यह वक्त महज हक के इस्तेमाल का नहीं, जिम्मेदारी का भी


संपादकीय
21 अगस्त
मुंबई में इस वक्त महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अकेले नेता राज ठाकरे एक रैली करने जा रहे हैं। सरकार की इजाजत न मिलने पर भी उन्होंने अपना यह फैसला कायम रखा, और उनके मुद्दे पिछले दिनों मुंबई में मुस्लिम समाज द्वारा की गई तोडफ़ोड़ और हिंसा के हैं। असम और म्यांमार में मुस्लिमों पर हिंसा का विरोध करते हुए मुंबई के मुस्लिम समाज के दसियों हजार लोग जुटे थे और  वह भीड़ बेकाबू और हिंसक होकर शहीदों के स्मारकों पर भी पिल पड़ी थी। वहां पर तोडफ़ोड़ की तस्वीरों में पूरे देश के लोगों को विचलित कर दिया था, कर दिया है, और लोगों ने इसे देश के खिलाफ किया गया काम माना। 
यह बात सही है कि तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं, और कम से कम इस एक मामले में शहीदों के स्मारक पर लात मारते हुए लोग इसी विरोध प्रदर्शन वाले थे, और मीडिया में तैरती उनकी तस्वीरों के पीछे कोई विदेशी हाथ नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि किसी भी समाज या शहर में जब एक बड़ी भीड़ नाराजगी के साथ जुटती है तो उसमें से कुछ या अधिक लोग कानून के खिलाफ कई मौकों पर हिंसा करने लगते हैं। इस बात को लेकर सारे प्रदर्शनकारियों को, या उनके विरादरी को देश के खिलाफ मान लेना भी गलता होगा, और शहीद स्मारक का अपमान करने वाले लोगों की शिनाख्त के साथ-साथ उन पर कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। इस मामले में आज लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि असम की आग अभी ठंडी नहीं पड़ी है। वहां पर तो लाखों लोग आज बेघर हैं ही, देश भर से शायद लाख या लाखों लोग अपने कमाने-खाने की जगह छोड़कर उत्तर-पूर्वी राज्यों में लौट गए हैं, दहशत के बीच, जान बचा कर। ऐसे में आज जरूरत देश और प्रदेशों की सरकारों को हालात सम्हालने देने की है, चाहे वे किसी भी पार्टी की सरकारें हों, चाहे वे किसी भी राज्य में हों या देश में हो। ऐसी नौबत के बीच राज ठाकरे का मुंबई में यह प्रदर्शन, या फिर किसी और पार्टी या नेता का कहीं और प्रदर्शन हो, वह निहायत गलत है। किसी धर्म या जाति के लोग बिना किसी संगठित राजनीतिक दल के भी कहीं-कहीं भीड़ की शक्ल में इक_ा हो रहे हैं, और वे हिंसा भी कर रहे हैं। उत्तरप्रदेश में एक महावीर प्रतिमा पर मुस्लिम समाज के लोगों का प्रदर्शन हुआ और इसका कोई तर्क भी नहीं था। लेकिन तनाव के दौर में बहुत किस्म के गलत काम होते हैं, और यही वक्त होता है जब संगठित और सुलझे हुए लोगों को अपने निजी और अपने संगठन के तात्कालिक फायदे को छोड़कर, भूलकर एक दरियादिली दिखानी चाहिए। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उनके बाकी परिवार वाली शिवसेना, ये दोनों ही संगठन अपनी शुरुआत से ही मुस्लिम-विरोधी या गैरमराठी-विरोधी जाने-पहचाने जाते हैं। ऐसे में इनके किसी प्रदर्शन के जायज होने पर भी आज का वक्त ऐसे काम का नहीं है। ऐसा करके राज ठाकरे उन लोगों के बीच कुछ राजनीतिक फायदा तो पा सकते हैं जो लोग पिछले दिनों मुंबई में हुई हिंसा को लेकर नाराज हैं, या शहीदों के अपमान को लेकर पूरे देश में विचलित हैं। लेकिन उनके जख्मों पर मरहम लगाने के लिए भी, हिंसा के जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने के लिए भी, आज के माहौल में ऐसे प्रदर्शन की न तो जरूरत है, और न ही राष्ट्रीय एकता और शांति के हिसाब से इसकी कोई गुंजाईश है।
हम इस बारे में आज मुंबई से दूर रहते हुए भी इसलिए लिख रहे हैं कि कल के दिन देश के तनाव के माहौल में हमारे इर्द-गिर्द भी अगर कोई किसी मुद्दे पर ऐसे प्रदर्शन की बात सोचे, तो उसके खतरों के बारे में हम अभी भी अपने आसपास के लोगों को आगाह कर दें। हर किसी को नाजुक मौकों पर प्रदर्शन के अपने अधिकार के इस्तेमाल की जिद के साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि जिस लोकतंत्र ने प्रदर्शन का यह अधिकार दिया है, उसी लोकतंत्र ने किस तरह की जिम्मेदारियां भी दी हैं। लोकतंत्र एक ही सिक्के के दो पहलुओं, अधिकार और जिम्मेदारी, की तरह है, और किसी सिक्के का सिर्फ एक पहलू कोई कीमत नहीं रखता। इसलिए देश भर में जहां भी लोग राज ठाकरे की तरह की बात सोच रहे हैं, उन्हें अपनी उत्तेजना, अपने फायदे, अपने  प्रदर्शन पर फिलहाल काबू रखना चाहिए। 

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