राजस्व मंडल अध्यक्ष के फैसले साजिश और भ्रष्ट होने के मायने

संपादकीय
30 मार्च 2016  

छत्तीसगढ़ के राजस्व मंडल में मौजूदा अध्यक्ष के आने के बाद से लगातार पिछले एक अध्यक्ष के कार्यकाल के इतने फैसलों को पलटा गया है, कि उन सब पर अमल करते हुए जिला कलेक्टरों की मुश्किल खड़ी हो गई है। गरीब आदिवासियों की जमीनों को साजिश के तहत गैरआदिवासियों के हाथों बेचने में मदद करने वाले राजस्व मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष के खिलाफ आज के मौजूदा अध्यक्ष ने साजिश जैसी कई बातें लिखी हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये बातें पहले चर्चा में नहीं थीं, पहले से यह चल रहा था, और सबको मालूम था कि राजस्व मंडल में कामकाज कैसे चल रहा था, और पूरे प्रदेश में आदिवासियों की जमीन, सरकार की खुद की जमीन, इनके खिलाफ किस तरह ये फैसले हो रहे थे। लेकिन आज पांच-छह बरस बाद जाकर अगर राज्य सरकार के इस राजस्व-न्यायालय से इसी कुर्सी के फैसलों को साजिश पाकर पलटना पड़ रहा है, और इसके खिलाफ अपील के लिए अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट बाकी ही हैं, तो फिर गरीबों और सरकार की जमीनों की हिफाजत कैसे हो सकेगी? 
और इस मामले को हम सिर्फ कुर्सी पर बैठे एक भ्रष्ट या एक ईमानदार के फर्क तक सीमित रखना नहीं चाहते। हमारा यह मानना है कि कलेक्टरों और कमिश्नरों के फैसलों के खिलाफ जमीनों के मामले सुनने के लिए बनाए गए राजस्व मंडल को सरकार के ढांचे में काले पानी की सजा की तरह मानना बंद किया जाना चाहिए। एक तेज और ईमानदार अफसर किस तरह से अदालती अधिकारों वाली इस कुर्सी पर बैठकर प्रदेश के हितों को, और लोगों के हितों को बचाने का काम कर सकता है, इस संभावना को देखते हुए इस कुर्सी पर लगातार बेहतर लोगों को लाने के बारे में सरकार को सोचना चाहिए। यहां पर आमतौर पर ऐसे अफसरों की तैनाती होती है जिनको सरकारी जुबान में लूपलाईन कहा जाता है, यानी नौकरशाही के हाशिए पर किसी को भेज देना। लेकिन प्रदेश की जमीनों के जितने मामले यहां से जुड़े रहते हैं, उनको देखते हुए इस कुर्सी की अहमियत समझना चाहिए। 
और जब राजस्व मंडल के वर्तमान अध्यक्ष ने करीब 50 एक सरीखे मामलों में पिछले एक अध्यक्ष के फैसलों को साजिश और गिरोह का काम कहा है, तो हमारा ख्याल है कि सरकार को खुद को भी ऐसे पिछले अध्यक्ष के खिलाफ कानूनी विकल्प तलाशने चाहिए, और अगर ऐसी कोई साजिश साबित होती है तो ऐसे अफसर को सजा दिलाने का काम करना चाहिए। यह कोई नई बात भी नहीं है, और राजस्व मंडल में बड़े पैमाने पर धांधली, और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार एक आम चर्चा रही है। लोगों का यहां तक कहना होता है कि कई अध्यक्षों के कार्यकाल में वकील ही फैसले लिखकर ले आते थे, और नगद भुगतान के साथ ऐसे फैसलों पर दस्तखत करवा लेते थे। सरकार को इस सिलसिले को तोडऩे की कोशिश करना चाहिए। लोगों की नजरों से दूर यह एक ऐसा कानूनी अधिकार प्राप्त न्यायालय है जहां पर कि हर फैसले से जमीनों का करोड़ों का नफा जुड़ा होता है, जो कि भ्रष्ट व्यवस्था के चलते आमतौर पर सरकारी जमीनों के हितों के खिलाफ जाता है। राज्य सरकार एक तरफ जब प्रशासनिक सुधार आयोग बनाकर सरकारी कामकाज में बेहतरी की कोशिश कर रही है, तो उसे प्रयोग के तौर पर राजस्व मंडल के दो अध्यक्षों के कार्यकाल का भी कानूनी विश्लेषण करना चाहिए कि एक खराब अफसर सरकार के खिलाफ, गरीबों के खिलाफ कितना नुकसान करके जा सकता है। और यह बात तो जाहिर है ही कि इस देश में अगर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का विकल्प बाकी हो, तो वहां पर संपन्न लोगों के ही जीतने की गुंजाइश अधिक बचती है। ऐसा नहीं कि हर जज भ्रष्ट है, लेकिन अदालती कामकाज इतना महंगा है कि गरीब अपनी गरीबी के चलते ही मामले हार जाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को राजस्व मंडल को ईमानदार और काबिल अफसर देकर इस स्तर पर भ्रष्टाचार को खत्म करना जारी रखना चाहिए। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31 - 03 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2298 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं