ऐसे में इन महिला आयोगों को बंद कर देने की जरूरत


6 अगस्त 2012
संपादकीय
हरियाणा में कांगे्रस पार्टी के लिए कुछ घंटों के भीतर शर्मिंदगी के दो मामले सामने आए हैं। एक तरफ उसके गृहमंत्री की प्रताडऩा से एक युवती को आत्महत्या करनी पड़ी और उसकी खुदकुशी की चि_ी सामने आने पर इस मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा जो कि मुख्यमंत्री का बहुत करीबी माना जाता था और पहली बार विधायक बनने पर ही उसे मंत्री बनाया गया था। उसने प्रताडऩा और शोषण का जितना लंबा सिलसिला चला रखा था, वह इस बात का सुबूत है कि मोटे तौर पर इस पार्टी में, और शायद पूरी भारतीय राजनीति में महिलाओं पर जुल्म, उनका शोषण आम बात है। कुछ ही दिन हुए हैं जब नारायण दत्त तिवारी एक लंबी अदालती लड़ाई के बाद बाप साबित हुए हैं और उस सिलसिले को ध्यान से देखें तो यह साफ होता है कि एक बड़े सीनियर कांगे्रस नेता के संबंध एक शादीशुदा महत्वाकांक्षी कार्यकर्ता से कितने करीबी हो जाते हैं कि उससे बेटा भी हो जाता है। और नैतिकता का हाल यह है कि उस महिला और उस बेटे को खारिज करने के लिए तिवारीजी पूरी जान लगा देते हैं। और इस फैसले के पहले भी जिस तरह के सेक्स-वीडियो के सामने आने पर उन्हें आंध्र का राजभवन छोडऩा पड़ा था, वह कोई कम शर्मनाक बात नहीं थी। एन डी तिवारी के डीएनए नतीजे की घोषणा के बाद अब कुछ हफ्तों के भीतर कांगे्रस के एक राज्य के गृहमंत्री की वजह से यह आत्महत्या सामने आई, और एक दूसरा हादसा भी सामने आया। करीब पूरी जिंदगी कांगे्रस के ताकतवर नेता रहे हरियाणा के भजनलाल के कांगे्रस विधायक और उप मुख्यमंत्री रहे बेटे ने दूसरी शादी करने के लिए धर्म बदला था, और निकाह के बाद उसकी छोड़ी हुई बीवी की लाश भी आज ही सुबह मिली है।
एक महिला के अध्यक्ष रहते हुए इस पार्टी के नेता जिस तरह से ऐसे मामलों में फंसे हुए सामने आ रहे हैं वह बात और तकलीफदेह है। लेकिन हम यह चर्चा यहां कांगे्रस नेताओं की बदचलनी के लिए नहीं कर रहे। इसका मकसद है केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाए जाने वाले एक संवैधानिक महिला आयोग पर बात करना। पिछले महीनों में लगातार राष्ट्रीय महिला आयोग ने जितनी संवेदनशून्यता दिखाते हुए घटिया दर्जे की बातें कहीं हैं, महिलाओं का अपमान किया है, उसे देखते हुए यह बात साफ है कि इतने बड़े संवैधानिक आयोग में अपनी पार्टी की मनोनीत महिलाओं को बिठाकर कोई पार्टी देश या प्रदेश में महिलाओं का भला नहीं कर सकती। सत्ता के मनोनयन से इस सुविधाभोगी जगह पर पहुंचने के बाद ऐसी महिलाएं सत्ता के राज में होने वाली ज्यादतियों पर कितनी आजादी से और कितनी ईमानदारी से कार्रवाई करती होंगी? दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक हमारा अनुभव यह रहा है कि सत्ता के मनोनीत लोग, अपने राजनीतिक आकाओं को असुविधा से बचाने का काम करते हैं और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के साथ खुली बेईमानी करते हैं। किसी राज्य में, या देश में यह देखने में नहीं आता कि महिला आयोग की कार्रवाई से सत्ता को जरा भी परेशानी हुई हो। अगर राज्यों में महिला आयोग असरदार होते, तो फिर महिलाओं को अत्याचार के खिलाफ, शोषण के खिलाफ आत्महत्या की हद तक नहीं जाना पड़ता। और जो मामले आत्महत्या तक पहुंचते हैं, जिनके बाद लिखे हुए सुबूत सामने आते हैं, उनकी तो चर्चा भी हो जाती है, लेकिन जो हजारों-लाखों मामले पुलिस या अदालत तक नहीं पहुंचते, वे तो जुल्मतले दबकर खत्म हो जाते हैं, और सत्तारूढ़ दल की चहेती महिलाएं इन आयोगों में बैठे कोई काम नहीं करतीं। 
राष्ट्रीय महिला आयोग जब गुवाहाटी के सार्वजनिक अत्याचार और देह-शोषण की जांच के लिए वहां पहुंचा तो जितनी भयानक तस्वीरें एक अकेली लड़की पर जुल्म करते हुए दर्जन भर बदमाशों की थीं, उतनी ही भयानक तस्वीरें वहां पहुंचने पर आयोग की महिला सदस्यों द्वारा हंस-हंसकर, असम की परंपरागत टोपी पहनकर स्वागत करवाने की थीं। वे वहां पर प्रताडऩा की जांच के लिए पहुंची थीं, या खिलखिलाने के लिए? देश-प्रदेश में महिलाओं पर जुल्म की खबरें दिन में दस छपती हैं। लेकिन अपनी-अपनी अन्नदाता सरकारों को बचाते हुए ऐसी महिलाएं इस संवैधानिक संस्था को चुप रखकर इन ज्यादतियों को बढ़ावा ही देती हैं। हमारा ख्याल है कि महिला आयोग में मनोनयन के लिए राजनीतिक दलों से बाहर की महिलाओं को ही मनोनीत करने की जरूरत है और इस चयन के लिए सत्ता के एकाधिकार से परे, अदालत, संसद, विधानसभा, राज्यपाल, प्रतिपक्ष के नेता जैसे प्रतिनिधित्व वाली एक कमेटी बनाने की जरूरत है, वरना सुविधाओं की इस दूकान को बंद कर देना चाहिए।

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