जंतर-मंतर का तिलस्म निपटा


3 अगस्त 2012
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
कल शाम दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक जंतर-मंतर खत्म हुआ। एक तिलस्म की तरह तथाकथित जनआंदोलन को लोकतंत्र के विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा था, पिछले कुछ बरसों में अनगिनत बार शुरू और खत्म हुए आमरण या बेमुद्दत अनशन को भी आज शाम खुद होकर खत्म करने का ऐलान अन्ना हजारे ने कर दिया है। इसके साथ ही जिस हकीकत को कल पहली बार माना गया, वह है अन्ना के, और उनके साथियों के राजनीतिक इरादे। अगले चुनाव में राजनीति करने या चुनाव लडऩे के बारे में कहा गया है, और हो सकता है कि शब्दों को कुछ आगे-पीछे करके ये बयान आए दिन के फेरबदल की तरह बदले जाएं, लेकिन कुल मिलाकर सार्वजनिक रूप से इतना तो मान ही लिया गया है कि अगले चुनाव में अन्ना हजारे और उनका आंदोलन शामिल रहेंगे, चाहे किसी भी हैसियत में। 
हर बार इस आंदोलन को भ्रष्टाचार के खिलाफ, अपने ही गढ़े हुए जनलोकपाल के समर्थन में, चुनिंदा राजनीतिक दलों और चुनिंदा नेताओं के खिलाफ एक साजिश सरीखे एक तरफा बेईमान अभियान की तरह शुरू किया गया और देश की सरकार को  बंधक बनाने की कोशिश की गई। कभी गांधीवादी होने का दिखावा करने वाले एक बुजुर्ग की धड़कन की नोंक पर, तो कभी देश के लिए कुर्बानी देने का दावा करने वाले नौजवान की गिरती सेहत की नोंक पर, इस देश की सरकार को, संसद को, पूरे लोकतंत्र को, इस टोली की अलोकतांत्रिक तानाशाही और मनमानी के साथ ब्लैकमेल किया गया। और इसे ही सबसे बड़ा लोकतंत्र बताया गया। इस आंदोलन को संसद का विकल्प बताया गया, लोकतंत्र की सारी संसदीय व्यवस्था को धराशाही करके एक अराजकता को बढ़ावा दिया गया और उसे ही जनता का हक बताया गया। सत्ता पर काबिज मौजूदा भ्रष्ट लोगों के विकल्प के रूप में संसद को टुकड़े-टुकड़े करके उसके मलबे को एक नई व्यवस्था बताया गया। और जनता का वह हिस्सा जिसकी राजनीतिक समझ किसी गंभीर और जटिल विश्लेषण में नहीं उलझ पाती, उसने अन्ना-टोली के इस आंदोलन को एक विकल्प मान भी लिया और इसके नारों से कुछ समय के लिए प्रभावित भी हो गई। यहां यह याद करना जरूरी है कि पड़ोस के पाकिस्तान के वोटर एक चुनाव में बेनजीर भुट्टो की पार्टी के लगाए गए इन बैनरों से भी प्रभावित हो गए थे कि-'न मां शरीफ, न बाप शरीफ, नवाज शरीफ-नवाज शरीफÓ। ऐसे किसी नारे से किसी के मां और बाप की शराफत जिस हद तक साबित हो सकती है, उसी हद तक अन्ना-टोली का आंदोलन संसदीय-लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प साबित हो रहा था। अब यह नौबत बेहतर है कि यह टोली अगले चुनाव में मैदान में रहेगी, अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के साथ, और संसदीय लोकतंत्र के विकल्प को पेश करने का वह एक लोकतांत्रिक जंतर-मंतर होगा। 
जिस अन्ना-टोली को गांधीवादी और देश का आदर्श साबित करने की कोशिशें इस आंदोलन के हिमायतियों ने की, उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि पिछले कुछ चुनावों में, यूपीए, खासकर कांगे्रस पार्टी को नुकसान पहुंचाने की नीयत से उसने जिस तरह का चुनाव प्रचार किया, उस किस्म की दिलचस्पी उसने भाजपा के राज वाले कर्नाटक में रोज फट रहे बेईमानी के बमों के धमाकों को सुनते हुए भी क्यों नहीं दिखाई। उस तरह की तो छोड़ दें, अन्ना हजारे और उनकी बड़बोली टोली के रोजाना के घंटों के बयानों में भी कर्नाटक का क शायद ही सुनाई दिया जबकि इसी टोली के सबसे गंभीर सदस्य, जस्टिस संतोष हेगड़े ने कर्नाटक की लोकायुक्त की हैसियत से यहां की भाजपा सरकार के बेइंतहा और ऐतिहासिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच रिपोर्ट देश के