रजनीकांत के मायने

संपादकीय
31 दिसम्बर 2017


तमिलनाडु में फिल्म स्टार रजनीकांत ने राजनीति में आने की घोषणा करके उस राज्य की चुनावी तस्वीर को बदल देने का काम किया है। अगर वे अपनी कही इस बात पर कायम रहते हैं कि वे हर सीट पर उम्मीदवार खड़ा करेंगे, और विधानसभा चुनाव के भी पहले होने वाले लोकसभा चुनावों में उम्मीदवार खड़े करने के बारे में भी सोचेंगे, तो इस राज्य में पहले से स्थापित दोनों पार्टियों के लिए एक बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है। उन्होंने जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे की बात कहते हुए राजनीति की घोषणा की है, वहां की दोनों बड़ी पार्टियां भ्रष्टाचार के आरोपों से लदी हुई हैं। इसलिए रजनीकांत अकेले अपने दम पर भी, अपनी बेमिसाल शोहरत की वजह से तमिल राजनीति की तस्वीर बदल सकते हैं।
दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों का राजनीति में आना नया नहीं है। इसी तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन और उनके बाद उनकी राजनीतिक वारिस जयललिता दोनों ही फिल्मों से आए थे। उनके विरोधी रहे एम करूणानिधि भी फिल्मों से राजनीति में आए। पड़ोस के आंध्र में एनटी रामाराव फिल्मों के लंबे करियर के बाद राजनीति में आए। कर्नाटक में फिल्म अभिनेता राजकुमार की बड़ी शोहरत रही और वह राजनीति में उनके काम आई। रजनीकांत के साथ एक बात यह कही जाती है कि वे तमिलनाडु के बाहर भी पूरे दक्षिण भारत में सबसे कामयाब, सबसे मशहूर, और सबसे जाने-पहचाने व्यक्ति हैं। राजनीति के जानकार लोगों का मानना है कि तमिलनाडु का एक भी पोलिंग बूथ ऐसा नहीं होगा जहां पर कि रजनीकांत के भक्त न रहते हों, और जहां उन्हें कार्यकर्ता न मिलें।
हम राजनीति में नए लोगों के आने के हिमायती हैं, और ऐसा भी नहीं है कि परंपरा से हटकर जो लोग आते हैं उन्हें कभी कामयाबी मिल ही नहीं सकती। असम में प्रफुल्ल महंत छात्र राजनीति से चुनावी राजनीति में आए थे, और अभी हाल में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने भारतीय राजनीति के कई किस्म के रिकॉर्ड तोड़े हैं। केजरीवाल तो बिल्कुल ही अनजाना चेहरा थे, उनके पास कोई प्रशंसक नहीं थे, और न ही उनके पास कोई पैसा था। तमिलनाडु में रजनीकांत के पास वह सब कुछ है जो कि राज्य स्तर की एक कामयाब पार्टी को पूरे प्रदेश में चुनाव लडऩे के लिए लगता है। और हो सकता है कि इस राज्य की राजनीति में एक ऐसी पार्टी सचमुच ही खड़ी हो जाए जो कि भ्रष्ट न हो।
भारत की राजनीति में महज भ्रष्टाचार ही अकेला मुद्दा नहीं है। साम्प्रदायिकता और सहनशीलता भी बहुत बड़े मुद्दे हैं, और रजनीकांत को तमिलनाडु के बाहर केंद्रीय स्तर पर किसी भी गठबंधन के लिए यह भी देखना होगा कि केंद्र के किस गठबंधन की रीति-नीति के साथ वे जा सकते हैं। अभी उनकी पहली घोषणा ही आई है, इसलिए हम तुरंत ही बहुत दूर की नहीं सोच रहे, लेकिन फिलहाल यह जानकर अच्छा लग रहा है कि राजनीति में एक और चेहरा आ रहा है, अब तक का साफ-सुथरा चेहरा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 दिसंबर

सबसे बुनियादी जरूरतों पर आधार-अनिवार्यता खत्म हो

संपादकीय
30 दिसम्बर 2017


हरियाणा की खबर है कि वहां पर एक निजी अस्पताल में एक महिला मरीज को ले जाया गया, लेकिन उसका आधार कार्ड न होने से इलाज नहीं हुआ, और उसकी मौत हो गई। यह बात खबर इसलिए भी बनी कि यह महिला कारगिल युद्ध के एक शहीद की पत्नी थी, और उसके बेटे ने मीडिया के सामने यह पूरा मामला उजागर किया। अस्पताल का कहना है कि आधार कार्ड औपचारिकताओं के लिए जरूरी है, और उसके बिना वे दाखिले के कागज पूरे नहीं कर सकते थे। लोगों को याद होगा कि अभी दो-तीन महीने के भीतर ही झारखंड में एक महिला की मौत हो गई थी क्योंकि आधार कार्ड न होने से उसके परिवार को राशन मिलना बंद हो गया था। भुखमरी से मौत हिन्दुस्तान में अब आम बात नहीं रह गई है, लेकिन झारखंड के इस हादसे से केन्द्र और राज्य सरकार को जो झटका लगना था, वह नहीं लगा, और बाकी देश के लिए भी, बाकी कामों के लिए भी सरकारों ने सबक नहीं लिया। अभी दो दिन पहले ही देश के मुख्य सूचना आयुक्त ने यह फैसला दिया है कि आरटीआई अर्जी देने वाले के पास आधार कार्ड न होने से उसे सूचना देने से मना करना कानून के खिलाफ है, और सूचना पाने के लिए आधार कार्ड की कोई जरूरत नहीं है।
हमारे सरीखे अनगिनत हिन्दुस्तानी आज ऐसे हैं जिन्हें दिन में कई बार टेलीफोन पर यह घोषणा सुननी पड़ती है कि 31 मार्च के पहले अपने सिमकार्ड को आधार कार्ड से जुड़वा लें। इसी तरह की घोषणा बैंक खातों को आधार से लिंक करवाने के लिए एसएमएस पर आती रहती है। अभी सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर एक मामले की सुनवाई जारी ही है, और वहां केन्द्र सरकार आधार कार्ड को हर बात के लिए जरूरी करने पर आमादा है, दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट लोगों के ऐसे शक को भी ध्यान से सुन रहा है जो यह मानते हैं कि हर बात के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य करने से लोगों की निजी जिंदगी की गोपनीयता खत्म ही हो जाएगी। इस सिलसिले में यह याद रखने की जरूरत है कि यूपीए सरकार के वक्त जब आधार कार्ड पर काम शुरू हुआ तो भाजपा ने ही उसका सबसे अधिक विरोध किया था, और मोदी सरकार बनने के बाद आधार कार्ड योजना के मुखिया नंदन निलेकेणि से एक मुलाकात के बाद ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच बदल गई थी, और उन्होंने आधार कार्ड को बढ़ावा देने के लिए पूरी ताकत लगा दी।
हमारा मानना है कि आज सरकार और कारोबार, इन दोनों ही जगहों में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर जितने तरह की गलतफहमी फैली हुई है, उसे देखते हुए केन्द्र सरकार को ही यह खुलासा करना होगा कि किसी भी बुनियादी जरूरत के लिए, किसी भी इलाज के लिए, किसी भी सफर के लिए आधार कार्ड को मुद्दा नहीं बनाया जाएगा, और लोगों के इलाज के हक, जिंदा रहने के हक, खाने के हक के ऊपर आधार कार्ड बिल्कुल भी लागू नहीं होगा। अगर केन्द्र सरकार, और राज्य सरकारें ऐसा खुलासा नहीं करती हैं, तो इससे सबसे गरीब और सबसे बेबस जनता का सबसे बड़ा नुकसान होगा। आज तो कारगिल के एक शहीद की पत्नी की बेइलाज मौत की वजह से हम इस पर लिख रहे हैं, लेकिन पिछले महीनों में जगह-जगह से ऐसी खबरें सामने आई हैं कि कुष्ठ रोगियों की गली हुई उंगलियों की वजह से उनके निशान नहीं लिए जा सकते, उनके आधार कार्ड नहीं बन पा रहे हैं, और जगह-जगह उनको बिना राशन रहना पड़ रहा है। हमारा बड़ा साफ मानना है कि चाहे सौ लोग बिना आधार कार्ड कोई रियायत पा जाएं, लेकिन आधार कार्ड की कमी से किसी एक जरूरतमंद को भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए। आधार कार्ड को लेकर दो बिल्कुल अलग-अलग पहलू हैं, एक तो जिंदगी की निजता और गोपनीयता की बात है, और दूसरी बात लोगों के न्यूनतम बुनियादी हक और जरूरत की है। अगर सरकारों को आधार की अनिवार्यता की ऐसी हड़बड़ी है, तो सुप्रीम कोर्ट को एक कड़ा रूख दिखाते हुए पूरे देश में एकदम बुनियादी बातों के लिए आधार को एकदम ही गैरअनिवार्य घोषित करना चाहिए। इस काम में कोई भी देरी सबसे कमजोर तबके के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने से कम और कुछ नहीं होगा। (Daily Chhattisgarh)

