कदम-कदम पर सरकारी भ्रष्टाचार और तुरंत कड़ाई की जरूरत


23 अगस्त
संपादकीय
इस वक्त बिलासपुर में सीबीआई का एक छोटा अधिकारी रिश्वत लेते गिरफ्तार हुआ है। उसे केन्द्रीय सतर्कता अधिकारियों ने रंगे हाथों पकड़ा है। कुछ महीने ही हुए हैं कि रायपुर में आयकर विभाग के एक से अधिक अधिकारी रिश्वत लेते पकड़ाए। और यही हाल देशभर में चल रहा है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकारी आए दिन पकड़ा रहे हैं, उनके घरों पर अनुपातहीन संपत्ति के लिए छापे पड़ रहे हैं, और कहीं से 25-50 करोड़ मिल रहे हैं, तो मध्यप्रदेश में एक आईएएस जोड़े से सैकड़ों करोड़ का हिसाब और जायदाद बरामद हुए। 
यह हालत भयानक इसलिए है कि सरकार में जब कोई रिश्वत लेकर किसी को रियायत देता है, तो वह रियायत रिश्वत के कई गुना अधिक होती है। बहुत से मामलों में जहां काम या सामान की क्वालिटी घटिया रखकर रिश्वत से काम चला लिया जाता है, वहां पर मामला और गड़बड़ होता है। घटिया सामान से सप्लायर या ठेकेदार को चाहे जो बचत होती हो, उस क्वालिटी की वजह से वैसे सामान या निर्माण समय के पहले दम तोड़ देते हैं और सरकार का लंबा-चौड़ा नुकसान उससे होता है जो कि अफसर-ठेकेदार की मिली हुई कमाई से बहुत अधिक होता है। कई बरस हुए छत्तीसगढ़ में सड़कों में इस्तेमाल हुए घटिया डामर को लेकर कुछ करोड़ रूपए की वसूली ठेकेदारों से निकाली गई, लेकिन सड़कें घटिया होने का नतीजा यह हुआ कि पूरी सड़कें तबाह हो गईं और उनकी पूरी लागत ही गड्ढे में चली गई। मतलब यह कि सरकार को नुकसान पहुंचाकर जो कमाई होती है, नुकसान उससे बहुत अधिक होता है। 
सरकार में जो आम बात हर कोई जानते हैं, वह यह है कि गैरजरूरी सामान खरीद लिए जाते हैं क्योंकि उनका सप्लायर सरकार को बहुत अधिक कमीशन देता है। ऐसा पूरे का पूरा खर्च फिजूल जाता है क्योंकि ऐसे बहुत से सामान कभी बक्सों से नहीं निकलते। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य विभाग में सैकड़ों करोड़ की ऐसी खरीदी हुई जिसमें गैरजरूरी मशीनें, गैरजरूरी सामान ले लिए गए, और ये नकली भी थे, या घटिया थे, गैरजरूरी थे, उनके इस्तेमाल की कोई योजना नहीं थी, और उनके खुलने की नौबत आने के पहले ही सारे मामले जांच और अदालत तक पहुंच भी गए। इस तरह सबसे गरीब और जरूरतमंद लोगों के हक मारकर भी ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोग ऐसी कमाई करते हैं जो कि बहुत सी जिंदगियों की कीमत पर ही होती है। इसी तरह केन्द्र सरकार की योजनाओं का हाल होता है। उनके तहत राज्यों को जो हजारों करोड़ मिलते हैं, उनको किस तरह मिल-बांटकर खा लिया जाता है इसकी मिसाल उत्तरप्रदेश में पिछले बरसों में लगातार सामने आ रही है जिनमें अफसरों की हत्याएं भी हुई हैं और अफसरों ने आत्महत्याएं भी की हैं। जब पूरे देश को लोग भ्रष्ट मान रहे हैं, तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है। जिस तरह हर कोना दिखते ही हिन्दुस्तानी लोगों को थूकने का मन करने लगता है, आड़ दिखते ही लोग पेशाब में जुट जाते हैं, उसी तरह कमाई का मौका दिखते ही लोग यह भूल जाते हैं कि ईमानदारी भी कोई चीज है, या बेईमानी की कमाई से कितने सौ-पचास गुना नुकसान देश का हो रहा है। 
इस नौबत में देश और प्रदेशों को भ्रष्टाचार, बेईमानी और रिश्वतखोरी पर नजर रखने के लिए अधिक असरदार, अधिक ताकतवर, अधिक बड़ी निगरानी एजेंसियों की जरूरत है, जांच एजेंसियों की मजबूती की जरूरत है, भ्रष्ट लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत देने का हक सरकार से छीन लेने की जरूरत है, और तेज रफ्तार अदालतों की जरूरत है। हमारा यह भी मानना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में जो अफसर पकड़ाते हैं, उन्हें सरकारी कामकाज से बाहर कर देना चाहिए और उन्हें किसी अधिकार की कुर्सी पर नहीं बैठने देना चाहिए। दूसरी बात यह भ्रष्टाचार की निगरानी रखने के लिए निगरानी एजेंसियों को सरकारी दफ्तरों और टेलीफोन पर नजर रखने के नए अधिकार मिलने चाहिए और खुफिया कैमरों जैसी तकनीक का खुलकर इस्तेमाल सरकारी दफ्तरों में करना चाहिए। केरल के एक मुख्यमंत्री ने अपने दफ्तर में कैमरे लगवाकर उन्हें इंटरनेट पर प्रसारण के लिए शुरू करवा दिया था, पता नहीं उससे सरकार पर वहां क्या असर पड़ा, लेकिन हर प्रदेश को अपनी नई मौलिक तरकीब निकालनी चाहिए जिसके कामयाब होने पर बाकी राज्यों में भी उस पर अमल हो सके। एक आखिरी बात इस सिलसिले में यह कि भ्रष्ट लोगों की संपत्ति को जब्त करने के लिए असरदार कानून बनाना चाहिए। आज देश की संसद भ्रष्टाचार को लेकर ठप्प पड़ी हुई है, लेकिन भ्रष्टाचार पूरे देश में बिखरा हुआ है, कहीं कम और कहीं अधिक। इस बारे में अगर कोई सबक लेेना हो तो बंगाल की वामपंथी पार्टियों से लेना चाहिए जिनके दशकों के निरंतर राज के बाद भी कोई चर्चित भ्रष्टाचार इतिहास में दर्ज नहीं हुआ। 

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