तीन-तलाक के बाद और भी कई रिवाज खत्म किए जाएं

संपादकीय
22 अगस्त 2017


सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के एक फैसले से मुस्लिम महिला के साथ लंबे समय से चली आ रही बेइंसाफी को खत्म करने की कोशिश की है और तीन-तलाक के प्रचलन को गैरकानूनी करार दिया है। पांच में से तीन जजों ने बहुमत से यह तय किया और केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह छह महीने में इसके लिए कानून बनाए। तब तक देश में तीन-तलाक गैरकानूनी रहेगा।
इस मामले के लिए एक अनोखी संविधानपीठ बनी थी जिसमें पांच अलग-अलग धर्मों के जज थे। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी। ऐसा लगता है कि बौद्ध धर्म को मानने वाले, आमतौर पर दलित कोई जज सुप्रीम कोर्ट में हैं नहीं, या फिर पांच धर्मों में उन्हें शामिल करना जरूरी नहीं समझा गया, और देश में गिनती के पारसियों के समुदाय से आए एक जज को इस बेंच में रखा गया। खैर, हम जजों के अपने धर्म का कोई ऐसा महत्व नहीं देखते कि देश की सबसे बड़ी अदालत जज के धर्म से ग्रस्त फैसले देती हो, वरना क्रिकेट के अंपायर की तरह तीसरे किसी देश के व्यक्ति की तरह सुप्रीम कोर्ट में तीसरे धर्म का जज रखना पड़ता। लेकिन इस चर्चा के बीच यह जिक्र जरूरी है कि इस मामले को मुख्य न्यायाधीश ने इतना महत्वपूर्ण माना कि इसके लिए गर्मी की छुट्टियां रद्द कर दीं, और पक्ष-विपक्ष के वकीलों को भी कह दिया गया कि जजों की तरह वे भी छुट्टी छोड़ इस मामले को निपटाने रोज अदालत आएं।
हम इस फैसले से सहमत हैं क्योंकि किसी धर्म की व्यवस्था के तहत अगर समाज धर्म के नाम पर, या कि धर्म के मुताबिक भी कोई ऐसे रीति-रिवाज लागू करके रखता है जो कि बुनियादी अधिकारों के खिलाफ हैं, मानवाधिकारों के खिलाफ हैं, या कि औरत-मर्द की बराबरी के खिलाफ हैं, तो उन रिवाजों को कानून बनाकर खत्म करना बेहतर और जरूरी दोनों ही हैं। एक वक्त हिंदू धर्म में सती प्रथा को सामाजिक मान्यता थी, आज भी हिंदुओं के बीच बालविवाह को सामाजिक मान्यता है, और विधवा-विवाह को समाज ठीक नहीं मानता, छुआ-छूत को मानता है, दहेज को मानता है, लेकिन इन सबके खिलाफ समय-समय पर कानून बने और लागू हुए। इनकी वजह से हालात काफी कुछ सुधरे और लोगों को धार्मिक-सामाजिक रीति-रिवाजों से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक न्याय और समानता की तरफ बढऩे के मौके मिले।
न सिर्फ मुस्लिम समाज में, बल्कि कई दूसरे समाजों में भी धर्म के नाम पर, या कि धार्मिक परंपरा के रूप में बेइंसाफी चलती रहती है। इनको खत्म करने के लिए सिर्फ समाज सुधार कभी काफी नहीं होते। वरना राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद की कोशिशें ही काफी होतीं। समाज के जो सबसे कट्टर और धर्मांध लोग होते हैं, वे कभी भी सुधार को आने नहीं देते क्यों उनकी अपनी नेतागिरी कट्टरता पर टिकी होती है। हमारा मानना है कि किसी भी धर्म की खाप पंचायतें हों, उनसे ऊपर देश के लोकतांत्रिक कानून को रखना ही होगा। किसी समाज के सबसे धर्मांध नेताओं को खुश रखने के चक्कर में यह देश एक बार मुस्लिम समाज की शाहबानो को कुचल चुका है। जब सुप्रीम कोर्ट ने उसे उसका हक दिलाया था तो कट्टर और दकियानूसी मुस्लिम नेताओं के आंदोलनों की धमकी से डरकर, और उन्हें खुश रखने के लिए तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद में अपने ऐतिहासिक बाहुबल से कानून बदल डाला था, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले और शाहबानो के हक दोनों को दफन कर दिया था। इस बार ऐसी उम्मीद है कि केंद्र सरकार चूंकि खुद ही लगातार तीन-तलाक के खिलाफ लगी हुई है, और मुस्लिम समाज के भीतर भी एक बड़ा तबका इस हिंसक प्रथा को खत्म करने का हिमायती है, इस बार संसद मुस्लिम महिला को हक दिलाने का कानून बनाएगी, और शाहबानो के साथ दशकों पहले हुए बेइंसाफी की कालिख अपने चेहरे से पोंछेगी।
हमारा यह साफ मानना है कि किसी धर्म के लोगों का आबादी में अल्पसंख्यक हो जाने से उस धर्म के तहत चलते रिवाजों की खामियों और बेइंसाफियों को जारी रखने देना गलत होगा। भारत को योरप की तरफ भी देखना चाहिए, वहां के जो विकसित और सभ्य देश हंै, वे एक तरफ तो अपनी मूल आबादी की नाराजगी भी झेलते हुए मुस्लिम देशों से पहुंच रहे लाखों शरणार्थियों को अपनी जमीन पर बसा रहे हैं, उन्हें बचा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ वे मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने के रिवाज के खिलाफ कानून बना रहे हैं जो कि उनकी अपनी अदालतों से लेकर यूरोपीय संसद तक सभी जगह सही ठहराए जा रहे हैं। इस मामले को लेकर दुनिया भर में एक मतभेद है, और बहस जारी है कि मुस्लिम महिला पर बुर्का एक बोझ है, बंधन है, या कि यह उसकी पोशाक की आजादी है। लेकिन हमारा यह मानना है कि मुस्लिम महिला का बुर्का हो या कि हिंदू महिला का घूंघट हो, यह सब महिला की आजादी के खिलाफ के रिवाज हैं, और इनको समाज सुधार से या कानून बनाकर खत्म करना बेहतर होगा, बजाय इसके कि इसे मुस्लिम महिला की आजादी माना जाए। कल तक तो हिंदू धर्म में पति खोने वाली महिला के लिए भी यही कहा जाता था कि वह अपनी मर्जी से सती होती है। लेकिन ऐसी मर्जी आमतौर पर महिलाओं पर थोप दी जाती है, और इसे उनकी आजादी का हक मानना गलत है। योरप के देश यह सही कर रहे हैं कि वे अपने कानून के मुताबिक इसे आजादी के बजाय बंधन मान रहे हैं, और कानून बनाकर इसे खत्म कर रहे हैं। भारत में भी महिलाओं की हालत सुधारने के लिए ऐसी बहुत से रिवाज खत्म करने की जरूरत है, और तीन-तलाक का खात्मा एक बड़ी शुरुआत होनी चाहिए, न कि किसी बात का अंत।

गुमनाम संदेश की नई तकनीक साराहा, पखानों के भीतर लिखने जैसी सुविधा?

आजकल
21 अगस्त 2017

अभी एक नई मैसेंजर सर्विस शुरू हुई है, जिसका नाम है साराहा। इस शब्द का मतलब अरबी भाषा में ईमानदारी से या दिल खोलकर सच-सच कह देना होता है। इस नाम के मुताबिक ही इस मोबाइल एप्लीकेशन को गढ़ा गया है, इससे आप लोगों को संदेश भेज सकते हैं, लेकिन उन्हें आपका नाम पता नहीं चलेगा। भेजने वाले के नाम के बिना जाने वाले संदेशों का कोई जवाब भी नहीं दिया जा सकेगा। और आज की दुनिया में जब लोगों को एक-दूसरे तक संदेश भेजने के बावलेपन का दौर चल रहा है, लोग इसका इस्तेमाल करने पर टूट पड़े हैं। लेकिन इससे जुड़ी हुई कुछ बातों पर पहले सोच लेना बेहतर होगा, बजाय बिना सोचे इसका इस्तेमाल करने के।
पहली बात तो यह है कि कई बरस पहले जब फेसबुक जैसा एक सोशल मीडिया शुरू हुआ, तब भी लोगों को यह शक था कि यह अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए का एक औजार है, और इससे लोग अपनी निजी और गोपनीय बातों को भी संदेश के बक्से में, या अधिक दुस्साहसी लोग इन्हें खुले रूप में भी लिखने लगे हैं। यह लतीफा भी चल निकला था कि फेसबुक आने के बाद अमरीकी सरकार ने सीआईए का खुफिया बजट घटा दिया है क्योंकि अब उसे मेहनत की जरूरत नहीं रहती, लोग ही अपने आने-जाने, खाने-पीने, जान-पहचान के बारे में लिख देते हैं, और तस्वीरें पोस्ट कर देते हैं। कुछ लोगों का अब भी यह शक है कि दुनिया की खुफिया एजेंसियां फेसबुक पर निजी संदेश को भी देखने की ताकत रखती हैं, और कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता। इसके बाद वॉट्सऐप नाम का एक दूसरा मैसेंजर लोकप्रिय हुआ, और दुनिया की सरकारें इसके संदेशों पर निगरानी रखने का कानूनी हक पाने के लिए अदालतों में पहुंची हुई हैं।
अभी जो लोग यह मानकर चलते हैं कि निजी संदेश गोपनीय रहते हैं, और मिटा देने पर वे हमेशा के लिए मिट जाते हैं, वे गलती पर हैं। कम्प्यूटर, फोन या इंटरनेट पर एक बार का भेजा हुआ कुछ भी कभी नहीं मिटता, और आगे-पीछे ऐसी तकनीक विकसित हो जाएगी जो मिटाई गई तमाम बातों को भी दुबारा सुबूत की शक्ल में खड़ा कर देगी। अब ऐसी नौबत में यह एक नया संदेशवाहक आया है जो कि भेजने वाले के नाम-नंबर के बिना एक गुमनाम संदेश पहुंचा देता है। हो सकता है कि जो लोग आधुनिक तकनीक को ताबीज की तरह मान लेते हैं, वे लोग इस बात पर भी भरोसा कर लें कि ये संदेश सचमुच ही गोपनीय रहेंगे, और हमेशा के लिए गोपनीय रहेंगे। लेकिन ऐसे लोगों को यह याद रखना चाहिए कि दुनिया की सबसे ताकतवर अमरीकी सरकार के राजदूत अपनी सरकार को जो खुफिया ई-मेल भेजते थे, उन्हें विकीलीक्स ने करोड़ों की संख्या में चारों तरफ उजागर कर दिया था। इसके पहले और इसके बाद भी दुनिया की कुछ सबसे गोपनीय जानकारी उजागर हो गई थी, और कारोबार की दुनिया में बैंकों के कम्प्यूटरों को हैक करके सेंधमार अरबों-खरबों की चोरी करते ही रहते हैं।
ऐसे में अरब दुनिया से ईमानदारी के एक खिलौने की शक्ल में सामने आए इस मैसेंजर साराहा के बारे में सोचें, तो इसे इंसानी सोच के साथ जोड़कर देखना होगा। जब लोगों को गुमनाम कुछ करने की सहूलियत होती है, तो उनके भीतर की सबसे बुरी बातें निकलकर सामने आती हैं। किसी भी सार्वजनिक जगह पर पखानों के दरवाजों के भीतर लोगों की सारी भड़ास लिखी हुई दिखती है, और मौका मिलने पर खुली दीवारों और पेड़ों पर भी लोग अपनी हसरतों को गोद डालते हैं। ऐसे में जब लोगों को यह कहा जा रहा है कि उनके संदेश उनके नाम के बिना जाएंगे, तो लोगों के भीतर की हिंसा, उनकी भड़ास, उनकी अपूरित इच्छाएं, वे सब सामने आने लगेंगी। और देर रात अपने बिस्तर पर बैठे या लेटे हुए लोगों को बाकी दुनिया को परेशान करना कुछ वैसा ही सूझने लगेगा जैसा कि कुछ सार्वजनिक जगहों पर लोग अपने कपड़े हटाकर औरों को अपना बदन दिखाकर करने लगते हैं।
गुमनाम संदेश, यह सुनने में तो एक अच्छी सहूलियत है, लेकिन दूसरी तरफ जिन लोगों को ऐसे संदेश मिलेंगे, उनका दिमागी सुख-चैन हो सकता है कि बहुत से संदेशों से गायब होने लगे। लोग यही सोचते हैरान हो जाएंगे कि कौन उनसे मिलने की हसरत जाहिर कर रहे हैं, कौन उनके खुफिया राज जानते हैं, और कौन ऐसे लोग हैं जो कि उनसे इतनी नफरत करते हैं, या कि धमकी भेज रहे हैं। यह अपने आप में एक कानूनी दिक्कत की बात भी हो सकती है कि किसी को धमकी मिले, और वह उसके खिलाफ शिकायत भी न कर पाए। यह देश के कानून के खिलाफ भी हो सकता है कि ऐसा कोई मैसेंजर हो जो गुमनाम काम करे, और जिसे जांच एजेंसियां भी पकड़ न पाएं, रोक न पाएं। इसलिए यह लोगों के दिमागी सुख-चैन से लेकर देश के कानून तक के लिए परेशानी का मैसेंजर हो सकता है। दुनिया में टेक्नालॉजी बनती तो है लोगों की जिंदगी में सहूलियतें बढ़ाने के लिए, लेकिन धीरे-धीरे तकनीक के सारे औजारों का बेजा इस्तेमाल भी होने लगता है, और जब यह इस्तेमाल बढ़ते-बढ़ते गुमनाम इस्तेमाल तक पहुंचने लगे, तो उसके कुछ अलग खतरे होने लगते हैं।
लोगों को याद होगा कि जब विकीलीक्स ने अमरीकी सरकार और उसके राजदूतों के बीच के करोड़ों ई-मेल उजागर किए, तो दुनिया भर के देशों को, वहां के नेताओं को, और वहां के प्रमुख लोगों को यह देखकर सदमा लगा था कि अमरीकी लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। अब यह सोचें कि साराहा जैसे मैसेंजर कल के दिन कानूनी रूप से या तकनीकी सेंधमारी से यह उजागर करने को बेबस हो जाएगा, या कि उसका भांडा फूट जाएगा, और सारे संदेशों के साथ यह बात इंटरनेट पर तैरने लगेगी कि किसने किसको क्या लिख भेजा था, तो उस वक्त क्या होगा? यह कुछ उसी तरह का रहेगा कि पखाने के भीतर कैमरा फिट करके यह रिकॉर्ड कर लिया जाए कि दरवाजे के पीछे कौन सी गाली कौन लिख रहे हैं।
लोगों को अलग-अलग तरह की गोपनीयता देने वाले कुछ और मैसेंजर भी बाजार में है। सिग्नल नाम का एक मैसेंजर ऐसा माना जाता है कि उसे खुफिया एजेंसियां आसानी से हैक नहीं कर पातीं। यह मैसेंजर यह सुविधा भी देता है कि लोग अपने भेजे संदेशों के साथ यह तय कर सकें कि वे कितने सेकेंड बाद अपने आप मिट जाएंगे। अब ऐसी सुविधा के साथ लोग अधिक गोपनीय बातें, अधिक खतरनाक बातें लिखने को भी महफूज मान बैठने का खतरा उठा लेते हैं। लेकिन कल के दिन यह साबित हो जाए कि फोन की स्क्रीन से कुछ सेकेंड में गायब हो जाने वाले संदेश विकीलीक्स जैसे किसी भांडाफोड़ू ने इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिए हैं, तो क्या होगा?
इसलिए यह समझ लेना चाहिए कि टेक्नालॉजी कोई तिलस्म नहीं है, और दुनिया में सौ फीसदी गोपनीयता किसी चीज की नहीं होती। आज तो लोगों के दिल-दिमाग में जो सोच है, वह जरूर गोपनीय है, लेकिन इसके बारे में भी लोगों को यह मालूम रहना चाहिए कि दुनिया की कुछ सबसे आधुनिक प्रयोगशालाएं इसी बात का प्रयोग कर रही हैं कि लोगों के दिमाग को कैसे पढ़ा जा सके। जैसे-जैसे इसके लिए औजार बनते चलेंगे, वैसे-वैसे लोग अपनी सोच के साथ भी बिना कपड़ों की तरह हो जाएंगे, और मशीनें यह बताने लगेंगी कि किसके दिमाग में क्या चल रहा है। ऐसे में किसी भी टेक्नालॉजी, किसी भी मैसेंजर सर्विस पर एक अंधविश्वास करना ठीक नहीं है। साराहा नाम का यह नया मैसेंजर आने के कुछ दिनों के भीतर ही कई ऐसी फर्जी वेबसाइटें आ गई हैं जो यह दावा कर रही हैं कि वे आपके पास आए इस गुमनाम संदेश को भेजने वाले के नाम-नंबर बता सकती हैं। अभी तो ऐसे दावे फर्जी दिख रहे हैं, लेकिन असली दावे अधिक दूर भी नहीं होंगे। इसलिए टेक्नालॉजी के बजाय अपनी सोच, अपनी नीयत, और अपने चाल-चलन पर अधिक भरोसा करना बेहतर है।

