कुछ मीठा हो जाए...


5 अगस्त 2012
संपादकीय
लंदन ओलंपिक में कल जब साइना नेहवाल को बैडमिंटन के महिला एकल का कांस्य पदक मिला, तो उनके चेहरे पर जीत का जोश कम था, और मेहनत का पसीना भी कुछ कम था, इसलिए आज की खुशी कुछ सहमी-सहमी सी है। इसलिए इस जीत के मायने को आज समझने की जरूरत है। चीन की खिलाड़ी को चोट लग जाने के बाद मुकाबले से वह बाहर हो गई, और पहले गेम को हार जाने के बाद भी साइना को मैडल मिला। लेकिन इससे साइना बिना हक यह मैडल पाने वाली नहीं हो गई, वह इस खिलाड़ी के ठीक-ठाक रहने पर भी मैडल पा सकती थी क्योंकि अब तक उसके साथ खेले छह मैचों में से दो में साइना जीती भी थी। और बैडमिंटन के खेल में ऐसा भी नहीं होता है कि पहले गेम में हारने के बाद बचे दो गेम जीतकर कोई मैडल तक न पहुंचा हो। 
खेल की बारीकियों से परे यह समझने की जरूरत है कि जीत और हार हमेशा ही सबसे काबिल की नहीं होती। और खेल की ही बात क्यों करें, भारत सुंदरी या विश्व सुंदरी के मुकाबलों में देश या दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की जीतती हो, ऐसा भी नहीं है। यह चुनाव तो मुकाबले में हिस्सा लेने वाली लड़कियों के बीच होता है। और फिर इस मुकाबले के दिन किसी की सेहत खराब हो, कोई सही जवाब न दे सके तो उसकी जीत मुमकिन नहीं होती। दूसरे खेलों में भी कभी बारिश के चलते, तो कभी रौशनी कम होने से कोई एक टीम मुकाबला खो बैठती है, और ऐसी ऊंच-नीच सबके साथ अलग-अलग वक्त पर होती रहती है। साइना को कल यह सहूलियत हासिल भी नहीं थी कि वह अगले दो मैचों में जीतकर पसीने पर तैरकर इस मैडल  तक पहुंचती। इसलिए उसकी जीत को कम आंकना ठीक नहीं है, उसने खुद ने अपनी इस जीत के बारे जो कहा है, उससे अधिक और क्या कहा जा सकता है। यह भी समझने की जरूरत है कि महिलाओं के एकल-बैडमिंटन मुकाबलों में अब तक कुल पांच देश ही काबिज थे, इस लिस्ट में साइना ने भारत को छठवें देश के रूप में जोड़ा है। और यह जीत उसके हाथ में किसी बटेर की तरह आकर नहीं लगी है, वह इस पदक से एक ही कदम पीछे थीं।
यह मौका एक राष्ट्रीय गौरव का मौका भी है जो कि इस देश में इन दिनों कम ही आ रहा है। चारों तरफ जितनी निराशा छाई हुई है उसमें एक कमउम्र लड़की अकेले अपने दम पर यहां तक पहुंची है, तो उससे देश में बहुत से लड़के-लड़कियों का हौसला भी बढ़ता है। एक तरफ जहां सट्टेबाजी और साजिशों से लदे हुए क्रिकेट के खिलाड़ी और पदाधिकारी अरबपति हुए जा रहे हैं, वहीं तमाम गैरक्रिकेट खेल खत्म से हो रहे हैं। ऐसे में बैडमिंटन जैसे साधारण खेल में साइना का इतने आगे बढऩा भारत के पूरे खेल के लिए मायने रखता है। तीरंदाजी और निशानेबाजी की तरह यह खेल वैसा महंगा नहीं है, इसमें ऊंची तकनीक नहीं लगती, और स्कूल-कॉलेजों से लेकर गली-मोहल्लों तक बच्चे बैडमिंटन खेलते हैं। ऐसे खेल में कामयाबी अधिक बच्चों के लिए खुशियों वाली है। देश की शायद आधी आबादी में रूबरू बैडमिंटन कभी न कभी देखा होगा, और मुकाबलों की बंदूक-पिस्तौल या उसके धनुष तो शायद एक फीसदी लोगों ने भी नहीं देखे होंगे।
साइना नेहवाल को जिन लोगों ने ओलंपिक में खेलते हुए देखा है, वे उसकी सादगी, उसकी मेहनत और उसकी विनम्रता पर फिदा हुए बिना नहीं रह सकते। फैशन और चकाचौंध से दूर, विवादों और सनसनीखेज खबरों से दूर रहकर वह खबरों की लहरों पर इतनी ऊंचाई तक पहुंची है कि उससे आज की खिलाड़ी पीढ़ी के तंग नजरिए वाले मां-बाप भी प्रभावित होंगे। और भारत जैसे देश में बच्चों की अपनी काबीलियत के साथ-साथ मां-बाप का सहमत होना भी जरूरी होता है, तभी बच्चों को खेलने का मौका मिलता है। भारत के पूरे ओलंपिक इतिहास में साइना ऐसी दूसरी महिला है जो मैडल लेकर लौट रही है। और इस कामयाबी को कम नहीं आंका जा सकता, क्योंकि इस गरीब देश में भी उसके जैसी खेल-सुविधाएं पाने वाली दसियों लाख लड़कियां रही होंगी, जिनके बीच से वह अकेली ही यहां तक पहुंच सकी।
निराशा के दौर से गुजर रहे इस देश में कामयाबी और खुशी का यह मौका, अपनी अहमियत से भी बहुत अधिक अहमियत का है, और इस मौके पर कुछ मीठा हो जाना चाहिए।

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