मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू


31 जुलाई 2012
संपादकीय
दिल्ली में अन्ना हजारे के आंदोलन को लेकर उनके कुछ साथियों ने मीडिया के बारे में भला-बुरा कहा है, और शायद कुछ बदसलूकी भी की है। इसे लेकर अन्ना हजारे का माफीनामा भी सामने आया है और उन्होंने यह कहा है कि उनके आंदोलन से मीडिया पर अगर हमले होंगे तो वे इस आंदोलन को ही खत्म कर देंगे। इन सारी बातों की बारीकियों में गए बिना आज ऐसे आंदोलनों और मीडिया पर बात की जा सकती है, क्योंकि लोगों के कहे हुए एक-एक शब्द पर बात करने से मुद्दे की बात धरी रह जाएगी और कुछ आंदोलनकारियों के आक्रामक अहंकार पर बात चली जाएगी, जो कि कम अहमियत वाली बात है। 
जो लोग मीडिया को एक गिरोह या एक टीम मानकर चल रहे हैं, उनको यह मालूम होना चाहिए कि विचारधाराओं और कारोबारी हितों के मामलों में बहुत बुरी तरह से बंटे हुए और आपस के गलाकाट मुकाबले में ओवरटाईम करते हुए मीडिया के बीच किसी तरह का कोई एका नहीं है। हकीकत तो यह है कि अगर मुकाबले की दौड़ वाले मीडिया का बस चले तो एक मीडिया कारोबार दूसरे मीडिया कारोबार के ठीक खिलाफ बोलने या लिखने लगे, जिससे कि वह अलग दिख सके और अधिक टीआरपी बटोर सके या अधिक पाठक जुटा सके। टीम इंडिया की मीडिया की समझ चाहे जो हो, जो लोग मीडिया को जानते हैं वे यह बात भी अच्छी तरह जानते हैं कि इमरजेंसी से लेकर अब तक भारत के मीडिया में वैचारिक विविधता कायम रही है, और आपातकाल के जुल्म के उस दौर में जब मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे तब भी मीडिया पूरी तरह न खत्म हुआ था, न बिक गया था। बहुत से पत्रकार उस दौरान भी मीडिया-एक्टिविस्ट की तरह काम करते रहे, और बाद में भी उन्होंने आपातकाल का इतिहास दर्ज किया। इसलिए संजय गांधी के जूते साफ करने वाले अखबारों से लेकर सेंसरशिप के खिलाफ लिखने वाले अखबारों तक बहुत किस्म की विचारधारा के अखबारनवीस उस दौर में भी थे। और आज तो हाल यह है कि देश में इतने किस्म की पार्टियों की राज्य सरकारें हैं, अखबारों के इतने संस्करण हैं, टीवी चैनलों के इतनी राज्य सरकारों से इश्तहार मिलते हैं, देश के बड़े कारोबारी और बड़े कारखानेदार कांगे्रस और भाजपा की विचारधाराओं और उनके नेताओं से संबंधों को लेकर अलग-अलग गिरोहबंद हैं कि किसी भी एक दिशा में इस देश के मीडिया को कैसे मोड़ा जा सकता है? जो मीडिया किसी एक प्रदेश तक सीमित है, उस पर तो उस प्रदेश के अपने कारोबारी हितों का असर सीधा हो सकता है। लेकिन अन्ना के साथी आज जब पूरे देश के मीडिया, और खासकर दिल्ली में डेरे वाले, राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया पर भी हमला कर रहे हैं, तो उनकी इस खीझ का कोई वजन नहीं है। 
दरअसल अन्ना हजारे और उनके साथियों के साथ एक बहुत बड़ी वैचारिक दिक्कत है। उनमें लोकतांत्रिक विविधता न तो है, न उन्हें उसकी समझ है, और न ही ऐसी किसी विविधता में उनकी आस्था है। इसलिए वे लोकपाल मसौदा कमेटी में समाज की तरफ से आने वाले सभी पांच प्रतिनिधि अपनी ही टोली के बनाते हैं, जो उनके साथ नहीं है उसे वे भ्रष्टाचार का साथी मान लेते हैं। यह उसी किस्म का है जैसे कि एक वक्त अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने यह मुनादी की थी कि जो कोई सद्दाम