एक लफ्ज हैवानियत गढ़कर फारिग


6 अगस्त 2012
असम में दो समुदायों के बीच टकराव बढ़ते-बढ़ते अब करीब सौ जिंदगियों को निगल चुका है, और सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि चार लाख लोग घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में जी रहे हैं, अगर उसे जीना कहा जा सके तो। लेकिन बाकी देश, असम के बाहर का तमाम देश चैन से जी रहा है। एक सौ तीस करोड़ से अधिक की आबादी के लिए उत्तर-पूर्व में बसे इस राज्य की तीन करोड़ की आबादी मदद के हिसाब से बहुत छोटी भी हो सकती थी, लेकिन वह मदद उठते नहीं दिख रही है। 
भारत में जो बड़े अखबार और जो टीवी समाचार चैनल किसी एक दुखी इंसान की मदद के लिए अभियान छेड़कर दसियों लाख जुटा देते हैं, उनमें से किसी ने भी असम के इन लाखों बेदखल लोगों के लिए ऐसी कोई कोशिश अब तक शुरू की हो, ऐसा दिखा नहीं है। जिस सोशल मीडिया की चर्चा पिछले दो-तीन बरसों में बढ़ गई है और जिसने मध्य-पूर्व के देशों में जनक्रांति लाने में सबसे बड़ी हिस्सेदारी साबित की है, वह सोशल मीडिया भी इन बरसों में भारत में अन्ना हजारे, रामदेव और डॉ. अब्दुल कलाम तक सीमित रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर भी असम के बेदखल लोगों के लिए हमदर्दी न के बराबर दिखती है।
इसकी दो वजहें नजर आ रही हैं। पहली तो यह कि असम की इस दिक्कत को लोग बांग्लादेश से आकर बसे हुए विदेशियों से ऊपजी परेशानी समझते हैं, और फिर मजहब का फर्क करने वाले लोग इन विदेशियों को मुस्लिम जानकर इस बात के भी खिलाफ हैं कि उन्हें यहां बसने दिया जाए, और फिर धीरे-धीरे वे मतदाता बन जाएं। दूसरी दिक्कत यह है कि उत्तर-पूर्व को लोग हिंदुस्तान की मूलधारा से परे का राज्य मानते हैं। कुछ ऐसा ही बर्ताव कश्मीर के साथ किया जाता है। नतीजा यह होता है कि वहां के लोग धीरे-धीरे अलग-थलग होने लगते हैं, और उनके सुख और दुख भारत के बाकी राज्यों को छू नहीं पाते। 
कल तक जो बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था और जिसे भारत में एक फौजी कार्रवाई करके पाकिस्तान से अलग कर दिया था, उस हिस्से की फौजी अहमियत को आम जनता की जुबान में समझाना कुछ मुश्किल बात है। लेकिन भारत के राजनीतिक दलों में हर किसी के नेता इस बात को ठीक से समझते हैं कि बांग्लादेश से काम के लिए आने वाले लोगों के साथ कुछ नरमी दिखाना और उन्हें सरहद के करीब कमाने-खाने देना, बसने देना, उसके अपने फौजी फायदे हैं। राजनीति के लोग और सरकार की तरफ से इस बात को इतनी खुली जुबान में नहीं कहा जा सकता कि इस आबादी की वजह से उस बांग्लादेश की तरफ से भारत के खिलाफ साजिशों का खतरा घटता है जो कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल करके अमरीका, चीन या पाकिस्तान जैसी ताकतें कर सकती हैं। लेकिन ऐसी पूरी समझ रहने के बाद भी राजनीति में एक तबका असुविधा के ऐसे सार्वजनिक सवाल खड़े करते रहता है जिनके सार्वजनिक जवाब देना सरकार या देश के लिए मुमकिन नहीं होता। 
लेकिन इस राजनीति को भी छोड़ दें। असम में तो आज सिर्फ बांग्लादेश से आए हुए मुस्लिमों की मौतें नहीं हो रही हैं, वहां के दूसरे आदिवासी समुदाय के लोग भी मारे जा रहे हैं, और बेदखली तो एक बड़ी तकलीफ की बात है। ऐसे में भी अगर देश के बाकी हिस्सों के लोग मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाते हैं, और देश-विदेश के दूसरे गैरजरूरी मुद्दों में ही उलझे रहते हैं तो इससे असम का कुछ साबित नहीं होता, इससे बाकी देश की अपनी जिम्मेदारी और इंसानियत की कमी साबित होती है। (हालांकि यहां पर इंसानियत शब्द का इस्तेमाल इसके प्रचलित अर्थ के लिए ही किया जा रहा है, वैसे हकीकत में इंसानियत के भीतर वह सब कुछ शामिल है जिसे इंसान हैवानियत कहते हैं।)
नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब शपथ ले रहे थे तो उन्हें या यूपीए को नापसंद करने वाले कुछ लोगों का यह कहना था कि जब असम में इतनी बड़ी त्रासदी चल रही है तब शपथ ग्रहण का जलसा भी चल रहा है। वह बात तो कुछ लोगों को खटकी हो सकती है, लेकिन क्या उस दिन से बाद से अब तक देश में पहले से तय जलसों में कोई कटौती हो गई है? क्या किसी फिल्म की पहले हफ्ते की कमाई ऐसे राहत शिविरों के लिए दी गई? क्या किसी टीवी के शो में असम के लिए मदद की अपील की गई? और यह बात रकम के हिसाब से मायने की नहीं है। एक कलमाड़ी या एक राजा, या एक मधु कोड़ा अपनी जेब से उतनी रकम दे सकते हैं जितनी कि प्रधानमंत्री असम जाकर दे आए हैं। मायने यह बात रखती है कि देश के लोग देश के किसी एक हिस्से पर आई मुसीबत में हाथ बंटाना सीखें, ऐसा आज अगर वे दूर बसे असम के साथ करेंगे तो कल पास में बसे किसी दूसरे के लिए भी करेंगे। लेकिन अगर आज वे असम को परदेश मानकर, विस्थापितों को विदेशी मानकर नहीं करेंगे तो कल वे अपने राज्य में पड़ोस के राज्य से आकर बसे लोगों को भी विदेशी मानने लगेंगे। बात पैसों की नहीं है, बात है किसी के दुख-दर्द से जुडऩे की। बांग्लादेश से लोग शौक में हिंदुस्तान आकर नहीं बसते। वहां जब रोजी-रोटी नहीं जुटती तो ही वे यहां आते हैं। पेट की इस हकीकत को अनदेखा करते हुए, फौजी जरूरतों को, और सरहद की हिफाजत को अनदेखा करते हुए जो लोग असम के लिए हमदर्दी को गैरजरूरी समझ रहे हैं, वे खुद अपनी जुबान में इंसानियत को भी अनदेखा कर रहे हैं। 
और सच तो यह है कि यह रूख और यह बर्ताव ही असल इंसानियत है, जिसे इंसान मानने के बजाय उसके लिए हैवानियत जैसा एक लफ्ज गढ़कर फारिग हो जाते हैं।

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