अंगरेज चले गए, तांदुला सौ बरस का हुआ, किसान बेमुआवजा तांदुला की हीरक जयंती की तैयारियां जोरों पर, ये गरीब किस बात की खुशी मनाएंगे?


बरतानियों द्वारा बनाए गए जिस जलाशय की हीरक जयंती मनाने की तैयारियां सरकार जोर-शोर से कर रही है और इसमें से निकलकर नहरों के जरिए लाखों-करोड़ों टन अनाज उत्पन्न करने वाले उपलब्धियों भरे आंकड़े भी अतिथियों के भाषण के लिए शासकीय कार्यालयों में इक_े कर समाहित किए जा रहे होंगे, उनमें शायद इस बात का जिक्र तो अवश्य होगा कि इस तांदुला ने लोगों के खेतों और खलिहानों को तो हरी-भरी बालियों से समृद्ध किया होगा, परंतु यह कटु सच्चाई कहीं भी नहीं झलकेगी  कि डुबान में आए 52 गांवों के उन सैकड़ों किसान परिवारों को एक शताब्दी बाद भी मुआवजा नहीं मिल पाया है। स्वाभाविकत:, जिन्होंने अपनी जमीनें समग्र विकास के लिए दी उनके वारिसान आज तक मुआवजे की राह तक रहे हैं। तख्त बदल गए, ताज बदल गए..., लेकिन अंसतुलित विकास की यह शायद सबसे त्रासद गाथा है कि चौथी पीढ़ी भी आज  तक अधिग्रहण के चिथड़ों में तब्दील हो चुके जमीनीं दस्तावेजों को समेटे हुए अपना हक पाने का सपना संजोए हुए हैं। 
छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 2 अगस्त। तांदुला जलाशय ने अपने सौ साल पूरे कर लिए हैं। इस वर्ष सिंतबर से दिसंबर के बीच ही कभी दो दिवसीय हीरक जयंती मनाई जाएगी। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, राज्यपाल सहित कई विभागीय अधिकारी शामिल होंगे। 11 हजार एकड़ में बने तांदुला जलाशय की नींव आज से 105 साल पूर्व 1907 में रखी गई थी। इंजीनियरों की टीम की देख-रेख में  हजारों मजदूरों ने 5 साल में इसका निर्माण किया था। वर्ष 1912 में इस विशाल जलाशय का निर्माण पूरा हुआ था।

विस्थापितों को नहीं मिला था मुआवजा
ब्रिटिश शासन काल में बना तांदुला जलाशय लगभग 11 हजार एकड़ में बना। उस समय इस जलाशय के बनने से करीब 52 गांव डुबान में आए थे, लेकिन किसी को मुआवजा नहीं मिला। यह बात 'छत्तीसगढ़Ó से जल संसाधन विभाग दुर्ग के अधिकारियों एवं किसानों से चर्चा के दौरान कही। जिन किसानों के खेत जलाशय बनाते समय डुबान में आए उन्हें न तो कहीं दूसरी जगह बसाया गया और न ही किसी तरह उन्हें मदद मिली। अपने दादा-परदादा से सुनी-सुनाई बात के आधार पर बृजलाल सतनामी, सूरतराम, कमल, खिलेश्वर साहू ने बताया कि उस समय अंग्रेजों का एकछत्र राज था। किसी को उनके सामने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं थी। इसके अलावा पढ़े-लिखे लोग गिने-चुने थे, मीडिया का बोलबाला नहीं था। डुबान में आने से कोई किसान कुछ भी नहीं बोल पाए। सभी को अपनी जान प्यारी थी, लिहाजा जिसे जहां जगह मिली वह वहीं स्थापित हो गया।    
फिर भी किसानों के खेत रहते हैं सूखे... 
