संसदीय लोकतंत्र को इस तरह अगुवा कर लेना एक अपराध


27 अगस्त 2012
संपादकीय
इस मुद्दे पर हम और लिखना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की आज की हालत पर बात करने के लिए यह लिखना जरूरी है। देश के चर्चित कोयला घोटाले पर अपना बयान देने के लिए प्रधानमंत्री संसद में खड़े हुए तो विपक्ष ने उन्हें बोलने नहीं दिया। उनका बयान संसद के रिकॉर्ड में तो आ गया, लेकिन संसदीय लोकतंत्र ने इस मौके का इस्तेमाल खो दिया। यह एक भयानक हालत है जब अन्ना-बाबा जैसे अलोकतांत्रिक-तानाशाह संसद को, उसकी अहमियत को, खत्म करने के लिए पूरे देश को भड़काने में लगे हैं, ऐन उसी वक्त संसद के भीतर से भी इसकी दीवारों पर हथौड़े चल रहे हैं। हो सकता है कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा को यह मौका अगले चुनाव के तरफ देश को धकेलने के लिए ठीक लग रहा हो, लेकिन महीनों से आरोप झेलने वाले प्रधानमंत्री जब एक औपचारिक बयान देने के लिए खड़े हो रहे हैं तो सुनने के बाद उसे खारिज करना विपक्ष का हक बनता है, लेकिन उनकी बात को सुनना विपक्ष की जिम्मेदारी भी बनती है। जब देश में पौने दो लाख करोड़ के नुकसान की चर्चा के बीच मनमोहन सिंह की सरकार आरोपों और संदेहों से घिरी हुई है, उस वक्त भी अगर हजार तोहमतों का जवाब देने के लिए उन्हें संसद के भीतर मौका नहीं दिया जाता, तो यह कैसी संसदीय व्यवस्था है? 
देश में एक लोकतांत्रिक और संसदीय अराजकता खड़ी करने की कोशिश हो रही है, और यह बात अन्ना-बाबा करें वहां तक तो ठीक है क्योंकि इन दोनों का न सच पर कोई भरोसा है और न ही न्याय पर। अपने-अपने नारों को लेकर जो फुटपाथ पर रामलीला दिखाकर, जंतर-मंतर फूंककर कानून बना लेना चाहते हैं, लोकतंत्र का विकल्प बना लेना चाहते हैं, वहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी अगर ऐसे ही कारोबार में लग जाती है तो फिर यह लोकतंत्र के लिए बुरा दिन है। इस देश ने सांसदों को चुना इसलिए है कि वे संसद में जनता के प्रतिनिधि रहकर काम करें। वहां वह अपनी पार्टी के बाहुबल का इस्तेमाल करके अगर पूरी संसदीय व्यवस्था को अगुवा कर लेना चाहते हैं, तो लोकतंत्र इस बात के लिए नहीं है। हम नीतिगत रूप से संसद और किसी भी राज्य की विधानसभा के सीमित रह गए समय के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ हैं, और ऐसे हर मौके पर हमारी यही सलाह रहती आई है कि संसद विपक्ष का हक होता है और सत्ता की जिम्मेदारी। ऐसे हक को लात मारकर विपक्ष जनता को ही लात मारता है। हम अगर इस लोकतंत्र में संसदीय-विपक्ष होते तो हमारी लड़ाई सदन के वक्त को बढ़ाने के लिए होती और फिर उसके बाद उसके एक-एक पल को जनता के प्रति जवाबदेही पूरी करने के लिए होती। मनमोहन सिंह चाहे कोयला घोटाले में जेल जाने लायक हों, जब तक वे प्रधानमंत्री हैं, जब तक संसद जिंदा है, तब तक उन पर लगे आरोपों का जवाब देने का उनका हक है। और संसद को न चलने देना एक बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी है और विपक्ष को अपना यह रूख खत्म करना चाहिए। 
देश को खत्म करने के कई तरीके होते हैं। कई बार हमें यह शक होता है कि अन्ना और बाबा के आंदोलनों का इस्तेमाल चाहे वे खुद देश को सीधे खत्म करने के लिए सीधे-सीधे न कर रहे हों, वे देश को खत्म करने वाले लोगों की हसरत पूरी करने में मददगार जरूर हो रहे हैं। इसी तरह अगर भाजपा को कोयला घोटाले पर कार्रवाई चाहिए, घोटालेबाजों को जेल भेजने की उसकी नीयत है, तो उसे संसद में रात-दिन काम करके, संसद के भीतर और संसद के बाहर घोटालों को उजागर करना चाहिए।

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