गोरखपुर की मौतों से भी कुछ सीखा नहीं छत्तीसगढ़ ने

संपादकीय
21 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, राजधानी के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, में ऑक्सीजन की गड़बड़ी से तीन बच्चों की मौत की खबर है, और स्वास्थ्य विभाग के अफसर अस्पताल की गड़बड़ी को छुपाने में लग गए हैं। स्वास्थ्य सचिव को आनन-फानन प्रेस कांफ्रेंस लेनी पड़ी, और उसमें यही उजागर हुआ कि वे मीडिया को सफाई तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें खुद पूरी जानकारी नहीं है। दूसरी बात यह कि सरकार ने इसी विभाग के अफसरों को जांच का जिम्मा दिया है, जिनके मातहत ये मौतें हुई हैं। तीसरी बात यह कि स्वास्थ्य सचिव ने किसी भी जांच के शुरू होने के पहले ही अस्पताल और विभाग को एक तरह से क्लीन चिट दे दी, ऐसे में किसी जांच से हकीकत सामने आने की संभावना बुरी तरह मार खाती है।
जिन लोगों को प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में जाने की नौबत आती है, वे इसे नर्क सरीखा पाते हैं। और यह अस्पताल प्रदेश के सबसे ताकतवर लोगों के आने-जाने के रास्ते में है, मुख्यमंत्री-राज्यपाल से लेकर मंत्री और सचिव तक यहां आते-जाते हैं, और इसकी बदहाली इस बात का सुबूत है कि प्रदेश के बाकी सरकारी अस्पताल इसके मुकाबले और खराब हालत में होंगे। आज की इन मौतों के बाद सिलेंडर-कर्मचारी को शराबी और नशे में होने की वजह से निलंबित किया गया है, और यह हाल अस्पताल में सैकड़ों डॉक्टर-कर्मचारियों का है जो कि निलंबित किए जाने के लायक हैं। दरअसल प्रदेश के ताकतवर लोगों के अपने इलाज के लिए सरकार ने निजी अस्पतालों मेें खर्च करने की छूट दे रखी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि सरकारी अफसर, मंत्री, और सरकारी खर्च पर इलाज पाने वाले बाकी लोग अपने और अपने परिवार के लिए सरकारी इलाज के मोहताज नहीं रह गए हैं, और सरकारी अस्पतालों को ऐसा लगता है कि एक सोची-समझी साजिश के तहत बर्बाद किया जा रहा है ताकि सरकार के सैकड़ों करोड़ रूपए निजी अस्पतालों को दिए जा सकें।
ऑक्सीजन की कमी या गड़बड़ी से मौत होने की नौबत इसलिए नहीं आनी चाहिए थी कि अभी-अभी उत्तरप्रदेश में एक बड़ा जुर्म हुआ है, और साठ बच्चे मारे गए हैं। उस घटना से पूरे देश के बाकी सरकारी अस्पतालों को एक सबक लेना था।  पिछले हफ्ते गोरखपुर पर लिखते हुए हमने इसी जगह आधा दर्जन बार छत्तीसगढ़ के बारे में भी सरकार को सचेत किया था। हमारे नियमित पाठकों ने पढ़ा होगा-
...छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।...
...सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी  बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।...
...छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है।...
ऊपर के ये सारे पैराग्राफ हमने पिछले हफ्ते-दस दिन में इसी जगह लिखे थे, और उन्हें आज फिर दुहराने की जरूरत लग रही है। अस्पताल के इस ताजा हादसे की जांच तो हो जाएगी, और उसमें भी कुसूरवार को बचाने की पूरी कोशिश भी हो जाएगी, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों के हाल सुधारने के लिए अगर कोई गंभीर कोशिश नहीं होगी, तो सरकार को यह बात समझ लेना चाहिए कि सरकारी अस्पताल से भुगत कर लौटने वाले लोग इतने जख्मी होकर आते हैं कि अगले चुनाव तक उनके जख्म सूखेंगे नहीं।

अखबारों को मीडिया के व्यापक दायरे से बाहर निकलना चाहिए

संपादकीय
20 अगस्त 2017


कल अंधेरा होने के बाद उत्कल एक्सप्रेस बेपटरी हुई, करीब दो दर्जन मौतें हुईं, और आबादी के बीच का इलाका होने की वजह से मीडिया अपने कैमरों सहित आनन-फानन वहां पहुंच गई। नतीजा यह हुआ कि बिखरे हुए टूट-फूटे डिब्बों के नीचे से पटरियों और वहां पहले से चल रही, और शायद हादसे के लिए जिम्मेदार भी, मरम्मत के औजारों को दिखा-दिखाकर टीवी समाचार चैनलों के कैमरे अपने दर्शकों को नजारा दिखा रहे थे। कोई टीवी रिपोर्टर पटरियों पर ट्रेन के ब्रेक लगने के निशान छू-छूकर दिखा रहा था, तो उनमें से कई एक-एक औजारों को उठा-उठाकर साबित कर रहे थे कि यहां मरम्मत चल रही थी।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे बड़े रेल हादसे के बाद जब यह जांच शुरू होनी है कि कौन सी बातें इस हादसे के लिए जिम्मेदार रहीं, तो पटरियों के निशान, और औजारों को हटा-हटाकर की जा रही रिपोर्टिंग क्या सुबूतों को चौपट भी करेगी? किसी छोटे से हादसे या छोटे से जुर्म में भी सुबूतों की इज्जत की जाती है, और एक घेरा डालकर उस जगह से सभी लोगों को दूर रखा जाता है। खुले में हुए रेल हादसे में लोगों की जिंदगी बचाना सबसे अधिक जरूरी रहता है, और इसलिए वहां पर ऐसा कोई घेरा नहीं डाला जा सकता, लेकिन क्या अरबों के कारोबार वाले मीडिया में अपने लोगों को इतना सिखाने की जहमत उठाई जा सकती है कि वे सुबूतों के साथ ऐसी छेड़छाड़ न करें? लेकिन आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल यह है कि उसके चैनलों के बीच पल-पल का गलाकाट मुकाबला रहता है। अखबारों में तो चौबीस घंटे में एक बार का मुकाबला रहता है, लेकिन चैनलों में मिनट भर की देरी भी एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के प्रचार में काम आती है। नतीजा यह होता है कि सब कुछ, सबसे पहले, और सबसे अधिक खुलासे से दिखाने की होड़ किसी और बात की इज्जत नहीं छोड़ती।  किसी जुर्म के नजारे को दिखाते हुए आसपास के बच्चों के चेहरे धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों या महिलाओं की शिनाख्त भी कई तरह से उजागर होती रहती है।
अब टीवी चैनलों से परे एक और मीडिया आगे बढ़ रहा है जो कि इंटरनेट का इस्तेमाल करता है, और वहां पर सबसे पहले खबरों को डालने के मुकाबले में लगा हुआ है। वेब-आधारित मीडिया को टीवी चैनलों की तरह किसी उपग्रह की जरूरत भी नहीं पड़ती, और न ही महंगे या बड़े कैमरों की। नतीजा यह होता है कि एक मोबाइल फोन से रिकॉर्डिंग भी हो जाती है, और तस्वीरें या वीडियो पोस्ट भी हो जाते हैं। इनकी हड़बड़ी टीवी चैनलों से भी अधिक होती है, और एक समय पत्रकारिता जिस तरह की जिम्मेदारी का काम होता था, सामाजिक सरोकार और नीति-सिद्धांत का काम होता था, वह अब कमजोर होते-होते पहले तो मीडिया बना, और अब वह मीडिया और सोशल मीडिया के बीच की एक नई संकर-नस्ल बन गया है जो पूरी तरह से बेकाबू है, और जवाबदेही से भी परे है। अखबारों में एक वक्त छपकर प्रेस से निकल चुके पन्ने पुख्ता सुबूत रहते थे, और गलती की कतरनें पूरी जिंदगी मुंह चिढ़ाती थीं, वह नौबत अब वेब-आधारित खबरों से गायब हो गई है, क्योंकि पहले पोस्ट करो, फिर जांचों-परखो के दौर में अपनी जानकारी गलत मिलने पर लोग बिना किसी सफाई के, सीधे पोस्ट हटा देते हैं, और बात को आई-गई मान लेते हैं।
इसलिए कम से कम छपे हुए मीडिया को अपने पुराने नाम, प्रेस, या अखबारनवीसी, या पत्रकारिता की तरफ लौटना चाहिए। इसके बाद आज इस्तेमाल हो रहे मीडिया शब्द को बाकी तमाम लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए, ताकि वे टीवी के लिए या कि इंटरनेट के लिए इसका मनचाहा इस्तेमाल करें। अखबारनवीसी एक वक्त बड़ी जिम्मेदारी और बड़ी इज्जत का काम माना जाता था, फिर चाहे वह चौबीस घंटे में महज एक बार समाचार-विचार देता था। अखबारों को अपने उसी रूख की तरफ लौटना चाहिए क्योंकि छपे हुए शब्द आज भी अधिक जिम्मेदारी के साथ तय होते हैं, फिर चाहे उन्हीं अखबारों के वेब-संस्करण गैरजिम्मेदारी से क्यों न बनते हों। आज मीडिया नाम के एक बहुत ही व्यापक दायरे से प्रेस को बाहर निकल जाना चाहिए, और अपनी पुरानी पहचान बनाकर, पुराने तौर-तरीकों से, अधिक ईमानदार काम करना चाहिए।

सरकारी अनुदान पर गायों को ऐसी मौत कोई और देता तो?

संपादकीय
19 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में एक भाजपा नेता और म्युनिसिपल में निर्वाचित पद पर बैठे हुए स्थानीय मुखिया की गौशाला में पिछले दो-चार दिनों में दर्जनों गायों की बहुत ही बुरी हालत में मौत पाई गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो सौ से अधिक गायें मारी गई हैं क्योंकि उन्हें खाना भी नहीं मिला। जब थोक में इतनी मौतें हो गई हैं, और इतनी लाशों को ठिकाने लगाना मुमकिन नहीं था, तो गौसेवा आयोग ने पुलिस रिपोर्ट की, और यह भाजपा नेता गिरफ्तार किया गया। अब जानकारी सामने आ रही है कि इसकी गौशाला को पिछले पांच बरस में करीब एक करोड़ रूपए का सरकारी अनुदान मिला था, और अनुदान के बेजा इस्तेमाल से लेकर गायों की बदहाली तक के लिए इसे सरकारी नोटिस मिलते रहे। यह सब भाजपा का एक हिन्दू नेता करते रहा, और इसके बाद जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि किस तरह सरकारी अनुदान पर गौशाला चलाकर हिन्दू नेता कमाई कर रहे हैं, और उनकी गऊमाता भूखों मर रही है।
यह मामला भयानक इसलिए भी है कि देश भर में जगह-जगह दो-चार गायों को लेकर भी दलितों और अल्पसंख्यकों को पीट-पीटकर मार डाला गया है, और देश में कुछ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि इसमें इंसानों के रहने की गुंजाइश चाहे न बचे, गायों का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए। ऐसे में जब शहरी घूरों पर जगह-जगह गायें गंदगी, मैला, और प्लास्टिक का कचरा खाते दिखती हैं, तो लगता है कि उनकी वो राष्ट्रवादी संतानें कहां हैं जिन्हें गाय की निकलती हुई सांस में भी ऑक्सीजन दिखता है, गोमूत्र में सोना दिखता है, गोबर में रेडियो एक्टिविटी रोकने की ताकत दिखती है, और इन सबमें कैंसर का इलाज दिखता है? गाय के नाम पर साम्प्रदायिक और हिंसक राजनीति करने वाले तब क्या करते जब छत्तीसगढ़ की इस गौशाला में हुई सैकड़ों मौतों के पीछे कोई गैरहिन्दू, कोई दलित या कोई अल्पसंख्यक जिम्मेदार होता?
यहां दो बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं। एक तो गाय को लेकर देश में जो साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है, उसे जिस तरह राष्ट्रवाद से जोड़ा जा रहा है, और उसे लेकर जिस तरह की अवैज्ञानिक बातें फैलाई जा रही हैं, उन्हें वैज्ञानिक सच ठहराया जा रहा है, वह सब अपने आपमें बड़ी फिक्र का सामान है। अब उसके साथ-साथ यह भी है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी अनुदान से सैकड़ों करोड़ रूपए लेकर गौशाला चलाने वालों ने अपनी संतानों के लिए कई पीढिय़ों का भ्रष्टाचार जमा कर लिया, और गाय की कई पीढिय़ों को मार डाला। बिहार में नीतीश-भाजपा गठबंधन सरकार के वक्त भाजपा के नेताओं ने सृजन नाम के एनजीओ के नाम पर सरकारी खजाने से करीब हजार करोड़ रूपए पार कर दिए, और अब वे लोग फरार हैं। लेकिन उसमें कम से कम किसी गाय का नाम नहीं था, इसलिए भाजपा के उन नेताओं ने कोई राष्ट्रद्रोह नहीं किया था, गऊमाता का कोई निवाला नहीं छीना था, महज गरीब जनता के खजाने के हजार करोड़ रूपए पार कर दिए थे। लेकिन छत्तीसगढ़ में तो इन हिन्दू नेताओं ने गाय पालने की गौशाला के नाम पर जगह-जगह फर्जीवाड़ा किया, और गाय को भूखे मार डाला। यह अनुदान देने वाला छत्तीसगढ़ सरकार का पशुपालन विभाग है जिसके मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अभी इजराइल के दौरे से ऐसी गौशालाओं पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भेज रहे हैं। लेकिन उनके विभाग से बंटने वाले ऐसे अनुदान पाकर भयानक भ्रष्टाचार करने की शिकायतें तो खुद विभाग की जांच में बरसों से साबित होती रही हैं, और इस पर अगर उन्होंने कार्रवाई की होती, तो उसके बाद से अब तक ऐसी हजारों गायों को भूखे और बीमार नहीं मरना पड़ता। बृजमोहन अग्रवाल से यह उम्मीद इसलिए भी की जाती थी कि उनके पिता पूरी जिंदगी से राजधानी रायपुर की एक सबसे बड़ी गौशाला से जुड़े हुए हैं। हमने इसी अखबार में गौशालाओं को सरकारी अनुदान में करोड़ों के घोटाले की रिपोर्ट एक-दो बरस पहले ही सरकारी जांच के हवाले से छापी थी, लेकिन जाहिर है कि उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। आज जब यह बात लिखी जा रही है, तब इजराइल के प्रवास से कृषि एवं पशुपालन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का भेजा समाचार मिला है कि वे वहां पर अत्याधुनिक डेयरी देख रहे हैं। उन्हें वहां से यह भी देखकर लौटना चाहिए कि बिना खाना दिए गायों को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है, ताकि छत्तीसगढ़ में उनकी सरकार की बदनामी न हो।
सैकड़ों गायों की लाशों का हिसाब अब सामने आ रहा है, और छत्तीसगढ़ के टीवी चैनलों पर भयानक तस्वीरें दिख रही हैं कि किस तरह ट्रैक्टर ट्रॉली भर-भरकर लाशों को छुपाया गया है। ऐसे एक गौशाला संचालक को गिरफ्तार करना काफी नहीं है, और राज्य सरकार ने सभी जिलों में गौशाला की जांच का जो आदेश दिया है, उस पर अगर ईमानदार रिपोर्ट आएगी, तो दर्जनों लोग सरकारी अनुदान में अफरा-तफरी के जुर्म में गिरफ्तार हो जाएंगे। दूसरी तरफ जिन गौभक्तों को गाय में ईश्वर दिखते हैं, उनको गाय या ईश्वर से यह सवाल भी करना चाहिए कि गाय को भूखे मारने वाले लोगों को क्या कोई सजा मिलेगी? या फिर गाय की जिंदगी महज घूरों पर ही गुजरेगी? एक अखबार में यह भी लिखा हुआ है कि गौशाला घोटाला करने वाला यह भाजपा नेता मरी गाय की खाल को मछलियों की चारे की तरह इस्तेमाल करता था, और तालाब में डालता था। देश भर में दलितों और अल्पसंख्यकों को जितने तरह की गौ-हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराया जा रहा है, उसमें कई नई मौलिक किस्में छत्तीसगढ़ में जुड़ रही हैं, और राज्य सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग गायों को ऐसा भूखा मारने की रिपोर्ट पढ़ते हुए क्या खुद खाना खा सकेंगे?
आज देश भर में गाय को लेकर जिस तरह का अवैज्ञानिक और हिंसक-साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है, केन्द्र और राज्य तरह-तरह के कानून बना रहे हैं, उन सबको लेकर देश की खेती से पशुओं का खात्मा हो रहा है। अब कोई किसान जानवर पालने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे, और छोटे-छोटे डेयरी वाले भी डर-सहमकर अपने कारोबार बदल देंगे। तो क्या यह पूरा गौ-उन्माद डेयरी के अरबपति-खरबपति कारोबार को बढ़ावा देने का एक हथियार भी है? ऐसी कई बातें मन में उठती हैं क्योंकि गौ-उन्माद में बनाए गए कानूनों से देश में करोड़ों लोगों का पशु आधारित रोजगार खत्म हो चुका है जिसमें डेयरी से लेकर खेती तक, और चमड़े से लेकर हड्डियों तक का कारोबार है। गाय-भैंस के मांस का कारोबार आज देश के खरबपति कारखानों में धड़ल्ले से जारी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसे जुर्म बनाकर खत्म कर दिया गया है। इस तरह यह धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद करोड़ों के रोजगार छीनकर कुछ सौ लोगों को अरबपति बनाने का एक अभियान भी साबित हो रहा है। 

