मोटा माल गिनाते हुए सुषमा को रेड्डी याद आ रहे थे, या नहीं?


संपादकीय
28 अगस्त 
हिन्दी के एक प्रमुख समाचार चैनल आज तक पर एक बातचीत में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके राजनाथ सिंह उस वक्त घिर गए जब उनसे बहुत तल्खी के साथ सवाल किया गया कि भाजपा के नेता चैनलों पर जाकर बहस में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन संसद में बहस का बहिष्कार कर रहे हैं, उससे बच रहे हैं। मीडिया के खुद के हिसाब से यह सवाल कुछ आत्मघाती था क्योंकि यह एक पार्टी को चैनल पर आने के लिए घेर रहा था और एक खास संदर्भ में इसकी आलोचना भी कर रहा था। लेकिन कुल मिलाकर आज देश के एक बड़े तबके के दिल-दिमाग में सवाल यह है कि संसद का बहिष्कार करके भाजपा, या उसके साथ के कुछ और दल लोकतंत्र को किस तरफ ले जा रहे हैं? हो सकता है कि वे लोकतंत्र की आज की नौबत को चुनाव में तब्दील करना चाहते हों, लेकिन संसद में यूपीए का बहुमत रहते हुए बहिष्कार करने वाले देश को एक और चुनाव में झोंकने की ताकत नहीं रखते। और चुनाव से अभी दो बरस दूर का देश इतने तेज हमलों में घिर गया है, कि जिसकी धार को दो बरस तक बनाए रखना खासा मुश्किल या नामुमकिन होगा। 
कल भाजपा की लोकसभा की नेता ने तौलकर और औपचारिक रूप से कांग्रेस पर यह आरोप लगाया कि उसे कोयले के गोरखधंधे में मोटा माल मिला है। इसका जवाब देते हुए कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि मोटा माल और छोटा माल, इसकी परंपरा भाजपा की रही है, और छोटा माल की मिसाल देने के लिए मनीष तिवारी ने भाजपा के अध्यक्ष रहते हुए लाख रूपए रिश्वत लेने वाले बंगारू लक्ष्मण को याद किया। संसद के बहिष्कार के नाजायज होने पर तो हम पिछले एक हफ्ते में एक से अधिक बार लिख चुके हैं, लेकिन आज इस छोटे और मोटे माल की कुछ चर्चा हो सकती है। सुषमा स्वराज ने जितने जोर के साथ मोटे माल की बात कही, तो उससे कर्नाटक की उनकी एक तस्वीर देश को एकदम से याद आ जाती है जिसमें वे वहां के कुख्यात रेड्डी बंधुओं के सिर पर हाथ रखे हुए खड़ी हैं, और उन्हें आशीर्वाद दे रही हैं। ये रेड्डी बंधु, या उसमें से एक, कर्नाटक में सबसे भ्रष्ट मंत्री होने के आरोप के साथ आज जेल में है, जमानत के लिए उससे दस करोड़ रूपए रिश्वत लेने वाला सीबीआई का जज भी जेल में है, और इन्हीं रेड्डी बंधुओं की अगुवाई में दसियों हजार करोड़ का लौह अयस्क घोटाला वहां के लोकायुक्त ने पाया है, और देश की सुप्रीम कोर्ट तक इन्हीं रेड्डी बंधुओं के दुस्साहस पर हक्का-बक्का है। खुद भाजपा के भीतर ये खरबपति खदान माफिया भस्मासुर की तरह ताकतवर साबित हो चुके हैं जो कि अपनी दौलत की नोंक पर आज भी भाजपा और कर्नाटक सरकार के बंधक बनाए रखते, अगर वे जेल में नहीं होते। 
अगर किसी एक कारोबारी के सबसे अधिक काले कारनामे, सबसे बड़े आर्थिक अपराध, और उसकी सबसे ताकतवर राजनीतिक कुर्सी, इन सबका अगर मेल देखें तो भाजपा के भीतर सुषमा स्वराज के वरदहस्त तले ये रेड्डी बंधु ही दिखते हैं, जिन्होंने विधानसभा के चुनाव में खर्च का पूरे देश का एक रिकॉर्ड ही कागजों से परे स्थापित किया है। इसलिए जब सुषमा स्वराज ने मोटे माल की बात को दम-खम के साथ कहा, तो उनके शब्दों के साथ इसी तरह की नैतिक ताकत नहीं थी। आज इस देश में कांग्रेस और भाजपा के बीच कम और अधिक भ्रष्ट को लेकर कोई उन्नीस-बीस या अठारह-इक्कीस जैसी बात कर ले तो कर ले, लेकिन इन दोनों में से कोई एक पार्टी ईमानदार है, क्या ऐसा भी देश का कोई भोला भी सोच सकता है? जिस एनडीटीवी सर्वे में देश में कांग्रेस के सफाए की भविष्यवाणी की जा रही है, उसी सर्वे में कांग्रेस और भाजपा के भ्रष्टाचार पर जब देश के लोगों से बात की गई तो 54 फीसदी लोग कांग्रेस को भ्रष्ट मानने वाले हैं, और 46 फीसदी लोग भाजपा को भ्रष्ट मान रहे हैं। और यह सर्वे देश के 18 राज्यों में 125 लोकसभा सीटों पर हुआ है। राज्य आधे से अधिक और सीटें एक चौथाई, जो कि पूरे देश के मिजाज को बताने के हिसाब से छांटी गई हैं। ऐसे में छोटा माल और बड़ा माल, ऐसी भाषा और ऐसी बात का क्या वजन है? 
कांग्रेस का कोयला घोटाला हो सकता है कि लाखों करोड़ तक पहुंचे, वह अभी सीएजी के एक अंदाज पर टिका हुआ पौने दो लाख करोड़ का आंकड़ा है। लेकिन अकेले कर्नाटक राज्य में भाजपा के खुद के अपने, सुषमा स्वराज के चहेते, मंत्रियों की अगुवाई में लोहा खदानों से चोरी और डकैती तो लंबी जांच के बाद लोकायुक्त में पन्द्रह-बीस हजार करोड़ की तो स्थापित की ही है, और उसके बाद गिरफ्तारी और मुकदमा शुरू हो चुका है। देश में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को ऐसा लगता है कि भाजपा के नेताओं के बीच संसद के भीतर और संसद के बाहर आपसी मुकाबले के चलते हुए अधिक आक्रामक बनने और दिखने की होड़ लगी है और उसके तहत संसद के ऐसे बहिष्कार का यह काम चल रहा है। हम ऐसा कोई अंदाज तो नहीं लगा रहे, लेकिन हम संसद के ऐसे बहिष्कार के खिलाफ हैं, और भाजपा के मोटे माल की भाषा को नैतिक-वजन वाला नहीं पाते। इस बात को कौन नहीं जानता कि छोटे और मोटे माल के लिए ये पार्टियां लगी रहती हैं, और जब, जहां जिसकी बारी लग जाए, वह कंगारू की तरह माल अंदर कर लेती हैं। लेकिन सुषमा स्वराज की आक्रामकता समझ से कुछ परे है क्योंकि उनके वरदहस्त तले के लोगों ने जो किया है, वह किसी भी एक राज्य के भीतर, किसी भी एक सत्तारूढ़ मंत्री का किया गया भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है। वे पता नहीं कल कांग्रेस का मोटा माल गिनाते हुए कर्नाटक के खनिज माफिया के बारे में सोच रही थीं या नहीं? 

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