सामने रखी थी। इस जांच रिपोर्ट पर मुंह खोलने की जहमत भी अन्ना की टोली के चेहरों ने नहीं की, जबकि इस टोली के चेहरे तकरीबन पूरे समय माईक के साथ ही देश को दिखते रहे। इस पूरे दौर में यह टोली उन तमाम लोगों को भ्रष्ट करार देती रही, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ होने का दावा करने वाले इस पक्षपाती आंदोलन के साथ खड़े नहीं थे। इसने भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे के अपने तरीके, और अपने आंदोलन को अकेला मुमकिन तरीका मान लिया था, और जो साथ नहीं है वह भ्रष्ट है ऐसा भी मान लिया था। लोकतंत्र में ऐसे किसी एकाधिकार की कोई गुंजाइश नहीं है। इस देश की आजादी की लड़ाई में गांधी के अहिंसक आंदोलन की जगह भी थी, पूरी तरह वामपंथी विचारधारा वाले गैरअहिंसक भगत सिंह की भी जगह थी, इन दोनों से परे, हिटलर से परहेज न रखने वाले सुभाषचंद्र बोस की भी जगह थी, और इनमें से किसी ने भी एक-दूसरे को गद्दार नहीं कहा था। इसलिए अन्ना-टोली के तौर-तरीके पूरी तरह तानाशाह थे, तानाशाह हैं। एक लोकतांत्रिक भ्रष्ट भी एक ईमानदार तानाशाह से बेहतर ही होता है क्योंकि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के खत्म होने की गुंजाइश रहती है, तानाशाही में लोकतंत्र की कोई जगह नहीं होती।
अन्ना हजारे के बारे में हम पहले भी कई बार इन बातों को लिख चुके हैं, कि किस तरह उन्होंने कैमरों के सामने ही शरद पवार पर हमला करने वाले, उन्हें थप्पड़ मारने वाले शर्मनाक मामले पर अपनी फूली न समाई जाने वाली खुशी जाहिर करते हुए कहा था-बस एक ही थप्पड़! इसके अलावा भी कभी वे गुजरात के लहू सने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रशंसक बनते रहे, कभी वे सोनिया गांधी के खिलाफ ओछी बातें करते रहे, कभी वे राहुल गांधी को कोसते रहे, और पूरे ही दौर में उनकी जुबान तर्कहीन, अन्यायपूर्ण और ओछी रही। इस पूरी टोली ने विशेषणों को तथ्यों का विकल्प मान लिया और आरोपों को सुबूत का विकल्प। यह टीम आंदोलन के इस पूरे दौर में तानाशाही से गढ़े गए नारेनुमा विकल्पों को संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरह पेश करती रही। और जिस तरह एक मदारी के बेचे जा रहे तेल को भी फुटपाथ पर लोग उसकी जुबान के असर में आकर खरीद लेते हैं, कमोबेश उतने ही लोग, उसी तरह के झांसे में आकर अन्ना हजारे के आंदोलन के नारों को भारत के भविष्य के लिए एक विकल्प मान बैठे। लेकिन कोई मदारी किसी एक फुटपाथ पर लंबे समय तक मजमा नहीं जमा सकता, इसीलिए इस बार जंतर-मंतर पर सैकड़ों की भीड़ को हजारों में तब्दील करने के लिए भगवा रामदेव को लाया गया, उसके बाद नजारा कुछ बदला, और तब तक की नाकामयाबी के लिए मीडिया को एक बिके हुए षडयंत्रकारी की तरह कोसा गया, उस पर हमले किए गए।
भेडिय़ा हो या कोई और जानवर, जब वह अपनी ही असल खाल में होता है, तो वह बेहतर होता है। भेड़ की खाल पहनकर घात लगाने वाला भेडिय़ा अधिक खतरनाक होता है। अन्ना हजारे की टोली ने कल गैरराजनीतिक होने की खाल उतार दी। अब अगले चुनाव में उसके पास जीतकर आने, और मौजूदा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक को, जनलोकपाल कानून बनाने, विदेशों से पैसा वापिस लाने, भ्रष्टाचारियों को चौराहे पर फांसी देने का कानून बनाने का पूरा हक रहेगा। यूपीए सरकार के मंत्रियों के साथ-साथ कहीं गलती से कर्नाटक के मंत्रियों को फांसी न लग जाए, इसके लिए कानून में खास रियायत करने का हक भी एक बड़ा बहुमत पाकर अन्ना हजारे की टोली गढ़ सकेगी। सवा अरब से अधिक आबादी में से उसे हजार से भी कम ईमानदार और भले लोग ढूंढकर चुनाव में खड़े करने और उन्हें जिताने का भी पूरा मौका उन्हें रहेगा। संसद के पहले होने वाले विधानसभाओं के चुनावों में भी वे एक-एक विधानसभा सीट के लाखों वोटरों में से एक-एक तो भले इंसान ढूंढ ही पाएंगे। और आज जैसा कि इस टोली का कहना है, इसके साथ पूरा देश खड़ा है, तो पूरे देश के एक-एक नोट और एक-एक वोट से ही पूरे देश में, सारे प्रदेशों में अन्ना की सरकार बन जाएगी। यह एक अधिक ईमानदार अभियान होगा, और इसकी ऐसी कामयाबी के बाद हम इसे पांच-पांच बरस सरकारें चलाने की शुभकामना भी देंगे।
