कुदरत की दी हुई दौलत और ताकतवर इंसानों की नीयत...


25 अगस्त 12
संपादकीय
एक तरफ जब दिल्ली से लेकर खनिज प्रदेशों तक यह आग लगी हुई है कि कोयले के घोटाले में अकेली केंद्र सरकार जिम्मेदार है, या फिर राज्यों ने भी नीलामी का विरोध करते हुए खदानों को चुनिंदा लोगों को देने का काम किया था, तब यह नीति अनदेखी रह जा रही है कि किस तरह देश की जनता के हक की खदानें एक-एक करके कारखानेदारों को जा रही हैं। चाहे कोयला हो, चाहे लोहा हो या फिर कोई और खनिज, इनमें से किसी का भी दाम इनसे बनने वाले सामानों के अनुपात में तय नहीं होता है और खदानों को या खनिजों को बहुत रफ्तार से ठिकाने लगा देने का काम देश भर में चल रहा है। 
इस बारे में होना तो यह चाहिए कि खनिजों को सोच-समझकर ही निकाला जाए, सरकार खुद यह काम करे, खनिजों के दाम को उससे बनने वाले सामान के बाजार भाव के मुताबिक कम-अधिक करने का एक अनुपात तय हो। आज तो हालत यह है कि जिस कारखानेदार को खदान मिल जाती है, वह मालामाल हो जाता है, और बाकी कारखाने के सामने एक गैरबराबरी का बाजार-मुकाबला खड़ा हो जाता है। यह बात भी समझ से परे है कि कोयले और लोहे की खदानों को ऐसे लोगों को क्यों दिया जा रहा है जो कि अपने इस्तेमाल से परे उसे खुले बाजार में बेच रहे हैं, खुद का कारखाना न लगाकर केवल धंधा कर रहे हैं। ऐसे कुछ खदान मालिक देश के बाहर भी खनिज भेज रहे हैं, और उनकी गुंडागर्दी का हाल यह है कि दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट उनके इस दुस्साहस पर हक्का-बक्का रह गया था कि किस तरह से कर्नाटक में जब्त पड़ा हुआ लौह अयस्क भी बाहर भेज दिया गया। 
हम अभी कोयले की खदानों या किन्हीं और खदानों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच के झगड़े की बारीकियों में जाना नहीं चाहते क्योंकि रोजाना कुछ नए कागज सामने आ रहे हैं। लेकिन एक बात जो तय है, वह यह कि जनता का हक पूरे देश में बुरी तरह से लूटा जा रहा है और यह सिलसिला बंद होना चाहिए। आज से देश में इतनी गैरबराबरी खड़ी हो गई है कि एक कारखानेदार कुबेर बन गया है, और उसके नीचे लाख-लाख लोग सिर्फ सिर पर टोकरा ढोने की ऊंचाई तक पहुंच पा रहे हैं। यह सिलसिला अगर बंद नहीं हुआ तो गरीबों के बीच की बेचैनी अच्छी बड़ी-बड़ी पार्टियों को उखाड़ फेंके गी। पिछले कुछ बरसों में देश में सूचना का अधिकार आया, अदालतें सरकारों पर पहले के मुकाबले अधिक खुलकर कार्रवाई करने लगीं, और अन्ना-बाबा जैसे लोग कुछ मुद्दों को उठाने में कामयाब रहे, और देश में आमतौर पर बेअसर रहने वाला मध्यम वर्ग भी चाहे एक प्रतीक के रूप में ही सही, भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर कुछ घंटों के लिए तो उतरा ही। ऐसे में यह बात तय है कि खदानों की बंदरबांट और खनिजों का मिट्टी के दाम पर बेचना, बेचैनी बन चुका है और लोग इसके पीछे के धंधे को देख पा रहे हैं। 
पूरे देश में खदानों के इलाकों में नक्सली पैर जमा चुके हैं, और उनकी पकड़ कमजोर होने का नाम नहीं ले रही है। जब तक कुदरत की दी हुई दौलत को ताकतवर तबका अपनी जेब में भरता चलेगा, तब तक बिना जेब वाले गरीब लोग या तो नक्सलियों के साथ जाएंगे, या एक दिन ऐसा आएगा जब खदानों से कमाने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों को वे पूरी तरह खारिज कर देंगे। अन्ना की पार्टी चुनाव जीत सके या नहीं यह एक अलग बात रहेगी, लेकिन अगर वह कुछ हद तक भी ईमानदार रही, तो वह हर किस्म की बेईमानी को उजागर करने में कामयाब हो सकती है। आज सत्ता पर, जो जहां बैठे हैं, उनके आत्ममंथन का समय है। 


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