बिना नए मुद्दे पुरानी फितरत दिखाकर शहरी जिंदगी को तबाह न करें


26 अगस्त 2012
संपादकीय
कल से दिल्ली की खबरें आ रही थीं कि पुलिस के कहने पर वहां मेट्रो के छह स्टेशन बंद कर दिए जा रहे हैं ताकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के घर के घेराव की अरविंद केजरीवाल की मुनादी से निपटा जा सके।  कितनी भीड़ से किस जगह कैसे निपटा जाए यह स्थानीय प्रशासन और पुलिस का नजरिया होता है, और किसी भीड़ के बेकाबू होने से क्या होता है यह अयोध्या से लेकर पिछले हफ्ते की मुंबई तक, देश में जगह-जगह दर्ज है। सरकार के साथ अन्ना हजारे के साथियों का जिस तरह का टकराव चल रहा है उसे देखते हुए यह मानना कुछ लोगों को जायज लग सकता है कि इस प्रदर्शन को रोकने के लिए कई स्टेशनों पर मेट्रो को ही रोकने की तैयारी की गई थी, लेकिन प्रदर्शन से स्थानीय लोगों को जिस तरह की दिक्कत होती, प्रदर्शनकारियों को काबू करने में किस तरह का खतरा हो सकता था, इसके अंदाज को हम पूरी तरह खारिज करना नहीं चाहते। और किसी भी पार्टी की सरकार देश या किसी प्रदेश में जब रहती है, तो वह प्रदर्शनों से अपने हिसाब से निपटती है। इसलिए सूने पड़े हुए मीडिया पर अगर केजरीवाल का आज का आंदोलन बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है, तो देश में असल मुद्दों पर जगह-जगह इतने आंदोलन होते हैं कि उनका महत्व बरसों से दिल्ली में दुहराए जा रहे आंदोलनों से अधिक होता है, यह एक अलग बात होती है कि उनको राजधानी में तैनात कैमरे नसीब नहीं होते।
केजरीवाल के आज के आंदोलन को सरकार ने कुचला है या हर आंदोलन के साथ हर जगह ऐसी ही बचाव की तैयारी होती है, यह बहुत साधारण समझ-बूझ और साधारण जानकारी की बात है। अब सवाल यह होता है कि पिछले बरसों में हर किस्म के आंदोलन बार-बार करके, उसी बात को बार-बार उठाकर जब पिछली बार का आंदोलन अन्ना-टोली ने खत्म किया और इसके बाद राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की गई, चुनाव में उतरने की घोषणा की गई, तो आज ऐसा कौन सा नया मुद्दा सामने आया जिसे लेकर केजरीवाल पहले आंदोलन नहीं कर चुके हैं, और आज एक नए प्रदर्शन का मौका है? किसी भी देश-प्रदेश में क्या सरकार का काम ऐसे पेशेवर हो चुके प्रदर्शनकारियों से ही रात-दिन जूझना है, या दूसरे काम भी करना है? क्या बारिश में डूबी दिल्ली को ऐसे किसी एक आंदोलन को बरसों तक झेलना जरूरी है जो कि हर बार उन्हें मिली इजाजत को तोड़कर शहरी जिंदगी को अस्त-व्यस्त करते आया है? इस आंदोलन के पीछे की वजहें जायज हो सकती हैं, लेकिन इस आंदोलन, और इस तरह के किसी भी दूसरे आंदोलन का एक तर्कसंगत, न्यायसंगत आधार भी होना चाहिए। किसी आंदोलन से निपटने का इंतजाम मुफ्त में नहीं होता है, और शहर के लोगों की अपनी जिंदगी में आंदोलनों की तकलीफ को झेलने के अलावा भी बहुत सी तकलीफें रहती हैं। इसलिए चाहे मुंबई में मुस्लिम समाज का आंदोलन हो, चाहे कहीं और रेल रोको हो, या फिर राजधानी में आंदोलन करने के लिए ओवर टाईम कर रहे केजरीवाल का जत्था हो, यह समझना जरूरी है कि आंदोलनकारियों के अलावा भी बाकी जनता के अपने नागरिक अधिकार हैं।
देश की सरकार, यहां की पुलिस के जिम्मे बहुत से ऐसे काम और भी हैं, जिनके लिए सरकारी अमला कम पड़ता है। अदालतों से विचारधाराधीन कैदियों को इलाज के लिए अस्पताल नहीं ले जाया जा पाता क्योंकि पुलिस कम पड़ती है। उनको अदालत में पेशी पर ले जाने के लिए पुलिस नहीं रहती, इसलिए बरस-दर-बरस विचाराधीन कैदी सलाखों के पीछे रहते हैं, जबकि उनके मामलों में अधिकतम सजा शायद महीनों की ही हो सकती है। भ्रष्टाचार किसी एक सरकार की अनोखी खूबी नहीं है। वामपंथियों को छोड़कर बाकी तमाम सरकारों में अलग-अलग दर्जे के भ्रष्टाचार के मामले सामने हैं। ऐसे में क्या हर राजधानी में बारहमासी आंदोलन चलते रहें? यह सिलसिला खराब है। पिछले एक-दो बरस में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनों को केंद्र सरकार ने जितना सुना है, उतने वक्त में देश के बहुत से दूसरे तकलीफजदा तबकों की बात भी सुनी जा सकती थी, सुनी जानी चाहिए थी। एक आंदोलन की एक ही कागजी बात को हजारवीं बार दिखाना मीडिया की अपनी सोच-समझ हो सकती है, लेकिन देश की सरकार का पूरा वक्त इसी धंधे में निकल जाना ठीक नहीं है। 
हमारा यह भी मानना है कि अन्ना और बाबा ने अपने आंदोलनों को घोर राजनीतिक बनाकर देश के सामाजिक आंदोलनों की साख चौपट की है। इसलिए अब अन्ना-टोली को अपनी घोषणा के मुताबिक चुनाव लडऩा चाहिए और वहीं अपनी बात रखनी चाहिए। फिलहाल उन्हें देश को चैन से जीने देना चाहिए, कम से कम शहर की सड़कों पर बिना नए मुद्दे सिर्फ पुरानी फितरत दिखा-दिखाकर शहरी जिंदगी को तबाह करना बंद करना चाहिए।

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