सिर्फ सिंचाई के उद्देश्य से बना तांदुला जलाशय अपने 100 वर्षों के स्थापना काल में कई उपलब्धियां हासिल की है। जहा जलसंग्रहण क्षमता बढ़ी वहीं सिंचाई का स्तर भी बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद आज भी किसानों के खेत सूखे नजर आए। छत्तीसगढ़ ने जलाशय की हीरक जयंती पर दुर्ग से बालोद क्षेत्रों का दौरा किया, तो पाया कि किसानों के खेत में पानी नहीं है, कई गांव आज भी वर्षा के पानी पर निर्भर है। हालांकि जल संसाधन विभाग 500 गांवों में पानी सप्लाई की बात कर रहा हैं लेकिन इसके विपरीत कई गांव ऐसे हैं जहां जलाशय का एक बूंद पानी किसानों के खेत तक नहीं पहुंचता। गुंडरदेही, रानीतराई, मोरदा, सुयकोना, सेलूद, ओटेबंद, पिरदा, माटिया, बीरगांव, बागडूमर, तर्रा, सोंढ़, पैरी, आनंदगांव, अंडा, खप्परवार, डीकाडीह सहित 15-20 गांवों का दौरा करने पर पाया कि कहीं पर किसानों के चेहरे में खुशी हंै तो कहीं उदासी।
क्या कहते हैं किसान




गांव पैरी की आबादी लगभग 12 सौ से 15 सौ की है। इस गांव के 80 फीसदी लोग किसानी पर निर्भर हैं। सत्तर वर्षीय ओसल राम की तीसरी पीढ़ी किसानी कर रही है। चार एकड़ में दो फसल धान एवं लाखड़ी की बुआई करते हैं। ओसल ने बताया कि किसानों से प्रति एकड़ 100 रुपए के हिसाब से जलकर लिया जाता है, लेकिन जरूरत पर पानी नहीं मिलता। किसानों को जुलाई-अगस्त में पानी की जरूरत होती है, क्योंकि वह समय निंदाई व बियासी का होता है। लेकिन जलाशय से पानी अक्टूबर में छोड़ा जाता है। 
फुलझर गांव के किसान आसाराम के पास 6 एकड़ खेत है। आसाराम ने बताया कि 6 एकड़ में 8-10 क्विंटल धान निकलता है। बांध से सही समय पर पानी मिलता तो धान की पैदावार और बढ़ा जाती। किसान राधेश्याम ने बताया कि पानी की कमी के कारण खेत में एक ही फसल की बुआई होती है।
पारागांव निवासी सुखीराम का कहना है कि नहर बनाते समय उसका एक एकड़ खेत आ गया है। मुआवजा तो कुछ नहीं मिला, सिंचाई के लिए पानी भी नहीं मिलता। 700 की आबादी वाले इस गांव में न स्कूल है और न ही स्वास्थ्य केंद्र। दो-तीन किमी चलकर बच्चे स्कूल एवं बीमार स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचते हैं। इसी गांव के किसान गिरीराज साहू के 13-14 एकड़ खेत है। गिरीराज ने बताया कि कैनाल बनाते समय उसका 3-4 एकड़ खेत आ गया था। गिरीराज के दादा ने बताया कि कैनाल किसानों के हित में बनाया गया, ऐसे में किसी को भी मुआवजा नहीं मिला। गांव की सरपंच शांतिबाई पटेल, पंच रामरतन का कहना है कि 90 फीसदी किसानी करके जीवन का गुजारा कर रहे हैं। खेत में मात्र एक ही फसल होती है, इससे बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि हो रही है। गांव के युवा अब चाहते हैं कि उनके गांव में कोई उद्योग खुले ताकि बेरोजगारी दूर हो सके।
झलमला निवासी राजूलाल ढीमर की दो एकड़ जमीन है। उन्होंने बताया कि नहर का अंतिम छोर होने के कारण इस गांव में किसानों को बांध का एक बूंद पानी नहीं मिलता है। 900 की आबादी वाले इस गांव में किसानों की माने तो खेत को अभी बियासी के लिए पानी की जरूरत है लेकिन उनके खेत सूखे हैं। 