नए साल का मौका नए इरादों और नए संकल्पों का बनाएं

संपादकीय
29 दिसम्बर 2017


नए साल का मौका अपने आपसे बहुत सी नई बातें तय करने का होता है। लोग इसे नए बरस के संकल्प कहते हैं, और यह भी मानते हैं कि ये संकल्प टिकते नहीं क्योंकि इन्हें नए साल के मौके पर महज एक औपचारिकता के लिए लिया जाता है। लेकिन फिर भी कैलेंडर बदलने का यह मौका इस काम में लाया जा सकता है कि लोग पिछले बरस तय की गई बातों को एक बार फिर गौर कर लें कि उनमें से कौन-कौन सी बातों पर वे कायम रह पाए हैं, और कौन सी बातों पर वे नहीं टिक सके। अभी दो-चार दिन पहले ही विख्यात फिल्म निर्देशक शेखर कपूर ने यह लिखा है कि लोगों को दिन में कुछ वक्त बिना कुछ किए हुए अकेले और शांत गुजारना चाहिए, अपने आपसे मिलना चाहिए। हर दिन तो पता नहीं कितने लोगों के लिए यह मुमकिन हो पाएगा, लेकिन नए साल के पहले हर किसी को इसके लिए जरा सा वक्त निकालना चाहिए, साल भर की अपनी चूक के बारे में भी सोच लेना चाहिए, और अगले बरस के लिए सावधानी की बात भी तय कर लेनी चाहिए।
हर किसी की जिंदगी में कोई न कोई खामी दूर करने, और कोई न कोई खूबी बढ़ाने की गुंजाइश तो रहती ही है। इसलिए बहुत सी ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं जिनका जरा सा जिक्र हम यहां कर रहे हैं, और लोग उनमें से जो बातें उन पर लागू होती हों, उनके बारे में सोच-विचार सकते हैं, और अपने आपसे कुछ वायदे भी कर सकते हैं। हम यहां पर यह याद दिलाना चाहेंगे कि मन के भीतर के वायदे तोडऩा बड़ा आसान होता है, और लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने आपको आसानी से धोखा न दे पाएं, इसके लिए उन्हें अपने नए साल के वायदों को अपने आसपास के लोगों को जरूर बताना चाहिए, ताकि उनसे फिरने पर वे लोग रोक-टोक सकें। घर-परिवार के लोग, दफ्तर या स्कूल-कॉलेज के लोग, दोस्तों की टोली, इन सबके बीच अगर लोग अपने फैसले बता देते हैं, तो उन पर कायम रहने की संभावना बढ़ जाती है।
हममें से कई लोग सिगरेट-बीड़ी, तम्बाखू खाते-चबाते या पीते हैं, और कैंसर से इसका बड़ा सीधा-सीधा रिश्ता सबकी जानकारी में हैं। छोडऩे के लिए यह एक सबसे जरूरी चीज है जो कि जिंदगी और मौत का फर्क ला सकती है। ऐसी ही एक दूसरी बात कोई नशा करना है, और नशा करके किसी भी तरह की गाड़ी चलाना है। इन दोनों ही बातों से बचने की कोशिश करनी चाहिए। बहुत सी बातें संपन्नता से जुड़ी हुई हैं, लोगों का खान-पान ऐसा हो गया है कि वह उनके बाहर चर्बी बढ़ाते चलता है, और उनके भीतर दिल की धमनियों को संकरा बनाते चलता है। खून में शक्कर बढ़ाते चलता है, कोलेस्ट्राल बढ़ाता है, कई लोगों का बीपी भी बढ़ा देता है। नया साल अपने खानपान के बारे में सोचने का एक अच्छा मौका है, लोगों को यह तय करना चाहिए कि वे बेहतर सेहत के लिए खानपान पर कैसा काबू करें। सेहत से ही जुड़ी हुई एक दूसरी बात कसरत की है। सुबह या शाम की सैर, हल्की-फुल्की कसरत, थोड़ा-बहुत योग या प्राणायाम लोगों की सेहत को अच्छा बनाकर रखने में मददगार होता है, इसमें कोई शक नहीं है। और इनमें से किसी भी बात पर एक धेला भी खर्च नहीं होता। इसलिए लोगों को इस बारे में जरूर-जरूर सोचना चाहिए, और यह भी याद रखना चाहिए कि परिवार के भीतर अगर एक सदस्य भी ऐसी मिसाल पेश करते हैं, तो वह मिसाल बाकी लोगों को भी एक बेहतर जिंदगी की तरफ ले जाती है। इससे इलाज पर होने वाले खर्च की बचत भी होती है, उत्पादकता भी बढ़ती है, और परिवार के भीतर दुख-तकलीफ का खतरा भी घटता है।
सड़कों पर कुछ और किस्म की सावधानी जरूरी होती है, नशे से बचने के अलावा भी। दुपहिया चलाते हुए लोगों को हेलमेट का इस्तेमाल करना चाहिए, और अगर चारपहियों की गाड़ी में बैठे हैं, तो हर सीट पर मौजूद सीट बेल्ट का इस्तेमाल बहुत से हादसों में जिंदगी बचा सकता है। इन दो बातों के अलावा किसी भी तरह के वाहन पर महिलाओं और बच्चों को लेकर चलने में एक अतिरिक्त सावधानी की जरूरत रहती है, और हम अपने आसपास हर दिन हादसों में कई मौतों को देखते हुए भी ऐसी सावधानी अगर नहीं बरतते हैं, तो हम ऐसी गैरजिम्मेदारी अपनी अगली पीढ़ी को भी विरासत में दे जाते हैं। यहां पर हम कुछ ही बातों को लिख पा रहे हैं कि लोगों को नए साल को बेहतर बनाने के लिए, जिंदगी को सुरक्षित और सेहतमंद बनाने के लिए क्या-क्या करना चाहिए, और लोग अपने हिसाब से ऐसी लिस्ट बना सकते हैं, पूरे परिवार के साथ बैठ सकते हैं, और नए साल को एक बेहतर तरीके से मना सकते हैं। कोई भी बात अगर मुश्किल लगती है तो यह याद रखने की जरूरत है कि हजार मील का सफर भी पहले कदम के बाद ही शुरू होता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 दिसंबर

तीन तलाक विरोधी कानून का साथ देने की जरूरत

संपादकीय
28 दिसम्बर 2017


भारतीय संसद में इस वक्त मुस्लिम महिला के अधिकारों के लिए एक नया कानून बनाने पर चर्चा चल रही है। भारत की कानूनी व्यवस्था के मुताबिक एक मुस्लिम मर्द को यह धार्मिक अधिकार प्राप्त है कि वह तीन बार तलाक कहकर अपनी बीवी को छोड़ दे। और समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते भी हैं। मुस्लिम विवाह कानून या इस्लाम के नियमों के मुताबिक कई देशों में इस किस्म के तलाक पर रोक लग चुकी है क्योंकि कई बार पुरूष प्रधान समाज में एक आदमी तैश में आकर अपनी पत्नी पर नाराजगी उतारने पर उतारू हो जाता है, और ऐसे में वह शादी खत्म हो जाती है, और फिर अगर वह आदमी दुबारा उसी औरत से शादी करना भी चाहे, तो भी उसके लिए बहुत ही जटिल और सामाजिक रूप से खराब नियम हैं। लेकिन हम अभी मुस्लिम विवाह, तलाक, और पुनर्विवाह की जटिलताओं की चर्चा में वक्त जाया करना नहीं चाहते, बल्कि आज संसद में पेश हुए इस कानून की बात करना चाहते हैं।
भारत में किसी भी मौजूदा कानून में फेरबदल या कि नया कानून बनाने के लिए संसद या विधानसभाएं ही एक जगह होती हैं, और कई धर्मों के कानूनों को लेकर पहले भी ऐसा होते आया है। भारत में ही सतीप्रथा को रोकने के लिए कानून बना, बालविवाह को रोकने के लिए कानून बना, और ये दोनों ही बुरी प्रथाएं हिन्दू समाज में ही चल रही थीं। बालविवाह हिन्दुओं से परे आदिवासियों के बीच भी आज भी जारी एक प्रथा है, लेकिन कानून की मदद से बच्चों की ऐसी शादियां रोकने की कोशिशें लगातार होती हैं। इसलिए हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि किसी समाज के बहुमत को सहमत करने के बाद ही उस समाज में सुधार का कोई कानून बनना चाहिए। समाज में अधिकतर लोग ऐसे मौन रहने वाले होते हैं कि कोई जनमतसंग्रह भी हो जाए, तो भी वे चुप्पी ही साधे रखेंगे। और समाज के जो ठेकेदार रहते हैं, वे लगातार कट्टरता को बढ़ावा देकर, पुरानी रूढिय़ों को बढ़ावा देकर समाज को अपने कब्जे में रखने की कोशिश जारी रखते हैं। हमने कुछ दशक पहले इसी भारतीय संसद में एक मुस्लिम महिला शाहबानो के जायज हक कुचलने के लिए राजीव गांधी की अस्वाभाविक बहुमत वाले संसदीय बाहुबल का इस्तेमाल देखा था जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए कट्टरपंथियों के दबाव में राजीव गांधी ने आत्मसमर्पण कर दिया था, और एक विदेश-शिक्षित, पायलट, नौजवान, और धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री ने मुस्लिम कट्टरता के सामने संसद को झोंक दिया था।
हमारा मानना है कि देश में धर्मों से परे कुछ ऐसे बुनियादी मुद्दे तय होने चाहिए जो कि इंसान को इंसान की तरह मानने वाले हों। कल अगर हिन्दू औरत को सती होने से रोकने का कानून बनाया गया था, तो आज एक मुस्लिम महिला को तलाक देने के खिलाफ ऐसा कानून बनाने में क्या हर्ज है? आज संसद में जो लोग इस कानून का विरोध करेंगे, वे लोग न केवल मुस्लिम महिलाओं की नाराजगी झेलेंगे, बल्कि वे देश की तमाम महिलाओं को भी नाराज करेंगे। और इतिहास में ऐसे लोगों का नाम दर्ज होगा। हम आज महज इस बिना पर इस प्रस्तावित कानून के विरोध के खिलाफ हैं कि इस कानून को लाने वाली सरकार की छवि एक हिन्दू सरकार की है, या कि एक मुस्लिम-विरोधी सरकार की है। छवि की ऐसी समस्या से परे आज यह सोचने की जरूरत है कि न्यायसंगत और तर्कसंगत बात क्या है, और उसी का साथ देने के लिए लोगों को खड़ा होना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 दिसंबर