दिग्विजय का एक अनोखा कदम छह महीने की नर्मदा परिक्रमा

संपादकीय
18 अगस्त 2017


मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह सत्ता के बाहर रहते हुए भी कभी खबरों के बाहर नहीं रहते। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद जब 2003 में विधानसभा चुनाव हुए, तो दिग्विजय सिंह दस बरस की सत्ता को खो बैठे, और कांग्रेस को बड़ी शर्मनाक हार हुई। उसके बाद उन्होंने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक फैसला लिया, और अपने आपको दस बरस के लिए चुनावों और सत्ता से परे कर लिया। कांग्रेस संगठन में उन्हें पार्टी के सबसे आक्रामक संघ-विरोधी के रूप में महत्व मिलता रहा, और एक वक्त ऐसा था जब उन्हें राहुल गांधी के राजनीतिक शिक्षक-प्रशिक्षक के रूप में भी देखा जाता था। हालांकि इस कुनबापरस्त पार्टी में जिसके भविष्य की हत्या करनी हो, उसके बारे में ऐसे विशेषण चला देना काफी होता है, और दिग्विजय सिंह के मौजूदा संगठन-पतन के पीछे हो सकता है कि यह भी एक वजह रही हो। जिस कुनबे के लोग अपनी वंशावली की वजह से देश को चलाने के हकदार माने जाते हों, पार्टी के मालिक रहते हों, उन्हें भी किसी से कुछ सीखना पड़ता है, ऐसी अपमानजनक बात कांग्रेस में किसी को आगे नहीं बढ़ा सकती। लेकिन दिग्विजय सिंह को कांग्रेस संगठन ने फिलहाल खारिज सरीखा कर दिया है, और एक-एक करके तमाम राज्यों का जिम्मा उनसे ले लिया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि गोवा में अधिक विधायक होते हुए भी उनकी चूक से वहां कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई, और इसलिए अब उनके प्रभार से सभी राज्य ले लिए जा रहे हैं।
दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह ने यह घोषणा की है कि वे छह महीने की एक नर्मदा परिक्रमा पर निकल रहे हैं, और मध्यप्रदेश से शुरू करके गुजरात तक वे एक गैरराजनीतिक पदयात्रा करेंगे जो कि उनके अपने धार्मिक और आध्यात्मिक उपयोग के लिए होगी। ऐसी खबरें हैं कि उन्होंने इसके लिए पार्टी से छह महीने की छुट्टी मांगी है, और सभी पदों से मुक्त करने का आग्रह किया है। कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि दिग्विजय सिंह अपने प्रदेश में खोई हुई जमीन वापिस पाना चाहते हैं, और वे इस यात्रा के बहाने मध्यप्रदेश और गुजरात की करीब डेढ़ सौ विधानसभा सीटों को विधानसभा चुनावों के पहले छू लेंगे, उनके भीतर से गुजरेंगे, और यह पदयात्रा भोपाल की सत्ता की तरफ वापिसी की यात्रा भी हो सकती है, जो कि अमरकंटक से गुजरात की ओर जाती तो दिखेगी, लेकिन वह अमरकंटक से भोपाल के श्यामला हिल्स पर मुख्यमंत्री निवास की तरफ जाने के मकसद से की जा रही होगी।
दिग्विजय सिंह में कुछ बात तो है जो कि उन्हें मिटने से बचाकर रखती है। वे आरएसएस और हिन्दू साम्प्रदायिकता के इतने कट्टरविरोधी हैं कि वैसी कट्टरता कांग्रेस पार्टी की नीति में भी नहीं दिखती। दूसरी तरफ वे हिन्दू-मुस्लिम सद्भावना के इतने बड़े हिमायती हैं कि वे कई मौकों पर मुस्लिम समाज को बचाते हुए उसकी चापलूसी की तोहमत भी झेल लेते हैं। आज जब पूरे देश में एक बहुत ही हिंसक और आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद फैल चुका है, और फैलाया जा रहा है, तो दिग्विजय सिंह मानो इस बिफरे हुए सांड को सींग से पकड़कर रोकने की कोशिश करते भी दिखते हैं। फिर ऐसा करते हुए उन्हें सोशल मीडिया पर लोग डॉग्विजय सिंह लिखते रहें, या कि पिग्विजय सिंह लिखते रहें, वे उसके परवाह नहीं करते। हमारा ख्याल है कि आक्रामक हिन्दुत्व और हिन्दू साम्प्रदायिकता से लडऩे के मामले में कांग्रेस पार्टी के भीतर दिग्विजय जितना हौसला और किसी का नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि वोटों की राजनीति में कांग्रेस पार्टी एक संगठन के रूप में इतनी आक्रामकता पसंद करती है, या नहीं। यह भी है कि जिस तरह दिग्विजय ने अपने आपको सत्ता से दस बरस के लिए खुद होकर बाहर कर लिया, वैसा कोई फैसला बाकी कांग्रेसी अपने खुद के बारे में कभी पसंद नहीं कर सकते। लेकिन दिग्विजय सिंह का ऐसी लंबी पदयात्रा का फैसला कांग्रेस पार्टी या कि कांग्रेसी सोच के लिए फायदे का हो सकता है, और कांग्रेस पार्टी को यह भी देखना चाहिए कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विचारधारा से मजबूत ऐसे और कौन से नेता हो सकते हैं जो कि पार्टी के लिए इस तरह की मेहनत कर सकें। भाजपा की संगठन की राजनीति में एक शब्द सुनाई पड़ता है, समयदानी। जो लोग पार्टी के काम के लिए अपने एक बरस या उससे कुछ कम समय को देने को तैयार हों। आज भाजपा तो विजयरथ पर सवार चारों तरफ फैल रही है, लेकिन अगर कांग्रेस को अपने अस्तित्व को बचाना है, तो उसे अपने संगठन में अच्छी साख वाले ऐसे समयदानी नेता ढूंढने होंगे जो कि देश के हर हिस्से में जाकर पार्टी की विचारधारा को बताएं, देश के सामने खड़े हुए मौजूदा खतरों को बताएं, और कांग्रेस की जमीन तैयार करें। इस हिसाब से दिग्विजय की यह पहल कांग्रेस के सामने एक अच्छी मिसाल भी हो सकती है कि गांव-गांव तक जाकर किस तरह लोगों से बात की जानी चाहिए।

बाढ़ से निपटने के क्या-क्या तरीके हो सकते हैं भारत में

संपादकीय
17 अगस्त 2017


भारत के बहुत से हिस्सों में हर बरस बड़ी बुरी बाढ़ आती है। और यह बाढ़ भारत के साथ-साथ बांग्लादेश में भी दिखती है जहां भारत से जुड़ी हुई नदियां पहुंचती हैं। दूसरी तरफ अभी बिहार की बाढ़ में आई हुई खबर बताती है कि नेपाल ने वहां बाढ़ को देखते हुए अपने बांध से पानी छोड़ा, और उसकी वजह से बिहार में नौबत और बुरी हो गई। अभी चीन के साथ सरहद पर जो फौजी तनाव चल रहा है, उसके चलते  ऐसी आशंका है कि हथियारों की जंग के पहले चीन वहां से पानी छोड़कर भी एक जंग शुरू कर सकता है। कुल मिलाकर बात यह है कि एक तो कुदरत की नाराजगी, और फिर पड़ोस में बसे हुए देशों से बिगड़े हुए रिश्ते, ये दोनों मिलकर बाढ़ की तबाही को और बुरा कर सकते हैं। साथ-साथ यह भी याद रखने की जरूरत है कि दुनिया में एक्स्ट्रीम वेदर कहे जाने वाली स्थितियां बढ़ती चल रही हैं, यानी अगर बारिश होती है तो अंधाधुंध हो जाती है, ठंड पड़ती है तो कई-कई फीट बर्फ शहरों को दबा देती है, और गर्मी पड़ती है तो लू में सैकड़ों लोग मरने लगते हैं। मौसम की मार के ऐसे दिन हर बरस बढ़ते चले जा रहे हैं, और यह फिक्र छोटी नहीं है, किसी एक देश तक सीमित नहीं है, और सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं है।
लेकिन पूरी दुनिया में मौसम में बदलाव को रोकना तो एक इतना बड़ा अभियान है कि जब तक अमरीका जैसे गैरजिम्मेदार देश मौसम के समझौतों को तोडऩे पर आमादा रहेंगे, तब तक बाकी दुनिया मिलकर भी इस बदलाव को पूरी तरह थाम नहीं सकती। फिर इंसान लगातार ऐसी नौबत ला रहे हैं कि उससे बाढ़ बढ़ती चले। हिन्दुस्तान में ही नदियों के आसपास के जंगल कटते चले जा रहे हैं, और उनकी जड़ों को थामकर रखने वाली मिट्टी ढीली होकर पानी में बहकर नदियों तक पहुंचने लगी है, और नदी की पानी सम्हालने की क्षमता को घटा चुकी है। नतीजा यह है कि बाढ़ बढ़ती जा रही है। फिर इंसान नदियों के किनारों को रेत के लिए खोद रहे हैं, नदियों के बहुत करीब तक जाकर शहर और बस्तियां बसा रहे हैं, और यह मानकर चल रहे हैं कि हर मानसून में सरकार और फौज आकर उन्हें बचाने का अपना जिम्मा पूरा करेंगी।
इस सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पर्यावरण के लिए खतरनाक और अच्छी दोनों तरह की समझी जाने वाली नदी जोड़ योजना पर अभी काम शुरू भी नहीं हुआ है, और भारत की सबसे बड़ी अदालत लाठी लेकर इसे पूरा करवाने में लगी हुई है। नदियों के जोडऩे से पर्यावरण पर कितना फर्क पड़ेगा, इसका अभी अंदाज नहीं है। लेकिन नुकसान से परे एक फर्क यह भी पड़ सकता है कि बाढ़ का अतिरिक्त पानी उन नदियों तक चले जाए जिनके इलाके में बाढ़ नहीं है, बिजली बनाना बढ़ जाए, सिंचाई बढ़ जाए, और हो सकता है कि जल परिवहन शुरू हो जाए। हम आज यहां इस जगह नदी जोड़ परियोजना के नफे-नुकसान पर अधिक खुलासे से चर्चा करना नहीं चाहते क्योंकि इससे बाढ़ के मौजूदा खतरे की बात धरी रह जाएगी। आज भारत में असम और बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ जितनी विकराल दिख रही है, उसका लंबे वक्त के लिए कोई इलाज ढूंढना जरूरी है। हो सकता है कि आबादी को नदियों के किनारे से कुछ दूरी पर ले जाना एक समाधान हो, दूसरा समाधान नदियों को जोडऩे से हो सकता है, और तीसरा समाधान यह हो सकता है कि जिस-जिस इलाके में बाढ़ आती है, वहां पर समय रहते जमीन के भीतर पानी को डालने का काम व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जाए ताकि बिना प्रदूषण भूजल स्तर बढ़ सके। ऐसा तो उन इलाकों में भी होना चाहिए जहां बाढ़ से अधिक तबाही नहीं आती है। जो इलाके डूबते नहीं है, वहां भी जमीन के भीतर बारिश के पानी को डालने के लिए बड़े-बड़े तालाब बनाए जाने चाहिए, और वे ऐसे रास्तों पर हों जहां से होकर पानी नदियों तक जाता है। नदियों में बाढ़ आए, और वे ही इलाके गर्मियों में सूख जाएं, यह एक अदूरदर्शिता की वजह से पैदा होने वाली नौबत है। बारिश और बाढ़ के अतिरिक्त पानी को समंदर तक जाना घटाना चाहिए, और उस पानी का जमीन के भीतर इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसी टुकड़ा-टुकड़ा बहुत सी बातें हैं जिन पर बाढ़ के दौरान सोचा-विचारा जा सकता है।