ग्राम पंचायत मटिया की आबादी लगभग 15 सौ होगी। किसानी पर आश्रित इस गांव में सिंचाई के लिए कैनाल तो है लेकिन यह काफी छोटा होने के कारण खेतों तक पानी की आपूर्ति नहीं हो पाती। गांव का युवा किसान अशोक यादव, अजित राम साहू, खोमन देवांगन, आधार सिंह डहरे, कार्तिक राम बघेल, फागूराम टंडन का कहना है कि खेत को पोटरीपानी (बियासी के बाद) के समय पानी की जरूरत होती है, लेकिन नहर की हाइट कम होने के कारण पानी नहीं मिलता है। दरअसल इस गांव में बने नहर की जलग्रहण क्षमता 9-10 इंच हैं लेकिन इसमें पानी सिर्फ ढाई से तीन इंच ही दिखा। इन किसानों की माने तो अगर ऊपर वाले की कृपा न हो तो किसानी करना संभव नहीं। चाराचार बोरगहन जैसे कई गांवों में खेत सूखे दिखे। हालांकि हर गांव की स्थिति ऐसी नहीं है। कुछ गांव में धान की ऊंची-ऊंची बालिया अपनी हरियाली को बखूबी बयां करती दिखीं।
मंत्री-नेता से करते पानी की गुहार
ग्राम पंचायत बोरगहन निवासी बृजेश, रतलाम, धानेश्वर का कहना है कि जरूरत पडऩे पर नेता-मंत्री से गुहार करते हैं। इन किसानों ने बताया कि उनका गांव काफी संपन्न है। अधिकांश खेतों में पंप होने के कारण पानी की किल्लत नहीं होती है, लेकिन जिनके पास पानी की व्यवस्था नहीं है उनके लिए आवश्यकतानुसार गांव के नेता-मंत्री से गुहार करके पानी का जुगाड़ कर लेते हंै। एक फसल सिर्फ धान के लिए सरोना एवं महमाया की बुआई करते हैं, जिसमें अच्छी-खासी आमदनी होती है। 
ब्रिटिश शासन काल में बने तांदुला जलाशय के इंजीनियरों की टीम के प्रमुख अभियंता सर एडम थे। उस समय में इसके निर्माण में 1 करोड़ 6 लाख 26 हजार 8 सौ 88 रुपए (1,06,26,888) की लागत आई थी। बांध से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आज की तारीख में इस तरह के निर्माण लागत की कल्पना करें तो यह कम से कम 12 सौ करोड़ रुपए पहुंचेगी। तांदुला जलाशय की निर्माण तकनीक आज भी बेजोड़ है। गारे मिट्टी, सुरखी और पक्की लाल ईंटों से बने इस बांध की मजबूती आज भी जस की तस है। तांदुला जलाशय बालोद से लगभग 5 किमी दूरी पर स्थित है। यह प्रदेश की बड़ी योजनाओं में से हैं। 
भयंकर सूखे ने बनाया तांदुला
1907 में ब्रिटिश शासनकाल में भयंकर अकाल एवं सूखा पड़ा था। चारों तरफ भुखमरी थी। ऐसे में मजदूरों के सामने एक-एक दाने के लाले पड़े हुए थे। उस समय ब्रिटिश शासन ने मजदूरों से तांदुला जलाशय का निर्माण करवाया और उसके बदले उन्हें पैसे व अनाज दिया गया। सूखा नाला एवं तांदुला नदी को जोड़कर बने इस बांध के जरिए हजारों मजदूरों के घर न सिर्फ चूल्हा जला बल्कि उनकी गरीबी भी दूर हुई। ब्रिटिश अभियंता सर एडम के नेतृत्व में हजारों मजदूरों एवं सैकड़ों इंजीनियरों की मेहनत से बहुत कम समय में यह जलाशय बनकर तैयार हो गया था। विशाल बांध का जलग्रहण क्षेत्र 818 वर्ग किमी है, जबकि इसकी लंबाई 110 किमी है। अंग्रेजों का शासन काल में कुछ वर्षों तक तांदुला जलाशय की सिंचाई क्षमता 54000 हेक्टर थी जो आज बढ़कर 1 लाख 3 हजार हेक्टर तक पहुंच गई है।
बीएसपी से 42 करोड़ की आय
एशिया महाद्वीप के सबसे बड़े इस्पात संयंत्र भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) को उसके स्थापना काल (1954) से तांदुला बांध से 4 टीएमसी पानी की सप्लाई की जाती है। शासन से किए गए अनुबंध से बीएसपी यदि कम पानी लेता भी है तो उसे 90 फीसदी जलकर चुकाना पड़ता है। पूर्व में 8 रुपए 5 पैसे की दर से प्रति क्यूबिक मीटर पानी सप्लाई की जाती थी, जो इस साल बढ़कर 9 रुपए 26 पैसे हो गया है। वर्ष 2011-12 में बीएसपी ने 42 करोड़ 30 लाख 35 हजार रुपए जलकर चुकाया है। भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए दो जलाशय तांदुला एवं महानदी से पानी सप्लाई होती है। तांदुला का पानी पहले खरखरा जलाशय में संग्रहित करते हैं। इस तरह खरखरा जलाशय से 1600 मिलियन घन फुट (45.30 मिलियन घन मीटर) एवं महानदी परियोजना से 2400 मि.घ.फु (67.95 मि.घ.मी) पानी आबंटित किए जाते है।
