देश की ऐसी नौबत बहुत फिक्र की है


संपादकीय
18 अगस्त
कल संसद में पेश सीएजी की रिपोर्ट कोई नया सदमा लेकर नहीं आई है क्योंकि इस तरह के आंकड़े देखने का आदी अब यह देश हो चुका है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके दायें हाथ मोटेंक सिंह अहलूवालिया को 26 रूपए रोज खर्च करने वाला गरीब नहीं दिखता है, लेकिन अंबानियों को दसियों हजार करोड़ का फायदा, जीएमआर को हजारों करोड़ का फायदा, कोयला खदान पाने वाले कारखानेदारों को लाखों करोड़ का फायदा देकर इस सरकार ने टेलीफोन कंपनियों को दिए हजारों-लाखों करोड़ के फायदे का सिलसिला जारी रखा है। यूपीए सरकार की साख का हाल आज यह है कि उस पर बेईमानी और भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप लग जाए, जनता आंख मूंदकर उसे सही मानेगी। कांग्रेस पार्टी के वकील प्रवक्ता जिस तरह से सीएजी के खिलाफ बोलते हुए अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं वह बात अदालत में सबसे बुरे मुजरिमों को बचाने की वकील की कोशिश से अधिक कुछ नहीं लग रही है। और इस हालात के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह बात पूरी तरह से बेतुकी लगती है कि वे व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हैं और उनके खिलाफ कोई भी बात साबित होगी तो वे राजनीतिक जीवन से सन्यास ले लेंगे। वैसे भी कांग्रेस पार्टी के भीतर आने वाले चुनाव के बाद मनमोहन सिंह के लिए सन्यास की बात जोरों से चल ही रही है, और हमारा आज का ऐसा अंदाज है कि इन तमाम बातों से मनमोहन सिंह बेदाग शायद निकल भी नहीं पाएंगे। इसलिए राहुल गांधी की जगह बनाने को, या फिर दागदार साबित होने पर, किसी न किसी वजह से उनका सन्यास तय दिखता है। हालांकि एक वक्त हम भी उनको शरीफ मानते थे और पिछले बरसों में हमने बार-बार उनके नाम यह नसीहत लिखी थी कि इस गंदगी को छोड़कर उन्हें पढ़ाने के लिए चले जाना चाहिए और किताबें लिखनी चाहिए। लेकिन वे एक ऐसे शाकाहारी और ईमानदार गब्बर बने रहे, जिनके गिरोह में सांभा से लेकर कालिया तक हर कोई लूटपाट करते हुए ओवरटाइम करते रहा। ऐसी ईमानदारी किस काम की? और मनमोहन सिंह आज किस मुंह से आरोप साबित होने पर सन्यास की बात करते हैं? उनकी सरकार, उनके मंत्रिमंडल और उनके दफ्तर, इन सबके भ्रष्टाचार में शामिल होने की बातें दर्जनों मामलों में सामने आ चुकी है, और हमारा यह मानना है कि उनका इस सन्यास की बात कहने का कोई नैतिक अधिकार भी नहीं रह गया है।
केन्द्र सरकार की ऐसी गिरी हुई साख इस देश की एकता, अखंडता और इसके अमन-चैन सबको प्रभावित कर रही है। आज जगह-जगह जब बहुत से प्रदेशों में एक-दूसरे के खिलाफ तनाव फैला हुआ है, जब आधा दर्जन प्रदेशों से उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग छोड़-छोड़कर वापिस लौट रहे हैं, तब अगर एक असरदार और ईमानदार प्रधानमंत्री देश में होता, यूपीए गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी के अनगिनत साथी भ्रष्टाचार में जेलों में नहीं होते, तो ऐसे नेताओं की एक आवाज पर देश में शांति भी लौट पाती, और लोग भी अपनी-अपनी पढ़ाई, अपनी-अपनी नौकरी की जगहों पर महफूज बने रहते। लेकिन आज इन लोगों का कुछ बोलने का मुंह ही नहीं बचा है। इस बारे में हर कुछ हफ्तों में हमको लिखना पड़ता है क्योंकि एक दमदार प्रधानमंत्री के वजन की जरूरत कहीं न कहीं दिखती है। इस देश के दो बड़े मुखिया, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी, दोनों राजनीति की कड़ी और कड़वी समझ से दूर के हैं और दोनों ही अपने साथियों पर निर्भर हैं, और इन साथियों में बेईमानों की गिनती कम नहीं है। राजनीति समझने वाले इनके आसपास के सबसे बड़े नेता को राष्ट्रपति भवन भेजकर कांग्रेस ने जो रूख दिखाया है, उसके बारे में बहुत से लोगों का यह मानना है कि राहुल गांधी को सरकार की लगाम पकड़ाने का रास्ता साफ किया गया है। लेकिन अब यूपीए गठबंधन के भीतर उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी के पास ऐसा कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं बचा है जो सरकार, गठबंधन, पार्टी और देश सबको समझता हो और सबके बीच उसकी बात का वजन हो। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने का बाद अब तो शायद विपक्ष से बात करने के लिए भी कांग्रेस के पास किसी नेता का टोटा पड़ जाएगा। देश की ऐसी नौबत बहुत फिक्र की है।

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