बच्चों का यौन शोषण और पोर्नोग्राफी की भयानक कहानी

संपादकीय
27 दिसम्बर 2017


केरल में अभी पुलिस ने लोगों के एक ऐसे समूह को पकड़ा है जो कि आपस में अपने बच्चों के अश्लील वीडियो बनाकर, उनकी नग्न तस्वीरें खींचकर शेयर करते थे, और इस समूह को चलाने वाले ने ऐसे पांच हजार लोगों को जुटा लिया। यह मुस्लिम नौजवान इस बात की वकालत करता था कि जब तक बच्चियां चार बरस की रहें, उनसे बलात्कार करने में कोई हर्ज नहीं है क्योंकि इस उम्र की बातें उनको याद नहीं रहती। यह आदमी अपनी ही बच्चियों से बलात्कार करते उनके भी वीडियो पोस्ट करता था। केरल पुलिस ने इन पांच हजार लोगों को पकडऩे की पूरी कोशिश की है, लेकिन ये लोग मोबाइल फोन के एक ऐसे मैसेंजर, सिग्नल, का इस्तेमाल करते हुए जहां किसी को पकड़ा नहीं जा सक रहा है। इन लोगों ने अपने सरीखे हजारों लोगों के साथ ऐसे वीडियो शेयर करने का काम कर रखा था और इसमें गिरफ्तारियां शुरू हो गई है।
बच्चों के साथ बलात्कार के मामले तो सामने आते रहते हैं, लेकिन जब उनके मां-बाप ही उनसे बलात्कार करने लगें, और उसकी फोटो या वीडियो दूसरों में बांटने लगें, तो यह एक बहुत ही गंभीर जुर्म भी है, और शायद मानसिक बीमारी भी है। भारत में अधिकतर लोगों का यह मानना रहता है कि बच्चों के साथ आसपास के लोग, परिवार के लोग ऐसा सुलूक नहीं कर सकते और महज अनजान लोग ही उनका यौन शोषण कर सकते हैं। अधिकतर परिवारों में अगर बच्चे किसी पारिवारिक सदस्य या करीबी के बारे में कोई शिकायत भी करते हैं, तो मां-बाप उन्हें डांटकर चुप कर देते हैं। ऐसे में बच्चों के पास कहीं और जाकर शिकायत करने की कोई गुंजाइश बचती नहीं है। लेकिन पूरी दुनिया की तरह भारत में भी चाईल्ड पोर्नोग्राफी का खतरा है जो कि मौजूद है, और बच्चों का यौन शोषण एक हकीकत है। दुनिया के किसी भी दूसरे गरीब देश की तरह भारत में भी गरीब बच्चे इसके शिकार अधिक होते हैं, लेकिन केरल से यह जो मामला सामने आया है, इसमें वहां तो ऐसी गरीबी भी नहीं है, वहां तो लोग पढ़े-लिखे भी हैं, और अगर ऐसे गिरोह में मुस्लिम लोग ही सरगना हैं, तो फिर उनके धर्म की रोक-टोक भी उनके गलत कामों को नहीं रोक पाई। इसलिए बच्चों का यौन शोषण संपन्नता से परे, शिक्षा से परे, धर्म से परे एक अलग किस्म का खतरा है जिससे कोई भी बच्चा सुरक्षित नहीं है।
बच्चों को ऐसे शोषण से बचाने के लिए उनको जागरूक बनाना, उनके आसपास के माहौल को तरह-तरह की निगरानी से सुरक्षित रखना, और बच्चों के मां-बाप को भी जागरूक करना एक समाधान हो सकता है। इस बारे में सरकारों को पहल करनी चाहिए, समाज को शामिल करना चाहिए, और फिर अलग-अलग किस्म के संगठन अपने-अपने सदस्यों को इस खतरे की तरफ से जागरूक करते चलें, इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। श्रीलंका या बैंकाक की तरह ही भारत में भी गोवा में पर्यटकों की बड़ी मौजूदगी के बीच बच्चों के यौन शोषण की बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अब एक दूसरा बड़ा पर्यटक-राज्य केरल ऐसी भयानक खबर लेकर आया है। पूरे देश को इससे चौकन्ना होने की जरूरत है, ऐसी खबरों को अनदेखा करना कोई इलाज नहीं होगा, लोगों को अपने आसपास के लोगों से इस खतरे के बारे में खुलकर बात करनी होगी, और हर किसी को अपने आसपास के बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए कोशिश करनी होगी। हर राज्य सरकार को अपने नागरिक संगठनों को साथ लेकर तुरंत ही ऐसी जागरूकता का अभियान चलाना चाहिए। दूसरी बात यह कि देश में आईटी एक्ट तो बहुत मजबूत है, लेकिन वह अदालत में किसी को सजा नहीं दिला पा रहा है। ऐसे में इंटरनेट या सोशल मीडिया पर, या कि किसी मैसेंजर सर्विस पर इस तरह के वीडियो आगे बढ़ाकर जो लोग समाज को एक खतरनाक जगह बना रहे हैं, उन्हें अपने बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए। कुल मिलाकर यह दुनिया एक भयानक जगह है, और लोगों को अपने बच्चों को बचाने के लिए इस पूरी दुनिया को सुरक्षित बनाना पड़ेगा, महज अपने घर को सुरक्षित रखकर, महज अपने बच्चों को सुरक्षित रखकर कुछ भी नहीं हो सकेगा। (Daily Chhattisgarh)

शहरी विकास में बेदखल ठीक तरह से बसाए जाएं

संपादकीय
26 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज सुबह कई दर्जन छोटी दुकानें गिराकर शहर के बीच बनने जा रहे एक बड़े जंगल के लिए जगह बनाई गई। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां की पिछले डेढ़ दशक में शहरों का बड़ा विकास हुआ है, वहां इस तरह की बात कभी आ सकती है कि लोगों को बेदखल करके एक बड़ी योजना के लिए जगह बनाई जाए। शहर के बीच से 70 छोटी दुकानों को हटाया गया है और शासन-प्रशासन से यह उम्मीद की जाती है कि इन छोटे कारोबारियों को नुकसान न होने देकर इन्हें कहीं ऐसी जगह फिर से बसाया जाए, जहां कि इनका काम चल सके। हमने शहर के कई दूसरों हिस्सों से लोगों के घर हटाए जाते देखे हैं जहां पर तालाब था और उसे फिर से तालाब कायम करने के लिए लोगों को हटाया गया, और बेहतर मकान बनाकर दिए गए।
रायपुर में नया रायपुर तो एक नियोजित शहर है, जो कि पूरी योजना के साथ अगले सौ बरस की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। लेकिन पुराना रायपुर तो बिना किसी योजना के टुकड़े-टुकड़े में बना और बसा है। ऐसे में यह दिक्कत ऐसे किसी भी दूसरे शहर की तरह इस शहर पर भी आ रही है कि नई योजनाओं के लिए सरकार के ही बसाये गए दूसरे हिस्सों को तोड़ा जा रहा है। इस एक पहलू को देखते हुए हमको लगता है कि न सिर्फ इस शहर में, बल्कि राज्य के दूसरे शहरों में भी सरकार को किसी भी तरह का खर्च करने के पहले यह देख लेना चाहिए कि अगले पच्चीस-पचास बरस की कौन सी जरूरतें हो सकती हैं। इसी तरह सड़क-फुटपाथ, डिवाइडर और चौक बनाते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि क्या कुछ बरस के भीतर उनको फिर हटाने या तोडऩे की जरूरत पड़ेगी? यह सोचना इसलिए जरूरी है कि यह सब इस राज्य की उस आधी आबादी के पैसों से भी हो रहा है जो कि गरीबी की रेखा के नीचे जी रही है। आज भी प्रदेश में जरूरतें कम नहीं हैं, लेकिन वे जरूरतें लगातार बढ़ रहे, विकसित हो रहे ढांचे को देखते हुए दिखाई नहीं पड़ती हैं। हम पिछले बरसों में रायपुर में ही लगातार सड़कों और डिवाइडरों को टूटते हुए देख रहे हैं, और कांक्रीट का मलबा पहाड़ सरीखा इकट्ठा हो जाता है। यह एक बड़ा नुकसान है, और बिना योजना के तेज रफ्तार से खर्च का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।
रायपुर शहर के बीच जिस तरह से सरकार अपनी खुद की कॉलोनी को हटाकर एक बड़ा जंगल बना रही है, जिस तरह से शहर में एक से अधिक जगहों पर हरियाली के बीच लाइब्रेरी विकसित हो रही है, उससे पूरे शहर का नक्शा बदलेगा, और लोगों की जरूरतें पूरी होंगी। लोगों ने शहर में ऐसी सहूलियत अभी तक देखी नहीं है, इसलिए आज बहुत से लोगों को यह अंदाज नहीं है कि आबादी के बीच हरियाली का इतना बड़ा इलाका विकसित होना क्या मायने रखता है। ऐसे में जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है, उन लोगों को बसाने के लिए प्रशासन को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 दिसंबर

पाक जेल में पहुंची मां-पत्नी सद्भावना का एक कदम...

