घर पर चुप बैठे अमनपसंद और ओवरटाईम करते नफरतजीवी


17 अगस्त 2012
संपादकीय
टेलीफोन और इंटरनेट की तकनीक का इस्तेमाल करके भारत में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों के बीच एक दहशत फैलाई गई और नतीजा यह है कि दक्षिण से लेकर पश्चिम तक के महानगर छोड़कर उत्तर-पूर्व के लोग वापिस भाग रहे हैं। संसद में आज इस नौबत को लेकर यह भी बात उठी कि एसएमएस या इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग तक पर किस तरह की रोक लगाई जाए ताकि साजिशें कारगर न हो सकें।  इसके पहले पिछले कुछ दिनों से लगातार कुछ वीडियो क्लिप जोड़-तोड़कर, कुछ तस्वीरों को छेड़छाड़ करके, और कुछ असली तस्वीरों को भी, जगह-जगह फैलाकर किसी एक धर्म के लोगों, किसी एक इलाके के लोगों के खिलाफ नफरत फैलाने की हरकत चल ही रही थी। और जिस तरह कुछ बरस पहले बात की बात में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की अफवाह को लोगों ने हाथोंहाथ ले लिया था, उसी तरह आज हिंदुस्तान के लोग हवा में तैर रही अफवाहों को अपने कंधों पर चढ़ाकर दूर-दूर तक बांटकर आ रहे हैं। संसद में फेसबुक और ट्विटर जैसी वेबसाईटों पर जैसी नफरत फैलते दिख रही है, और जितना खुलकर लोग अपने नाम के साथ इस नफरत को आगे बढ़ा रहे हैं, उससे यह बात जाहिर है कि ऐसे लोग चाहे फीसदी में न आते हों, चाहे इनका अनुपात न के बराबर हो, लेकिन ये तालाब के पूरे पानी को गंदा करने की ताकत रखने वाले अकेले इंसान (मछली को क्यों गाली देना?) हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब साम्प्रदायिक लोग, नफरतजीवी लोग अतिसक्रिय होकर ओवरटाईम करते हैं, तब जिम्मेदार और अमनपसंद लोग सिर्फ उसे पढ़ते रहते हैं तो नफरत का मुकाबला आखिर कैसे हो सकता है? टेक्नॉलाजी ने सरकार के हाथ काटकर रख दिए हैं, और सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया में। तकनीक का मिजाज ऐसा है कि वह पहाड़ से उतरती तूफानी नदी की तरह है, जिस पर कोई बांध बनाना मुमकिन नहीं है। इसलिए आज संसद में सिर्फ एक भावना देखी है, कोई संभावना नहीं देखी है। अब जैसा कि नकली नोट बाजार से असली नोटों को खदेड़कर बाहर कर देते हैं, उसी तरह नफरत लोगों के बीच से मोहब्बत को खदेड़कर बाहर करने की ताकत कुछ अधिक रखती है। धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर दूसरों को भगाने, मारने, जलाने की हसरत रखने वाले लोग अधिक असरदार होते हैं। मोहब्बत की बजाय नफरत में एक करने की ताकत कुछ अधिक होती है। और फिर जिनके भीतर नफरत भरी हुई है, उनको ऐसी ताकतों की मदद भी मिल जाती है जो दुनिया के जाने किस कोने पर बैठे रहकर भारत की तबाही देखना चाहती हैं। यह नौबत भयानक है। और अभी तो भारत में बहुसंख्यक समुदाय को विचलित करने वाली कोई अफवाह हवा में नहीं है। अगर ऐसी कोई नौबत आएगी तो उस दिन राजनीतिक दल अपनी लार को पता नहीं किस रूमाल से पोंछ सकेंगे और देश-प्रदेश की सरकारें पता नहीं कैसे अफवाहों से उपजी आग को बुझा सकेंगी। इस पूरे खतरे का एक ही इलाज है, देश के लोगों के बीच समझबूझ को बढ़ाना और नफरत फैलाने वालों को उजागर करना। यह बात सुझाना हमारे लिए आसान है लेकिन इस पर अमल करना और इसे कामयाब करना, नाकामयाबी से थोड़ी ही अधिक गुंजाइश की बात है। देश के ऐसे तमाम लोगों को अपने आसपास के लोगों के बीच मुंह खोलना होगा जो कि देश का भला चाहते हैं, सभी इंसानों का भला चाहते हैं। चुनिंदा तबकों का बुरा चाहने वाले लोग तो बहुत हैं, उनकी राजनीतिक हसरतें भी हैं और साम्प्रदायिक हसरतें भी। इन सबको उजागर करने वालों की अपनी साख भी अच्छी होनी चाहिए। और यह साख सिर्फ धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता या सद्भावना के मोर्चे पर अच्छी साख नहीं हो सकती, इसका ईमानदारी के मोर्चे पर भी अच्छा होना जरूरी है, वरना भ्रष्ट, बेईमान और चोर की बात पर कौन भरोसा करेगा। यह पूरी बात हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि लोगों को इस चर्चा को आगे बढ़ाना होगा, वरना हिंसक लोग तो जुटे हुए हैं ही। 

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