फ्रीडम को इस कदर फ्री मान लेना गांधी-नेहरू ने कभी सोचा भी न होगा...


13 अगस्त 2012
हरियाणा का कांगे्रस सरकार का गृहमंत्री अपनी एक भूतपूर्व कर्मचारी की प्रताडऩा-आत्महत्या के बाद से फरार है। वैसे तो तकनीकी रूप से यह मंत्री निर्दलीय निर्वाचित होकर आया था, लेकिन वह कांगे्रस सरकार में मंत्री बनाया गया। इस बारे में अखबार और टीवी रंगे पड़े हैं, इसलिए यहां पर हम उससे जुड़ी तमाम बातों को दुहराना जरूरी नहीं समझते, लेकिन क्या अपने कल तक के गृहमंत्री की आज की फरारी पर इस पार्टी की महिला अध्यक्ष की चुप्पी काफी है? जिस दिल्ली में सोनिया गांधी रहती हैं, उसी दिल्ली में यह महिला खुदकुशी को बेबस हुई, और उसने जिसे जिम्मेदार ठहराया है, कल तक वह बाहुबली मंत्री और कारोबारी, माफिया सरगना जैसे अंदाज वाला नेता मजे में फरार है।  पुलिस उसके घरों पर छापे मार रही है और मानो एक राष्ट्रीय पार्टी, और हरियाणा में सत्तारूढ़ कांगे्रस का इससे कोई लेना-देना ही नहीं है। 
हो सकता है कि कानूनी रूप से कुछ कहना कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी की मजबूरी न हो, लेकिन क्या नैतिक रूप से, सामाजिकता के रूप से, और जिस बोलचाल की जुबान में इंसानियत कहा जाता है (जो कि इंसानियत की पूरी तस्वीर के मुकाबले एक अद्र्धसत्य से कुछ नहीं), उसके हिसाब से सोनिया गांधी को एक महिला की ऐसी दुर्गति करने वाले अपने मवाली-मंत्री को लेकर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए? 
दरअसल आज सरकार और राजनीतिक दलों की तमाम सोच कानूनी जिम्मेदारी पर आकर रूक जाती है। अगर कोई बात उनकी कानूनी जिम्मेदारी नहीं है, और उनके लिए दिक्कत वाली है, तो वहां वे जेब से एक घिसा-पिटा तर्क निकालकर पेश कर देते हैं कि कानून अपना काम करेगा। यहां पर सवाल यह है कि देश का कौन सा कानून किसी पार्टी को या किसी सरकार को उसके किसी शिकार से माफी मांगने से रोकता है? उसे मुआवजा देने से रोकता है? यही हाल पिछले दिनों नारायण दत्त तिवारी को लेकर सामने आया जब वे एक निजी इंसान के रूप में बरसों तक अदालती लड़ाई लडऩे और एक मां-बेटे को बदनाम करने का काम करते रहे, और आखिर में जाकर वे उस बच्चे के बाप साबित हुए। इस मामले को भी दिल्ली में बैठी कांगे्रस ने मुंह बंद करके देखा।
अब सवाल यह उठता है कि जब अदालत तक किसी को कुकर्मी, जुल्मी या बेईमान साबित कर देती है, तब भी अगर पार्टी ऐसे लोगों के खिलाफ चुप रहती है तो उस पार्टी के सिद्धांत क्या हैं? ऐसे लोग पार्टी में बने भी रहते हैं। क्यों कांगे्रस पार्टी या ऐसी ही कोई दूसरी पार्टी अपने ऐसे लोगों से कोई जुर्माना नहीं वसूलती? क्यों उनकी जायदाद का कोई हिस्सा सार्वजनिक काम के लिए दान नहीं दिलवाती? और कुछ नहीं तो अपने नेताओं और मंत्रियों की हिंसा और ज्यादती के शिकार लोगों को मुआवजा दिलवाने जैसा बहुत साधारण समझ का प्राकृतिक न्याय यह पार्टी क्यों नहीं करती? और जब कांगे्रस किसी नेक काम को नहीं करती, तो यह बात देश की बाकी पार्टियों के सामने एक मिसाल की तरह काम आती है और बाकी पार्टियां भी फिर उसी तरह के अपने कुकर्मों को इस मिसाल के साथ सही ठहराने लगती हैं। 
