हिंदुस्तानी-तालिबानी हौसले और समाज-सरकार की चुप्पी


9 अगस्त 2012
संपादकीय
पाकिस्तान में सम्पत्ति विवाद के चलते एक महिला पर चाकू से हमला कर उस पर तेजाब फेंक दिया गया। इधर भारत के झारखण्ड की राजधानी रांची में कुछ जगहों पर धमकी भरे पोस्टरों में लड़कियों के जीन्स पहनने पर पाबंदी के साथ ओढनी लेकर चलने का फरमान जारी किया गया है। धमकी दी गई है कि अगर जींस पहनी लड़की दिखी तो उस पर तेजाब फेंक दिया जाएगा। भारत, नेपाल, बंाग्लादेश, अफगानिस्तान और कम्बोडिया के साथ ही पाकिस्तान महिलाओं पर तेजाब फेंकने की घटनाओं के लिए दुनिया भर में बदनाम है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनियाभर के 20 देशों में साल भर में कोई 1500 लोगों पर तेजाब फेंका जाता है इनके शिकारों में  80 फीसदी महिलाएं होती हैं।  
इन खबरों से दिल दहलने की कई वजहें हैं। उत्तरप्रदेश के एक छोटे हिस्से से अभी लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि वहां की पंचायतें, पंचायतों के तहत लड़कियों और महिलाओं की अलग बैठक, यह तय कर रही हैं कि लड़कियां जींस नहीं पहनेंगी, मोबाईल फोन का इस्तेमाल नहीं करेंगी, अकेले बाजार नहीं जाएंगी। यह रूख सिर्फ खबरों के लायक है या फिर उत्तर-भारत में पे्रम की हत्या करने वाले हरियाणा के लोगों की तरह असल में हिंसक भी हो जाएगा, यह कहना मुश्किल है। लेकिन जब इसे अधिक पढ़े-लिखे और अधिक विकसित कर्नाटक के साथ जोड़कर देखें तो लगता है कि धर्मांध और कट्टरपंथी ताकतें एक तथाकथित भारतीय संस्कृति की शुद्धता और पवित्रता के नाम पर जिस तरह के हमले वहां की नौजवान पीढ़ी पर कर रही हैं, अगर यह दीवानगी आगे बढ़ी और तेजाब फेंकने का सिलसिला यहां शुरू हुआ, तो समाज में ऐसे हमलों से बचाव कैसे हो सकेगा? हर किसी के पीछे हिफाजत के लिए पुलिस को तो लगाया भी नहीं जा सकेगा। 
इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी बात अभी चार दिन पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में फेंडशिप-डे पर सामने आई। शहर के बाग-बगीचों में सुबह से पुलिस तैनात हो गई थी, गेट को बंद कर दिया गया था और पेड़ों के बीच इस तरह से सिपाही खड़े होकर चारों तरफ निगरानी कर रहे थे कि कोई कीट-पतंग भी उस दिन दोस्ती या पे्रम का इजहार न कर सके। यह खबर और इसकी तस्वीरें आई-गई हो गईं, यह चर्चा समाज में नहीं छिड़ी कि दोस्ती रखने वाले लड़के-लड़कियों को बगीचे में घुसने से रोकना सरकार की जिम्मेदारी है, या उन पर हमला करने के लिए घूमने वाले गुंडों को रोकना? जब सरकार की सोच नफरत के बजाय पे्रम को, दुश्मनी के बजाय दोस्ती को रोकने की हो जाए, और समाज को यह खतरा समझ ही न आए, तो समाज खतरे में है। बात तेजाब तक सीधे नहीं पहुंचती। बात छोटी हिंसा से शुरू होती है और बड़ी हिंसा तक पहुंचती है। जो लोग आज लड़के-लड़कियों के सार्वजनिक बाग-बगीचों में घुसने पर भी बंदिश लगवाने में कामयाब हो गए हैं, वे लोग कल दूसरे किस्म की बंदिशों के लिए इससे अधिक हिंसा करने लगेंगे। 
छत्तीसगढ़ की पुलिस की सोच दिल्ली की पुलिस की सोच से बहुत अलग नहीं है। वहां पर जब बलात्कार की वारदातें एकदम से बढ़ीं तो पुलिस के एक आला अफसर ने बयान दिया कि रात में महिलाएं अकेले न निकलें, परिवार के किसी पुरूष के साथ ही निकलें, वे अपने कपड़ों पर भी ध्यान दें कि वे उत्तेजक न हों। जहां पर रोक लगाने की जरूरत गुंडों के लिए है, वहां पर देश की राजधानी और देश के दूसरे नंबर के सबसे बड़े महानगर में रात तक काम करने वाली दसियों लाख महिलाओं पर बंदिशों की सलाह दी जा रही है। 
जब समाज मुर्दा होने लगता है तो सामाजिक सिद्धांत भी सरकारी अफसर तय करने लगते हैं। और जब इस हक के चले जाने की समझ भी समाज को नहीं रहती, तो वह हांककर कहीं भी ले जाने वाले रेवड़ की तरह का हो जाता है। आज जब तक किसी जाति, धर्म, पेशे या ऐसे ही किसी तबके से जुड़ी हुई बात न हो, भारतीय समाज के लोग किसी भी मुद्दे पर न विचार-विमर्श करते और न ही उसे लेकर एक सार्वजनिक-सामाजिक आंदोलन छिड़ पाता। जो बहुत ही राजनीतिक मुद्दे हैं, उनसे परे सामाजिक मुद्दे अब मानो एकदम महत्वहीन मान लिए गए हैं और उन्हें थानेदारों के भरोसे छोड़ दिया गया है। 
भारत में समाज के अपनी आजादी से जीने के हक को अगर तेजाब से जलाने की तालिबानी कोशिश हो रही है, और उस पर सरकार और समाज की सेहत पर अधिक फर्क नहीं पड़ रहा है, तो फिर इस देश को तेजाब से हुए जख्मों के इलाज के लिए जगह-जगह अस्पताल बनाना शुरू कर देना चाहिए।

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