आज किसी कालिखपुती बात पर न लिखने की कसम है...


31 अगस्त 2012
संपादकीय
आज चाहे कुछ भी हो जाए, हमने यह तय करके रखा है कि कोयले पर, संसद-बहिष्कार पर, अन्ना-बाबा पर, या भ्रष्टाचार पर, कालिखपुती किसी भी बात पर आज नहीं लिखेंगे। इसलिए कि लगातार निराशा को देखते हुए और लगातार उस पर लिखते हुए हमारी खुद की दिमागी हालत गड़बड़ा रही है। और ऐसे में किसी भली बात को सुनने, आगे बढ़ाने और उस पर लिखने की बहुत जरूरत लग रही है। 
सारी कालिख के बीच एक छोटी सी, वैसे तो बिना अहमियत वाली, लेकिन अंधेरी सुरंग में जूगनू की तरह की खबर भारत के लिए अमरीका से आई है। दुनिया की सबसे बड़ी समाचार पत्रिका 'टाईमÓ अपने कवर पेज पर किसे जगह देती है, उसे लोग गौर से देखते हैं। और ऐसे में आज जब सत्यमेव जयते नाम के टीवी प्रोग्राम की वजह से आमिर खान को वहां लिया गया है तो यह एक राहत की बात भी है। चाहे यह कार्यक्रम हिंदुस्तान की बुराईयों की वजह से पैदा क्यों न हुआ हो, यह अपनी भीतरी बुराईयों को उसके सींग पकड़कर उससे मुठभेड़ करने वाला कार्यक्रम रहा और उससे दर्जनभर ऐसे जरूरी मुद्दों पर देश में कुछ दिनों के लिए चर्चा छिड़ी जिन्हें कि दरी-चटाई के नीचे दबाकर रखना हिंदुस्तान का उच्च-मध्यम वर्ग जरूरी समझता है। 
दरअसल धर्म में पाप के लिए प्रायश्चित के जितने रास्ते बनाए गए हैं, वे सब भी जिन सामाजिक कुकर्मों के बोझ से बरी होने के लिए कम पड़ते हैं, उन पापों पर कोई चर्चा इस देश में करना नहीं चाहते। इसलिए एक फिल्मी सितारे ने, अपनी शोहरत और राष्ट्रीयता को छूने वाली साख के साथ-साथ जब यह कार्यक्रम पेश किया, तो भारी असुविधा और हीन भावना के साथ भी, अपराधबोध के साथ भी भारत के लोगों ने इसे देखा। इस पर हम शायद दो बार पहले भी लिख चुके हैं, लेकिन भ्रष्टाचार पर दो सौ बार लिख चुके हैं, और संसद, अन्ना-बाबा पर भी दर्जनों बार लिख चुके हैं। इसलिए आमिर खान की एक कोशिश पर भी एक बार और अगर लिख दें, तो यह जगह की उतनी बड़ी बर्बादी नहीं है, जितनी कि यहां पर किसी और निराशा को एक और बार परोसने पर पाठकों के वक्त की होती, और हमारे लिखने के वक्त की होती।  
टाईम ने अपने कवर पर आमिर की तस्वीर छापी है और लिखा है कि वे बॉलीवुड के ढर्रे को तोडऩे की कोशिश में लगे हैं- भारतीय की सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाकर। क्या एक अभिनेता किसी देश को बदल सकता है। इस कार्यक्रम में  उन्होंने कन्या भू्रण हत्या, मेडिकल पेशे में कथित बेइमानी, इज्जत के नाम पर हत्या और दहेज जैसे संवेदनशील, लेकिन सोच-समझकर अनदेखे किए जाने वाले मुद्दों को उठाया था। समाज को बीच-बीच में आत्मावलोकन, आत्मविश्लेषण, आत्ममंथन, आत्मचिंतन की जरूरत होती है। और भारत या दुनिया के इतिहास में समाज सुधार का काम करने वाले लोग हमेशा ही किसी धर्म या आध्यात्म के चोले में नहीं आए, और न ही वे खादी या उस जैसी किसी और वर्दी में आए। समाज सुधार तो किसी भी तरह की शक्ल में आ सकता है और लोगों को याद होगा कि फौजियों के मनोरंजन के लिए सरहद पर लगातार जाने वाले सुनील दत्त और नरगिस ने बाद में और भी किस्म के काम किए। और आखिर के बरस तो सुनील दत्त साम्प्रदायिकता के खिलाफ देश में हजारों किलोमीटर की पदयात्रा भी करते रहे। इसलिए बिना किसी राजनीतिक मकसद के लोग अगर ऐसा करते हैं तो समाज को ऐसे ही लोगों की जरूरत है, उसे अन्ना-बाबा किस्म की भेड़ की खाल से ढंकी राजनीतिक नीयत की जरूरत नहीं है। 
टाईम पत्रिका भारत के किसी भले काम के लिए कोई सर्टिफिकेट मानी जाए ऐसी जरूरत नहीं है, लेकिन इस देश से बाहर बैठे लोग यहां के बारे में कई बार एक अधिक संतुलित विश्लेषण कर सकते हैं। हम टाईम पत्रिका के इस संपादकीय फैसले के उसी वजह से आज यहां चर्चा के लायक मान रहे हैं, और यह चर्चा उस पत्रिका की नहीं है, भारत के मुद्दों और यहां की एक पहल की है। इससे यह समझने की जरूरत है कि इन मुद्दों पर आमिर खान से परे भी हमीं लोगों को बात करनी होगी, और किसी तरह की मंदिर-मस्जिद, पूजा-प्रायश्चित से हिंदुस्तान के भीतर की यह बेइंसाफी खत्म नहीं होगी, और न ही कुकर्मों के दाग धुलेंगे। इसलिए खुलकर इस पर बात करनी चाहिए। और हमारा यह मानना है कि सत्यमेव जयते में जिन दर्जन भर मुद्दों को उठाया गया, उन मुद्दों को इस कार्यक्रम की चर्चा के बिना भी स्कूल-कॉलेज में, सामाजिक संगठनों में तरह-तरह के मौकों पर बहस का सामान बनाना चाहिए। इनसे एक फिल्मी सितारे को शोहरत मिले या न मिले, हिंदुस्तान के भीतर की इन खामियों को गालियां जरूर मिलनी चाहिए, और इस आत्मविश्लेषण के बाद ही सुधार का रास्ता शुरू होगा।

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