पिछले कुछ बरसों में चौबीसों घंटे चलने वाले टीवी समाचार चैनलों की अपने माध्यम की अपनी सीमाएं हैं, और सीमाहीन गलाकाट मुकाबला उनके बीच पल-पल चलता है। इसलिए हवा में गूंजते नारे जमीनी हकीकत की तरह पेश किए जाते हैं, और विशेषणों को तथ्यों की तरह पेश किया जाता है। ऐसे मीडिया को बाबा, अन्ना या निर्मल बाबा जैसी नाटकीयता अपनी रोजी-रोटी के लिए माकूल बैठती है। इसलिए देश में नारों की फसल में मीडिया का यह हिस्सा खाद-पानी डालते रहता है। निर्मल बाबा इसके लिए लंबा-चौड़ा भुगतान करते थे, और अन्ना-बाबा को यह मीडिया अपने कारोबार के लिए मुफ्त में ही वैसा कवरेज देता था। इस कवरेज को पूरे देश का साथ मानने वाली अन्ना-टोली से देश के किसी भी तबके ने खुलकर यह सवाल नहीं किया कि कुछ राज्यों के कुछ हिस्सों से परे, कुछ तबकों से परे उनका साथ कहां और कितना रहा। चूंकि देश का मीडिया इन दिनों महानगरों में भी महज दिल्ली तक केंद्रित है इसलिए यह जंतर-मंतर परमाणु विज्ञान की तरह पेश किया जाता रहा। आने वाले दिनों में यह टोली चुनाव की एक भागीदार की तरह सामने रहेगी और उस वक्त अशोक पर्व मनाने वाला, पेडन्यूज के लिए बदनाम मीडिया किस तरह पेश आएगा, यह अन्ना भी देखेंगे और बाकी लोग भी। दूसरी बात यह भी कि यूपीए के खिलाफ खड़े, लेकिन अपने-आपको भाजपा से अलग बताते हुए अन्ना-टोली के उम्मीदवार जब राष्ट्रवादी मुद्दों को लेकर, शुचिता के नारों को लेकर चुनावी मैदान में रहेंगे तो राष्ट्रवादी-शुचिता के नारों पर चलने वाली भाजपा के अपने उम्मीदवारों का उसका क्या असर होगा? या तो भाजपा को नुकसान होगा, या फिर अन्ना की टोली की एक और खाल उतरेगी।
इस पूरे दौर में हमको सबसे अधिक निराशा उन वामपंथियों से हुई जिनकी विचारधारा तो अन्ना-बाबा जैसे करिश्मों के ठीक खिलाफ है, लेकिन जिन्होंने इन अलोकतांत्रिक और असंसदीय तौर-तरीकों का विरोध नहीं किया। भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर पूरी व्यवस्था को ढहा देने की कोशिशों को इसलिए चुप रहकर देखना कि उनसे एक भ्रष्ट यूपीए सरकार उजागर हो रही है, देश की जनता को एक गलत राजनीतिक शिक्षण पाने देने जैसा रहा। और वामपंथी चुप रहकर ऐसा होने देते रहे। हद तो तब हो गई जब सीपीआई के ए.बी. वर्धन अन्ना हजारे के मंच पर गए और आंदोलन के एक पहलू का उन्होंने समर्थन किया। इतिहास इस पार्टी की इस गलती को दर्ज कर चुका है, ठीक उसी तरह जिस तरह की सीपीआई ने आपातकाल का समर्थन किया था। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे अन्ना हजारे की राजनीतिक सरगर्मी बढ़ेगी इस मुद्दे पर हम बात आगे बढ़ाते रहेंगे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. Sir, wholly concur with you but this is also a callous truth that existing political status of our nation can’t be refined without strenuous acid……doesn’t matter form where it will come and how it will be .
    Regards
    Sagar

    उत्तर देंहटाएं
  2. Yeh lekh aapka stand to ho sakta hai lekin janbhawna to kattai nahi

    उत्तर देंहटाएं
  3. Let us wait and watch the march of this political party in making.It may be good for the country or bad for this party, who knows what is in waiting.

    उत्तर देंहटाएं