कुकर्मों से लदी सरकारें क्या काबू कर सकती हैं?


16 अगस्त 2012
संपादकीय
कर्नाटक में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों पर हमले की अफवाह फैली तो बात की बात में दसियों हजार लोग रेलवे स्टेशन पर इक_ा हो गए और असम की तरफ जाने वाली रेलगाड़ी में पांव धरने की जगह भी नहीं बची। यह उस वक्त हो रहा है जब असम झुलसा हुआ है, जल रहा है और अपने घर से बेदखल है। यह उस वक्त हो रहा है जब मुंबई में मुसलमानों ने असम-म्यांमार की मुस्लिम मौतों के खिलाफ एक हिंसक प्रदर्शन वहां किया, यह उस वक्त हो रहा है जब असम को लेकर दिल्ली में एक राजनीति भी चल रही है और लगी आग के बीच हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के मुद्दे भी उठाए जा रहे हैं। ऐसे में कर्नाटक छोड़कर भाग रहे उत्तर-पूर्वी लोगों को वहां की सरकार, वहां की सत्तारूढ़ भाजपा, आरएसएस से लेकर असम सरकार और केंद्र सरकार तक, हर किसी ने यह दिलासा दिया है कि इन लोगों को कर्नाटक में कोई खतरा नहीं है और वे छोड़कर न जाएं। लेकिन अपनी जान पर जिनको खतरा लगता है वे छोड़कर भाग रहे हैं। यह खतरनाक नौबत उस असम में और कैसे हालात पैदा करेगी जहां पर आज भी हालात बेकाबू हैं और सेना तैनात है। कर्नाटक की अफवाह वहां पहुंचते ही वहां हिंसा का एक नया दौर शुरू हो गया है, और यह जख्म जल्दी भरने वाले भी नहीं हैं। 
उत्तर-पूर्व के लाखों लोग कर्नाटक में पढ़ रहे हैं या बसे हुए हैं। उनके बीच ऐसी दहशत फैलने से देश के उत्तर-पूर्वी हिस्से और बाकी देश के बीच आपसी समझ की एक कमी फिर सामने आती है, और इसके लिए बाकी देश ही जिम्मेदार है जो कि सरहदी सूबों को साथ रखने में कमजोर है। यह एक भयानक नौबत है कि देश के भीतर ही एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश में सिर्फ इसलिए खतरा झेल रहे हैं कि वे उस प्रदेश के हैं। यह बात भारत के लोकतांत्रिक और विविधतावादी ताने-बाने के ठीक खिलाफ है। और ऐसी नौबत के पीछे हमें बहुत सी ताकतें जिम्मेदार लगती हैं। कर्नाटक में साम्प्रदायिकता, दंगों और हिंसा का एक इतिहास रहा है। पिछले बरसों में वहां पर श्रीराम सेना जैसे साम्प्रदायिक संगठन ने पश्चिमी या ईसाई संस्कृति का आरोप लगाते हुए जिस तरह के खुले हिंसक हमले किए, उससे भी वहां के अमनपसंद हिंदू समाज की साख चौपट हुई है। धर्म और संस्कृति के ऐसे गुंडा-ठेकेदारों के चलते कर्नाटक में युवा पीढ़ी या आधुनिक समाज के बीच भारी दहशत बनी हुई है और बरसों से जारी ऐसी हिंसा को खत्म करने के लिए कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कुछ भी नहीं किया। बल्कि पाठकों को याद होगा कि इस सरकार के एक से अधिक मंत्रियों ने समय-समय पर सार्वजनिक रूप से बहुत ही दकियानूसी किस्म की बातें लड़कियों और महिलाओं के पहरावे को लेकर की, वहां के स्कूलों में गीता को अनिवार्य करने की बातें कीं, और कुल मिलाकर साम्प्रदायिक-समानता का माहौल खराब किया। यही वजह है कि आज जब उत्तर-पूर्व के लोगों को मारने की अफवाह वहां फैली तो असुरक्षा की दिमागी हालत के बीच जीते वहां के अल्पसंख्यक लोगों या उत्तर-पूर्वी लोगों को आनन-फानन इस पर भरोसा हो गया। इस तरह कर्नाटक की सत्तारूढ़ पार्टी, वहां की सरकार और वहां के हिंदू संगठनों में से कुछ इस खतरनाक नौबत के लिए जिम्मेदार हैं। यहां दो और बातों को याद दिलाना जरूरी है कि किस तरह श्रीराम सेना का मुखिया तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में यह कहते वीडियो कैमरे पर कैद हुआ था कि वह मोटे भुगतान के एवज में वहां दंगा करवा सकता है। दूसरी घटना भी इसी संगठन को लेकर है जिसके लोग कर्नाटक में कुछ महीने पहले पाकिस्तान का झंडा फहराकर यह तनाव फैलाना चाहते थे कि यह झंडा मुसलमानों ने फहराया है। इस मामले में श्रीराम सेना के लोग गिरफ्तार भी हुए हैं और जांच में यह बात साबित भी हुई है। 
केंद्र सरकार इस नौबत के लिए इसलिए जिम्मेदार है क्योंकि पूरे देश के लोगों को अपनी हिफाजत का जो भरोसा एक मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे हो सकता है, वह देश से गायब है। मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी तक, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन में एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी नीयत पर, जिसकी ताकत पर और जिसकी लीडरशिप पर पूरे देश को भरोसा हो। इसलिए विश्वास की यह कमी भी इस दहशत के पीछे है। 
यह एक बहुत खतरनाक हालत इसलिए है कि ऐसी कुछ हत्याओं से, ऐसी कुछ अफवाहों से देश के किसी भी राज्य में किसी दूसरे राज्य लोगों को भगाया जा सकता है, या लोग खुद ही छोड़कर भाग सकते हैं क्योंकि उन्हें अपनी जान खतरे में दिखती है। ऐसे में कैसे यह देश एक रह पाएगा और कैसे लोगों के मन एक रह पाएंगे? ऐसे खतरनाक हालत में भी आज देश की कुछ राजनीतिक ताकतें और कुछ लिखने-पढऩे वाले लोग अपनी साम्प्रदायिक विचारधारा के मुताबिक आग को भड़काने में लगे हुए हैं। इस नौबत से निपटना पूरी तरह हम कर्नाटक और देश की सरकारों की जिम्मेदारी मानते हैं, और ये दोनों ही अपने-अपने कुकर्मों के तले इस कदर दबी हुई सरकारें हैं कि इनकी बात पर किसी को कोई भरोसा शायद ही हो। यह हालत बहुत फिक्र पैदा करती है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें