ऐसी ही एक और सालगिरह का कितना जश्न मनाया जाये?


14 अगस्त 2012
संपादकीय
आजादी की एक और सालगिरह आकर खड़ी हो गयी है। हर बरस मानो वह मुंह चिढ़ाने आ जाती है। गांवों से लेकर शहरों तक जगह-जगह गाँधी और नेहरू को याद किया जायेगा, आजादी के आन्दोलन के भगत सिंह और बाकि लोगों को भी याद किया जायेगा, और देश अगले दिन से फिर उसी रफ्तार से, उसी ढर्रे पर चलने लगेगा। आज़ादी पर उन लोगों का हक बने रहेगा जिनके हाथ में किसी भी किस्म की ताकत है, राजनीति, सरकार, पैसों, या किसी और किस्म की ताकत। लेकिन जिनके पास कोई ताकत नहीं है, वे लोग आजादी के मायनों से दूर पड़े रहेंगे।
कहने को तो सबके हक बराबरी के हैं, लेकिन एक खरबपति कारखानेदार की जमीन की जरूरत या हवस के मुकाबले उस जमीन के असल मालिक गरीब किसान की कोई आजादी है? खदानों से लेकर आसमानी लहरों तक पर अगले सैकड़ों बरसों के लिए काबिज हो जाने वाले लोगों के मुकाबले इस कुदरती दौलत के असल मालिकों की कोई आजादी है? हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में अमीर की मर्जी के मुकाबले गरीब की कोई आजादी है? यह पूरा सिलसिला अदना लोगों को आजादी का अहसास कराते रहने, उसके झांसे में रखने का है। जिस तरह कोई महाराज या बापू अपने प्रवचन में लोगों को स्वर्ग का अहसास करते रहते हैं, उसी तरह साल में दो चार बार हिन्दुस्तानी लोगों को आजादी का अहसास कराया जाता है। 
लेकिन हिन्दुस्तानी जम्हूरियत की बदहाली इतनी है कि चुनी हुई सरकार के मुकाबले आज लोग ऐसे हवाई नारों को सर पर बिठाने लगे हैं, जिन पर सिर्फ नासमझ लोगों को भरोसा होना चाहिए था। जब लोकतंत्र की जवाबदेह सरकार, अदालत, संसद, सब बेअसर और नकामयाब होने लगें, तो फिर लोग नारों को सर पर पोथी की तरह सजा लेते हैं, और नारों की राह से जन्नत पहुँचने पर भरोसा करने लगते हैं। आज दिल्ली में एक भगवा बाबा जिस हिकारत के साथ यह मुनादी कर रहा है कि वह चाहे तो इस मुल्क के प्रधानमंत्री तो लाल किले से कल झंडा फहराने से रोक सकता है, और इस चुनौती पर भी देश को गुस्सा नहीं आ रहा, तो इसका मतलब यह नहीं कि बाबा पर देश का भरोसा है, इसका मतलब यह है कि जनता का सरकार पर, प्रधानमंत्री पर से भरोसा खत्म हो गया है। आज आजादी की सालगिरह के मौके पर यह एक बड़ी नाकामयाबी है कि तानाशाह अन्ना-बाबा के फतवों को लोग सुन रहे हैं। जैसे मोदी की साम्प्रदायिकता उनके बेहतर राज की साख को मिट्टी में मिला देती है, जिस तरह लालू का चारा उनकी धर्मनिरपेक्षता को मिट्टी में मिला देता है, उसी तरह आज देश के सरकार के कुकर्म लोकतंत्र की साख को मिट्टी में मिलाकर अन्नातंत्र-बाबातंत्र को एक विकल्प बना रहे हैं। 
यह सिलसिला भयानक है। एक तरफ देश के बहुत बड़े हिस्से में नक्सल पाँव पसार चुके हैं, सरहद के सूबों में अलग खतरे खड़े ही हुए हैं, और ऐसे में दिल्ली पर किसी को भरोसा नहीं है। अन्ना के लोग जिस अंदाज में देश की संसद को एक-मुश्त गालियाँ बक रहे हैं, अदालतों पर लोगों को इन्साफ का भरोसा नहीं है, ऐसे में किस आजादी की सालगिरह हम मानाने जा रहे हैं? इस देश में लोगों में समझ का दीवाला निकला हुआ है, राजनीतिक दल चाहते भी यही हैं कि लोगों की समझ कम ही रहे। हिंदुस्तान का लोकतंत्र चुनावों की निरंतरता के मामले में जरूर कामयाब है, और हर पांच बरस में चुनावी उम्मीदवारों को यह आजादी रहती है कि वे मनचाहे भुगतान पर मनचाहे वोट खरीद सकें, वोटरों को आजादी रहती है कि वे मनचाहे रेट पर अपने वोट बेच सकें। और लोकतंत्र को आजादी रहती है कि वह अपने-आपको जिंदा और तरक्की करता बता सके। 
ऐसी ही एक और सालगिरह का कितना जश्न मनाया जाये?




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