माणिक सरकार को अब त्रिपुरा के बाहर बाकी दुनिया ने भी पढ़ा

संपादकीय
16 अगस्त 2017


अबकी बार स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह पर भारत में पहली बार एक बात हुई जो कि शायद इसके पहले कभी नहीं हुई थी। त्रिपुरा के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री माणिक सरकार का भाषण दूरदर्शन ने रिकॉर्ड करने और प्रसारित करने से मना कर दिया, और मुख्यमंत्री को बता दिया गया कि उन्होंने जो बातें लिखी हैं उनके साथ उसे प्रसारित नहीं किया जा सकता। दूरदर्शन को नियंत्रित करने वाली केन्द्र सरकार की स्वायत्तशासी संस्था प्रसार भारती की तरफ से मुख्यमंत्री को बताया गया कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों के भावनाओं के अनुरूप बनाएं। माणिक सरकार ने अपने भाषण में कोई फेरबदल करने से मना कर दिया। अब उनकी पार्टी ने वह भाषण सार्वजनिक किया है, और उसके मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए।
त्रिपुरा के एक दुर्लभ साख वाले, बहुत ही किफायत और सादगी से चलने वाले, ईमानदारी के लिए मशहूर मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपने भाषण में आज देश में फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता, और गाय के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों पर किए जा रहे हमलों की चर्चा की है। उन्होंने अनेकता में एकता वाली भारत की संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा कि आज कुछ ताकतें देश को तोडऩे की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने बिना किसी पार्टी या संगठन का नाम लिए हुए यह लिखा जो लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, बल्कि अंग्रेजों के साथ मिलकर जिन्होंने आजादी के आंदोलन का विरोध किया था, आज वे लोग देश की जड़ों पर हमला करके देश को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। उनके भाषण में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद के नाम पर देश में फैलाए जा रहे तनाव के खिलाफ पूरी तरह से अहिंसक और शांतिवादी बातें कही गई हैं।
केन्द्र सरकार के हाथ महज इतना ही तो है कि दूरदर्शन या आकाशवाणी पर किसी मुख्यमंत्री के भाषण को रोक दे। इससे अधिक तो सरकार कुछ कर नहीं सकती। केन्द्र का यह रवैया भी हैरान करने वाला है जिसमें एक मुख्यमंत्री को कहा गया है कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं। यह तो अपना-अपना नजरिया है, भाजपा के कोई मुख्यमंत्री अपने नजरिए से कोई बात कह सकते हैं, वामपंथी मुख्यमंत्री का अपना नजरिया हो सकता है, और कश्मीर में महबूबा की बात किसी तीसरी तरह की हो सकती है। अगर यह कहा जाए कि वे अपने भाषण को लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं, तो यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि किन लोगों की भावनाओं के अनुरूप? माणिक सरकार का भाषण देश के अल्पसंख्यक तबके, दलित और आदिवासी तबके, गरीब और धर्मनिरपेक्ष तबके की भावना के अनुरूप है, और यह आबादी ही देश में आधी से अधिक आबादी है। देश में एक बहुत छोटी आबादी बाकी पूरी आबादी के खान-पान, उसकी देशभक्ति के पैमाने, उसकी भाषा, और उसके पहरावे पर काबू पाने में लगी है। ऐसी ताकतों के बीच माणिक सरकार ने देश को बचाने और एक बनाए रखने की एक समझदारी की बात कही है, जो कि सरकारी रेडियो-टीवी के बिना भी अहमियत रखती है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की जनता से यह सलाह मांगते दिख रहे थे कि वे लालकिले से आजादी की सालगिरह पर अपने भाषण में कौन सी बातों को शामिल करें। और दूसरी तरफ जब देश के एक सबसे अच्छे मुख्यमंत्री ने देश को एक रखने की बात कही, तो उसके भाषण को ही रोक दिया गया! प्रधानमंत्री को यह सोचने की जरूरत है कि उन्होंने सलाह मांगने का जो सार्वजनिक आव्हान किया था, उसका क्या हुआ? देश के संघीय ढांचे में एक राज्य के मुख्यमंत्री की अहिंसक और धर्मनिरपेक्ष बातों को रोक देने का अधिकार केन्द्र को कैसे मिला है, इस बारे में भी प्रधानमंत्री को इसलिए बात करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने लालकिले से भारत के ढांचे को एक कोऑपरेटिव फेडरलिज्म कहा है। अब एक मुख्यमंत्री के भाषण को रोकना किस तरह से एक सहकारी-संघवाद कहा जा सकता है? दरअसल माणिक सरकार की सोच तो उनके राज्य में लोग अच्छी तरह जानते हैं, अब उनके भाषण को रोककर केन्द्र सरकार ने पूरी दुनिया को उनकी वामपंथी सोच को जानने का मौका दिया है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों का हुआ है जिन्हें आलोचना से बचाने के लिए केन्द्र सरकार ने माणिक सरकार को रोका।

गोरखपुर की मौतों से निकलते हुए सबक

संपादकीय
14 अगस्त 2017


गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में पिछले दो दिनों से हमने काफी कुछ लिखा है, लेकिन आज कुछ और बातें हैं जिन पर लिखना जरूरी है। उत्तरप्रदेश के सांसद वरूण गांधी ने इस हादसे को देखते हुए अपने संसदीय क्षेत्र सुल्तानपुर में सांसद निधि के पांच करोड़ रुपये देकर तुरंत ही एक बाल चिकित्सा केंद्र का काम शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि वे इस काम के लिए अलग-अलग कंपनियों के सामाजिक सरोकार मद से पांच करोड़ रुपये  और जुटाएंगे। इस बात पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि गोरखपुर न केवल उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मठ वाला शहर है, बल्कि वे लगातार पांच बार वहां से सांसद रहे और अब सांसद रहते-रहते मुख्यमंत्री भी बने। अब अगर वे ताजा मौतों को लेकर यह सफाई दे रहे हैं कि यह इलाका हमेशा से ही बीमारियों की वजह से ऐसी मौतों वाला रहा है, तो सवाल यह उठता है कि इतने बरसों तक लगातार सांसद रहते हुए वे अब तक इस बारे में पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर पाए थे? उनके पांच बार के सांसद कार्यकाल में तो पहले भी छह बरस अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केंद्र में थी, और वाजपेयी खुद भी उत्तरप्रदेश से ही सांसद थे। अब अगर सत्ता की इतनी ताकत के रहते हुए योगी आदित्यनाथ अपने ही शहर के लिए कुछ नहीं कर पाए थे, तो इससे उनकी क्षमता पता लगती है। वे सांसद रहते हुए भी हिंदू-मुस्लिम पे्रम संबंधों के खिलाफ एक हिंसक और हमलावर अभियान के अगुवा रहते आए हैं, और उनका निजी संगठन आज भी भाजपा सरकार के रहते हुए भी अलग से एक साम्प्रदायिक और हिंसक कार्रवाई चलाते रहता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका एक साम्प्रदायिक एजेंडा चल रहा है जिसके तहत उत्तरप्रदेश के हर मदरसे को आजादी की सालगिरह पर झंडा फहराकर अपनी देशभक्ति का वीडियो सुबूत बनाकर सरकार को देना है। जाहिर है कि अपने इलाके के बीमार बच्चों, या कि वहां हर बरस फैलने वाली दूसरी बीमारियों को रोकने के बजाय योगी का ध्यान हिंदुत्व को लागू करवाने में लगा हुआ था। आज ही एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह गोरखपुर में ही इंसेफलाइटिस से विकलांग मरीजों के इलाज और पुनर्वास के लिए बने विभाग के ग्यारह कर्मचारियों को सत्ताईस महीने से वेतन नहीं मिला, और वहां से तीन डॉक्टर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। यह हाल केंद्र में मोदी की पार्टी की सरकार आने के तीन बरस बाद का है, उत्तरप्रदेश से नरेन्द्र मोदी के सांसद बनने के ढाई बरस बाद का है, और योगी के मुख्यमंत्री बन जाने के आधे बरस बाद का तो है ही।
हम वरूण गांधी की खबर को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि किसी एक जगह अगर आग लगती है, तो बाकी लोगों को भी अपने-अपने घर संभाल लेने चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।

परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है..

संपादकीय
13 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में जिस तरह ऑक्सीजन की कमी से साठ या अधिक बच्चे दो-चार दिनों में मारे गए हैं, वह मामला एक न्यायिक जांच से कम का नहीं है, लेकिन न तो उत्तरप्रदेश सरकार इसकी परवाह कर रही, न ही उत्तरप्रदेश में हाईकोर्ट ने खुद होकर इसका कोई संज्ञान लिया, सरकार से जवाब मांगा, या कि किसी जांच का आदेश दिया। केन्द्र सरकार का रूख भाजपा के राज वाले प्रदेशों में बड़ा साफ है कि जितनी मौतों पर प्रधानमंत्री दुनिया के किसी और देश के लिए भी हमदर्दी ट्वीट कर देते हैं, उससे दस गुना मौतें भी अगर भाजपा राज में हो जाएं, तो वे चुप्पी साधे रहते हैं। यह सिलसिला देश के लोगों को बहुत विचलित कर रहा है, और परंपरागत मालिकाना हक वाले मीडिया से परे आज देश और दुनिया में बागी तेवरों वाला और अभूतपूर्व आजादी वाला जो सोशल मीडिया अतिसक्रिय है, वह इन बातों पर गौर कर रहा है। उस पर बागी तेवर भी दिखते हैं, बिके हुए तेवर भी दिखते हैं, और गुलाम तेवर भी देखते हैं। इन तमाम पहलुओं के पूर्वाग्रहों के साथ सोशल मीडिया पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह सत्ता और मीडिया के एकाधिकार को एक बड़ी चुनौती है, और बेजा इस्तेमाल के तमाम खतरों के बीच भी सोशल मीडिया आजादी की ताजी हवा का एक झोंका बना हुआ है।
जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, और भाजपा के अश्वमेधी घोड़े की लगाम थामने को अब हाथ नहीं बचे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि चुनावों से परे लोकतंत्र इतिहास दर्ज करते चलता है। चुनाव का इतिहास तो चुनाव आयोग दर्ज कर देता है, वह बहुत मेहनत का काम भी नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र की बाकी बातों, बाकी पहलुओं का इतिहास बहुत सी ताकतें, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब बहुत से कमजोर तबके भी, लिखते हैं, और लिख रहे हैं। लोग यह भी देख रहे हैं कि किस तरह कल लाशों के बीच किसी एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती मंच पर जोर-जोर से हॅंस रहे थे। लाशों के बीच की यह हॅंसी महज एक तस्वीर से ही दर्ज हो जाती है, और उसके लिए वामपंथी या दक्षिणपंथी इतिहासकारों की जरूरत नहीं पड़ती। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि ऐसी ही हॅंसी बिलासपुर की नसबंदी मौतों की लाशों के बीच उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की भी दर्ज हुई थी, और मुख्यमंत्री जब दम तोड़ती महिलाओं से बात कर रहे थे, तब सरकारी अस्पताल के वार्ड में स्वास्थ्य मंत्री देर तक जोरों से हॅंसते जा रहे थे। उस वीडियो को किसी और टिप्पणी या इतिहास लेखन की जरूरत नहीं थी।
लेकिन सोशल मीडिया की सारी मौजूदगी के बीच भी हैरानी इस बात की है कि उत्तरप्रदेश के मंत्रियों से लेकर केन्द्र सरकार के भाजपा मंत्रियों तक के पास इस बात का भारी हौसला बचा है कि गोरखपुर में बच्चों की लाश थामे रोते-बिलखते मां-बाप के दिलों के जख्म पर और नमक छिड़कें। इन मंत्रियों और नेताओं के बयान अगर सुनें, तो ऐसा लगता है कि जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह तो इनके भीतर बाकी ही नहीं है, और वह सामान्य समझ भी बाकी नहीं है कि इस चुनावी दुनिया में जिंदा रहने के लिए जिस जनता की जरूरत इंदिरा से लेकर मोदी तक हर किसी को पड़ती है, उस जनता की भावनाओं को बिना वजह अपने बूटों से कुचलते जाना समझदारी नहीं है। इतिहास ऐसी छोटी-छोटी वीडियो क्लिप भी अब सम्हालकर रख रहा है, प्रधानमंत्री सहित बाकी लोगों की चुप्पी को सम्हालकर रख रहा है, और दम तोड़ते बच्चों की सांसों की कीमत पर आक्सीजन-कमीशनखोरी करते योगी के अफसरों को भी दर्ज कर रहा है। इन मौतों के कुछ ही घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बेटी के कुछ महीने बाद भारत आने की तारीख तय होने पर ट्वीट करके उनका स्वागत किया था। गोरखपुर में दर्जनों नवजात बच्चों की ऐसी अकाल मौत पर हमदर्दी ट्वीट न करके वे उत्तरप्रदेश की अपनी सरकार की मदद नहीं कर रहे हैं, खुद अपनी चुप्पी को अपने ही हाथों इतिहास में दर्ज कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया के मार्फत लिखा जा रहा इतिहास अब तक के परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है।

उप्र में ऑक्सीजन दलाली के चलते दर्जनों मौतें, हत्यारे कौन?

संपादकीय
12 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हास्पिटल में ऑक्सीजन सप्लायर का भुगतान नहीं हुआ तो उसने कई नोटिसों के बाद ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी, और इस वजह से वहां भर्ती तीन दर्जन बच्चों की मौत पिछले दो दिनों में हो चुकी है, और कुल मिलाकर पिछले चार-पांच दिनों में साठ के करीब मौतों का अंदाज है। खुद भाजपा के सांसद और नेता इसे सरकारी लापरवाही मान रहे हैं, और हत्या का मुकदमा चलाने की बात कह रहे हैं, लेकिन कुछ और लोगों का यह भी कहना है कि सप्लायर से कमीशन और दलाली पर मुख्यमंत्री के करीबी लोग मोल-भाव कर रहे थे और इसी की वजह से भुगतान रोका गया था, और बड़ी संख्या में यह मौतें हुईं। यह मामला इतना भयानक है कि दो दिन बाद आजादी की सालगिरह उत्तरप्रदेश में मनाई जाए या न मनाई जाए, इस बारे में सोचना चाहिए। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक रूप से देश की जनता से यह मांग रहे हैं कि वे किन-किन मुद्दों पर लालकिले से बोलें, इस पर जनता राय दे। इससे बड़ी और राय क्या हो सकती है कि देश में भाजपा के राज वाले कई राज्यों में अस्पतालों में थोक में ऐसी मौतें हुई हैं, वे कम से कम अपनी पार्टी के राज पर तो बोल ही दें।
दरअसल सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी कल ही बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।
छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है। प्रधानमंत्री को पूरे देश के राज्यों को सचेत करना चाहिए, और खासकर अपनी पार्टी के राज वाले प्रदेशों को तो सबसे पहले। आज उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ इसमें लगे हुए हैं कि वहां के मदरसे तिरंगा फहराते हैं या नहीं, और उसका वीडियो बनाकर अपनी देशभक्ति का सुबूत भेजते हैं या नहीं। हमारे हिसाब से ऑक्सीजन के दलाल हत्यारों से कम नहीं हैं, देशद्रोही से कम नहीं हैं, और उन्हीं को पहले सजा हो जाए, मदरसों की देशभक्ति बाद में नापी-तौली जाए।

सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती होती है

संपादकीय
11 अगस्त 2017


हरियाणा के भाजपाध्यक्ष का बेटा दारू के नशे में साथियों के साथ कार में एक  लड़की का पीछा करने और उसके अपहरण की कोशिश में गिरफ्तार है, और हरियाणा के मुख्यमंत्री की शुरुआती प्रतिक्रिया मुजरिम दिखते शराबी नौजवान के खिलाफ होने के बजाय उसके पिता को बेकसूर ठहराने वाली सामने आई है। यह बात अपनी जगह सही है कि किसी बालिग औलाद के लिए मां-बाप जिम्मेदार नहीं होते, लेकिन यह बात भी सही है कि संविधान की शपथ लेकर सरकार चलाने वाले किसी इंसान को मुजरिम को सजा दिलाने की बात कहनी चाहिए, उसे बचाने वाली नहीं।
लेकिन यह बचाना बड़ा आम हो चुका है। देश में जगह-जगह कई पार्टियों के लोग अपने नेताओं को, और अपने कुनबों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाते हैं। पड़ोस के मध्यप्रदेश को ही देखें, तो वहां वेश्याएं मुहैया कराने के सेक्स-कारोबार में फंसे हुए और गिरफ्तार हुए भाजपा नेता से लेकर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करते गिरफ्तार भाजपा नेताओं तक एक लंबा सिलसिला सामने आया है, लेकिन भाजपा ने अपने इन कुलकलंकों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा है। ऐसा न कहना उनको बचाने सरीखा है। दूसरी तरफ अगर ये काम करने वाले कोई मुस्लिम होते, तो उन्हें मध्यप्रदेश के भाजपा नेता कूद-कूदकर पीटते और देशद्रोही करार देते, भारत की संस्कृति तबाह करने वाला बताते। लेकिन गोमांस बेचने वाले भी कुछ लोग भाजपा के निकले हैं, कुछ लोग नकली नोट छापने और चलाने वाले भी निकले हैं, लेकिन पार्टी ने इनके खिलाफ कुछ नहीं कहा। मोटेतौर पर यही हाल बाकी पार्टियों का है, और ऐसे में यह देखकर हैरानी होती है कि किस तरह सीपीएम ने बंगाल में अपने एक नेता को इसलिए निलंबित कर दिया कि वह एक महंगा मोबाइल इस्तेमाल करता था। आज तो बाकी किसी भी पार्टी में लोग लाखों-करोड़ों की घडिय़ां पहनकर घूमें तो भी उनकी पार्टी को उससे कोई दिक्कत नहीं होती, वे एयरपोर्ट या दूसरी जगहों पर सरकारी कर्मचारियों को पीटें तो भी उनको कोई दिक्कत नहीं होती है।
ऐसी बददिमागी, गुंडागर्दी, और जुर्म के लिए जो हौसला सत्ता से मिलता है, वही हौसला लोगों को तबाही तक ले जाता है। पूरे देश में जगह-जगह राजनीतिक दलों के नेताओं ने भ्रष्टाचार की छूट मिलने को इतने बड़े-बड़े भ्रष्टाचार किए कि वे उनकी अगली पूरी सदी की राजनीतिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से अधिक की दौलत और जायदाद जुटाने वाले रहे, और उसी चक्कर में वे जेल भी पहुंच गए, सजा भी काट रहे हैं। जिस चौटाला कुनबे की अरबों-खरबों की दौलत है, उसके मुख्यमंत्री रहे हुए मुखिया जेल में सजा काट रहे हैं, तमिलनाडू की शशिकला कर्नाटक की जेल में बंद हैं। राजनीति में भ्रष्ट पैसे की कुछ जरूरत तो हो सकती है, अगर ईमानदारी से चुनाव लडऩे का हौसला न हो तो। लेकिन ऐसी मजबूरी किसी की नहीं रहती। ऐसे में सत्ता की बददिमागी सिर चढ़कर बोलती है, और मां-बाप भ्रष्ट रहते हैं, आल-औलाद गुंडागर्दी पर उतर आती है, और सौ में से चाहे एक ही सही, सारी ताकत के बावजूद जेल की कैद तक पहुंच ही जाते हैं। अगली सौ पीढ़ी के लिए जमा की गई दौलत धरी रह जाती है, और एक मामले में पुख्ता सुबूत, ईमानदार जज आ जाने से वह पूरी दौलत किसी ताकत की नहीं रह जाती।
जो लोग सत्ता की ताकत से जुर्म करते चलते हैं, उनको याद रखना चाहिए कि अगर कानून एक बार भी ठीक से काम कर बैठा हो, तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे। लेकिन सत्ता से ऐसी बददिमागी आती है कि लोगों को यह लगता ही नहीं कि उनके बुरे दिन भी कभी आ सकते हैं, कभी उनके मामलों पर कार्रवाई करने वालों अफसर या जज ईमानदार भी निकल सकते हैं, या कि कोई ऐसे गवाह भी हो सकते हैं जिन्हें धमकाना या खरीदना मुमकिन न हो। मध्यप्रदेश में सत्ता की सारी ताकत मिलकर भी व्यापम घोटाला फूटने से रोक नहीं पाई। सत्ता के कई लोग सरकार की लाख कोशिश के बावजूद जेल चले गए, हालांकि सत्ता से जुड़ी रहस्यमय ताकतों की इतनी कामयाबी तो सामने आई कि इस मामले से जुड़े हुए पचास लोग अब तक रहस्यमय तरीके से मर चुके हैं, या कि मार डाले गए हैं। इस पूरे सिलसिले से हम केवल यही एक नतीजा निकालना चाहते हैं कि सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती साबित होती है।

शरद यादव के सामने आ खड़ा है एक ऐतिहासिक मौका

संपादकीय
10 अगस्त 2017


बिहार में सत्तारूढ़ जदयू के भीतर की बेचैनी अब किसी किनारे लगते दिख रही है। वहां पर पार्टी के सबसे ताकतवर नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार भाजपा के साथ उनकी ताकत तो कम नहीं होगी, लेकिन पार्टी के सबसे बड़े राष्ट्रीय स्तर के वैचारिक स्तंभ शरद यादव अगर पार्टी के बाहर निकलकर भाजपा-एनडीए विरोधी विपक्ष के लिए खुला काम करते हैं, तो इससे एक वैकल्पिक विपक्ष मजबूत होकर सामने आने की संभावना बन सकती है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही इन्हीं नीतीश कुमार को मोदी के मुकाबले संयुक्त विपक्ष का एक संभावित नेता माना जा रहा था, फिर अचानक बिहार की सत्ता से लालू को बाहर करने के लिए नीतीश ने भाजपा का दामन थाम लिया, और कुछ घंटों के भीतर ही वे सीएम की कुर्सी छोड़कर फिर सीएम की कुर्सी पर बैठ गए, और दलबदल या सत्ता पलट की एक बिल्कुल ही अभूतपूर्व मिसाल पेश की थी, और उनकी पार्टी के ही शरद यादव इस फैसले को टीवी पर ही देख पा रहे थे, रूबरू नहीं। ऐसे में शरद यादव ने अपने कुछ तेवर नीतीश के फैसले के खिलाफ दिखाए हैं, और गुजरात के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के खिलाफ कांग्रेस को वोट देने के लिए अपने समर्थक जेडीयू विधायक को कहा।
शरद यादव एनडीए सरकार में रह चुके हैं, नीतीश कुमार के साथ-साथ। इसलिए यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि वे भाजपा से ऐसे परहेजी हैं कि उसके साथ बैठ भी नहीं सकते, लेकिन भारत की राजनीति यह बताती है कि पिछली एनडीए सरकार के वक्त की वाजपेयी की भाजपा, और आज मोदी-शाह की भाजपा में लोग बड़ा फर्क देखते हैं। बिहार में ही नीतीश कुमार ने पिछले चुनाव के वक्त भाजपा से नाता तोड़कर अपने धुरविरोधी लालू यादव से गठबंधन इसी मुद्दे पर किया था कि वे मोदी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। लेकिन उन्होंने कोई ऐसी एंटी एलर्जिक दवा पा ली है कि अब वे मोदी को भारत का अगला भविष्य भी देख रहे हैं, और शरद यादव इस नौबत को मान नहीं पा रहे हैं। ऐसे में वे अब तक ऐसी संभावनाओं की चर्चा का लालच छोड़कर बाहर बैठे हुए हैं कि बिहार के गठबंधन के केन्द्र में विस्तार के रूप में उन्हें भी केन्द्रीय मंत्री बनाया जा सकता है। शरद यादव सत्तर बरस की उम्र में अब सत्ता के मोह को छोड़कर सैद्धांतिक राजनीति भी कर सकते हैं, और उनके आगे आने से एनडीए-विरोधी एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बन सकता है, जो कि आज कांग्रेस की अगुवाई में नहीं बन सकता। नीतीश कुमार ने बहुत ही पाखंडी नारों के साथ भाजपा से गठबंधन किया है कि वे लालू के भ्रष्टाचार के साथ रह नहीं पा रहे थे, यह अलग बात है कि एनडीए में बादल कुनबा वैसी ही साख वाला कुनबापरस्त और भ्रष्टाचारजीवी परिवार है, और उससे भी बढ़कर अब जया-शशिकला का अन्नाद्रमुक भी एनडीए में आते दिख रहा है।
देश की राजनीति में गठबंधनों का ध्रुवीकरण लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है, और शरद यादव के सभी दलों के साथ ऐसे दोस्ताना संबंध हैं कि कांग्रेसियों से लेकर वामपंथियों तक, और छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियों तक से वे बात कर सकते हैं। हमारा ख्याल है कि देश की राजनीति पर एनडीए और मोदी के एकाधिकार के मुकाबले ऐसी एक राजनीतिक एकजुटता लोकतंत्र के शक्ति संतुलन में मदद करेगी, और आज शरद यादव के अलावा किसी दूसरे में ऐसी संभावना नहीं दिख रही है। यह उनके सामने एक ऐतिहासिक मौका है, और यह बात पहली बार हम नहीं लिख रहे हैं, बल्कि कुछ और राजनीतिक विश्लेषक लिख चुके हैं कि नीतीश देश के दूसरे जयप्रकाश नारायण बन सकते हैं जो खुद सत्ता में न आकर देश की सत्ता के खिलाफ एक बहुत बड़ा जनमोर्चा खड़ा करने का इतिहास बना चुके हैं। जब भी किसी की मिसाल किसी दूसरे पर लागू की जाती है, तो वह खतरे भी खड़े करती है, इसलिए हम ऐसी मिसाल पर जोर देने के बजाय बस इतना ही कहना चाहते हैं कि शरद यादव को उनके सामने अनायास पेश हो गए इस मौके पर भारतीय लोकतंत्र के लिए अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए।

गुजरात की राज्यसभा सीट, एक अनैतिक और अवांछित लड़ाई में भाजपा की शिकस्त

संपादकीय
9 अगस्त 2017


गुजरात की एक राज्यसभा सीट के लिए भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रदेश में इतना बड़ा दांव लगाया था कि उस बाजी की शिकस्त पार्टी के मुंह में कड़वाहट छोड़ गई है। विधानसभा के भीतर विधायकों की गिनती के मुताबिक भाजपा से दो लोगों को राज्यसभा के लिए चुना जाना था, और वे अमित शाह और स्मृति ईरानी रहे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दशकों के राजनीतिक सचिव रहे और लंबे समय से राज्यसभा में बने आ रहे अमहद पटेल को राज्यसभा में आने से रोकने के लिए भाजपा ने मानो अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यह पार्टी के लिए एक बहुत ही खोखला कदम था कि कांग्रेस से बगावत करके बाहर आने वाले एक विधायक को भाजपा ने आनन-फानन अपना राज्यसभा उम्मीदवार बना दिया। यह एक वैचारिक और सैद्धांतिक दीवालियापन भी था, और आज अपने को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भाजपा की एक बहुत ही सतही और सस्ती अवसरवादिता भी थी। देश की संसद के जिस उच्च सदन को देश के सबसे अच्छे लोगों की सेवाएं पाने के लिए बनाया गया था, उसकी दुर्गति तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन कल के कांग्रेस विधायक और आज के भाजपा राज्यसभा प्रत्याशी, चौबीस घंटे के भीतर बदले ये राजनीतिक रंग बहुत ही स्तरहीन थे, और इन्हें भाजपा ने सोच-समझकर एक बड़े दांव की तरह खेला था। इसके बाद की विधायकों की खरीद-फरोख्त को हम अधिक वजन नहीं देते क्योंकि वामपंथियों के अलावा देश की अधिकतर पार्टियां ऐसी खरीदी करती रही हैं, और अधिकतर पार्टियों के सांसद और विधायक अंतरात्मा की ऐसी बिक्री करते आए हैं। ऐसे में भाजपा की इस मंडी में अगर आज के सबसे बड़े खरीददार की तरह थैली लिए खड़ी थी, तो वह ऐसा करने वाली न तो पहली पार्टी थी, और न ही आखिरी पार्टी रहेगी। लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा के संदर्भ में सैद्धांतिक शुचिता की बात अडवानी-युग के साथ चल बसी है, और प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए भाजपा अपने ही दिग्गजों को छोड़कर कल के दलबदलू को आज सिर पर बिठाने को बेताब है, अगर इससे उसे कोई तात्कालिक फायदा होता है। और भाजपा ने यह रूख जगह-जगह अलग-अलग राज्यों के चुनावों में दिखाया है, और म्युनिसिपल चुनावों तक उसने अपनी पार्टी के पुराने निष्ठावानों को कचरे की टोकरी में डालकर नवजात दलबदलू को सिर पर बिठाया है। यह बात भाजपा को आनन-फानन सीटें तो दिला पाई है, लेकिन इससे एक राष्ट्रीय पार्टी की नैतिकता की इज्जत मिट्टी में मिल गई है। लेकिन अब गुजरात में नैतिकता भी गई, और दांव भी डूब गया। यह एक अलग बात है कि यह पूरे का पूरा दांव दूसरी पार्टी के बेईमानों और दगाबाजों के भरोसे पर लगाया गया था।
गुजरात में जिस अंदाज में भाजपा ने कांग्रेस में तोडफ़ोड़ करवाई, या कि उसमें हुई बगावत को दुहने की कोशिश की, उसमें उसे एक बड़ी मात हुई है। अगर वह अपनी सारी ताकत के साथ अहमद पटेल को हरा भी देती, तो भी सोनिया गांधी, कांग्रेस, और अमहद पटेल की उतनी बेइज्जती न हुई होती, जितनी आज एक पूरी तरह अवांछित लड़ाई को छेड़कर भाजपा ने हासिल की है। और देश में कांग्रेस के बहुत से शुभचिंतकों का यह मानना है कि अगर अहमद पटेल हार गए होते, तो कांग्रेस जीत जाती, और सोनिया गांधी को शायद कोई ऐसा दूसरा सलाहकार बनाना सूझता जो कि पार्टी को और गर्त में डूबने से बचा पाता। लेकिन अहमद पटेल की वापिसी से कांग्रेस की पुनर्जीवन की संभावनाएं भी खत्म हो गई है।
लोकतंत्र में एक राजनीतिक दल की इज्जत महज जीत नहीं होती है, ईमानदारी और सिद्धांतवाद की जीत उसके लिए जरूरी भी होती है। ऐसे में तमाम अनैतिक तरीकों के इस्तेमाल से इस देश की राजनीति में एक वक्त कांग्रेस जो करती थी, भाजपा अब उससे सौ कदम आगे बढ़कर कर रही है। यह सिलसिला गुजरात की इस एक राज्यसभा सीट से कहीं आगे की शर्मिंदगी भाजपा को दिला चुका है, और इस पार्टी को गंभीरता से अपनी साख सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। कांग्रेस की राजनीति में सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द अहमद पटेल को सत्ता का एक सबसे बड़ा सौदेबाज माना जाता रहा है, और राजनेता के रूप में उनकी साख फूटी कौड़ी की नहीं रही। जब कांग्रेस की अगुवाई की सरकार रही तो उसके सबसे बड़े आर्थिक फैसलों की राह अहमद पटेल से होकर ही गुजरती थी, और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष को भी लोग महज गिनने वाला मानते थे, बड़े लेन-देन के लिए अहमद पटेल का ही नाम रहता था। इन बातों की हकीकत सोनिया और पटेल ही बता सकते हैं, लेकिन वामपंथियों को छोड़कर देश की तमाम पार्टियों में कोई न कोई अहमद पटेल तो रहते ही हैं। इसलिए ऐसा काम करने वाले को हराने के लिए भाजपा का इतना बड़ा दांव बेकार गया, यह पूरी तरह अवांछित था, और इसमें जीत से भी भाजपा की बदनामी ही होती कि उसने खरीद-बिक्री करके या धमकाकर विधायकों को मोड़ा, और इस बाजी में हारकर तो भाजपा की बड़ी ही किरकिरी हुई है। यह बात बाकी राजनीतिक दलों के सामने भी एक सबक की तरह खड़ी है कि लोगों को अनैतिक और अवांछित लड़ाई नहीं छेडऩी चाहिए, जीतने के लिए भी नहीं। आज नौबत यह है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी दोनों राज्यसभा सीट जीतकर भी खुशी मनाने की हालत में नहीं हैं।