पिछले दिनों मैंने कहीं पर यह भी लिखा कि कांगे्रस के राज्यसभा में मनोनीत सांसद श्रीकांत वर्मा और उनकी पत्नी वीणा वर्मा का बेटा अभिषेक वर्मा आज देश की सुरक्षा के खिलाफ दस किस्म की दलाली करते पकड़ाया है। खुद इसी यूपीए सरकार की एजेंसियां उसके खिलाफ मुकदमे चला रही हैं। ऐसे में यह पार्टी देश की जनता से इस बात के लिए माफी क्यों नहीं मांगती कि उसकी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए इस कुनबे के चिराग ने पूरे देश में अंधेरा फैलाने का धंधा चला रखा था, और कांगे्रस की या तो इस पर कोई नजर नहीं थी या फिर हथियारों के इन सौदों में, दलाली और जासूसी में उसकी भागीदारी थी।
इस देश में यह बेशर्मी हैरान कर देने वाली है कि जब बड़े-बड़े ताकतवर लोग फंसते हैं तो वे अदालत के बजाय जनता की अदालत की बात करने लगते हैं। और जब जनता की तरफ से असुविधा के सवाल उठते हैं तो नेता और पार्टी एक अलग ढाल उठा लेते हैं कि कानून अपना काम कर रहा है। 
दरअसल अंगे्रजी का एक शब्द इस देश में बहुत गलतफहमी खड़ी करता है। गलतफहमी कहें, या खुशफहमी। फ्रीडम, यानी आजादी को लोगों ने फ्री (मुफ्त) मान लिया है। यह फ्रीडम बहुत सी जिम्मेदारियों के साथ आती है, जिसमें से हर जिम्मेदारी को पूरा करवाना कानूनी की लाठी का काम नहीं होता, लोगों का खुद का काम भी होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक दल अभी-अभी आए आंकड़ों के मुताबिक सैकड़ों करोड़ का चंदा लेने वाली पार्टियां अगर इस दौलत से उन बेकसूर लोगों को कोई मुआवजा भी नहीं दे सकती, जिनके साथ इनके नेताओं ने बलात्कार किया हो, आत्महत्या को बेबस किया है, जिनकी हत्या की है, जिन बच्चों को पैदा किया है, तो इन पार्टियों को फ्रीडम के सिर्फ लड्डू ही फ्री में क्यों मिलें? चुनाव आयोग के नियम, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संसद के बनाए कानून, सब मिलकर भी किसी भी देश में तथाकथित इंसानियत को लागू नहीं करवा सकते, और लोगों से उनकी नैतिक जिम्मेदारी पूरी नहीं करवा सकते। 
लेकिन फ्रीडम इतनी फ्री नहीं रहती, उसमें कानून से परे के इंसाफ की भी उम्मीद जुड़ी रहती है। यूपीए की मुखिया होने के नाते कांगे्रस पार्टी को, और उसकी मुखिया होने के नाते सोनिया गांधी को देश को बहुत से मामलों में जवाब देना चाहिए। जिम्मेदारी से कतराना किसी को महान नहीं बनाता। इस विशाल लोकतंत्र को अपनी निरंतरता और और मजबूती के लिए दुनिया भर में इज्जत से देखा जाता है। खुद यहां के नेताओं को अपनी पार्टियों को इज्जत के लायक बनाना चाहिए। जब तक इंसान हैं तब तक किसी भी पार्टी या सरकार तले तथाकथित हैवानियत होती ही रहेगी। इससे तो बचा नहीं जा सकता, लेकिन ऐसे मौकों पर नैतिकता का यह तकाजा है कि ऐसे हैवानों के मुखिया बेकसूर होने पर भी अपने लोगों के किए की भरपाई करें, और एक प्राकृतिक न्याय की मिसाल पेश करें। 
ऐसे में इन नेताओं के भले की एक बात यहां कह सकते हैं कि इससे उनको वोटों का भी नफा ही होगा, नुकसान नहीं। 
फ्रीडम को इस कदर फ्री मान लेना गांधी-नेहरू ने कभी सोचा भी न होगा...

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