नफरत के नतीजे


संपादकीय
7 अगस्त
अमरीका के एक गुरुद्वारे में जिस तरह एक गोरे अमरीकी ने पहुंचकर अंधाधुंध गोलियां चलाकर बहुत से लोगों को मार डाला, उससे हिन्दुस्तान तो विचलित है ही, खुद अमरीका इससे सदमे में है। अमरीकी राष्ट्रपति ने वहां राष्ट्रध्वज आधा झुकाने का आदेश दिया है, और ऐसा भारत में भी नस्लीय हिंसाओं के बाद कभी हुआ याद नहीं पड़ता। अमरीका की फिक्र यह है कि वहां हर नागरिक को बहुत से हथियार खरीदने के हक हासिल हैं, और तरह-तरह की राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा की आजादी के चलते वहां कुरान को जलाना भी जुर्म नहीं माना जाता, और नफरत के कई किस्म के आंदोलन भी चलते रहते हैं। यह हत्यारा भी नवनाजीवादी बताया जा रहा है जो कि नस्ल के आधार पर दूसरों से नफरत करने वाले हिटलर की मानस संतानें मानी जाती हैं। वहां पर गोरे लोगों के प्रभुत्व के लिए जो आंदोलन चलते हैं, वे अश्वेत समुदाय के खिलाफ, गैरईसाईयों के खिलाफ बहुत किस्म से हिंसा करते हैं, और हाल के बरसों में ही कानून उन पर वहां कड़ाई कर पाया है। यह हत्यारा न्यूयॉर्क में विश्व व्यापार केन्द्र पर ओसामा बिन लादेन के विमानों के हमले के वक्त से नफरत की बातें करते आया था, और ऐसे ही एक गोरे संगीत समूह में वह सक्रिय भी था। विचारों की आजादी के चलते वहां पर नफरत की संभावना इतनी बढ़ जाती है, कि सार्वजनिक प्रदर्शन भी लगातार दिखते रहता है। और यह नस्लीय नफरत इस हत्याकांड में सिखों के खिलाफ क्यों तब्दील हुई यह तो आने वाले दिनों में पता लगेगा, क्योंकि यह हत्यारा अपने शरीर पर 11 सितंबर के आतंकी हमले को लेकर गुदने गुदवाया हुआ था। अपनी सारी आधुनिक पढ़ाई-लिखाई के बावजूद अमरीका में गुरुद्वारे पर हमले के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया इंटरनेट पर, टेलीविजन चैनलों पर देखने मिली, उससे भी दुनिया के जागरूक लोग सदमे में हैं क्योंकि वहां यह माना गया कि मुसलमानों के धोखे में सिख नाहक मारे गए। लोगों का रूख कुछ ऐसा था कि मानो मुसलमान मारे जाते तो वह ठीक होता।

अमरीका में अश्वेत लोगों से नफरत के ऐसे हिंसक आंदोलन, भारत में किसी धर्म के लोगों से नफरत, या मिसाल के तौर पर हिन्दू धर्म के भीतर दलितों से नफरत जैसे ही हैं। जिस नस्लीय नफरत के चलते गांधी को मारा गया, हिन्दुस्तान में दंगे हुए, दलितों को आज भी तकरीबन हर हफ्ते हिन्दुस्तान के किसी न किसी हिस्से में मारा जाता है, इन सब के पीछे की जो सोच है, वही सोच हिटलर की थी जिसने दस लाख से अधिक यहूदियों को उनकी नस्ल की वजह से मारा था। ऐसी ही नफरत के चलते आज भी भारत का हिन्दू समाज अपने भीतर के दलितों को बड़ी संख्या में खो चुका है और वे बौद्ध बन गए हैं, या कोई दूसरा धर्म मान चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई से ऐसी नफरत अगर कम होती तो फिर अमरीका में तो इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि वह तो एक पढ़ा-लिखा देश है। लेकिन पढ़ाई-लिखाई किसी को एक बेहतर इंसान नहीं बनाती। पढ़ाई किसी को एक कामयाब बना सकती है, संपन्न बना सकती है, लेकिन जिन्हें इंसानी खूबियां कहा जाता है, वे अगर पढ़ाई से आ जातीं, तो हिन्दुस्तान में डॉक्टर और प्रोफेसर जैसे लोग नफरत की आग फैलाने में उत्तरप्रदेश से लेकर गुजरात तक ओवरटाईम क्यों करते रहते? 
इस तरह की हालत को पैदा करने के पीछे अमरीका की सरकार और वहां का कारोबार, दोनों कुछ या अधिक हद तक जिम्मेदार हैं ही। अमरीका के अनगिनत कारोबार हिटलर की मदद करने के जिम्मेदार रहे हैं। इसकी एक लंबी फेहरिस्त खाता-बही सहित इतिहास में दर्ज है। और राजनीतिक रूप से जागरूक लोग आज भी कुछ बहुत कामयाब फैशन ब्रांड इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि वे हिटलर के हिस्से रहे हुए हैं। अमरीका ने तेल की अपनी प्यास के चलते हुए, फौजी ठिकानों को दुनिया के हर हिस्सों में कायम करने की हसरत के चलते हुए, साम्यवादी विचारधारा को खत्म करने के लिए जिस तरह से दुनिया के मुस्लिम देशों पर लगातार हमले किए, आज भी जिस तरह से वह हमले जारी रख रहा है, उसके चलते भी उसका जवाबी हमला कुछ मुस्लिमों की तरफ से दिया जाता है, और ऐसे जवाबी हमलों के जवाब में अमरीका के या दुनिया के दूसरे गोरे देशों के बहुत हिंसक नस्लवादी गिरोह हमले करना अपना हक समझते हैं। यह सिलसिला रातोंरात थम भी नहीं सकता। अमरीका का झंडा एक दिन अगर आधा झुक जाएगा तो भी उससे दुनिया की तस्वीर नहीं बदल जाएगी और नफरत का इतिहास नफरत का भविष्य बनने से भी अचानक नहीं थम जाएगा। भारत में ही हम देखते हैं कि 1984 के सिख विरोधी दंगे चाहे किसी एक नस्ल की तरफ से नहीं किए गए थे, और कांग्रेस के लोगों ने उसको हवा दी थी, आज तक वे जख्म सिख समुदाय के भीतर रिसते ही रहते हैं। इसलिए अमरीका को अपनी सोच सुधारनी होगी, ठीक उसी तरह जैसे कि भारत के भीतर कांग्रेस के नेताओं और प्रधानमंत्रियों को बार-बार सिख समुदाय से माफी मांगनी पड़ती है। इन दो हालात के बीच सीधी-सीधी कोई तुलना करना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन हम नफरत के इस सिलसिले पर बात करते हुए 1984 के कत्लों को, या 2002 के गुजरात के नस्लीय कत्लेआम को भूल नहीं सकते। जो विचारधाराएं किसी भी देश या प्रदेश में राज करती हैं, वे जब तक नफरत से दूर नहीं होंगी, नफरत दूर तक फैलेगी और किसी बूमरैंग की तरह लौटकर चोट भी करेगी। 

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