हिंसा, नफरत, आतंक फैलाने की आजादी कैसे लोकतांत्रिक?


24 अगस्त
संपादकीय
भारत में अफवाहों की वजह से बढ़े हुए तनाव के बाद जब संसद में यह राय सामने आई कि भड़काने वाली वेबसाइटों पर रोक लगाई जाए, तो आजादी के हिमायती लोगों की तरफ से यह हंगामा शुरू हुआ कि सरकार सेंसरशिप लागू कर रही है। लोकतंत्र के तहत अभिव्यक्ति की जिस स्वतंत्रता का इस्तेमाल करके लोग अपनी बात कहते हैं, अखबारों में लिखते हैं या इंटरनेट पर डालते हैं, वह स्वतंत्रता कुछ नियमों के साथ-साथ मिली हुई है। इस देश में अखबारों को लिखने की पूरी आजादी है लेकिन उनके लिखे हुए को लेकर वे जवाबदेह भी रहते हैं, और आए दिन अदालती कार्रवाई भी झेलते हैं, क्योंकि किसी को यह लगता है कि अखबार ने उसकी मानहानि की है, तो उसके लिए कानूनी ईलाज देश में मौजूद है। लेकिन दूसरी तरफ इंटरनेट की तकनीक का अपना एक ऐसा मिजाज है जो कि बेकाबू जंगली घोड़े की तरह का है, और उस पर लगाम लगाना आसान नहीं है। इसलिए भारत के प्रधानमंत्री के नाम से दर्जन भर ट्विटर अकाउंट खुल जाते हैं, उन पर प्रधानमंत्री की तस्वीर लग जाती है और पहली नजर में लोग धोखा खा सकते हैं कि यह बात मनमोहन सिंह ही लिख रहे हैं। और बात सिर्फ राजनीति या प्रधानमंत्री की नहीं है, इंटरनेट पर ट्विटर से लेकर फेसबुक तक हर प्रमुख व्यक्ति के ढेरों फर्जी अकाउंट बन जाते हैं और कहीं जावेद अख्तर को इस बात का खुलासा करना पड़ता है कि उनका फेसबुक अकाउंट नहीं है तो कहीं किसी और को। 
सिर्फ इसलिए कि इंटरनेट, कम्प्यूटर और संचार तकनीक तक पहुंच के लिए एक आय वर्ग का होना जरूरी होता है, आमतौर पर शिक्षित और शहरी होना भी शायद जरूरी होता है, इसलिए इसे एक अलग कानूनी रियायत दी जाए यह फिजूल की बात है। और जिसके पास न बिजली है, न फोन है, न कम्प्यूटर है, उसके पढऩे के अखबार पर तमाम कानूनी शर्तें लागू रहें, यह एक संपन्न और शहरी सोच है। जो भी जगह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देती है, वहां पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। हम रात-दिन इंटरनेट पर सैकड़ों ऐसी वेबसाइट देखते हैं जो कि गालियों की जुबान में लोगों के खिलाफ, उनके चाल-चलन को लेकर, उनके मां-बाप को लेकर झूठी बातें लिखती हैं। बनाई हुई और गढ़ी हुई तस्वीरें, सही बताते हुए चारों तरफ फैलाई जाती हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे ताकतवर व्यक्ति, जिन्हें कि सुप्रीम कोर्ट में रोज जगह मिलती है, वे भी ट्विटर पर अपनी सबसे नापसंदीदा सोनिया गांधी की तरफ इशारा करते हुए उन्हें विषकन्या लिखते हैं और उनके इर्द-गिर्द के लोगों के लिए गालियां लिखते हैं। इसकी एक सीमा है और इसके खतरे भी सीमित है। लेकिन जब साम्प्रदायिक दंगा फैलाने की नीयत से, हिंसा और नफरत फैलाने की नीयत से, आतंक फैलाने और लाशें गिरवाने की नीयत से, फिल्में गढ़कर, तस्वीरें गढ़कर, खबरों की कतरनें गढ़कर उसे फैलाया जाता है, तो उस पर रोक लगनी ही चाहिए। अभिव्यक्ति की ऐसी किसी स्वतंत्रता को जगह नहीं मिल सकती जो कि दूसरे लोगों की जान लेने की नीयत रखती हो, और उसके लिए जुटी हुई हो। 
ऐसी किसी बदमाशी वाली चीज को रोकना, सेंसरशिप नहीं है, एक संभावित अपराध के खिलाफ वह कानून के तहत कार्रवाई है। सेंसरशिप किसी बात को रोकने के लिए होती है, लेकिन जब कोई जुर्म होते हुए दिखता है तो कानून अपना काम करता है, फिर चाहे वह अखबार हो या इंटरनेट हो। एक अखबारनवीस की हैसियत से हमको यह भी जरूरी लगता है कि अभिव्यक्ति की जिम्मेदार स्वतंत्रता और गैरजिम्मेदार स्वतंत्रता के बीच एक फर्क होना चाहिए। और जब गैरजिम्मेदारी किसी जुर्म की हद तक बढ़ जाए, तो उसके सुबूतों को दर्ज करके उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। जिसके बिना अभिव्यक्ति की जिम्मेदार स्वतंत्रता दिखाने वाले लोगों का महत्व भी समाज में खत्म हो जाएगा। मीडिया के खिलाफ भी बहुत से मौके ऐसे आते हैं जब टीवी चैनलों पर रोक लगती है, किसी पत्र-पत्रिका के अंक जब्त होते हैं, या उसके संपादक-प्रकाशक को गिरफ्तारी झेलनी पड़ती है। लेकिन जब तक पहले से किसी अभिव्यक्ति को रोका नहीं जाए, वह सेंसरशिप नहीं है। और सिर्फ पढ़े-लिखे, शहरी और कम्प्यूटर-जानकार लोगों के लिए अलग से कोई कानूनी रियायत नहीं हो सकती। इंटरनेट का मिजाज ऐसा है जो कि लोगों को इस झांसे में रखता है कि वहां वे बेनाम रहकर, गुमनाम रहकर, जितनी चाहे उतनी नफरत और हिंसा फैला सकते हैं, दूसरों पर कीचड़ उछाल सकते हैं। लोकतंत्र का ऐसा मतलब किसी भी कोने से नहीं होता और लोग अपने कहे, लिखे, टाइप किए हुए हर शब्द के लिए कानून के प्रति जवाबदेह तो रहेंगे ही। वे अपना काम करते हैं, और जब कानून अपना काम करता है, तो कानूनी कार्रवाई सही है या नहीं है, इसे तय करने के लिए अदालत तो रहती ही है।

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