हुसैन पर हमले में अमरीका के साथ नहीं है वह आतंक के साथ है। आज अन्ना हजारे का सारा आंदोलन उन तमाम तबकों को, ताकतों को, लोगों को खुलेआम भ्रष्ट या भ्रष्टचारियों का साथी कह रहा है जो कि आंदोलन के उनके तरीके से सहमत नहीं हैं। यह तरीका न गांधीवादी है और न लोकतांत्रिक है। ऐसे में पिछले कुछ दिनों से मीडिया को कोसते हुए अन्ना हजारे के बड़बोले और अहंकारी साथी जो कुछ कह रहे हैं, वह सिर्फ उनकी भड़ास है, मीडिया की हकीकत नहीं। न सिर्फ देश में, बल्कि प्रदेशों में भी मीडिया की अपनी पसंद और नापसंद है, जो कभी विचारधारा और नीतियों के आधार पर तय होती है तो कभी कारोबारी हितों के आधार पर। आज पूरे देश में ऐसी कोई पार्टी या सरकार नहीं है, ऐसे कोई कारोबारी गिरोह नहीं है जो कि मीडिया के एक बड़े हिस्से को भी खरीद सकें। और फिर अन्ना हजारे के खिलाफ जिस मीडिया के पूर्वाग्रहग्रस्त होने का आरोप अन्ना के साथी लगा रहे हैं, वही मीडिया तो यूपीए सरकार के सारे भ्रष्टाचार का उजागर करते आया है और केंद्र सरकार की सबसे बड़ी फजीहत अन्ना की टीम से परे के लोगों ने की है, या फिर मीडिया ने की है। अपने हाथों में अगर भ्रष्टाचार विरोध का एक बैनर हो, और उसके पीछे चलने से कुछ लोग असहमत हों, तो उन तमाम लोगों को भ्रष्ट कह-कहकर अन्ना हजारे के साथी जनसमर्थन-मीडिया समर्थन खो ही रहे हैं। क्या टीम-अन्ना के पास इस बात का जवाब है कि पवार को थप्पड़ मारने की अन्ना हजारे की तारीफ कैसा गांधीवाद था? क्या उसके पास इस बात का जवाब है कि कर्नाटक की भाजपा सरकार के जिस दानवाकार भ्रष्टाचार को अन्ना-टीम के ही जस्टिस हेगड़े ने पकड़ा, और उसके खिलाफ इस आंदोलन का मुंह क्यों नहीं खुलता? और ऐसी अनगिनत दूसरी मिसालें हैं, लेकिन उन सबके लिए यहां जगह कम है और हम उन्हें दर्जनों बार इसी जगह लिख भी चुके हैं।
हर आंदोलन वे तमाम नुकसान झेलते ही हैं, जिसके लायक हरकतें उसके नेता करते हैं। इसलिए अन्ना हजारे का आज का मीडिया से माफी मांगना गैरजरूरी भी है और नाकाफी भी है। एक जनआंदोलन चलाने वालों को जनमत बनाने या बिगाडऩे की मीडिया की सीमित या असीमित ताकत, और पूरे मीडिया को एकमुश्त खरीदने की संभावना या ऐसा नामुमकिन होने का फर्क अगर नहीं है, तो इससे उनके आंदोलन को ही नुकसान पहुंचता है। मीडिया की विश्वसनीयता या उसकी साख की कमी बहुत से दूसरे मामलों से तय होती है, इसमें बहुत ठोस वजहों से पिछले बरसों में वैसी ही गिरावट आई है जैसी भारतीय समाज के किसी भी दूसरे दायरे में। लेकिन अन्ना हजारे की टीम के आरोपों से इस साख में खरोंच भी नहीं आ पा रही क्योंकि यह खीझ से चलाया गया पंजा है, जिसके नाखूनों में धार नहीं होती। कल तक जब भारतीय मीडिया रात-दिन अन्ना हजारे के आंदोलन को एक बड़ा आंदोलन मान रहा था तब तक वे मीडिया के शुक्रगुजार थे, और आज जब उनकी अपनी हरकतों की वजह से, गैरजिम्मेदार गालीगलौच की वजह से वह विश्वसनीयता खो रहा है, जनसमर्थन खो रहा है तो मीडिया के आज के आईने में दिखती इस कमजोर तस्वीर पर टीम अन्ना थूक  रही है। इस थूक तले हकीकत की तस्वीर दबती नहीं। इसके बजाय इस आंदोलन को अपनी इस नौबत पर आत्मविश्लेषण करना चाहिए और इसके राजनीतिक मकसद को ईमानदार बनाना चाहिए।

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