विश्व आदिवासी दिवस पर दो तकलीफदेह मामले

संपादकीय
8 अगस्त 2017


कल नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है, और दुनिया के तमाम देशों में मूल निवासियों के मुद्दों पर चर्चा होगी। लेकिन यह छत्तीसगढ़ के लिए एक बुरा संयोग है, या कि दुर्याेग है कि राज्य के दो आदिवासी-मामलों पर मीडिया में अप्रिय चर्चा चल रही है। इनमें से एक तो अभी कल की ही है जब आदिवासी बस्तर के नक्सलग्रस्त दंतेवाड़ा जिले के एक गांव में कन्या छात्रावास में प्रशासन और पुलिस के लोग सीआरपीएफ के जवानों को ले गए ताकि छात्राएं उनको राखी बांध सकें, और उन्हें यह भरोसा हो कि सुरक्षा बल उनकी रक्षा करते हैं। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा, और छात्राओं ने यह शिकायत दर्ज कराई है कि उनके पीछे-पीछे सीआरपीएफ जवान शौचालय में पहुंच गए, और उनका यौन शोषण किया। यह बहुत ही गंभीर मामला इसलिए है कि राखी का यह पाखंड अफसरों द्वारा प्रायोजित था, और उनकी निगरानी में हो रहा था। ऐसे में यह जाहिर है कि अकेले में मिलने वाली लड़कियों या महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों द्वारा शारीरिक बदसलूकी करने की शिकायतों में से कुछ तो सही होती ही होंगी। बस्तर में नक्सलग्रस्त इलाकों में मुसाफिर बसों में चलने वाली महिलाओं की भी यह शिकायत रहती है कि सुरक्षा बल बसों में घुस जाते हैं और तलाशी लेने के नाम पर उनके बदन टटोलते हैं। यह बहुत ही अप्रिय मौका है जब प्रदेश को आदिवासी मुद्दों पर कोई सकारात्मक चर्चा करनी थी, और ऐसी नकारात्मक खबरों से मीडिया पटा हुआ है।
दूसरी घटना जेल के एक मंझले दर्जे के आदिवासी अफसर की है जिसे विभाग ने अभी चार दिन पहले निलंबित कर दिया है। इस पर यह तोहमत है कि उसने अपने फेसबुक पेज पर यह पोस्ट किया था कि हर आदिवासी नक्सली नहीं होते। इस बात को राज्य सरकार की आलोचना मानते हुए इसे नोटिस दिया गया, और जवाब न मिलने की बात कहते हुए इसे निलंबित कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि कुछ महीने पहले जेल की एक और नई-नई अफसर को भी निलंबित किया गया था जिसने जेलों में लाकर बंद की जाने वाली और नक्सल होने के आरोप वाली महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों के बलात्कार की आपबीती घटनाओं को लिखा था। इसे भी सरकार की कड़ी आलोचना मानते हुए इसे निलंबित किया गया था। हमने इस निलंबन के मौके पर भी लिखा था कि इस महिला अधिकारी को उसे पता लगी बातें सरकार की जानकारी लानी चाहिए थीं, बजाय उन्हें पहले सोशल मीडिया पर लिखने के।
अब उस महिला अधिकारी का निलंबन तो हो गया, लेकिन उसकी कही बातों पर कोई जांच राज्य सरकार ने शुरू नहीं की, जो कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारी बनती है। जब भी कोई ऐसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, और खासकर एक सरकारी अफसर ने उसे बताई हुई बातों को लिखा था, तो यह सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी बनती थी कि उन बातों की जांच करवाई जाती। लेकिन उस अफसर को निलंबित करने के साथ मानो वह पूरा मामला खत्म हो गया था, और उसके उठाए मुद्दे भी दफन हो गए।
राज्य सरकार ने आदिवासी मुद्दों को लेकर संवेदनशीलता की जरूरत है। अपने अफसरों को निलंबित करना तो ठीक है, लेकिन सरकार को इस हकीकत को मानना होगा कि जुल्म और ज्यादती के, हत्या और बलात्कार के आरोपों को अनसुना करके सरकार आदिवासियों को नक्सलियों की तरफ धकेलने के अलावा और कुछ नहीं कर रही। बस्तर में सीआरपीएफ या बाकी सुरक्षा बलों की जनता में साख खराब है, और उन्हें कन्या छात्रावास में ले जाने का अफसरों का फैसला ही गलत था। इसके बाद जब वहां पर सुरक्षा कर्मचारी छात्राओं का यौन शोषण करने लगे, तो भी शुरू में बड़े अफसरों ने इस मामले को दबाने की कोशिश की। कल आदिवासी दिवस पर अगर कोई सार्थक चर्चा इस प्रदेश में होनी है, तो वह आदिवासियों पर ऐसे जुल्म को रोकने केे बारे में होनी चाहिए। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ की संवैधानिक संस्थाओं से लेकर बस्तर के आदिवासी मंत्री-सांसद और विधायकों तक ने गजब की चुप्पी साध रखी है, और ऐसा लगता है कि मानो मीडिया ही लोकतंत्र की जिम्मेदारी पूरी कर रहा है।

रक्षाबंधन, गैरबराबरी के रिवाज से निकली परंपरा

संपादकीय
7 अगस्त 2017


आज देश भर में जगह-जगह लोग धर्म और जाति से परे, और पारिवारिक रिश्तों से भी परे राखी का त्यौहार मना रहे हैं। राखी का शायद किसी धर्म में कोई उल्लेख नहीं है, और यह मोटे तौर पर एक सामाजिक परंपरा के रूप में चले आ रहा त्यौहार है। राखी, या रक्षाबंधन, यह भाई-बहन के बीच का रिश्ता पुख्ता करने का एक मौका रहता है जिस दिन कोर्ट-कचहरी में आपस में मुकदमा लड़ रहे भाई-बहन भी एक साथ जुट जाते हैं, और बहन इस उम्मीद के साथ भाई को राखी बांधती है कि वह मुसीबत में उसकी रक्षा करेगा। भारत की सामाजिक व्यवस्था में आमतौर पर यह भी चले आता है कि बूढ़े मां-बाप बेटे के पास रहते हैं क्योंकि अधिकतर समाजों में बेटियां शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं। ऐसे में मां-बाप से लेकर बहन तक से रिश्ता रखना भाई के जिम्मे ही आता है। यह एक अलग बात है कि बहुत से बूढ़े मां-बाप ऐसे रहते हैं जिनका ख्याल रखने के लिए केवल बेटियां ही रह जाती हैं, और बेटे जिम्मेदारी से हाथ धो लेते हैं। ऐसे बेटों से उनकी बहनों को भी किस तरह की हिफाजत या मद मिल सकती है, यह सोचना अधिक मुश्किल नहीं है। आज ही इसी वक्त मुंबई की एक खबर आ रही है कि अमरीका से आया एक बेटा जब अपनी बूढ़ी और अकेली रह गई मां से मिलने के लिए घर पहुंचा तो पता लगा कि मां तो कई दिनों की मरी पड़ी है। दरवाजा तोड़कर मां को ऐसे हाल में देखने वाले बेटे ने पिछले डेढ़ बरस से मां से फोन पर भी बात नहीं की थी। यह एक अलग बात है कि अब मां का करोड़ों का मकान बेटे का ही होगा।
दरअसल राखी को लेकर सदियों से चली आ रही यह सोच आज सामाजिक समानता के पैमाने पर अटपटी लगती है कि भाई ही बहन की हिफाजत करेगा। इस रिवाज की एक बड़ी खामी यह है कि महिला को कमजोर माना जाता है, और यह माना जाता है कि उसकी हिफाजत के लिए बाप-भाई, या पति जैसे किसी एक पुरूष की जरूरत होती है। रक्षाबंधन अगर दोनों के बीच एक-दूसरे की बराबरी से हिफाजत का बंधन होता, तो शायद यह एक बेहतर रिवाज होता। लेकिन जिस तरह भारत में महिला को सुहाग की निशानी के नाम पर सिंदूर से लेकर मंगलसूत्र तक, और तरह-तरह की चूडिय़ों से लेकर बिंदी तक सबको ढोना पड़ता है, उसी तरह उसे भाई या किसी और पुरूष से हिफाजत की गारंटी भी लेकर चलना पड़ता है। इस रिवाज में यह फेरबदल करने की जरूरत है क्योंकि आज बहुत सी बहनें भी अपने बेरोजगार, या बीमार भाई की जिम्मेदारी ढोती हैं, और उस भाई की सामाजिक जिम्मेदारी, माता-पिता को भी ढोती हैं।
भारत के अधिकतर रीति-रिवाज महिलाओं को कमजोर या आश्रित बनाने वाले रहते हैं। उनकी बुनियाद इस बात पर रखी जाती है कि वे पुरूषों से कमजोर रहती हैं, और उन्हें लगातार पुरूष की हिफाजत चाहिए ही चाहिए। लोगों को याद होगा कि जिस हरियाणा में दो दिन पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बेटे ने एक युवती से छेडख़ानी करके खतरनाक अंदाज में उसका पीछा किया, उसी हरियाणा में मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल खट्टर ने अपने चुनाव प्रचार में यह कहा था कि जिन महिलाओं को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं निकल जातीं? ऐसी सोच वाले हरियाणा में जाहिर है कि सत्तारूढ़ भाजपा के बड़े-बड़े नेता, प्रदेशाध्यक्ष, का बेटा यह मानकर चल रहा होगा कि रात में अगर कोई लड़की कार से भी अकेले जा रही है, तो उसे नंगा करना उसका बुनियादी हक है। आज वही मुख्यमंत्री वहां की बच्चियों से राखी बंधवा रहे हैं, और उन्हें एक तरह से उनकी रक्षा की जिम्मेदारी ले रहे हैं। संस्कृति के ऐसे ठेकेदार पूरे राज्य के संवैधानिक जिम्मे को उठाने का हक तो रखते नहीं, आज वे राखी जरूर बंधवा रहे हैं। इस तरह जब निजी संबंधों के एक धागे का सार्वजनिककरण कर दिया गया है, तो उसका महत्व भी खत्म कर दिया गया है। रक्षाबंधन को आज के हालात देखते हुए दुबारा परिभाषित करने की जरूरत है।

न चीन की तरह सस्ता, न ही एप्पल की तरह बढिय़ा...

संपादकीय
6 अगस्त 2017


अमरीका की एक खबर है कि वहां एप्पल कंपनी का मुनाफा बढऩे से किस तरह उसके शेयर रखने वाले दुनिया के एक सबसे बड़े पूंजीनिवेशक वारेन बफे को रातों-रात दसियों अरब की कमाई हो गई। एप्पल न सिर्फ अमरीका बल्कि दुनिया की उन कंपनियों में से है जो बिना किसी एकाधिकार के, खुले बाजार के मुकाबले में एक के बाद एक बेहतरीन सामान लाकर बड़ा मुनाफा कमाती है, और उसके सामानों के प्रति निष्ठावान बने रहने वाले ग्राहक उसके हर सामान के अगले मॉडल का इंतजार भी करते हैं।
दूसरी तरफ इससे ठीक उल्टा हाल चीन की कुछ कंपनियों का है जो कि सामान इतना सस्ता बनाती हैं कि वह सामान कमजोर और अविश्वसनीय रहता है, और जाने कब तक चले, कब खराब हो जाए। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी को लेकर तरह-तरह के मजाक चलते रहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वहां से भारत आने वाले बहुत से सस्ते सामानों ने भारत के उसी किस्म के सामानों के कारखाने बंद करवा दिए हैं। चीन में सामान अच्छे भी बनते हैं, और घटिया भी। लेकिन वहां के सस्ते सामान इतने सस्ते रहते हैं कि वे दुनिया के अधिकतर देशों में जाकर वहां के स्थानीय सामानों को पीटकर रख देते हैं। इसकी एक वजह यह है कि वहां पर लागत इतनी कम आती है, उत्पादन इतना अधिक होता है कि सामान सस्ते बनते हैं। दूसरी तरफ भारत में बनने वाले बहुत से सामान घटिया चीनी सामानों जितने ही घटिया रहते हैं, लेकिन वे महंगे बनते हैं, क्योंकि कामगार हुनरमंद नहीं हैं, मशीनें अच्छी नहीं है, बिजली का ठिकाना नहीं है, और कंपनियां उत्पादन ठीक से नहीं कर पातीं।
अब ऐसे में जब भारत की सरकार लगातार यह ताकत लगा रही है कि मेक इन इंडिया को कामयाब बनाया जाए, तो उसके कुछ रास्ते हैं। पहली बात तो यह कि भारत में सामानों का उत्पादन बेहतर क्वालिटी का हो, और इसके लिए कामगारों का हुनर बेहतर हो। चीन में यह नौबत रातों-रात बेहतर कर ली जाती है, और भारत में कौशल विकास के नाम पर राज्यों में अंधाधुंध लूटपाट और धांधली चलती रहती है। ऐसे में दुनिया के दूसरे देश तो दूर रहे, भारत के भीतर भी सस्ते चीनी सामानों का कोई विकल्प नहीं है। दूसरी तरफ भारत में अधिक कमाई वाला एक तबका ऐसा है जो कि दुनिया का सबसे महंगा एप्पल कम्प्यूटर या फोन लगातार इस्तेमाल करता है, और वह क्वालिटी के लिए अधिक से अधिक दाम देने को भी तैयार रहता है। भारत में ही सॉफ्टवेयर का काम करने वाली कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों से खुला मुकाबला करती हैं, वे क्वालिटी में भी अच्छी हैं, और उनके दाम भी बाजार के मुकाबले के हैं। लेकिन भारत का भविष्य बेहतर मानने वाले लोगों को यह भी समझ लेना चाहिए कि इस देश में आज कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खदानों और खनिजों से जुड़े हुए ऐसे उद्योगों का है जो कि भारी प्रदूषण फैलाते हैं, और जिन्हें दुनिया के विकसित देश अपने घर पर चलाना नहीं चाहते। ऐसे उद्योगों पर टिकी हुई भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर यह भावनात्मक सोच तो ठीक है कि भारत सब कुछ खुद बनाने लगेगा, और दुनिया में अव्वल हो जाएगा, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि यह देश न तो चीन की तरह का सस्ता बना पा रहा, न ही दुनिया के बहुत से देशों की नामी कंपनियों जैसा अच्छा बना पा रहा है। इन दोनों मामलों में आगे बढऩे की कोशिश के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है। 

