्तियों को बचाने के लिए, और तोड़-फोड़ करने वालों को पकडऩे के लिए अगर पुलिस लगती रहेगी तो यह सिरे से बेवकूफी की बात होगी। किसी भी प्रतिमा को लगाते समय उसकी हिफाजत, उसकी लागत, सड़क पर उससे दिक्कत जैसी बातें तो सोच ही लेनी चाहिए, यह भी सोच लेना चाहिए कि आगे किसी डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट से प्रतिमा को तोडऩे की नौबत न आ जाए, या प्रतिमा के बगल में बच्चे की प्रतिमा और जोडऩे की नौबत न आ जाए। 

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