असल जिंदगी की सुनामी के साथ बहकर आते मोती


1 अगस्त 2012
संपादकीय
ओलंपिक के खेलों को टीवी पर ध्यान से देखें तो उन लोगों को भी बहुत कुछ नसीहतें मिल सकती हैं जो खेलते नहीं हैं, या खेल की बारीकियों को नहीं समझते हैं। जब बरसों की मेहनत से तैयारी करने वाले लोग भी एक सेकंड के दसवें या शायद उससे भी कम हिस्से से पिछड़ जाने की वजह से एक मैडल का मौका खो बैठते हैं, तो उन्हें देखकर लोग यह तो समझ ही सकते हैं कि एक-एक पल कितना कीमती होता है और एक-एक कोशिश लोगों को कहां पहुंचा सकती है। 
अमरीका के जिस तैराक माइकल फेल्प्स ने ओलंपिक के इतिहास में सबसे अधिक गोल्ड मैडल पाने का जो रिकॉर्ड बनाया है उसे देखें और फिर यह देखें कि उसकी जिंदगी की शुरूआत कैसे हुई थी, वह कहां तक पहुंचा तो उससे भी बहुत कुछ सीखने मिल सकता है। बचपन में ही मां-बाप मेें तलाक हो गया और जब माइकल छठवीं क्लास में पहुंचा तो पता लगा कि उसे अटेंशन डेफिसिट हाईपरएक्टिविटी डिसऑर्डर है। वह किसी भी चीज पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता था। इस गंभीर मानसिक तकलीफ से गुजरते हुए भी उसने तैराकी सीखना शुरू किया और पन्द्रह बरस की उम्र में वह अमरीका के सात दशक का सबसे छोटा ओलंपिक तैराक बन गया। उसकी मानसिक तकलीफ और उसके बावजूद उसकी कामयाबी को मिलाकर जब लोग देखते हैं तो वह एक विशाल बनकर सामने आता है। पिछले बीजिंग ओलंपिक में जब उसने आधा दर्जन स्वर्ण पदक जीते थे तब खबरों में आई उसकी मां ने ऐसी तकलीफ (एडीएचडी) के शिकार बच्चों के मां-बाप के लिए कुछ सलाह भी मीडिया के मार्फत दी थी। उन्होंने कहा था कि सात बरस की उम्र में माइकल का हाल ऐसा था वह अपने चेहरे के गीला होने से चिढ़ता था और इसलिए वह तैराकी में मुंह ऊपर किए हुए बैकस्ट्रोक में डाला गया। और यही बात उसकी ताकत बनकर सामने आई। 
इस एक मिसाल पर और अधिक बात करना आज का मकसद नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि लगातार मेहनत, पक्का इरादा, और सही प्रशिक्षण से लोग कहीं के कहीं पहुंच जाते हैं। और यह बात सिर्फ खेल तक नहीं रहती। जिंदगी के हर पहलू में ऐसी कामयाबी पाई जा सकती है और इसके लिए हौसला बढ़ाने वाली बातों को खुद भी सोचना होता है और अपने आसपास के लोगों का हौसला बढ़ाना भी जिंदगी की ग्लास को आप चाहें ता आधा खाली देख सकते हैं, और आप चाहें तो आधा भरा देख सकते हैं। खेलों में ऐसा सोचने का नतीजा आपको स्वर्ण पदक तक ले जा भी सकता है और मुकाबले से बाहर भी कर सकता है। अभी दो दिन पहले जब खबरों का सैलाब था, तब भी हमने पहले पन्ने पर ओलंपिक की एक ऐसी टेबल-टेनिस खिलाड़ी की तस्वीर छापी थी जिसका एक हाथ कोहनी के नीचे नहीं था और वह एक हाथ से खेलते हुए, सर्विस करते हुए ओलंपिक तक पहुंची थी। पहले पन्ने पर उस तस्वीर को इतनी जगह देने का, और उसके लिए कई खबरों को रोकने का मकसद यही था कि उसे देखकर बहुत से लोगों का हौसला बढ़े और लोगों को राह सूझे। लोगों को यह भी याद होगा कि आमिर खान ने एक फिल्म बनाई थी और देश भर के दर्शकों का ध्यान इस बात की तरफ गया था कि कुछ किस्म की मानसिक दिक्कतों को झेलने वाले बच्चों को एक खास किस्म की परवरिश की जरूरत होती है और उनको वैसा साथ मिलने पर वे किसी भी ऊंचाई तक आगे बढ़ सकते हैं। 
तो खास जरूरत वाले लोगों से लेकर साधारण जरूरतों वाले लोगों तक हर किसी में आगे बढऩे की संभावनाएं असीमित रहती हैं, और इन संभावनाओं में सीमा अगर तंग होती है, तो यह अपने भीतर की हिचक से होती है या आसपास के लोगों की तंगदिली से। हर माहौल में लोग आगे बढ़ सकते हैं, माहौल माकूल न भी हो, तो भी वे अपने बूते किसी सीमा तक तो जा ही सकते हैं। आसपास की नकारात्मक बातों को लेकर, गैरबराबरी और बेइंसाफी को लेकर लोग घर बैठे रह सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उसी माहौल में बहुत से लोग होते हैं जो आगे बढऩे की कोशिश करते हैं और बढ़ते भी हैं। आज यहां इस चर्चा को छेडऩे का एक मकसद यह भी है कि इसे पढऩे वाले लोगों को हम यह सुझा सकें कि अपने आसपास के बच्चों, और बड़ों से भी, ऐसी मिसालों की चर्चा करें। असल जिंदगी में नकारात्मक बातों की सुनामी रोज सुबह-शाम आती ही है। उसके बीच ऐसी लहरों के साथ बहकर आने वाले मोतियों को भी देखने की जरूरत है, और उसी से सबका भला हो सकता है। 

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