संपादकीय
25 दिसम्बर 2017


पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में कैद, और मौत की सजा पाए हुए कुलभूषण जाधव की मां और पत्नी इस वक्त वहां जेल में उससे मुलाकात कर रहे हैं। पाकिस्तान की फौजी अदालत द्वारा कुलभूषण को दी गई इस सजा के खिलाफ भारत में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपील की हुई है, जिस पर सुनवाई जारी है। इस बीच यह पहला मौका है कि पाक सरकार से वीजा पाकर कुलभूषण का परिवार वहां पहुंचा है, और उससे मिल पा रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच आमतौर पर ऐसा तनाव चलते रहता है कि वीजा की अर्जियों में से बहुत से लोगों को इजाजत नहीं मिलती, और इस मामले में अगर ऐसा हुआ होता तो फांसी की सजा में कैद इस हिन्दुस्तानी को परिवार से मिलना नसीब नहीं हो पाता। लेकिन दो-चार दिन पहले ही हमने इसी जगह यह लिखा है कि किस तरह भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भारत के पाकिस्तान-विरोधियों के फतवों को अनसुना करके वहां के सारे मरीजों को भारत में इलाज के लिए आने का वीजा देती हैं, और हर दिन ट्विटर पर ऐसी एक सद्भावना दिखती ही है जिसमें उनका दिया वीजा दिखता है, या कि भारत से इलाज कराकर लौटते हुए पाकिस्तानी परिवारों का शुक्रिया दिखता है।
जिन लोगों को भारत और पाकिस्तान की जेलों में कैद दूसरे लोगों की हालत का अंदाज नहीं है, उन्हें सआदत हसन मंटो की कहानी, टोबा टेकसिंह, जरूर पढऩी चाहिए कि विभाजन के वक्त जब जेल के कैदियों के बारे में यह तय नहीं हो पा रहा था कि वे किधर जाएंगे, तो उनमें से एक कैदी शायद मानसिक रूप से विचलित था, और उसकी दिमागी हालत ऐसे असमंजस में किस तरह की रहती है उसका जैसा भयानक ब्यौरा मंटो ने लिखा है, वह दिल दहला देता है। आज मंटो जैसे मजबूत कोई लेखक नहीं बचे, और शायद वैसा पढऩे की तकलीफ करने वाले लोग भी नहीं बचे, लेकिन फिर भी दोनों देशों में कैदियों के प्रति एक उदारता दिखाने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि राजधानियों में दोनों सरकारों के बीच बातचीत का माहौल आज चाहे न बन पा रहा हो, लेकिन अगर छोटी-छोटी कोशिशें होती रहेंगी, तो माहौल एक दिन ऐसा बदलेगा कि सरकारों को मजबूर होकर बात करनी पड़ेगी, और जंग का खतरा खत्म होगा।
हम लोगों को भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कुछ पहलू दिखाने वाली एक हिन्दी फिल्म भी याद दिलाना चाहते हैं, बजरंगी भाईजान। इस फिल्म में पाकिस्तान से भारत में भटक गई एक बच्ची की कहानी है जिसे एक हिन्दुस्तानी नौजवान उसके घर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाता है, और तमाम किस्म के खतरे उठाते हुए, परेशानियां उठाते हुए उसे उसके परिवार तक पहुंचाकर ही दम लेता है। ऐसा करते हुए उसकी अपनी जान खतरे में पड़ती है, लेकिन वह उस मूक बच्ची को परिवार तक पहुंचाना अपनी जिंदगी का मकसद बनाकर उसमें कामयाब भी होता है। यह है तो एक फिल्म, लेकिन इसमें जो संदेश छुपा हुआ है, उसे अगर देखें तो समझ आएगा कि सरहद के दोनों तरफ भलमनसाहत की कितनी इज्जत है। और यह बात सिर्फ फिल्मी कहानी में नहीं है, दोनों तरफ के लोग जब सरहद पार करके जाते हैं, तो वे दोस्ती की गर्मजोशी पाते हैं। आज की पाकिस्तान जेल की यह मुलाकात कुलभूषण की जान बचा पाएगी या नहीं, हम अभी उस पर नहीं जा रहे हैं। लेकिन यह बात कम नहीं होती है कि मौत की सजा पाए हुए एक कैदी को उसके परिवार से मिलने का एक मौका मिले। यह सद्भावना आगे बढऩी चाहिए और भारत-पाक को कैदियों की अदला-बदली के बारे में भी सोचना चाहिए। एक-दो दिन पहले ही हमने पाकिस्तानी फौज के मुखिया के एक बयान पर लिखा था जिन्होंने भारत के साथ अच्छे रिश्तों की वकालत की थी, और आज का यह कदम उसी सिलसिले की एक कड़ी है। दुश्मनी बहुत भारी पड़ती है, और सबसे अधिक भारी सबसे अधिक गरीब पर पड़ती है। इसलिए अपने-अपने गरीबों की फिक्र करते हुए इन दोनों देशों को दोस्त बनना चाहिए, या कि कम से कम दुश्मनी भुलानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर

बड़े-बुरे को छोड़कर-भूलकर छोटे-बुरे के खिलाफ कोशिश

संपादकीय
24 दिसम्बर 2017


लोगों का मूल्यांकन करते हुए दुनिया उनकी खूबियों और खामियों के बीच कई बार उलझ जाती है। अभी किसी ने इटली के कुछ सदी पहले के एक सबसे चर्चित कलाकार लियोनार्दो दा विंची की इस खूबी के बारे में लिखा कि वे बाजार में बिक रहे पशु-पक्षियों को इसलिए खरीद लेते थे, कि वे उनको आजाद कर सकें। लेकिन इटली के उन्हीं के जीवनकाल के दूसरे पहलू को देखें तो यह दिखता है कि वहां पर दास प्रथा कायम थी, और गुलाम खरीदे-बेचे जाते थे, और इस कलाकार की मौत के बरसों बाद पोप ने गुलाम प्रथा के खिलाफ फतवा जारी किया था। अब पशु-पक्षियों को आजाद करने की खूबी तो है, लेकिन उसी दौर में इंसानों की मंडी के खिलाफ कुछ न कहने की बात के मुकाबले यह बात दब जानी चाहिए थी। 
आज भी दुनिया भर में बहुत से लोग बेईमानी से करोड़ों कमा लेते हैं, और उसमें से कुछ लाख खर्च करके समाजसेवा का कोई ऐसा काम करते हैं जो कि सामने दिखता है। सतह पर देखकर अपना मन तय करने वाले लोग ऐसे लोगों को महान समाजसेवक मान लेते हैं, और उनके गुणगान करने लगते हैं। ऐसा ही दुनिया के बहुत से लोगों के शाकाहारी होने, या उनके शराब न पीने, या उनकी जिंदगी बहुत अनुशासित होने को लेकर मान लेते हैं, और उनके सात खून माफ कर देते हैं। दुनिया के बुरे से बुरे लोगों की कुछ खूबियों को लेकर उनकी खामियों को अनदेखा करने की चूक कर बैठते हैं। 
इसी तरह अच्छे लोगों की कुछ बुरी बातों को, उनके कुछ गलत कामों, या उनकी कुछ गलतियों को लोग उनकी अच्छी बातों से ऊपर देखना और दिखाना शुरू कर देते हैं। भारत में जवाहर लाल नेहरू के जो सबसे सक्रिय आलोचक हैं, उनके पास नेहरू की दो-तीन तस्वीरें हैं। एक में वे सिगरेट पीते दिख रहे हैं, और एक में वे एडविना माउंटबेटन के साथ हंसते हुए दिख रहे हैं। इन दो को लेकर नेहरू को बदचलन साबित करने की कोशिश आधी सदी से चली आ रही है, और अब डिजिटल जमाना आ जाने के बाद लोगों को यह लगता है कि अगर इन दो तस्वीरों को चारों तरफ बांटा नहीं गया, तो उग्र-राष्ट्रवाद में योगदान देना नहीं हो पाएगा। कुछ लोग इससे भी अधिक आगे बढ़ते हैं और किसी विदेशी महिला के साथ गांधी के डांस करने की एक फर्जी तस्वीर को यह बताते हुए फैलाते हैं कि गांधी कितने बदचलन थे। 
लेकिन ऐसी साजिशों से परे अगर महज हकीकत की बात करें, तो लोगों को किसी की खूबी या खामी को एक व्यापक संदर्भ में ही देखना चाहिए। नेहरू के मांसाहारी होने को जो लोग उनके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं, उनको यह भी सोचना चाहिए कि उनके अपने साथी इस देश में गांधी से लेकर गुजरात तक कितना लहू बहा चुके हैं। उनको यह भी याद रखना चाहिए कि जिस गाय को बचाने के नाम पर लोग वाहवाही पाते हैं, उनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो कि गाय को लेकर इंसानों के कत्ल पर कुछ भी नहीं बोलते। ऐसे लोगों का मूल्यांकन हर एक बयान के बाद नहीं हो सकता, लेकिन जो समझदार लोग हैं वे दूसरों की खूबियों के बिना उनकी खामियों का मूल्यांकन नहीं करते, और न ही उनकी खामियों के बिना उनकी खूबियों का। 
गरीबों का हक दबाने वाले लोग जब सड़क किनारे प्याऊ और भंडारे खोलकर गरीबों की सेवा का नाटक करते हैं, तो उन्हें समाजसेवी मान लेने के पहले उनके बारे में गहराई से कुछ सोच भी लेना चाहिए। यह बात आसान नहीं है, क्योंकि यह बात बहुत कड़वाहट फैलाने वाली है, लेकिन दुनिया के जो गंभीर और जिम्मेदार लोग हैं, वे कतरा-कतरा बातों पर किसी के बारे में अपनी धारणा नहीं बनाते। इसलिए छोटी-छोटी खूबियों और खामियों से उबरकर एक व्यापक नजरिए से लोगों के बारे में, मुद्दों के बारे में सोचना सीखना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

