नीयत का तेल-घी न हो तो कढ़ाही का आकार बढ़ाने से हलुवा नहीं बन जाता


संपादकीय
19 अगस्त
भारत ने पाकिस्तान से इस बात की शिकायत की है कि एक समुदाय की हिंसा या एक समुदाय पर हिंसा के झूठे नजारे दिखाने वाले गढ़े हुए वीडियो वहां से हिन्दुस्तान पहुंचे थे और उनकी वजह से यहां हिंसा भड़की। पाकिस्तान का नाम आने के पहले भी संसद में इस बात को लेकर नाराजगी थी और इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर रोक  की बात भी हो रही थी और यह बात भी हो रही थी कि कैसे थोक के एसएमएस पर रोक लगाई जाए। लेकिन लोगों की समझ और इस टेक्नालॉजी के बेकाबू मिजाज को देखें तो रोक की यह बात कुछ उसी किस्म की लगती है जैसे चाकू से गले कटने पर सब्जी काटने के चाकुओं पर रोक लगा दी जाए। यह मामला औजारों का नहीं है, यह औजारों को हथियार बनाकर इस्तेमाल करने वाले इंसानी मिजाज का मामला है। 
पाकिस्तान की बात क्यों करें, हिन्दुस्तान के भीतर जितने लोग जितने तरह की बातें फेसबुक पर, ट्विटर पर, एसएमएस और एमएमएस पर डाल रहे हैं, उनके लिए हो सकता है कि पाकिस्तान से हथियार बनाकर उनके हाथों में थमाया गया होगा, लेकिन इस साइबर हथियार से गोलियां तो हिन्दुस्तानी ही दाग रहे हैं। टेक्नालॉजी का जो इस्तेमाल आज दुनिया के हर दायरे में हो रहा है उसके चलते इस पर किसी तरह की रोक मुमकिन नहीं है। हथौड़े से कोई कत्ल हो जाए, तो पूरी दुनिया के हथौड़ों पर रोक लगा दी जाए तो उससे हथौड़े वाले कातिल को तो दूसरा औजार ढूंढना पड़ेगा, लेकिन दुनिया के कल कारखाने उससे थम जाएंगे। इसलिए तकनीक को कोसने और उस पर रोक लगाने की मांग भावनात्मक अधिक है, उसका व्यवहारिक पहलू कुछ नहीं है। दूसरी तरफ सरकार के पास आईटी कानून इतना सख्त है कि उसके तहत कार्रवाई की जा सकती है, और इंटरनेट या टेलीफोन, कम्प्यूटर या सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटें ऐसी टेक्नालॉजी से लैस हैं कि उन पर किया गया कोई भी काम अदालत तक अमूमन साबित किया जा सकता है। यहां पर फिर हम यह याद दिलाना चाहेंगे कि एक औजार को हथियार बनाकर नफरत फैलाने या हिंसा के लिए उकसाने का काम जो लोग कर रहे हैं, उन्होंने अपने आसपास किसी को भी ऐसी कम्प्यूटर-हरकत के लिए जेल जाते नहीं देखा होगा। अगर सरकार की जांच एजेंसियां असरदार होतीं, सरकारों में नफरतजीवी लोगों पर, ऐसे संगठनों पर कड़ी कार्रवाई का राजनीतिक हौसला होता, तो लोग इस लापरवाही से, या इस दुस्साहस से आग को बढ़ाते नहीं चलते। यह तो आज की संसद से लेकर सड़क तक की फिक्र श्मशान वैराग्य से अधिक कुछ नहीं है, क्योंकि लोग समकालीन इतिहास में अपनी फिक्र दर्ज कराना चाहते हैं। जब जो बातें खबरों में होती हैं, लोग उनके बारे में चर्चा में हिस्सा इसी तरह लेते हैं, जिस तरह राह से गुजरते जनाजे में लोग कंधा लगाते दस कदम चल लेते हैं। यह दौर निकल जाएगा और इसके बाद न संसद में इसकी चर्चा होगी, और न सड़क पर। 
हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि देश का साइबर कानून तो बहुत कड़ा बना दिया गया है, लेकिन इस पर अमल और इसके इस्तेमाल का जिम्मा उन्हीं लोगों पर है जो लोग दूध में मिलावट पर अठारह बरस बाद फैसला करवा पाते हैं। ऐसे लोग जब तक अपने रजिस्टर में कार्बन लगा सकेंगे, तब तक नफरतजीवी लोग, आतंक और तबाही फैलाने वाले लोग हजारों मील शहरी जंगल और जला चुके होंगे। आज भारत में किसी भी कानून के तहत होती जो कार्रवाई दिखती है, वह मोटे तौर पर राजधानियों की हिफाजत के लिए होती है, और जहां मीडिया का फोकस है, वहां होती है। जिस हिन्दुस्तान में गरीब, ग्रामीण और बेजुबान लोग बसते हैं, वहां शायद इस कार्रवाई का दो-चार फीसदी भी नसीब नहीं होता। लेकिन इस फर्क को देखने की जहमत भी न मीडिया उठाता, और न ही संसद के लंबे-लंबे आंसू सने भाषणों की बाद में कोई याद रह जाती। रातों रात कोई हिफाजत नहीं बढ़ सकती। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक को सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं को छोड़कर हौसले से और ईमानदारी से आतंकियों और बदमाशों पर कार्रवाई करनी पड़ेगी, तेजी से करनी पड़ेगी, और अदालती इंतजाम ऐसा करना पड़ेगा कि वहां भी तेजी से बदमाशों को सजा मिल सके, इसके बिना आज की तरह के खतरे बने रहेंगे, और लोग संसद में श्मशान की तरह की बात करते रहेंगे कि गुजरने वाला कितना भला था। 
भारत के लोगों को इंसाफ और सामाजिक जवाबदेही सिखा और समझा पाना आसान बात नहीं है। देश की राजनीतिक ताकतों की इसमें दिलचस्पी भी नहीं है। इसलिए लोग तो एक-दूसरे को ऐसे भड़काऊ संदेश और तस्वीरें भेजते ही रहेंगे। जब तक हर शहर, हर दायरे, हर बिरादरी के ऐसे मुजरिमों में से कुछ-कुछ जेल नहीं जाएंगे तब तक बाकी लोगों को अपनी कानूनी जिम्मेदारी समझ भी नहीं आएगी। देश के कानून में और अधिक कड़ाई की जरूरत बिल्कुल नहीं है, मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की जरूरत है। सरकारों में नीयत का तेल-घी न हो, और कढ़ाही का आकार बढ़ाते चले जाएं, तो उससे हलुवा नहीं बन जाता। 

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