गंदा लिखने वाले लेखकों का पूरी तरह बहिष्कार जरूरी

संपादकीय
5 अगस्त 2017


पाकिस्तान से अभी एक खबर आई थी कि कल के क्रिकेटर और आज के राजनेता इमरान खान ने अपनी पार्टी की एक महिला नेता को कोई अश्लील संदेश फोन पर भेजा, और उसने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया। इसके बाद इमरान समर्थक उस महिला के खिलाफ लाठियां लेकर टूट पड़े हैं, और उसके चाल-चलन पर भद्दी बातें कहते जा रहे हैं। लेकिन यह बात महज पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, और न ही महज राजनीति तक। अमरीका में मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार महिलाओं के बारे में बहुत ही घटिया और अश्लील बातें कहते आए हैं। और इन दिनों भारत में सोशल मीडिया पर हिन्दी साहित्य से जुड़े हुए लोगों के बीच एक बहस चल रही है कि साहित्यकार अपने बीच की महिलाओं के खिलाफ जितनी घटिया और अश्लील बातें लिख रहे हैं, तो उनका क्या किया जाए?
लिखने-पढऩे वाले और चर्चित नामों को जब सोशल मीडिया पर बहुत ही गंदी बातें लिखते देखा जाता है, तो फिर उनके लिखे हुए से भी नफरत होने लगती है। ऐसा लगता है कि साहित्य की सारी समझ, और उसमें गुजारी हुई जिंदगी भी न तो उन्हें सामाजिक न्याय सिखा पाई, और न ही महिला का सम्मान उन्हें समझ आया है। वैसे तो साहित्य में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर कई तरह की खेमेबाजी चलती है। और ऐसे खेमों के बीच बहस कई बार बड़ी फूहड़ भी हो जाती है। लेकिन किसी महिला के चाल-चलन की तरफ गंदा इशारा करके कोई साहित्यकार किस तरह से लोगों के बीच बने रहने का हौसला दिखा सकता है, यह देखना हो तो इन दिनों फेसबुक पर चल रही ऐसी बहस को देखना काफी होगा। महिलाओं को लेकर पुरूषों के मन में सदियों से चले आ रहा एक अनादर वहां चीख-चीखकर सामने आ रहा है, और इस ज्यादती के खिलाफ भी बहुत से लोग लिख रहे हैं।
फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ने लोगों के भीतर छुपे हुए एक हिंसक और खूंखार हैवान को उजागर करने का काम बखूबी किया है। अपने लेखन में जो लोग महानता और सिद्धांत की बातें करते नहीं थकते, वे लोग भी यहां पर नंगे हुए जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने लोगों के मिजाज की कमजोरियों को उजागर करने का एक बहुत बड़ा काम किया है, और लोग आत्मघाती अंदाज में अपनी हिंसा को अपने नाम और चेहरे के साथ लिखते चले जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि साहित्य में चल रही खेमेबाजी से परे भी यह महिला के खिलाफ पुरूष के मन की एक आम हिकारत है, जो कि उसके किसी भी फैसले को उसके चाल-चलन से जोडऩे के लिए उतारू बैठे रहती है। यह तो अच्छा है कि सोशल मीडिया पर और बहुत से लोग ऐसे ओछे हमलों का जवाब देने के लिए मौजूद हैं, लेकिन इससे अधिक भी कुछ करने की जरूरत है। ऐसे लेखकों की किताबों का एक सामाजिक बहिष्कार हो, ऐसे लेखकों को छापने वाली पत्रिकाओं में लिखने का भी बहिष्कार हो, और उनको खरीदने का भी बहिष्कार हो। जब किसी लेखक के पेट पर इस तरह की लात पड़ेगी, तभी जाकर उन्हें यह समझ में आएगा कि हिंसक बकवास करना कितना महंगा पड़ सकता है।

विश्व स्तनपान सप्ताह जागरूकता की जरूरत

संपादकीय
4 अगस्त 2017


दुनिया भर में अभी विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जा रहा है। अगस्त का पहला हफ्ता इसी बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए रहता है, क्योंकि कुछ समाजों में किसी अंधविश्वास के चलते महिलाएं बच्चों को दूध पिलाने से कतराती हैं, तो कुछ अतिसंपन्न और अतिआधुनिक तबके की महिलाएं अपने शरीर की फिक्र करते हुए बच्चों को दूध पिलाने से बचती हैं। इसके अलावा बाजार में बच्चों के पहले खाने का कारोबार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेबी फूड को बढ़ावा देने के लिए उसके फायदे गिनाते हुए इतने आक्रामक तरीके से डॉक्टरों और दवा दुकानों के रास्ते, और ईश्तहार से भी बेबी फूड को घर-घर तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं। ऐसे में बच्चों के भले के लिए यह जागरूकता जरूरी है कि नवजात बच्चों को शुरुआती एक-दो बरस सबसे अधिक फायदा मां के दूध का होता है, और उसकी एक बूंद बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती है, और उनके विकास में मदद करती है।
इसी से जुड़ा हुआ एक दूसरा मुद्दा कई बरसों से खबरों में हैं कि अपने बच्चों को दूध पिलाती हुई मां क्या अपने बदन को लेकर किसी तरह की अश्लीलता की नौबत लाती है, या कि किसी सार्वजनिक जगह पर भी मां और बच्चे का यह पहला हक होता है, कि वे बच्चे की जरूरत पूरी कर सकें। यह बहस चलती रहती है और लोग सार्वजनिक जगहों पर दूध पिलाती महिला को देखकर बड़बड़ाते भी हैं, और उसका बुरा भी मानते हैं। लेकिन दूसरी तरफ विकसित दुनिया में ऐसी महिलाएं हैं जो संसद में भी अपने बच्चों को लेकर जाती हैं, और वहां संसद की कार्रवाई के बीच बच्चे को दूध पिलाना वे अपना हक समझती हैं। दरअसल समाज में अधिकारों को लेकर इस तरह की जागरूकता का आंदोलन ताकतवर और संपन्न तबके की तरफ से, चर्चित लोगों की तरफ से शुरू होने पर उसके कामयाब होने की संभावना अधिक रहती है। समाज में बड़े कहे जाने वाले लोग जब कुछ करते हैं, तो उनसे नीचे के तबके में भी उसे मंजूर करने का मिजाज रहता है। इसलिए विकसित देशों के ताकतवर तबके से शुरू हुई यह बात बाकी दुनिया तक भी पहुंच सकती है।
दूसरी बात यह है कि जो मजदूर या गरीब तबका रहता है, उसकी महिलाओं के पास तो पसंद-नापसंद की संभावना भी नहीं रहती। उसे तो मजदूरी की जगह पर, या सड़क किनारे फुटपाथ पर बैठकर भी अपने बच्चे को दूध पिलाना पड़ता है। इसलिए अधिक दिक्कत मध्यम वर्ग की है जो कि सामाजिक रीति-रिवाजों को सबसे अधिक ढोने का आदी रहता है। समाज की सोच में एक बदलाव की जरूरत है कि महिला और बच्चे के अधिकार बाकी तमाम अधिकारों से ऊपर हैं, और जिन लोगों को दूध पिलाती मां देखने में बुरा लगता हो, वे अपनी नजरों को लेकर कहीं दूर जा सकते हैं। कल ही एक खबर आई है कि भारत में बच्चों को मां का दूध न मिल पाने से देश का कितना नुकसान होता है। यह नुकसान सेहत पर भी होता है, और कुपोषण से प्रभावित होने वाली सेहत की वजह से बच्चों के बड़े होने पर उनकी आर्थिक उत्पादकता का नुकसान भी होता है। आमतौर पर कुपोषण से देश का होने वाला आर्थिक नुकसान गिनना आसान नहीं रहता, इसलिए उसकी चर्चा कम ही होती है। फिलहाल इस हफ्ते इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए यह भी समझने की जरूरत है कि एक मां अपने बच्चे को ठीक से दूध पिला सके इसके लिए यह भी जरूरी है कि वह मां सेहतमंद रहे, बीमारियों से दूर रहे, और उसका खानपान ठीक हो। भारत के सक्षम और संपन्न तबके के लोग अपने आसपास में महिलाओं की सेहत का ध्यान रख सकते हैं, और उन्हें जागरूक बना सकते हैं। 

विधानसभाएं हों या संसद, विपक्ष एक-एक पल का इस्तेमाल करे

संपादकीय
3 अगस्त 2017


संसद और कई राज्यों की विधानसभाओं के सत्र साथ-साथ चल रहे हैं, और विपक्ष कई मुद्दों को लेकर काम ठप्प कर रहा है, इधर छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के कुछ मुद्दों को लेकर विधानसभा के चल रहे सत्र में काम रूकना शुरू हो गया है, और इस छोटे से सत्र में कोई काम हो पाना मुश्किल दिख रहा है। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने बहुत सी ऐसी नौबतें विपक्ष को मुहैया कराई हैं, जिनको अगर विपक्ष न उठाए, तो वह गैरजिम्मेदार कहलाएगा। इसलिए विधानसभा सत्र शुरू होते ही विपक्ष का विरोध जायज था, लेकिन हम विधानसभा की कार्रवाई को बहिष्कार करने, या बार-बार बहिर्गमन करने का विरोध करते हैं, और उसी तरह संसद की कार्रवाई ठप्प करने का भी विरोध करते हैं। और यह बात हम तब भी लिखते आए थे जब छत्तीसगढ़ में भाजपा विपक्ष में थी, और संसद में एनडीए विपक्षी थी।
चाहे देश की कुछ विधानसभाओं के चुनाव हों, या फिर छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल के चुनाव हों, राजनीतिक विरोध के मुद्दों को अगर संसद और विधानसभा पर ऐसे हावी होने दिया जाता है कि उससे संसदीय काम ठप्प हो जाए, तो उससे राजनीतिक दल चुनावी फायदा पाने की कोशिश चाहे कर लें, उससे राज्य और देश का एक बहुत बड़ा नुकसान होता है। जितने संसदीय कार्य रहते हैं, उन विधेयकों पर, उन संशोधनों पर, उन प्रस्तावों पर चर्चा का वक्त हंगामे में खत्म हो जाता है, और जब नए कानून बनते हैं, या मौजूदा कानूनों में फेरबदल होता है, तो उन पर जो चर्चा होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती। आज ही छत्तीसगढ़ विधानसभा में नारेबाजी और बहिर्गमन के बीच अनुपूरक बजट और सात विधेयकों को पारित कर दिया गया। जाहिर है कि उन पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई।
हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि सदन के समय का एक-एक पल का इस्तेमाल होना चाहिए, क्योंकि वह मौका रहता है जिसमें जनता के प्रतिनिधि के रूप में विपक्ष सरकार को घेर सकता है, और हर मुद्दों पर जवाब मांग सकता है। जहां तक विरोध-प्रदर्शन की बात है, तो हम यह सुझाएंगे कि विपक्ष को सदन के समय को और बढ़वाने की कोशिश करनी चाहिए, रोज शाम देर तक सदन की कार्रवाई चलाने पर सरकार को मजबूर करना चाहिए, हर मुद्दे पर सवाल पूछने चाहिए, और घेरना चाहिए। ऐसा करके ही विपक्ष अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकता है और सरकार के लिए परेशानी भी खड़ी कर सकता है। आज जिस तरह से संसद और विधानसभा में कार्रवाई ठप्प है, उससे सत्र के आखिर में जाकर सरकार के तमाम किस्म के प्रस्ताव, तमाम किस्म के संशोधन रफ्तार से आगे बढ़ा दिए जाएंगे, और बिना अक्ल के इस्तेमाल के नए कानून बन जाएंगे, कानून में फेरबदल हो जाएगा।
संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को यह समझने की जरूरत है कि सदन का उपयोग बहिष्कार और बहिर्गमन में बर्बाद करना सरकार के हाथ मजबूत करने जैसा है। इससे मीडिया में कुछ घंटों के लिए एक सुर्खी तो हासिल हो जाती है, लेकिन देश की जनता लुटी हुई सब देखते रह जाती है। सरकार को घेरने का यह तरीका संसदीय उत्पादकता को खत्म करने का है। हमारा मानना है कि सदन के समय का पल-पल इस्तेमाल करके, प्रदर्शन के लिए बाहर मौका ढूंढना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सब जगह गांधी की प्रतिमाएं लगी हुई हैं, और वहां बैठकर अनशन और उपवास करके सांसद और विधायक मीडिया से सीधे बात भी कर सकते हैं, जो कि सदन के भीतर नहीं कर सकते। सांसदों और विधायकों के ऐसे ही रूख के चलते जनता के मन में इन निर्वाचित और मनोनीत प्रतिनिधियों के लिए इज्जत घटती चली गई है, और हिकारत बढ़ती चली गई है। प्रदर्शन के लिए सड़क का इस्तेमाल हो सकता है, आमसभाओं के मैदान का इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन सदन को सड़क बना देना पूरी तरह नाजायज है, और दिल्ली से लेकर रायपुर तक जनता के बीच ऐसे रूख के खिलाफ एक जागरूकता खड़ी होनी चाहिए। 

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खतरों को समझे बिना उसे आगे बढ़ाने पर रोक लगे...

संपादकीय
2 अगस्त 2017


कम्प्यूटरों की दुनिया में आज एक सबसे बड़ी चुनौती आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को माना जाता है। कृत्रिम बुद्धि के विकास में दुनिया के कई कम्प्यूटर वैज्ञानिक लगे हुए हैं, और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने इस रिसर्च में बहुत बड़ा पूंजीनिवेश किया हुआ है। लेकिन अभी पिछले हफ्ते दुनिया के कुछ सबसे बड़े कम्प्यूटर-दिमागों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को विकसित करना कितना खतरनाक होगा, और यह कि इसके लिए क्या पहले कड़े नियम बनाना बेहतर नहीं होगा? अमरीका के एक दूसरे बड़े कारोबारी ने मार्क जुकरबर्ग की कोशिशों को गैरजिम्मेदार और खतरनाक बताया। यह बहस तब शुरू हुई जब फेसबुक को अपने ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस प्रोजेक्ट में एक कोशिश को खारिज कर देना पड़ा। उसने ऐसी दो कृत्रिम बुद्धियां बनाकर उन्हें विकसित करने का काम किया था, लेकिन वे कुछ इस तरह बेकाबू विकसित हुईं कि वे आपस में बात करने के लिए एक नई जुबान बना बैठीं, और वे दोनों बुद्धियां अंग्रेजी छोड़ इस नई भाषा में आपसी बातचीत करने लगीं जो कि इन वैज्ञानिकों की समझ से भी परे की थी। इसके बाद लाख कोशिश करके भी ये वैज्ञानिक इन कृत्रिम बुद्धियों को वापिस अंग्रेजी तक नहीं ला पाए, तो फिर उन्होंने इन्हें खत्म कर दिया। यही तजुर्बा ऐसे बहुत सारे मामलों में हुआ जहां पर कृत्रिम दिमागों ने अपनी एक अलग भाषा बना ली, और अंग्रेजी को पूरी तरह छोड़ ही दिया।
यह तो महज भाषा की बात है, और अभी ये कृत्रिम दिमाग इंसानी काबू के बाहर के नहीं थे, इसलिए इन्हें खत्म किया जा सका। लेकिन अधिकतर लोगों ने हॉलीवुड की ऐसी फिल्में देखी होंगी जिनमें इंसानों के बनाए हुए मशीनी मानव इंसानों के काबू से बाहर हो जाते हैं, और तबाही फैलाने में लग जाते हैं। दरअसल ऑर्टिफिशियल इंटेंलीजेंस के साथ एक दिक्कत यह है कि इंसान ऐसी बुद्धियों को बनाकर उन्हें विकसित तो करते चलता है, लेकिन एक सीमा के बाद जाकर ऐसे दिमाग अपने आपको खुद ही विकसित करने लगते हैं, और इंसान महज देखते रह सकता है। लोगों को हिन्दुस्तान में प्रचलित एक बहुत पुरानी कहानी याद होगी कि किस तरह कुछ लोग हड्डी, मांस, और चमड़ा जोड़कर एक शेर तैयार करते हैं, और फिर आखिर में उसमें प्राण भी फूंक देते हैं। प्राण मिलते ही वह शेर अपने को बनाने वाले लोगों को ही खा जाता है। कुछ ऐसा ही खतरा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर बहुत से लोग देखते हैं जिनमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भी हैं। लेकिन फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग फेसबुक पर लोगों की पसंद के मुद्दों से जुड़े हुए इश्तहार ढूंढने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करते हैं। अब कल के दिन अगर ये दिमाग बेकाबू हो जाएं, तो हो सकता है कि लोगों की निजी और गोपनीय बात खुद होकर बाजार में बेचने लगें। कृत्रिम बुद्धि के विकास को शुरू तो किया जा सकता है, लेकिन बहुत से लोगों का यह मानना है कि वह इंसान की समझने की सीमा को बहुत रफ्तार से पार कर लेगी, और फिर हो सकता है कि बेकाबू होकर अपना खुद का एक एजेंडा तय कर ले।
दुनिया की कहानियों और फिल्मों में ऐसे ही मानव निर्मित दानव, फ्रैंकस्टीन की कहानी है जिसे एक वैज्ञानिक ने बनाया, और फिर जो बेकाबू होकर तबाही करने लगा। हम ऐसे नाजुक और खतरनाक मामले में संकीर्णतावादी होना बेहतर समझते हैं, और विज्ञान-टेक्नालॉजी का ऐसा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए जिस पर इंसान का किसी दिन काबू ही न रह जाए। ऐसा ही जेनेटिक्स के साथ हो रहा है, इंसानों से लेकर फल-सब्जी और अनाज की फसलों तक जेनेटिक मॉडिफिकेशन का काम चल रहा है, और लोग इसके खतरों की तरफ दुनिया को आगाह भी कर रहे हैं। इंसानों का बनाया हुआ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस किसी दिन एक तानाशाह बनकर इंसानी बिरादरी को, या धरती को खत्म करने पर आमादा हो जाए, तो क्या होगा? उस दिमाग से इंसान मुकाबला भी नहीं कर पाएंगे, और शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह मारे जाएंगे।