पाक फौजी जनरल की ओर से समझदारी की एक बात

संपादकीय
23 दिसम्बर 2017


बहुत दिनों बाद पाकिस्तान की फौज के किसी अफसर से एक समझदारी की बात सामने आई है जो कि युद्धोन्माद से परे की है, और दोनों देशों के ताकतवर लोगों के लिए एक संदेश भी है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने भारत से रिश्ते सुधारने की वकालत की है। उन्होंने पाकिस्तान के सांसदों को आश्वासन दिया है कि पाकिस्तानी सेना उनके प्रयासों का समर्थन करेगी। मंगलवार को पाकिस्तान की सीनेट कमेटी की बैठक में दिए अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा, सेना भारत के साथ संबंध सामान्य करने के तहत उठाए गए राजनीतिक कदमों का समर्थन करती है। पाकिस्तानी सेना को लेकर आम तौर पर माना जाता है कि वह भारत के खिलाफ रहती है। इसलिए उसके मौजूदा मुखिया के इस बयान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि इस मौके पर जनरल बाजवा ने कुछ बातें भारत के खिलाफ भी कही हैं, लेकिन हम उन पर जाना नहीं चाहते। तनाव बढ़ाने के लिए तो किसी की भी कुछ बातों को पकड़ा ही जा सकता है, लेकिन तनाव घटाने के लिए जब कभी कोई बात सामने आती है तो उसका इस्तेमाल करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि किसी भी देश की फौज को बहुत सारे मुद्दों का इलाज जंग में दिखता है क्योंकि उनकी पूरी ट्रेनिंग और उनकी पूरी सोच उसी किस्म से बनी रहती है। इसके साथ-साथ फौज का अस्तित्व भी जंग के समय ही लोगों को दिखता है, इसलिए भी भारत और पाकिस्तान के बहुत से मौजूदा फौजी अफसर, और अधिकतर रिटायर्ड फौजी अफसर टीवी के चैनलों पर जंग के फतवे देते दिखते हैं। हमारा मानना है कि ऐसी बकवास से दोनों ही देश अपने गरीबों को अनदेखा करते हुए फौज पर अंधाधुंध खर्च करते हैं जो कि इन दोनों ही देशों के लिए आत्मघाती है, लेकिन उसे आत्मगौरव से और राष्ट्रवाद से इस तरह जोड़ दिया गया है कि देश के लोगों को भूखे रहकर भी सरहद के लिए फौजी सामान खरीदना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच कई जंग हो चुकी हैं, लेकिन उससे न तो कोई नतीजा निकला है, और न ही निकलेगा। इन दोनों ही देशों ने परमाणु हथियार बना रखे हैं, लेकिन आज के अंतरराष्ट्रीय माहौल में किसी भी लोकतांत्रिक देश के फौजी हथियार उसके अपने अहंकार की सेवा करने के अलावा और किसी काम के हैं नहीं। भारत और पाकिस्तान के बीच किसी तरह की परमाणु जंग न चीन होने देगा, और न अमरीका, और न ही रूस। ऐसे में इन दोनों देशों को सरहद पर तनाव घटाना चाहिए, दोनों देशों के बीच आम लोगों के रिश्ते लगातार बढ़ाना चाहिए, कारोबार लगातार बढ़ाना चाहिए, खेलकूद से लेकर संगीत और कला तक का आना-जाना बढ़ाना चाहिए। यहां पर हम एक खास जिक्र भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का करना चाहेंगे जो कि लगातार ट्विटर पर दिखती हैं और पाकिस्तान के लोगों को इलाज के लिए भारत आने का वीजा मंजूर करते हुए उन्हें बेहतर सेहत के लिए शुभकामनाएं भी देती हैं। हमारा मानना है कि ऐसी ही सद्भावना से हम सरहद के दोनों तरफ के सबसे गरीब लोगों को उनका बेहतर हक दे पाएंगे। इसके अलावा और कोई जरिया आज दुनिया में नहीं है। फौजी तनाव किसी के काम का नहीं है। और भारत और पाकिस्तान के बीच तो कारोबार की इतनी गुंजाइश है कि दोनों तरफ के बहुत से लोगों को इससे फायदा होगा।
जनरल बाजवा ने जो कहा वह पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय बात नहीं मानी जाएगी, लेकिन वह बात बहुत महत्वपूर्ण है, और भारत की तरफ से उसका कोई फौजी जवाब न जाकर, लोकतांत्रिक जवाब जाना चाहिए। जब-जब कोई देश अपनी विदेश नीति को, पड़ोसियों से अपने रिश्तों को फौजी अफसरों पर छोड़ते हैं, तो वे आमतौर पर जंग की बातें करने लगते हैं। भारत एक अधिक मजबूत लोकतंत्र है, और उसे ऐसी बातों से बचना चाहिए। किसी भी तरफ से एक सकारात्मक पहल हुई है, और उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 दिसंबर

अविश्वास प्रस्ताव, चुनाव के पहले सत्ता के लिए चेतावनी

संपादकीय
22 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस वक्त विपक्षी कांग्रेस पार्टी रमन सरकार के खिलाफ अपना अविश्वास प्रस्ताव पेश कर चुकी है, और उस पर आगे चर्चा जारी है। सदन के भीतर कोई भी फैसला विधायकों के आंकड़ों से होता है, इसलिए इस अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की संभावना या आशंका शून्य रहते हुए भी, इसका एक महत्व है। संसदीय लोकतंत्र में संसद या विधानसभाओं का इस्तेमाल मुद्दों को उठाने के लिए, सरकार को घेरने के लिए, उससे जवाब मांगने के लिए होना चाहिए, न कि नारेबाजी और बहिर्गमन के लिए। इसलिए जब कभी सदन में गंभीर चर्चा होती है, हम उसे वहां पर विपक्षी शक्ति प्रदर्शन के मुकाबले बेहतर मानते हैं, और अभी छत्तीसगढ़ विधानसभा में ऐसा ही चल रहा है। कांग्रेस ने राज्य सरकार के मौजूदा कार्यकाल में शायद अपने इस आखिरी शक्ति प्रदर्शन पर बड़ी मेहनत की है, और करीब डेढ़ सौ मुद्दों को उसने अविश्वास प्रस्ताव में रखा है। हर मंत्री, हर विधायक के खिलाफ भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के आरोप लगाए हैं, और आने वाले कुछ घंटों में सरकार उनका जवाब देगी, और फिर शायद ध्वनिमत से या मतदान से अविश्वास प्रस्ताव का फैसला होगा।
कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव को देखें, तो यह सदन से बाहर राज्य सरकार के लिए एक अच्छी नसीहत भी है कि अगले चुनाव में कांग्रेस किन बातों को मुद्दा बनाएगी, इसकी एक झलक उसे अभी मिल जा रही है, और इसमें अगर किसी सुधार की गुंजाइश है, तो सरकार अगले नौ महीनों में इन आरोपों के जवाब ढूंढ सकती है, महज सदन में बताने को नहीं, जनता के बीच उसे सहमत कराने के लिए भी। सरकार हो या विपक्ष, हर राजनीतिक दल को किसी भी मौके में संभावनाएं ढूंढनी चाहिए। आरोपों के बीच भी इस आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन की संभावना बनती है कि क्या सचमुच ही सरकार ने ऐसी गलती की है, या कि ऐसे गलत काम किए हैं, जिनसे कि बचा जाना चाहिए था, बचा जा सकता था, और अब उनके हो जाने के बाद वे दुहराए न जाएं, इसकी गारंटी कैसे की जाए। हम जब इन डेढ़ सौ मुद्दों को देखते हैं, तो लगता है कि इनमें सभी किस्म की मिलीजुली बातें हैं, बहुत सी बातें गलत काम हैं, बहुत सी बातें गलतियां हैं, और बहुत सी बातें सरकार के खिलाफ एक जनधारणा है। यह अविश्वास प्रस्ताव रमन सरकार के मौजूदा कार्यकाल के आखिरी बरस में तब आया है जब चुनाव का माहौल पूरी तरह से जोर पकड़ चुका है। सरकार के भीतर के लोग भी इसे कांग्रेस का चुनावी बिगुल मानकर चल रहे हैं, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि सरकार सदन में जवाब देने के बाद भी इस दस्तावेज को लेकर बैठेगी, और डैमेज-कंट्रोल की कोशिश करेगी। और ऐसा होना भी चाहिए।
हमारा मानना है कि विधानसभा के भीतर या विधानसभा के बाहर, किसी पार्टी के नफे-नुकसान से परे राज्य के हित में तमाम किस्म की गलतियां उजागर होनी चाहिए, और गलत कामों का भांडाफोड़ भी होना चाहिए। ऐसी उम्मीद है कि अगले नौ महीने में ऐसी कोई नई बातें सरकार सामने नहीं आने देगी, लेकिन अभी जो बातें सामने आई हैं, उनमें से कोई चुनावी मुद्दा न बन सके, इसके लिए सरकार को मेहनत भी करनी होगी, और कार्यकाल का आखिरी का छोटा सा हिस्सा बिना ऐसे किसी विवाद के ठीक से गुजारने की कोशिश भी करनी होगी। इस आरोप पत्र के साथ कांग्रेस पार्टी पूरे आक्रामक तेवर लेकर मैदान में है। और इस आरोप पत्र से परे प्रदेश में इन दिनों लगातार गुंज रहे सेक्स-सीडी कांड में कांग्रेस जांच में घिरी हुई है, और उसके प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल पर भी आरोप लगे हैं। आने वाले दिनों में सीबीआई की जांच भूपेश बघेल तक पहुंच सकती है, ऐसी आशंका बहुत से लोगों को है। ऐसे में सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़वाहट और टकराहट और आगे बढ़ेगी। फिलहाल हमारी सलाह यही है कि छत्तीसगढ़ सरकार को, और सत्तारूढ़ भाजपा को इस आरोप पत्र की तमाम बातों को लेकर एक आत्ममंथन करना चाहिए कि ऐसी नौबत क्यों आई, और जनता को इसके खिलाफ सहमत कराने के लिए क्या-क्या करना होगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 दिसंबर

