सत्ता-माफिया से टक्कर के बाद इंसाफ पाने में लगे बीस बरस


संपादकीय
4 अगस्त
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर आज इस अखबार के पहले पन्ने पर एक बड़ी रिपोर्ट छप रही है कि किस तरह छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कोयला माफिया के खिलाफ शिकायतें करने वाले, और अखबारों में जानकारी भेजने वाले एक डॉक्टर से पुलिस ने कोयला अफसरों के साथ मिलकर बदसलूकी की और सामाजिक रूप से प्रताडि़त किया। इसके बाद जब इस डॉक्टर ने ऐसा करने वाले अफसरों के खिलाफ मानवाधिकार आयोग और अदालतों में लड़ाई शुरू की, तो उसके खिलाफ तरह-तरह के और मामले भी दर्ज हुए, जिनके बारे में हम सही या गलत होने की कोई बात यहां नहीं लिख सकते। लेकिन सुप्रीम कोर्ट से आए हुए आदेश में हाईकोर्ट और राज्य के अफसरों, दोनों के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की गई है, इसलिए यह मामला आज यहां लिखने के लायक है। 
आज देश भर में यह बात उठ रही है कि शिकायतों को उठाने वाले लोगों पर अगर हमले होते हैं तो उनकी हिफाजत के लिए कैसा कानून होना चाहिए। यह हर कोई जानता है कि छत्तीसगढ़ में कोयले का दो नंबर का कारोबार हजारों करोड़ सालाना का माना जाता है। इसमें कोयला कंपनी से लेकर राज्य शासन के स्थानीय अधिकारियों और कर्मचारियों तक की भागीदारी तय रहती है जिसके बिना इतना संगठित जुर्म नहीं हो सकता। इसी तरह छत्तीसगढ़ में खदानों और कारखानों की मनमानी और गुंडागर्दी के खिलाफ मामले उठाने वाले रायगढ़ के एक सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल पर पिछले दिनों गोलियों से हमला हुआ, और हमलावरों का रिश्ता छत्तीसगढ़ की एक सबसे बड़ी कंपनी जिंदल से निकला है। ऐसे में अगर पुलिस भी चोरी-गुंडागर्दी करने वाले माफिया के साथ मिलकर किसी को प्रताडि़त करेगी, तो इस राज्य और देश की संपत्ति की लूटपाट, लोगों के साथ ज्यादती, जमीनों की अफरा-तफरी, इन सबकी आवाज उठाने का हौसला कौन कर सकेगा? 
सरगुजा के जिस मामले की चर्चा हम यहां कर रहे हैं उसमें पुलिस ने इस डॉक्टर के हाथों में एक तख्ती पकड़ाकर उस पर गालियां लिखकर, उसकी तस्वीर खींची और सामाजिक अपमान के लिए उसे बंटवा दिया। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को एकदम सही मानते हैं कि ऐसा करने वाले अफसरों से वसूली करके इस आहत व्यक्ति को पांच लाख रूपए का मुआवजा दिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि 1992 की घटना पर आज 20 बरस बाद यह इंसाफ मिल पा रहा है, तो हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक इतनी लंबी लड़ाई लडऩे की ताकत कितने लोगों में रहती है? आज ही इस अखबार के पहले पेज पर यह रिपोर्ट छपी है कि सौ बरस पहले अंग्रेजों के जमाने में बने हुए तांदुला जलाशय में गई जमीनों के लिए आज चार पीढ़ी बाद भी किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाया है। यह पूरा मामला एक अलग जांच का मुद्दा है, और इसकी पड़ताल किए बिना सौ बरस का समारोह बेमायने भी रहेगा। 
तो एक तरफ तो सरकारी अमले की ऐसी ज्यादती कि किसी व्यक्ति को इस कदर अपमानित करना, उसके मानवाधिकार खत्म कर देना, दूसरी तरफ हमला करने वाले कारखानेदार शिकायतकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाकर महीनों तक उनकी जमानत न होने देने की ताकत भी रखते हैं, और तीसरी बात यह कि अदालत से इंसाफ मिलने में एक पूरी पीढ़ी गुजर गई तब जाकर मुआवजे का हुक्म हुआ है। देश की ऐसी ही हालत के चलते हुए कहीं जनता का भरोसा नक्सलियों पर होने लगता है, कहीं उसका भरोसा हाजी मस्तान पर हो जाता है, कहीं जनता फूलन के किस्म का इंसाफ पाने चली जाती है, कहीं पर बिहार में मुखिया का माफिया दरबार लगता है। इन सबके साथ-साथ देश में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे अलोकतांत्रिक लोगों का भाव भी इसीलिए बढ़ता है कि लोकतंत्र के संस्थान बुरी तरह से नाकामयाब हो जाते हैं, हो चुके हैं। 
छत्तीसगढ़ सरकार को यह चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट तक जाकर सही साबित हुई इस शिकायत को एक नमूना मानकर वह अपनी खुद की व्यवस्था को एक बार ठोके-बजाए कि उसमें कहां इतनी कमजोरी थी, कहां उसमें इतनी मनमानी आ गई थी कि वह माफिया के साथ मिलकर एक शिकायतकर्ता को इस तरह से प्रताडि़त करने का हौसला रखती थी। सरगुजा से लेकर रायगढ़ तक, सत्ता और ताकतवर तबके की मनमानी को उठाने वाले लोगों को अगर कुचला जाएगा, तो फिर कुचले हुए लोगों का भरोसा लोकतंत्र से परे की ताकतों पर क्यों नहीं होगा? राज्य सरकार को न सिर्फ आज के नक्सल प्रभावित इलाकों पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि बाकी इलाकों को भी नक्सलियों का मुंह ताकने की नौबत से बचाना चाहिए।

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