दलबदलू सांसद-विधायकों की सीट छीन लेनी चाहिए

संपादकीय
1 अगस्त 2017


गुजरात, बिहार, और उत्तरप्रदेश में कांगे्रस और दूसरी विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शाामिल हो रहे हैं। गुजरात में तो कांगे्रस के लिए अपना घर संभालकर रखना मुश्किल पड़ रहा है, और राज्यसभा चुनाव के मतदान तक उसे अपने विधायकों को अपनी पार्टी के राज वाले कर्नाटक भेजना पड़ा, और उनके मोबाइल फोन ले लेने पड़े। आज सोशल मीडिया और मीडिया दोनों जगह कांगे्रस विधायकों की आलोचना हो रही है कि बाढ़ में डूबे गुजरात में वे अपने मतदाताओं के बीच न रहकर कर्नाटक में छुपकर बैठे हैं, लेकिन लोगों को याद रहना चाहिए कि भाजपा के येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री रहते हुए जब वहां उनके मंत्री, रेड्डी बंधु सरकार पलटने के लिए विधायक खरीदी में लगे थे, तो कर्नाटक में बाढ़ की तबाही के बावजूद भाजपा के विधायक दूसरे प्रदेश में ले जाकर संभालकर रखे गए थे कि भाजपा का खरबपति खदान मालिक-मंत्री ही उन्हें न खरीद ले। इसलिए विधायकों या सांसदों की खरीद-फरोख्त कोई नई बात नहीं है। हमारा अनुभव यह रहा है कि छत्तीसगढ़ में 2003 में भाजपा विधायकों की जोगी द्वारा खरीदी के मामले से लेकर सांसदों की खरीदी तक, कोई मामले अदालतों में साबित नहीं हो पाते, और यह खरीद-बिक्री चलती ही रहती है।
ऐसे में हमें लगता है कि देश के चुनाव कानून में एक ऐसे फेरबदल की जरूरत है कि पांच बरसों के लिए चुने गए सांसद या विधायक जिस पार्टी के निशान पर चुने जाते हैं, उस पार्टी को छोड़कर जाने पर, या कि थोक में दलबदल करने पर भी अपनी सीट खो बैठें। आज दलबदल कानून अकेले सांसद-विधायक को दलबदल से रोकता है, लेकिन जब एक तिहाई से अधिक सांसद-विधायक दलबदल करते हैं, तो उसे कानूनी मंजूरी है। चुनाव कानून में संशोधन करके दल बदलने वाले तमाम लोगों को बाकी कार्यकाल के लिए अपात्र कर देना चाहिए, और अगर उनकी सीट पर दुबारा चुनाव होता भी है, तो भी उन्हें चुनाव लडऩे की पात्रता नहीं रहनी चाहिए। आज तो हालत यह है कि गुजरात में कांगे्रस के जिस विधायक ने पार्टी छोड़ी और भाजपा में शामिल हुआ, उसे अगले ही दिन भाजपा ने अपना राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया। खुद भाजपा के लिए यह शर्मिंदगी की बात है कि अपने इतने नेताओं के रहते हुए वह इस तरह कल के दलबदलू को आज का प्रत्याशी बना रही है। यह सिलसिला लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है, और कानून का बेजा इस्तेमाल है। इसके खिलाफ एक संशोधन तुरंत जरूरी है जिससे दल बदलने वाले लोग कम से कम कुछ बरस तो सदन और सत्ता से दूर रहें।
यह बात अपनी जगह सही है कि हर नौबत को देखते हुए जब कानून में फेरबदल होते हैं, तो वे फेरबदल खतरनाक भी रहते हैं। लेकिन आज हिंदुस्तान में सांसदों और विधायकों की खुली खरीद-फरोख्त लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक हो चुकी है, और इस पर कड़ी रोक लगनी चाहिए। जनादेश शब्द का सम्मान होना चाहिए, और जिस विधायक को या सांसद को जिस पार्टी के साथ जनादेश मिला है, उस पार्टी से अलग होते ही वह जनादेश समाप्त मान लेना चाहिए, फिर चाहे यह अलग होना अकेले हो, या एक तिहाई भीड़ के साथ हो।

सूचना के अधिकार के बीच सिंचाई विभाग की अपना भ्रष्टाचार छुपाने की कोशिश

संपादकीय
31 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलों से भरे हुए सिंचाई विभाग के सचिव ने अपने अफसरों को लिखा है कि आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो जैसी दूसरी जांच एजेंसियों या राजभवन जैसी संस्थाओं से मांगी गई जानकारी विभागीय अनुमोदन के बिना सीधे न दी जाए। इस पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने आपत्ति करते हुए इस आदेश को गैरकानूनी बताते हुए मुख्य सचिव को लिखा है कि जानकारी देने से मना करने वाले कानून के खिलाफ काम करेंगे। यह आदेश हैरान करने वाला है क्योंकि एक तरफ तो देश में सूचना का अधिकार लागू किया गया है, और उसकी गारंटी के लिए हर राज्य में संवैधानिक शर्त के रूप में सूचना आयोग बनाए गए हैं, सूचना न देने पर जुर्माने का प्रावधान भी है। दूसरी तरफ सरकार का कोई विभाग इस तरह की रोक लगाकर अपने भीतर के भ्रष्टाचार को छुपाने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा। आज सिंचाई विभाग के कई आदेश हवा में तैर रहे हैं जिसमें सिंचाई मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के परिवार की जमीन के मामलों में विभाग ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है, यह बात उजागर होने के पहले से ही विभाग को यह मामला अच्छी तरह मालूम था, और ऐसा विभाग जांच एजेंसियों से भी जानकारी छुपाने की कोशिश कर रहा है, तो राज्य शासन को इस आदेश को खारिज करना चाहिए।
दरअसल नेताओं और अफसरों को सूचना के अधिकार नहीं सुहाते। अब जनता की पहुंच कानूनी हक के साथ सरकारी फाईलों तक हो चुकी है, और आम जनता भी जिस जानकारी को सीधे मांग सकती है, उस जानकारी को भी जब अपने बड़े-बड़े अफसरों को देने से मना किया जा रहा है, तो इससे विभाग की नीयत साफ दिखती है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और सिंचाई विभाग के बीच कुछ हफ्तों से एक तनातनी चल रही थी जब सिंचाई विभाग के कुछ भ्रष्ट मामलों पर एसीबी ने जांच शुरू की। इसके खिलाफ सिंचाई मंत्री ने मुख्यमंत्री को यह लिखा कि ऐसी जांच से विभाग के निर्माण कार्य प्रभावित होंगे। यह बात जगजाहिर है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार बहुत ही आम बात है। जब-जब एसीबी के छापे पड़ते हैं, तो इन विभागों के अधिकारियों से दसियों करोड़ की काली कमाई बरामद होती है, और यह जाहिर है कि विभाग के निर्माण बजट का एक चौथाई हिस्सा भ्रष्टाचार में चले जाता है। ऐसे भ्रष्ट विभाग भी जब जानकारी को छुपाकर रखना चाहते हैं तो सरकार के काम में ईमानदारी और पारदर्शिता की थोड़ी-बहुत भी संभावना खत्म हो जाती है।
सिंचाई विभाग का एसीबी से टकराव भ्रष्टाचार को छुपाने, दबाने, और जारी रखने की एक खुली कोशिश है, और कल से शुरू हो रही विधानसभा में भी इस बारे में विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। हमारा तो सुझाव यह है कि राज्य के जितने निर्माण विभाग हैं उन पर निगरानी रखने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम और काबिल एक ऐसे बड़े अफसर को इन विभागों के बाहर से लाना चाहिए जो कि समय रहते गड़बड़ी को पकड़ सके। जब एनीकट बह जा रहे हैं, बांध फूट जा रहे हैं, नहरों की गड़बड़ी पकड़ में आ रही है, तो उसके बाद फिर किसी जांच से नुकसान की भरपाई तो नहीं हो पाती। राज्य सरकार को चाहिए कि मुख्य सूचना आयुक्त का जो पद साल भर से खाली पड़ा हुआ है, उस पर किसी ईमानदार व्यक्ति को नियुक्त करे, वरना सरकारी विभाग अपने भ्रष्टाचार को दबाने और छुपाने में जितनी खुली कोशिश कर रहे हैं, वह सिंचाई विभाग की इस चि_ी से जाहिर है। मुख्यमंत्री को इस बारे में तुरंत देखना चाहिए। 

नफरती-हिंसा रोकने के लिए केन्द्र-राज्य तुरंत कुछ करें

संपादकीय
30 जुलाई 2017


केरल में आरएसएस के एक कार्यकर्ता की हत्या के खिलाफ आज प्रदेश स्तर का बंद रखने का आव्हान भाजपा-आरएसएस ने किया है। वहां पुलिस ने इस हत्या के मामले में ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया है जो कि सीपीएम से जुड़े हुए बताए गए हैं। राज्य में आरएसएस और सीपीएम के लोगों के बीच बरसों से ऐसी खूनी लड़ाई चल रही है जिसमें सड़कों पर एक-दूसरे पर बम भी चलाए जाते हैं, और कत्ल भी किए जाते हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले एक सीपीएम कार्यकर्ता के कत्ल के पुराने मामले में आरएसएस के कई लोगों को सजा हो चुकी है। दोनों ही तरफ से लड़ाई कत्ल तक पहुंच जाती है, और देश में शायद केरल अकेला राज्य है जहां पर इन दोनों के बीच टकराहट इतनी हिंसक है।
कुछ अरसा पहले तक बंगाल में भी ममता के समर्थकों और वामपंथियों के बीच ऐसा ही टकराव देखने मिलता था, लेकिन केरल जितने कत्ल वहां भी देखने में नहीं आते। इसकी एक वजह तो शायद यह है कि केरल में हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई और मुस्लिम बनने वाले लोगों की बहुत बड़ी संख्या है। वहां पर स्थानीय स्तर पर लोग ईसाई बनते आए हैं, और खाड़ी के देशों में काम करने जाने वाले लोगों में से बहुत से लोग वहां पर काम की सुविधा और इजाजत के लिए मुस्लिम भी बनते हैं। इस तरह केरल में धार्मिक अनुपात पिछली आधी-पौन सदी में बड़ा बदला है, और यह बात आरएसएस के लिए एक किस्म की चुनौती रहती है कि वहां पर अब तक जो हिन्दू हैं, उन्हें संगठित किया जाए, और खासकर उन वामपंथी कार्यकर्ताओं से टक्कर ली जाए जो कि धर्म परिवर्तन के मामले को कोई महत्व नहीं देते हैं।
लेकिन देश के एक प्रदेश में होने वाली हिंसा का दूसरी जगहों पर भी बड़ा बुरा असर पड़ता है। आज ही उत्तरप्रदेश की खबर है कि वहां योगी राज के चलते मेरठ में एक मजार पर सिंदूर जैसा रंग पोतकर उस पर बजरंग बली की प्रतिमा बिठा दी गई। और ऐसा करने वाले एक हिन्दू संगठन ने यह कहा कि अमरनाथ में यात्रियों पर हुए हमले और कश्मीर में भारतीय फौज पर चलने वाले पत्थरों के जवाब में पूरे उत्तरप्रदेश में मजारों का भगवाकरण किया जाएगा। इसका एक वीडियो भी सामने आया है जो बताता है कि ऐसा साम्प्रदायिक जुर्म करने वाले लोगों का हौसला आज कितना बुलंद है। इसके साथ-साथ मध्यप्रदेश की एक खबर है कि किस तरह बीफ के शक में एक मुस्लिम महिला के साथ हिंसा की गई है। ऐसी सारी घटनाओं की प्रतिक्रिया देश के दूसरे हिस्सों में तो होती ही है, देश के बाहर भी उन जगहों पर हिन्दुस्तानियों को इसकी प्रतिक्रिया झेलनी पड़ती है जहां पर स्थानीय सरकारें किसी धर्म को महत्व देती हैं। अब जैसे खाड़ी के देश हैं, वहां पर उन तमाम घटनाओं की प्रतिक्रिया हिन्दुस्तानियों को झेलनी पड़ती है जो कि भारत में मुस्लिमों के खिलाफ होती हैं।
पूरी दुनिया में जगह-जगह सिक्खों को लोगों की हिंसा झेलनी पड़ती है, भेदभाव झेलना पड़ता है, क्योंकि पश्चिम के लोग उनकी पगड़ी और पहरावे से उन्हें मुस्लिम मान बैठते हैं, और दुनिया में जगह-जगह मुस्लिम आतंकी जो हिंसा कर रहे हैं, उसका हर्जाना अमन-पसंद मुस्लिमों के साथ-साथ सिक्खों को भी देना पड़ता है। और सिर्फ हिंसा से यह भेदभाव सामने नहीं आता, भारत में होने वाले ऐसे हमलों को देखते हुए पूरी दुनिया में भारत की तस्वीर गंदी होती है, यहां आने वाले पर्यटक घटते हैं, यहां से कारोबार करने की दिलचस्पी घटती है।
भारत सरकार को बहुत तेजी से सारे प्रदेशों के साथ मिलकर देश में फैल रहे नफरत के सैलाब को रोकना चाहिए। अभी दो दिन पहले ही दिल्ली के अंग्रेजी के एक बड़े अखबार ने इंटरनेट पर अपने पेज पर भारत में नफरती-हिंसा की सारी घटनाओं को एक साथ इक_ा करके रखा है। इसे देखकर दिल दहल जाता है कि यह देश किस तरफ जा रहा है। इसलिए आज केन्द्र और राज्य की सरकारों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और हिंसा को रोकना चाहिए। हिंसा के जख्म बरसों तक जवाबी हिंसा के लिए लोगों को उकसाते हैं।