यूपीए और मोदी, दोनों सरकारों के तहत बरसों की सीबीआई जांच, 2जी में हाथ आया शून्य

संपादकीय
21 दिसम्बर 2017


सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का जिक्र करते हुए पौन दो लाख करोड़ रूपए के एक संभावित-नुकसान का हिसाब लगाया था। इस रिपोर्ट को लेकर उस वक्त की यूपीए सरकार और उसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर एनडीए गठबंधन के दलों ने जमकर हमला किया था, और एक हिसाब से ऐसा माना जाता है कि यूपीए की आम चुनाव की शिकस्त में इन आरोपों का खासा बड़ा योगदान था। ऐसे में 2011 से अदालत में चल रहे इस मामले में आज सभी सत्रह आरोपी बरी कर दिए गए, और जज ने कुल एक लाईन का फैसला सुनाया कि सीबीआई कोई भी लेन-देन साबित नहीं कर सकी, इसलिए सभी लोगों को बरी किया जा रहा है। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने संसद के भीतर और बाहर यह कहा है कि जिस कथित भ्रष्टाचार को लेकर यूपीए को हरा दिया गया था, आज वह भ्रष्टाचार का मामला गलत साबित हुआ है।
यह मामला यूपीए सरकार के दौरान स्पेक्ट्रम आबंटन में घोटाले के आरोपों के साथ सामने आया था, और उसी वक्त इस मामले की सेंट्रल विजिलेंस कमीशन के हुक्म पर सीबीआई जांच शुरू हो गई थी। इस वक्त दूरसंचार मंत्री रहे, कांग्रेस के एक सहयोगी दल तमिलाडु के डीएमके के ए.राजा सहित, डीएमके के मुखिया करूणानिधि के परिवार के और लोगों को, बड़ी-बड़ी दूरसंचार कंपनियों के बड़े अफसरों को इसमें आरोपी बनाया गया था। भारत का 2014 का आम चुनाव इस कथित भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाकर लड़ा गया था, और कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए का इसमें सफाया हो गया था। तब से अब तक मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली सीबीआई को इस फैसले के आने के पहले जांच और मुकदमे के लिए तेरह सौ से अधिक दिन और मिले थे। इस तरह यूपीए और एनडीए सरकार के तहत साढ़े सात बरसों से चले आ रहा इस मामले में सीबीआई कुछ भी साबित नहीं कर सकी। इसलिए यह अटकल लगाना गलत होगा कि उस वक्त सीबीआई ने यूपीए के मातहत हजार दिनों में जांच में बेईमानी की, या कि अब मोदी सरकार के तहत इन तेरह सौ से अधिक दिनों में बेईमानी की। ऐसे में आज डीएमके और कांग्रेस के नेताओं के खुश होने का हक बनता है, और यूपीए दलों का यह कहने का हक बनता है कि जो भ्रष्टाचार हुआ ही नहीं है, उस मुद्दे पर उनकी सरकार चली गई।
कुछ लोग सीबीआई की इस विशेष अदालत में सीबीआई के केस हार जाने को इस बात से जोड़कर देख रहे हैं कि क्या एनडीए तमिलनाडु में डीएमके के साथ अदालत में नरमी बरतवाकर आगे उससे गठबंधन या तालमेल का रास्ता तैयार कर रही है? अगर ऐसा है भी, तो भी यह कोई अनहोनी बात नहीं होगी क्योंकि सीबीआई पर इस तरह की तोहमतें अलग-अलग समय पर अलग-अलग पार्टियों से लगती ही रही हैं। फिलहाल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर डीएमके के नेताओं और पारिवारिक सदस्यों तक के लिए यह एक राहत की बात है, और बहुत बड़ी राहत की बात है। अब सीबीआई इस फैसले के खिलाफ आगे अपील करती भी है, तो ऊपर की किसी अदालत में इसका फैसला आने के पहले शायद देश का अगला आम चुनाव हो चुका रहेगा। सीबीआई की इस मामले में नाकामयाबी थोड़ा सा हैरान जरूर करती हैं कि विशेष अदालत ने उसके मामले में कुछ भी साबित होते नहीं पाया। हमारा ख्याल है कि गुजरात के चुनाव में बेहतर नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी के लिए आज का दिन एक और नया उत्साह लेकर आया है जब उसकी सरकार के खिलाफ चल रहा देश का भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मामला अदालत में औंधे मुंह गिर गया।
यह मामला भारत के इतिहास में एक अनोखे किस्म का मामला इसलिए था कि इस स्पेक्ट्रम आबंटन में गड़बड़ी का आरोप लगाने वाली जनहित याचिकाओं पर सेंट्रल विजिलेंस कमीशन ने 2009 में सीबीआई को जांच शुरू करने का आदेश दिया था। इसके बाद 2010 में सीएजी की रिपोर्ट आई, जिसमें संभावित-नुकसान के सीएजी के निष्कर्ष पर आगे बढ़ा यह मामला आज पहली अदालत में फैसले तक पहुंचा। इस जांच ने अपना लगभग आधा हिस्सा यूपीए सरकार के कार्यकाल में पूरा किया, और आधे से कुछ अधिक हिस्सा मोदी सरकार के कार्यकाल में। आठ बरस से अधिक  लंबी जांच और मुकदमेबाजी से आज हासिल आया शून्य, सिवाय यूपीए सरकार के हाथ शिकस्त, और मोदी के सिर पर ताज के। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 दिसंबर

अब समाचार-विचार का संपादक बाजार ही है...

संपादकीय
20 दिसम्बर 2017


इन दिनों दुनिया में सबसे लोकप्रिय बने हुए सोशल मीडिया, फेसबुक ने एक नया फीचर जोड़ा है कि आप अपने किसी फेसबुक-दोस्त की पोस्ट से अगर थके हुए हैं, तो आप अगले तीस दिनों के लिए उसकी तमाम पोस्ट देखने से बच सकते हैं। बस एक क्लिक, और एक महीने की नापसंदगी नजरों से परे। यह तो फेसबुक पर है, लेकिन असल जिंदगी में ऐसा थोड़ा मुश्किल है। हम सोचें कि अखबारों में अगले तीस दिन हम किसी एक घटिया बात को न देखें, तो वह मुमकिन नहीं है, हम यह सोचें कि टीवी चैनलों पर किसी एक चीज को न देखें, तो आज वह भी मुमकिन नहीं है, टीवी के न्यूज-बुलेटिन पर वहां के संपादक जो तय करते हैं, उसे उतनी देर और उसी सिलसिले से देखना जरूरी होता है।
लेकिन खबरों के डिजिटल मीडिया में धीरे-धीरे यह सहूलियत बढ़ती जा रही है। लोग अब गूगल के समाचार-पन्ने पर यह तय कर सकते हैं कि वे किन खबरों को अधिक देखना चाहते हैं, और किन खबरों को कम। लोग इन पन्नों को अपने हिसाब से डिजाइन भी कर सकते हैं कि वे किस तरह से इन्हें देखना चाहते हैं। बहुत सी समाचार वेबसाइटें भी यह सहूलियत देती हैं कि वहां पहुंचने वाले लोग किन विषयों को अधिक देखना चाहते हैं, और किनको देखना नहीं चाहते हैं। और यह बात दो हिसाब से अधिक मायने रखने लगी है। एक तो इसलिए कि अखबार हो या टीवी, या फिर वेबसाइट हो, उन पर विज्ञापनदाता वहीं पर अपना खर्च करना चाहते हैं जहां पर लोग अपना समय गुजारते हैं, जहां पर खबरों को देखते हैं। इसलिए अब मीडिया की यह मजबूरी भी हो रही है कि वह जनहित के मुद्दों को छोड़कर, महज जनरूचि के मुद्दों को छूते चले, उन्हें ही जगह दे। एक वक्त पब्लिक इंटरेस्ट की खबरों को दिखाया जाता था, या छापा जाता था कि वे जनता के हित में हैं। अब पब्लिक-इंटरेस्ट का मतलब महज जनता की दिलचस्पी की खबरें हो गया है।
दरअसल टीवी के दर्शक हों, अखबारों के पाठक हों, या कि डिजिटल मीडिया, ऑनलाईन मीडिया, या फोन पर आधारित मीडिया को देखने वाले लोग हों, अब लोगों के पास वक्त की कमी होने लगी है, समाचार माध्यम बढ़ते चले गए हैं, मूलधारा के समाचार माध्यमों से परे भी बहुत से नए-नए ऐसे समाचार-स्रोत हो गए हैं जिनसे लोगों का काम चलता है, बेहतर चलता है, इसलिए अब पूरे के पूरे मीडिया को अपने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलना भी पड़ रहा है। हम यह तो नहीं कहते कि यह नौबत लोगों का भला करने जा रही है, क्योंकि अब जो बिकता है वह दिखता है की नौबत साबित करने में अब हर किसी के पास कम्प्यूटर से मिलने वाले आंकड़े हैं कि किस खबर को लोग देखते हैं, कितनी देर देखते हैं, और किस खबर को छोड़ देते हैं। जब किसी समाचार या किसी विचार का महत्व उसे पढऩे वालों की गिनती, या उसके साथ मिलने वाले इश्तहार से तय होने लगी है, तो फिर अखबारनवीसी की पुरानी और परंपरागत सोच पूरी तरह से खारिज हो चुकी है। अब इंटरनेट पर समाचार-विचार का महत्व उन्हें लिखने वाले लोग तय नहीं करते, बल्कि कम्प्यूटर ही मालिक को यह बता देता है कि किस बात को कितने लोग देख या पढ़ रहे हैं, और इंटरनेट के कम्प्यूटर यह बता देते हंै कि वे देखने-पढऩे वाले लोग खरीददार हैं या नहीं, वे कितनी खर्च की ताकत रखते हैं।
इस सिलसिले ने एक वक्त की पत्रकारिता को, आज बहुत ही बुरी और गलाकाट स्पर्धा में बदलकर रख दिया है, इससे लोगों को एक क्लिक पर ही मनपसंद पढऩे तो मिल रहा है, लेकिन वह उनके लिए कितना अच्छा है, यह तय करने वाला बाजार है, कोई संपादक नहीं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 दिसंबर

