दंगों पर अदालती फैसलों के दाग कुपोषण पर भी मोदी कमसमझ


30 अगस्त 2012
संपादकीय
भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने की चर्चा में नरेन्द्र मोदी का नाम एक तबका बार-बार लेता है। जिन लोगों के इंसानी सरोकार बहुत कम हैं, वे लोग मोदी को देश को चलाने के लिए सबसे सही भी मानते हैं। ऐसे लोगों को कल गुजरात की एक अदालत के फैसले से कुछ सदमा पहुंचा होगा। मोदी राज के सरकारी दंगों में भागीदारी के लिए उनकी एक करीबी मंत्री भी करीब सौ हत्याओं वाले इस मामले में कुसूरवार ठहराई गई हैं। दो दर्जन लोग इन हत्याओं और दंगों के जिम्मेदार माने गए हैं, जिनको तरह-तरह से बचाने की कोशिश मोदी सरकार के नाम इतिहास में दर्ज है। लेकिन गुजरात के दंगों में वहां नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सरकार का जो रूख रहा है, सरकार जो भागीदारी रही है, सरकार ने हजारों हत्याओं के बाद हत्यारों को बचाने के लिए अदालतों में जैसी कोशिश की है, और गुजरात से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अच्छी तरह दर्ज है, और ऐसी साजिशों को हिंदुस्तान के इतिहास ने कभी नहीं देखा था जब दंगाईयों और हत्यारों के वैचारिक-भागीदारों को ही सरकारी वकील बनाया गया था। नतीजा यह हुआ कि मुठभेड़ हत्याओं से लेकर अफसर-प्रताडऩा, और दंगों के मामलों को कमजोर करने की मोदी की साजिशों के चलते मामले गुजरात के बाहर भी भेजे गए, और सुप्रीम कोर्ट ने मानो गुजरात में सीधे अपने कैमरे लगाकर मोदी से कई किस्म के हक छीन लिए। 
लेकिन इतनी बातों में कुछ भी नया नहीं है, सिवाय मोदी की एक करीबी महिला मंत्री को कल सजा मिलने के, और इस बड़े जनसंहार का फैसला आने के। इसलिए आज मोदी पर लिखने का मकसद कुछ दूसरा है। कल नरेन्द्र मोदी ने यह कहा कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग की लड़कियां सेहत के बजाय फैशन पर अधिक ध्यान देती हैं इसलिए वे कुपोषण की शिकार होती हैं। एक इंटरव्यू में कल उनसे गुजरात में कुपोषण की कथित खराब स्थिति के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब हैरान करने वाला है। अमरीकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल  के इंटरव्यू के मुताबिक मोदी का तर्क था कि गुजरात एक शाकाहारी राज्य जहां मध्यम वर्ग का एक बड़ा तबका रहता है जिसके चलते लोग अपने सेहत का ख्याल रखते हैं। उन्होंने कहा, अगर मां अपनी बेटी से कहती है कि दूध पीयो, तो बेटी ये कहते हुए मना कर देती है कि मैं इसे पीकर मोटी हो जाऊंगी। हम इस धारणा में परिवर्तन लाना चाहते हैं। 
गुजरात की हकीकत यह है कि ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वहां के आधे बच्चों का विकास प्रभावित है और पांच बरस से कमउम्र के बच्चों का शारीरिक विकास और कद तक सेहत के पैमाने पर कम है। अब मोदी के बारे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या वे अपने राज्य के आर्थिक विकास के नारों, और शायद आंकड़ों के भी, बीच सबसे गरीब तबके को इस तरह अनदेखा कर रहे हैं? क्या पांच बरस की लड़कियां फैशन का ख्याल रखते हुए, छरहरी दिखने के लिए कम खाती-पीती हैं? देश या किसी भी प्रदेश के आर्थिक सफलता के आंकड़े वहां के समुदाय के आम हाल का सुबूत नहीं होते। भारत की पिछले बरस की मानव विकास रिपोर्ट को देखें तो गुजरात प्रति व्यक्ति ऊंची कमाई वाले राज्यों में कुपोषण का सबसे बुरा शिकार राज्य भी पाया गया। गुजरात को भूख के इंडेक्स पर प्रमुख राज्यों में तेरहवें नंबर पर जगह मिली, ओडि़शा, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम के भी नीचे। मतलब यह कि चुनिंदा कारखानेदारों और कारोबारियों की कमाई से राज्य का प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा तो आसमान तक चले जाता है, लेकिन गरीब तबके की भूख भी नहीं मिट पाती। 
किसी राज्य के विकास के आंकड़े, उसका बजट-आकार बहुत दगाबाज हो सकते हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी जैसे चौकन्ने मुख्यमंत्री से यह बात बड़ी अटपटी और खराब लगती है कि राज्य का कुपोषण लड़कियों के फैशन के फेर से उपजा हुआ है। कुपोषण एक ऐसे गरीब तबके की बेबसी है, जिसकी जिंदगी में दूसरों की उतरन ही फैशन होती है। और पांच बरस की उम्र में तो फैशन के लिए जागरूकता, नरेन्द्र मोदी के पसंदीदा खरबपतियों के परिवारों में भी नहीं होती होगी।

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