महान खूबियों से कोसों दूर, और खामियों से लदे हुए नेताओं का यह नतीजा


20 अगस्त 2012
संपादकीय
भारत में अभी-अभी हुई ताजा हिंसा के लिए एक बार फिर पाकिस्तान का हाथ खबरों में आया है। भारत ने पाक सरकार से विरोध दर्ज किया है कि उसकी जमीन से गढ़ी हुई तस्वीरें अफवाहें फैलाने और हिंसा के लिए इस्तेमाल की गई हैं, और पाकिस्तान ने इस बात के सुबूत हिंदुस्तान से मांगे हैं। मुंबई हमलों के ढेर से सुबूतों के आ जाने के बाद न तो भारतीय कानून के तहत, और न ही पाकिस्तानी कानून या सरकार के तहत अब तक किसी को सजा हो पाई है। इसलिए यह सोचना मुनासिब नहीं होगा कि भारत में अफवाहों को हवा देने के लिए जिम्मेदार कहे जाने वाले पाकिस्तानी लोगों पर कोई कार्रवाई जल्द होगी। 
सवाल यह उठता है कि आरोपों की नाल पाकिस्तान की तरफ घूम जाने से, या कि घुमा देने से कितने वक्त तक काम चलेगा? क्या इससे आज के हिंसक हालात को लेकर भारत की जिम्मेदारी कुछ कम हो सकती है? क्या केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, और राजनीति से परे के सामाजिक नेता इस बात से बरी हो सकते हैं कि यह देश इतने नाजुक हाल में कैसे रखा गया है, या आ गया है कि सरहद पार से आए किसी कंकड़ से भी यह चूर-चूर हो जाए? दरअसल जब आसानी से कोई दुश्मन मिल जाता है तो लोग अपनी जिम्मेदारी से बरी होने की एक चूक करने लगते हैं। जैसे किसी घर के भीतर जब एक बच्चे की शिनाख्त शरारत के लिए खूब अच्छे से हो जाती है, तो हर गड़बड़ के लिए लोगों के पास उसका एक नाम तैयार रहता है कि उसने ही यह किया होगा। इसी तरह मुहल्ले के एक बदमाश का नाम बहुत से लोगों की गलतियों के लिए याद रखकर, भले लोग अपनी जिम्मेदारियों से बरी हो जाते हैं। यह सिलसिला तबाही से बचाव की अपनी जिम्मेदारी और अपनी तैयारियों को कमजोर करने का काम भी करता है। 
आज इक्कीसवीं सदी के इस साइबर-जमाने में क्या कोई देश किसी दूसरे देश से ऐसी उम्मीद भी कर सकता है कि वहां से बर्बादी की कोशिशें नहीं होंगी? किसी देश में बड़े-बड़े आंदोलनों को परदे के पीछे से सहारा और बढ़ावा देकर उस देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिशें बाजारू मुकाबले वाला कोई दूसरा देश नहीं करेगा? अंतरराष्ट्रीय संबंध और किसी देश की राजनीति या सरकार, इनमें से कुछ भी महज नैतिकता के आधार पर नहीं चलते। कूटनीति का नाम बदलकर राजनय कर दिया गया था क्योंकि कूटनीति शब्द अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन हकीकत तो यही है कि बाजार से लेकर फौज तक, और अंतरराष्ट्रीय असर तक के मुकाबले में अपने-आपको जिंदा रखने के लिए बहुत से देशों को घोषित और अघोषित रूप से अनैतिक काम करने पड़ते हैं, या सोच-समझकर अनैतिक काम किए जाते हैं। ऐसे में अगर कोई देश इतना नाजुक बना हुआ है कि सरहद पार के कुछ दर्जन कम्प्यूटरों से आई अफवाहों से यह देश झुलस जाए, तो यह झुलसने वाले देश की शराफत की मासूमियत नहीं है, यह उसकी कमजोरी है और हिफाजत की कमी है। 
हिंदुस्तान में आज की इस हिंसा और आज के इस क्षेत्रीय-आपसी तनाव से परे पिछले ही पखवाड़े आधे देश में अंधेरा देखा है। जानकार लोगों का अंदाज यह है कि यह अंधेरा भारत की अपनी बिजली-व्यवस्था की कमजोरी और गड़बड़ी के चलते हुआ। इसमें तो कोई दुश्मन भी नहीं था। लेकिन कल्पना करें कि किसी दुश्मन देश में बैठे कम्प्यूटर घुसपैठिए अगर भारत के बिजली कम्प्यूटरों, या रेल और टेलीफोन कम्प्यूटरों में घुसकर इंतजाम को तबाह कर दें, तो क्या होगा? बैंकों के कम्प्यूटरों को तबाह कर दिया जाए, तो क्या होगा? खातेदार क्या बैंकों में आग लगाने की नौबत में नहीं आ जाएंगे? तो ऐसा एक साइबर हमला इस देश को गृहयुद्ध में भी धकेल सकता है, और यहां कि अर्थव्यवस्था को भी चौपट कर सकता है। सरहद पार से आए फर्जी वीडियो या तस्वीरों की बात कुछ ऐसी ही लगती है कि भारत ने अपनी इमारत सिर्फ शीशों से बना रखी है, और पत्थरों से बचाव की उसकी कोई समझ नहीं है। 
हम आज की इन अफवाहों के लिए एक आसान कुसूरवार मिल जाने को तसल्ली का सामान मानने से इंकार करते हैं। हिंदुस्तान को अपने इंतजाम को सुधारना होगा, अपनी चौकसी तेज रखनी होगी, अपने लोगों को बर्दाश्त सिखाना होगा, देश के भीतर तनाव की वजहें घटानी होंगी, और इनमें से किसी भी कमी की तोहमत किसी दुश्मन देश पर लगाना नाजायज होगा। यह देश इतनी नाजुक दीवारों के साथ न तो दूसरे देशों के बीच सुरक्षित है, और न ही इतनी कमजोर कागजी दीवारों के साथ यह किसी किस्म के तनाव देश के भीतर ही झेल सकता। और यह सारी तैयारी पांच बरसों तक ही देश पाने वाली सरकारों के बस की नहीं है, ऐसी सरकारें बनाने वाली राजनीतिक पार्टियों के बस की भी नहीं है। यह तैयारी दूरदर्शी, बड़े और ताकतवर नेताओं के बस की बात है, जिन्हें महान नेता कहा जा सके। ऐसी महान खूबियों से कोसों दूर, और खामियों से लदे हुए नेताओं का यह नतीजा है कि आज यह देश एक कंकड़ फेंककर झुलसाया जा सकता है।  

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