मनमोहन सरीखे भले इंसान पर लगाई तोहमत नाजायज

संपादकीय
19 दिसम्बर 2017


संसद के दोनों सदनों में एक ऐसे मुद्दे पर सत्तारूढ़ एनडीए के सामने कांग्रेस और बाकी विपक्ष अड़ गए हैं कि प्रधानमंत्री संसद में आएं और यह साफ करें कि गुजरात चुनाव प्रचार में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की देश के प्रति वफादारी पर सवाल कैसे उठाया? कांग्रेस और बाकी विपक्ष यह भी मांग कर रहे हैं कि इस बयान के लिए नरेन्द्र मोदी सदन में आकर माफी मांगें। दरअसल गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान यह बात सामने आई कि दिल्ली में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के घर पर भारत और पाकिस्तान के कुछ ऐसे प्रमुख अमनपसंद लोग जुटे जो कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने में लंबे समय से लगे हुए हैं। इसके बाद मोदी ने अपनी आमसभाओं में यह आरोप लगाया कि मनमोहन सिंह और मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान के अफसरों और कूटनीतिज्ञों के साथ मिलकर साजिश कर रहे हैं। उन्होंने इस बात को बार-बार दुहराया और यह कहा कि गुजरात के चुनाव में पाकिस्तान दखल दे रहा है, और उसी साजिश के तहत इन लोगों ने बैठकर चर्चा की थी। मनमोहन सिंह ने बहुत ही शालीन शब्दों में मोदी की कही पूरी बात को खारिज किया था, और उस बैठक में मौजूद अधिकतर लोगों ने बयान जारी करके यह कहा था कि पूरी बैठक में गुजरात शब्द का भी इस्तेमाल नहीं हुआ था, न ही उस राज्य के चुनाव को लेकर किसी तरह की चर्चा हुई थी।
चुनाव प्रचार तो खत्म हो जाता है, लेकिन उसमें कही बातें लोगों को याद रहती हैं, और अब टेक्नॉलॉजी की मेहरबानी से ये ऑडियो-वीडियो इतिहास भी बन जाती हैं। नरेन्द्र मोदी ने जिस अंदाज में इस बैठक का चुनावी इस्तेमाल किया था, उसे लोग उस वक्त भी समझ गए थे, लेकिन वह माहौल ऐसा था कि कांग्रेस के एक दूसरे नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी को एक नीच आदमी कहकर भाजपा के हाथ एक बड़ा हथियार दे दिया था, और जिस सूरत में भाजपा को लगभग पूरी सीटें मिली हैं, वहां की सभाओं में मोदी ने उन्हें कही गई इस गाली को बार-बार दुहराया था, और अब ऐसा लगता है कि उसका असर भी मतदाताओं पर हुआ था। हालांकि यह एक और बात है कि इसके पहले भाजपा के कितने नेता सोनिया और राहुल के खिलाफ कितने तरह की गालियों का इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन ऐन चुनाव के बीच में मोदी को नीच कहकर कांग्रेस के एक लापरवाह नेता ने मानो कांग्रेस के हाथ से जीती हुई बाजी ही छीन ली।
लेकिन अभी मुद्दा यह है कि मोदी ने मनमोहन सिंह के बारे में जो कहा है, क्या उस पर उन्हें संसद में बयान देना चाहिए? हमारा ख्याल है कि भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में एक प्रधानमंत्री को कम से कम अपने ठीक पहले के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान से मिलकर गुजरात चुनाव के लिए साजिश करने की तोहमत नहीं लगानी थी। खासकर डॉ. मनमोहन सिंह एक ऐसे सज्जन नेता हैं, जिनसे लोगों को यह शिकायत तो हो सकती है कि वे राजनीति करना नहीं जानते, लेकिन हिंदुस्तान में मोदी के अलावा शायद ही किसी को यह भरोसा रहा है कि वे गुजरात में मोदी की भाजपा को हराने के लिए पाकिस्तान से मिलकर कोई साजिश करेंगे। और अगर हम अपने अंदाज का इस्तेमाल करें, तो हमें पूरा भरोसा है कि मोदी को खुद को अपनी इस तोहमत पर फूटी कौड़ी का भरोसा नहीं रहा होगा, और उन्होंने चुनावी इस्तेमाल के लिए ऐसी बात कही जिसका आज संसद में जवाब देना शायद नामुमकिन होगा।
संसदीय लोकतंत्र के साथ एक दिक्कत यह है कि वह महज सदन में बहुमत के आधार पर बनी सरकार तक सीमित नहीं रहता, वह देश में लोकतांत्रिक परंपराओं और सद्भावना तक फैला हुआ एक लचीला तंत्र है जो कि परस्पर सम्मान को बहुत महत्व देने वाला भी है। ऐसे लोकतंत्र में अगर न सम्मान रहे, न सद्भावना रहे, और महज चुनाव जीतने के लिए किसी सच को तोड़-मरोड़कर उसका जाहिर तौर पर झूठा इस्तेमाल रहे, तो यह चल तो सकता है, लेकिन यह न वर्तमान में सम्मान पा सकता, और न ही इतिहास में दर्ज होने के बाद। फिलहाल यह बहुत अफसोस की बात है कि मनमोहन सिंह सरीखे भले इंसान पर पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिश करने की तोहमत लगाई गई। ऐसे में संसद में लोगों की तकलीफ जायज है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 दिसंबर

कांग्रेस हार तो गई, लेकिन उसके बेहतर प्रदर्शन को अनदेखा करना चूक होगी

संपादकीय
18 दिसम्बर 2017


गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव के नतीजे मोटे तौर पर एक्जिट पोल के अनुमान के मुताबिक भाजपा के पक्ष में गए हैं, और 22 बरस से गुजरात में चली आ रही भाजपा सरकार और पांच बरसों के लिए चुन ली गई है, और हिमाचल में भ्रष्टाचार से लदी हुई कांग्रेस सरकार को जनता ने खारिज कर दिया है। इन चुनावों को दो वजहों से जरूरत से अधिक महत्व मिला था, गुजरात के भीतर पहली बार भाजपा के खिलाफ दो बड़े नौजवान सामाजिक आंदोलनों से उभरकर सामने आए थे, और ये दोनों ही भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे, या अपने लोगों को लड़ा रहे थे। दूसरी बात यह रही कि कांग्रेस के भीतर लीडरशिप की अगली पीढ़ी इन्हीं चुनावों के दौरान बदल रही थी, और राहुल गांधी की अगुवाई में गुजरात कांग्रेस एक अभूतपूर्व उत्साह के साथ चुनाव लड़ रही थी।
चुनावी नतीजे चाहे भाजपा की सरकार बना रहे हों, लेकिन वे खुद भाजपा के दावों और उनकी उम्मीदों के मुकाबले गुजरात में खासे पीछे रहे, और वहां कांग्रेस ने एक नई पकड़ साबित की है। यहां पर गुजरात के नतीजों को देखते हुए यह भी याद रखने की जरूरत है कि चुनाव प्रचार विकास के मुद्दे पर भाजपा ने शुरू किया था, और पाकिस्तान के मुद्दे पर खत्म किया। चुनाव विश्लेषकों ने यह कहा कि देश के किसी विधानसभा चुनाव में पहली बार पाकिस्तान के नाम का ऐसा इस्तेमाल हुआ, और खुद पाकिस्तान के बड़े लोगों ने ये बयान जारी किए कि भाजपा उनके नाम का इस्तेमाल न करे, और अपने दम पर चुनाव लड़े। हमारा यह कहना नहीं है कि इस एक रणनीति के बिना भाजपा चुनाव नहीं जीती होती, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी पूरी सरकार के साथ, पूरी पार्टी और तमाम मुख्यमंत्रियों के साथ गुजरात का मोर्चा सम्हालना पड़ा, और तकरीबन हर इलाके में खुद आमसभा करनी पड़ी। दूसरी तरफ मुकाबले में राहुल गांधी ने अकेले ही मोर्चा सम्हाला, और यह याद भी नहीं पड़ता कि कांग्रेस के कोई और बड़े नेता वहां पर जमकर बैठे हों।
अभी जब हम यह लिख रहे हैं, तब वोटों और सीटों का विश्लेषण आ ही रहा है, अभी तक जीत-हार का आंकड़ा तय नहीं हुआ है, और महज जीत-हार ही तय हुई है। इसलिए अगले एक-दो दिनों में यह साफ होगा कि हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवाणी जैसे गुजरात के दो ओबीसी और दलित नौजवान नेताओं के आंदोलनों ने क्या असर डाला है। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि दो बरस बाद देश में आम चुनाव होने हैं, और केन्द्र सरकार की, भाजपा की, हिन्दू संगठनों की बहुत से नीतियों के चलते हुए देश के आदिवासी, दलित, और ओबीसी समुदायों में अलग-अलग किस्म से बेचैनी है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि गुजरात से निकलकर इन दो नौजवानों की बेचैनी बाकी देश में भी चुनावी वोटों में तब्दील हो पाएगी, लेकिन भारत जैसे लोकतंत्र में माहौल अगर बनता है, तो उसकी शुरूआत इसी तरह किसी महत्वहीन लगते सिरे से शुरू होती है।
फिलहाल इन नतीजों के आने तक एक दूसरी बात जो साफ-साफ दिखती है, वह है कांग्रेस की नई लीडरशिप की शक्ल में राहुल गांधी की कामयाबी की। उन्होंने गुजरात चुनाव को बड़े दम-खम के साथ लड़ा, गरिमा के साथ लड़ा, देश की एकता को ध्यान में रखते हुए लड़ा, और वोटों की गिनती में भी वे पिछले चुनाव के मुकाबले खासे आगे बढ़े हैं, उनकी पार्टी ने सीटें भी बहुत अधिक हासिल की हैं। इसलिए यह मानना एक चूक होगी कि कांग्रेस की हार हुई है। भाजपा ने अपनी सरकार बचा ली है, लेकिन कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में ऐसी संभावनाओं के साथ कामयाब हुई है, जिसका असर वह उत्साह के साथ बाकी देश में भी लाने की कोशिश कर सकती है।
लगे हाथों हिमाचल पर अगर दो बातें कहें, तो पहली बात तो यह कि कांग्रेस को अपने भ्रष्ट नेताओं से छुटकारा पाना होगा। पूरे देश में मोदी को जो शोहरत हासिल हो रही है, उसमें इस जनधारणा का बड़ा हाथ है कि वे ईमानदार हैं। कांग्रेस को अगले आम चुनाव के पहले अपने भ्रष्ट और दुष्ट नेताओं से किनारा करना पड़ेगा, इसके बिना वह मोदी का मुकाबला नहीं कर पाएगी। राहुल गांधी के सामने आज एक क्लीन स्लेट है, और उन्हें राजनीति में अच्छी परंपराओं की इबारत लिखनी चाहिए। उन्होंने पूरे गुजरात चुनाव में अपने गंदगी से दूर रखा, भड़कावे और उकसावे के चुनावी तौर-तरीकों से दूर रखा, और देश के तमाम गंभीर राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात का नोटिस लिया है। हमारा यह भी मानना है कि देश की जनता भी ऐसी बातों का नोटिस आगे-पीछे कभी न कभी लेती है। शायद ही किसी को यह उम्मीद रही होगी कि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस जीतेगी, लेकिन गुजरात में उसने जो बेहतर प्रदर्शन किया है, उसे अनदेखा करना एक चूक ही होगी। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 18 दिसंबर

बात की बात, 18 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 18 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर

