चचा की बात पर चर्चा


10 अगस्त 2012
संपादकीय
उत्तर प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव फिर से विवादों में हैं। एटा में एक सरकारी बैठक में अफसरों से कहा, अगर आप मेहनत करोगे तो थोड़ी बहुत चोरी कर सकते हैं। अगर मेहनत करोगे, बुद्धि लगाओगे, अगर इन्हें मीठा पानी दोगे तो चोरी कर सकते हो। शिवपाल की इस सलाह से अधिकारी भौंचक्के रह गए। बाद में शिवपाल सिंह ने यह खबर फैल जाने पर कहा कि मीडिया ने उनकी बैठक में घुसपैठ की। शिवपाल सिंह मुलायम सिंह के भाई हैं और मुख्यमंत्री अखिलेश के चाचा हैं।  दरअसल यह पहला मौका नहीं है कि भारत के किसी राज्य में मंत्री ने अफसरों से थोड़े बहुत भ्रष्टाचार के साथ भी काम करने को कहा है। इस बात में शायद भ्रष्टाचार करने को नहीं कहा गया है, काम करने को कहा गया है, और उसके उत्साह के लिए भ्रष्टाचार को अनदेखा करने जैसी एक बात दिखती है। 
सरकार को अगर करीब से देखें तो ऐसी बात आम चर्चा में रहती है कि कोई अफसर या कोई मंत्री बेईमानी करने के बाद भी काम को फुर्ती से करते हैं और उससे जनता का भला होता है, जबकि बहुत से अफसर या मंत्री ईमानदारी बरतने की कोशिश में काम करने से बचते हैं और काम हो ही नहीं पाता। एक बहुत छोटा तबका ऐसे अफसरों और मंत्रियों का भी रहता है जो कि ईमानदार भी रहते हैं और सावधानी के साथ-साथ तेजी से फैसले भी लेते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों का बजट भारत में इतना अधिक होता है कि उसमें बेईमानी करने वालों के कमाने-खाने के बाद भी सरकारी कामकाज के लिए बहुत सी रकम रहती है। बहुत से काम सबसे गरीब और कमजोर तबके के फायदे के रहते हैं, और वह बजट अगर समय पर खर्च नहीं होता तो फिर यह तबका जिंदगी का वह अरसा उस फायदे के बिना ही गुजार देता है। इसी तरह सरकार की कई योजनाएं आर्थिक-चक्र को आगे बढ़ाने वाली होती हैं, और उन पर काम न होने से देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था उतनी रफ्तार नहीं पकड़ पाती जितनी कि मुमकिन होती है। 
आज का वक्त सूचना के अधिकार, जनहित याचिका, लोकायुक्त और तरह-तरह की दूसरी शिकायतों और जांच का है। नतीजा यह है कि किसी भी किस्म के सरकारी काम में जिम्मेदार लोग फूंक-फूंककर कदम रखते हैं। खासकर ईमानदार लोग अधिक चौकन्ने रहते हैं क्योंकि उनकी किसी कमाई की नीयत नहीं रहती, और काम में कोई चूक हो जाने पर जानबख्शी की गुंजाइश भी नहीं रहती। बहुत से अच्छे अफसरों का यह मानना रहता है कि सरकार के लिए अच्छा कितना भी करें, उससे कोई भला नहीं होता, लेकिन अगर एक गलती हो जाए तो कानून उसे गलती न मानकर गलत काम मानता है और फिर उससे बचने का कोई रास्ता नहीं होता। इसलिए ऐसे अधिकारी और मंत्री कम रहते हैं जो पूरी सावधानी के साथ-साथ तेजी और ईमानदारी से काम करें। लेकिन ऐसी भी बात नहीं है कि यह मुमकिन ही नहीं होता। जो लोग ऐसा करना चाहते हैं वे इसके रास्ते भी निकाल लेते हैं। 
सरकार को करीब से देखते हुए जो एक बात बहुत सी जगहों पर सामने आती है वह ईमानदारी को एक मुश्किल खूबी बनाती है और काम होने में वह एक खामी की तरह रोड़ा भी बन जाती है। केंद्र सरकार से राज्य की योजनाओं के लिए जो हजारों करोड़ का बजट आता है, उसमें भी कहीं-कहीं राज्य से कुछ ठेकेदारों को भेजकर कमीशन देना होता है और तब वह रकम जारी होती है। यह सिलसिला कुछ उसी तरह का है कि सरकार की हर कुर्सी कुछ-कुछ रखते चलती है और नीचे की किसी कुर्सी पर कोई ईमानदार भी बैठे हैं तो भी उनको इस बेईमानी को कहीं न कहीं अनदेखा करना पड़ता है। इसलिए जो बात उत्तरप्रदेश के सत्तारूढ़ कुनबे ने सरकारी मीटिंग में कही है, उसे सरकार से वास्ता पडऩे वाले बहुत से लोग सही मानते हैं, और ऐसा सोचते हैं कि ऐसे प्रोत्साहन के बिना सरकार के काम की रफ्तार मंदी रहती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि भ्रष्टाचार किसी एक सीमा तक कानूनी बना देना चाहिए ताकि काम समय पर और तेजी से हो सकें। सरकारी अस्पतालों में इलाज से मिलने वाली फीस के एक हिस्से को डॉक्टरों और बाकी अस्पताल-कर्मचारियों में बांटने का एक फार्मूला सरकार ने बनाकर छत्तीसगढ़ में घोषित भी किया है। उत्पादकता-बोनस की तरह अगर कोई फार्मूला सरकार के सभी विभागों के लिए निकाला जा सकता है, तो उसे भी कुछ लोग ठीक मानेंगे। हमारी अभी तक की समझ इसके नफे-नुकसान का अंदाज नहीं लगा सकती, इसलिए हम इस चर्चा को छेड़ भर रहे हैं।

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