रामदेव अब ईमानदार


13 अगस्त 2012
संपादकीय
एक हफ्ते के भीतर देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे दो अलग-अलग, और समानांतर आंदोलन राजनीतिक हो गए, और इसी वजह से कम से कम आज उनका वजन खत्म हो गया। कांगे्रस के बड़बोले नेता पहले से अन्ना हजारे के आंदोलन की नीयत के बारे में कहते आ रहे थे, अन्ना के साथी चुनावों में कांगे्रस के खिलाफ प्रचार करना भी शुरू कर चुके थे, और अब अन्ना हजारे के खेमे से राजनीतिक दल बनाने की मुनादी हो चुकी है। उसके बाद आज बाबा रामदेव के मंच से कांगे्रस को हराने की खुली राजनीतिक घोषणा के बाद उनका हिलते हुए पारे की तरह का अस्थिर मिजाज साफ हो गया है कि यह आंदोलन अब कांगे्रस के खिलाफ ही रह गया है।  मुखौटे के इस तरह उतर जाने को हम बेहतर मानते हैं। बाबा के मंच से आज देश के एक प्रमुख साम्प्रदायिक नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इस आंदोलन को ओम और रोम के बीच का मुकाबला कहकर इस मंच के तेवर और इसका रूख भी साफ कर दिया। लेकिन कुछ हैरानी की बात यह रही कि इसी मंच से शरद यादव ने भी खासी लंबी बात कही, और ओम और रोम वाली बात के बाद कही, और उसे अनदेखा करते हुए कही। खैर, एनडीए के साथियों के ऐसे रूख से किसी सदमे की जरूरत नहीं है। 
देश को अन्ना और बाबा के आंदोलनों की राजनीति को समझने की जरूरत है। हम तो अपने पाठकों के सामने अपनी सोच को आए दिन रखते ही आए हैं कि किस तरह अन्ना-बाबा से लेकर रविशंकर तक, ये तमाम ताकतें अपने ही बीच के कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की कर्नाटक की भाजपा सरकार के अभूतपूर्व भ्रष्टाचार को पूरी तरह अनदेखा करते हुए, सिर्फ कांगे्रस लीडरशिप की सरकार के भ्रष्टाचार पर हमला करते आई हैं। दूसरी बात किस तरह अन्ना-बाबा ने वक्त-वक्त पर गुजरात के लहू सने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ की। तीसरी बात यह कि अन्ना और बाबा के साथी किस-किस तरह के नाजायज और गैरकानूनी कामों में पकड़ाए जा चुके हैं, और उनको अनदेखा करके अपने-आपको पाक-साफ बताकर यह आंदोलन चल रहा है। चौथी बात यह कि किस तरह देश के संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ एक हिकारत पैदा करते हुए निर्वाचित संसद के काम को फुटपाथ पर करने की एक तानाशाही जिद में देश को पिछले एक बरस से लगातार झोंक दिया गया है। पांचवीं बात यह कि इन तमाम आंदोलनों के चलते इस देश का किस-किस तरह का नुकसान, अर्थ-व्यवस्था के मोर्चे पर हुआ है, और लोकतंत्र के प्रति आस्था के मामले में भी हुआ है। 
इन तमाम मुद्दों पर तिरंगे झंडों की भीड़ के बीच लगते हुए नारों के शोर में समझदारी की कोई बात नहीं हो सकती। देश की कोई एक सरकार अगर भ्रष्ट है, और है, तो उससे देश की संसदीय व्यवस्था को खत्म कर देने का तर्क खड़ा नहीं हो जाता। किसी सरकार के खिलाफ अनास्था एक बात होती है, सारे के सारे निर्वाचित लोकतंत्र को खारिज कर देने का मामला अधिक खतरनाक था, और है। और अब आने वाला वक्त इस बात का गवाह रहेगा कि अन्ना की पार्टी किस तरह के लोगों को उम्मीदवार बनाकर किस तरह से चुनाव लड़ेगी। इसी तरह बाबा का आंदोलन भी भविष्य में यह इतिहास लिखेगा कि उनके हाथ का तिरंगा झंडा और उनके आंदोलन का ओम या रोम का नारा चुनाव में किस पार्टी के भ्रष्टाचार का विरोध करेगा और किस पार्टी के भ्रष्टाचार को अनदेखा करेगा।
दुनिया का इतिहास गवाह है कि बहुत से आंदोलन जाहिर तौर पर जहां निशाना लगाते दिखते हैं, उनका निशाना रहता कहीं और है। हर चुनाव में ऐसी अनगिनत सीटें होती हैं जहां पर किसी उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाने के लिए किसी ऐसे फर्जी उम्मीदवार को खड़ा किया जाता है जिससे कि नुकसान कहीं और पहुंचे। ऐसे में आज यह बात अच्छी हुई है कि रामदेव ने भ्रष्टाचार विरोध के अपने नारे में सबसे पहला वाक्य कांगे्रस को हराने का जोड़ दिया है। इसके साथ ही अब अन्ना और बाबा पहले के मुकाबले कुछ अधिक हद तक ईमानदार हैं। 

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