हिंदुस्तान का बेअक्ल कानून


2 अगस्त 2012
संपादकीय 
शाहरूख खान को एक स्टेडियम में मैच के दौरान सिगरेट पीते कैमरे पर कैद किया गया, तो एक मुकदमे के बाद अब उन्हें सौ रुपए जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया। इस मामले में कोई कैद तो होनी भी नहीं थी, लेकिन इस मामले को चलाने में सरकार या अदालत का जितना वक्त लगा और शाहरूख खान जैसे अरबपति की पैसों की जो ताकत है उसके चलते यह इंसाफ बेअक्ल लगता है। कहने को लोग कानून के ऐसे अमल पर अंधा कानून कहते हैं, लेकिन हम इस भाषा से बचना चाह रहे हैं क्योंकि जो लोग कुदरत की मार से या किसी बीमारी या हादसे से आंखें खो चुके हैं, उन्हें गालियों की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 
भारत के कानून में किसी की दौलत के मुताबिक उस पर अधिक जुर्माना लगाने का अलग से कोई इंतजाम नहीं है। किसी कानून को तोडऩे पर एक गरीब को जितना जुर्माना लगता है, उतना ही जुर्माना एक अमीर को भी लगता है। पचीस हजार की एक मोपेड पर जो जुर्माना लगता है शायद वही जुर्माना लाख रुपए की मोटर साइकिल पर भी लगता है। हमारे हिसाब से यह होना चाहिए कि जुर्माना लोगों की कमाई और उनकी संपन्नता के अनुपात में तय हो। अगर सौ रुपए रोजी पर काम करने वाले इंसान पर सार्वजनिक जगह पर बीड़ी पीने पर सौ रुपए का जुर्माना होता है, तो शाहरूख खान या किसी भी दूसरे अरबपति पर जुर्माना उनकी एक दिन की कमाई जितना होना चाहिए, इसके बिना इंसाफ का यह इंतजाम एक मखौल से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकेगा। 
लगे हाथों इस मुद्दे पर हम कुछ और बातें कहना चाहेंगे, कि ताकतवर तबकों के खिलाफ जब कमजोर तबकों के साथ ज्यादती करने के मामले चलते हैं तो इन दोनों की ताकतों के बीच फर्क जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक जुर्माना होना चाहिए, उतनी ही अधिक सजा होनी चाहिए। एक सरकारी दफ्तर में बैठे कर्मचारी ने अगर किसी ठेकेदार से रिश्वत ली है और उस पर 5 हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है, और 6 महीने सजा का इंतजाम है, तो फिर वृद्धावस्था पेंशन मंजूर करने के लिए रिश्वत लेने पर इससे कई गुना अधिक जुर्माने और कई गुना अधिक सजा का कानून होना चाहिए। जुर्म अगर बराबरी के लोगों के बीच होता है तो वह एक अलग बात होती है, लेकिन जब ताकतवर एक कमजोर के खिलाफ जुर्म करता है तो उसे उसी दर्जे में नहीं रखा जाना चाहिए। इसलिए दौलत की ताकत, ओहदे की ताकत, अधिकारों की ताकत को देखते हुए जुर्माने और सजा में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। एक कार जो 2 लाख रुपए की है, उस पर जो जुर्माना है वही जुर्माना 50 लाख रुपए की कार पर अगर है, तो यह कानून बेअक्ल है। सुप्रीम कोर्ट को अपनी तरफ से ऐसा फैसला देना चाहिए और अगर यह संसद के अधिकार क्षेत्र की ही बात है तो संसद पर ऐसे फेरबदल के लिए जोर डालना चाहिए।
भारत की आज की न्याय व्यवस्था इतनी कमजोर और बेअसर है कि किसी गरीब को इंसाफ मिलने की संभावना कम ही रहती है। इसीलिए नक्सलियों के वैचारिक समर्थक यह मानते हैं कि इस लोकतंत्र में हिंसा के बिना सबसे कमजोर तबके को कभी इंसाफ नहीं मिल सकेगा। इस तस्वीर को बदलना, और नक्सलियों के हमदर्दों को कम करना है, तो इंसाफ को असरदार भी बनाना होगा, और उससे अमीरों और गरीबों के बीच, ताकतवर और कमजोर के बीच की संभावनाओं के फासले को भी खत्म करना होगा। शाहरूख खान तो एक सिगरेट पीने पर सौ रुपए का जुर्माना पूरी जिंदगी लगातार सिगरेट पीते हुए भी दे सकता है, फिर उसे सजा किस तरह की हुई? 
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