किसानों से नही मिलता पूरा जलकर
पूर्णत: सिंचाई के उद्देश्य से बने  इस जलाशय से आज हजारों हैक्टर खेतों की प्यास बुझती है। तांदुला जल संसाधन दुर्ग के कार्यपालन अभियंता पी.के. अग्रवाल ने बताया कि तांदुला जलाशय अपने स्थापना के उद्देश्य को पूरा करते हुए वर्तमान में 1 लाख 3 हजार हैक्टर में सिंचाई कर रहा है। मात्र एक फसल (खरीफ) के लिए किसानों से प्रति एकड़ 91 रुपए जलकर लिया जाता है। इस तरह विभाग को हर साल कृषि से जितना जलकर वसूलने का लक्ष्य होता है वह पूरा नहीं हो पाता है। वर्ष 2011-12 में कृषि से 13 करोड़ 8 लाख 12 हजार रुपए वसूलने का लक्ष्य था, लेकिन मात्र 1 करोड़ 47 लाख 5 हजार रुपए वसूल हो पाए हैं। अधिकारियों का कहना है कि सरकार समय-समय पर किसानों का जलकर माफ करती हैं जिसके कारण हर साल कृषि से मात्र 8-10 फीसदी ही वसूली हो पाती है।
जलसंग्रहण-सिंचाई क्षमता बढ़ी
11 हजार एकड़ में बने तांदुला जलाशय में भी भविष्य में जल संकट हो सकता है, इसके लिए जलाशय का जल संग्रहण क्षमता बढ़ायी गयी। शुरूवाती दौर में बांध की ऊंचाई कम होने के कारण जलसंग्रहण क्षमता मात्र 9712 मि.घ.फीट थी। जल संग्रहण क्षमता बढ़ाने के लिए बांध की ऊंचाई 0.60 मीटर बढ़ाई गई जिससे आज इसकी संग्रहण क्षमता 10,674 मि.घ.फीट (302.21 मि. घ.मी.) हो गई है। जबकि इसमें औसत वर्षा का संग्रहण 50.09 इंच दर्ज है। निर्माण अवधि में जलाशय की सिंचाई क्षमता 54000 हेक्टर (सिर्फ खरीफ फसल) थी, जो बढ़कर 68219 हैक्टयर हो गई। वर्तमान में तांदुला जलाशय व गोंदली जलाशय से प्राप्त पानी नहरों के माध्यम से बालोद, दुर्ग एवं बेमेतरा जिलों के 6 विकासखंडों के 90000 हेक्टर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा दी जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि भविष्य में इसकी क्षमता बढ़कर 103000 हैक्टर करने का लक्ष्य है। 
रखरखाव में 15 करोड़ होते खर्च
तांदुला जलाशय का स्थापना खर्च 15 करोड़ रुपए हैं। वर्ष 2011-12 में जलाशय के रख-रखाव पर लगभग 6 करोड़ रुपए खर्च किए गए है। अधिकारी ने बताया कि जलाशय रख-रखाव पर जो खर्च होता है उसे मनरेगा के तहत किया जाता है। 
ढाई सौ करोड़ का नया प्रोजक्ट
तांदुला वैसे तो विशाल बांध है, लेकिन उसमें पानी का स्तर हमेशा कम रहता है। जल संसाधन विभाग दुर्ग ने दो साल पहले सरकार को ढ़ाई करोड़ का एक प्रोजक्ट दिया है। इस नए प्रजोक्ट का नाम प्रपोज कनेक्टिंग चैनल फार्म रविशंकर रिजरवायर-2 तांदुला रिजरवायर है। इसमें कहा गया है कि तांदुला का जलस्तर बढ़ाने के लिए महानदी बांध का पानी नहरों के माध्यम से तांदुला में लाया जाए। अगर ऐसा हो जाता है तो निश्चित ही तांदुला का जलस्तर बढ़ेगा जिससे सिंचाई भी अधिक होगी। अधिकारियों का कहना है कि विभाग द्वारा सर्वे कार्य पूरा कर लिया गया है। नए नवेले इस प्रोजक्ट में महानदी से तांदुला की लंबाई लगभग 40 किमी रूट को जोड़कर बनाया जाएगा। संभवत: 2013-14 में यह योजना लागू हो जाए।

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