बलि की सोच एक संकेत है वैज्ञानिक सोच खत्म होने का

संपादकीय
17 दिसम्बर 2017


इस वक्त छत्तीसगढ़ के एक टीवी चैनल पर खबर आ रही है कि राजधानी के पास ही एक कस्बे में एक नाबालिग लड़की ने अपनी ही चार बरस की बहन को बलि चढ़ा दिया है। दूसरी तरफ कल ही अंधविश्वास के खिलाफ सबसे अधिक आक्रामकता के साथ बरसों से अकेले लडऩे वाले छत्तीसगढ़ के डॉ. दिनेश मिश्रा ने सरकार से यह मांग की थी कि छत्तीसगढ़ में कम्बल वाले बाबा नाम से चर्चा में बने हुए एक आदमी के कार्यक्रमों पर रोक लगाई जाए जो कि मरीजों को कम्बल उढ़ाकर उनका इलाज करने का दावा करता है। पिछले कुछ महीनों से छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा भी इस बाबा से इलाज करवाते हुए उसका प्रचार कर रहे हैं, और उसे स्थापित करने में पूरी ताकत लगा रहे हैं। ऐसे में डॉ. दिनेश मिश्रा ने सरकार को याद दिलाया है कि राज्य सरकार के ही अंधविश्वास विरोधी कानून के मुताबिक ऐसे बाबा पर तुरंत रोक लगाई जाए।
पाखंड और अंधविश्वास इनके नुकसान रातों-रात सामने नहीं आते हैं। इनसे लोगों की मानसिकता जख्मी होती है, और उनकी सोच अंधविश्वास में डूबकर कभी हिंसक हो जाती है, तो कभी बिना वजह अतिआत्मविश्वास का शिकार भी हो जाती है। लोगों को लगने लगता है कि उनका कैंसर भी किसी बाबा के भभूत से ठीक हो जाएगा, वे बाबाओं और उनके पाखंडों को चिकित्सा विज्ञान का विकल्प मानकर चलने लगते हैं, और ऐसा ही पाखंड अंधविश्वास को इतना बढ़ाने लगता है कि लोगों की तर्कशक्ति खत्म होने लगती है, वैज्ञानिकता पर से उनका भरोसा खत्म होने लगता है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में जगह-जगह महिलाओं को टोनही कहकर मारा जाता है, उनका बहिष्कार किया जाता है, और उनकी हत्या की जाती है। ऐसा ही अंधविश्वास बढ़कर छत्तीसगढ़ में हर कुछ हफ्तों में बलि की कोई न कोई हिंसा खड़ी कर रहा है। एक नाबालिग बच्ची ने अपनी नन्हीं सी बहन को बलि चढ़ा दिया, यह उसकी अपनी सोच नहीं है, सामाजिक माहौल में अंधविश्वास इतना बढ़ा दिया गया है कि कोई बाप अपने बेटे को बलि चढ़ा रहा है, तो कोई बच्ची अपनी छोटी बहन को बलि चढ़ा रही है।
और बात सिर्फ अंधविश्वास की नहीं है, बात है देश में एक वैज्ञानिक सोच को बनाने या खत्म करने की। जब कभी देश के लोगों से तर्कशक्ति को छीन लिया जाता है, उन्हें इतिहास को नकारने को कह दिया जाता है, तमाम किस्म के कड़वे सच को झूठ मानने के लिए कह दिया जाता है, जब कानून को छोड़ देने के लिए कह दिया जाता है, और लोगों की अपनी हिंसक सोच को ही कानून मान लिया जाता है, तो देश की तर्कशक्ति, उसकी न्यायप्रियता एक पूरे समाज के रूप में खत्म होने लगती है। समाज की सोच टुकड़ों में बन या बिगड़ नहीं सकती, वह पूरी की पूरी किसी एक रंग में रंगने का खतरा रखती है। जब लोगों को किसी धर्म के प्रति, किसी विचारधारा के प्रति, किसी संगठन या किसी नेता के प्रति, किसी मंदिर या किसी मस्जिद के प्रति अंधविश्वासी बनाया जाता है, तो वह सेमर के पेड़ से उसके फल के रेशों की तरह उड़कर दूर-दूर तक पहुंचने वाली बात रहती है। नेहरू ने जिस देश की सोच को बड़ी मुश्किल से वैज्ञानिकता की ओर ले जाने की कोशिश की थी, और उसमें बहुत हद तक कामयाबी भी पाई थी, वह पूरा सिलसिला अब खत्म करने की कोशिश हो रही है, और वह ऐसी बलि की शक्ल में कामयाबी भी बता रही है।
छत्तीसगढ़ हो या कि कोई और प्रदेश हो, केन्द्र सरकार के कानून हों, या कि किसी राज्य सरकार के कानून हों, वे महज कागजों पर ही रह जाएंगे, अगर जनता की सोच को रात-दिन की कोशिशों से उन कागजों के खिलाफ ढालने का काम चलता रहेगा। छत्तीसगढ़ में एक तरफ तो सरकार चिकित्सा सुविधाओं के लगातार विस्तार का दावा कर रही है, दूसरी तरफ उसी के गृहमंत्री तमाम सरकारी सुविधाओं के साथ जाकर अंधविश्वास को बढ़ावा देने की मॉडलिंग सी कर रहे हैं। डॉ. दिनेश मिश्र ने एक बहुत जायज बात को उठाया है, सरकार उनकी बात को पूरी तरह अनदेखा करते हुए, अपने मंत्री के पाखंड को अनदेखा करते हुए चल सकती है। और हो सकता है कि छत्तीसगढ़ में ऐसी बलि, महिलाओं को टोनही कहकर ऐसी हत्या महज पुलिस आंकड़े बनकर रह जाए, और यह प्रदेश अंधविश्वास में और अधिक डूब जाए।
-सुनील कुमार
Daily Chhattisgarh

चुनावी जीत-हार से परे कांग्रेस की एक बुनियादी परंपरा जारी

संपादकीय
16 दिसम्बर 2017


कांग्रेस पार्टी मोतीलाल नेहरू से जवाहर, इंदिरा, राजीव, सोनिया से होते हुए आज राहुल गांधी के हवाले हो गई है। कुनबापरस्त राजनीति की यह एक बड़ी लंबी मिसाल इसलिए है कि देश में बाकी कोई भी कुनबापरस्त राजनीतिक दल इतना पुराना नहीं है। नेहरू कुनबा 1919 से लेकर अब तक बीच-बीच में खासा अरसा इस पार्टी का अध्यक्ष रहा, यह एक और बात है कि बीच-बीच में दर्जनों दूसरे लोग भी इसके अध्यक्ष रहे। आजादी के पहले का एक दौर ऐसा था जब पार्टी नेहरू के कब्जे में नहीं थी, वे अकेले उसके सर्वेसर्वा नहीं थे, और कई दूसरे लोग भी अध्यक्ष बनते रहे। लेकिन नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस पार्टी मोटे तौर पर उनके परिवार के भीतर रही, या फिर परिवार की मर्जी से उसमें समय-समय पर कुछ दूसरे अध्यक्ष बनाए गए। लेकिन यहां पर हम आजाद भारत के एक ऐसे दौर का जिक्र करना चाहते हैं जब यह कुनबा पार्टी पर कब्जे से पूरी तरह बाहर था, और प्रधानमंत्री की कुर्सी से लेकर पार्टी अध्यक्ष तक दूसरे लोग रहे, और चुनावी शिकस्त के बाद पार्टी के अधिकतर लोग लौटकर सोनिया गांधी के चरणों में पहुंचे कि वे कमान सम्हालें और पार्टी को उबारें।
चूंकि राहुल गांधी आज पार्टी की अध्यक्षता नेहरू-गांधी कुनबे का होने की वजह से शुरू कर रहे हैं, इसलिए कुनबे की शोहरत या उसकी तोहमत, ये दोनों उनके साथ अंत तक चलने वाली बातें रहेंगी, और इससे उनका उबर पाना मुमकिन नहीं रहेगा। लेकिन कांग्रेस इस देश की अकेली कुनबापरस्त पार्टी नहीं है, यह चूंकि सबसे पुरानी है इसलिए इसके कुनबे के नाम अधिक लंबी लिस्ट बनाते हैं। वैसे तो मुम्बई में शिवसेना को देखें, शरद पवार की पार्टी को देखें, आन्ध्र में एनटीआर और चन्द्राबाबू को देखें, तेलंगाना में चन्द्रशेखर राव, तमिलनाडू में एमजीआर से लेकर जयललिता और शशिकला तक, कर्नाटक में देवेगौड़ा और उनका बेटा, छत्तीसगढ़ में शुक्ल परिवार, ओडिशा में पटनायक परिवार, मध्यप्रदेश से राजस्थान तक सिंधिया परिवार, उत्तरप्रदेश में मुलायम परिवार, बिहार में लालू परिवार, पंजाब में बादल परिवार, कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार, हरियाणा में कुनबे ही कुनबे, और दूसरे कई इलाकों में इसी तरह की राजनीतिक वंशावली अच्छी तरह कायम हैं। ऐसे देश में कांग्रेस को कोसने के लिए तो यह ठीक है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने यह हिसाब लगाया है कि करीब साढ़े पांच सौ परिवार ही ऐसे हैं जो कि देश की संसद और विधानसभाओं पर हावी हैं, वहां काबिज हैं, या वहां के फैसले लेते हैं।
कांग्रेस के तीन अध्यक्ष- इंदिरा, सोनिया, राहुल गांधी
इस देश का मिजाज कुनबापरस्ती को शायद बुरा नहीं मानता है, और वह सिलसिला चलते ही आ रहा है। ऐसे में राहुल गांधी को लेकर बहुत से मजाक तो बन सकते हैं कि वे अभी घुटनों पर चल रहे हैं, या कि वे पप्पू हैं। लेकिन एक दूसरी हकीकत को देखने की जरूरत है। मोतीलाल नेहरू से लेकर जवाहरलाल, इंदिरा, राजीव, सोनिया, और राहुल तक एक सैद्धांतिक कड़ी ऐसी चली आ रही है जिसमें धर्मनिरपेक्षता, जातिनिरपेक्षता, क्षेत्रनिरपेक्षता, सर्वधर्म सद्भाव की एक गौरवशाली परंपरा लगातार कायम है। कहने के लिए 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों को कांग्रेस पार्टी की एक हिंसक कार्रवाई कहा जाता है, उसके बहुत से नेता इस हिंसा में शामिल थे, लेकिन यह कहना कांग्रेस के साथ ज्यादती होगी कि उसने सिक्खों को एक धर्म और एक नस्ल के रूप में खत्म करने के लिए ऐसा किया था। इन दंगों को याद करने के साथ-साथ यह भी याद रखना जरूरी होगा कि स्वर्ण मंदिर पर ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सुझाव दिया गया था कि सिक्ख अंगरक्षक उनकी सुरक्षा से हटा दिए जाएं, तो उन्होंने इससे साफ मना कर दिया था। इसलिए हम इस परिवार को साम्प्रदायिकता से परे, साम्प्रदायिकता विरोधी सिद्धांतों की राजनीति करने की एक अटूट परंपरा वाला भी मानते हैं। आज इस देश में जो माहौल बना हुआ है, उसमें यह लगता है कि भ्रष्टाचार के आरोप भारतीय लोकतंत्र को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला मुद्दा नहीं हैं, और इस लोकतंत्र की धुरी में धर्मनिरपेक्षता सबसे बड़ी ताकत है, और साम्प्रदायिकता सबसे बड़ी खामी है। इसे अगर देखें, तो कांग्रेस पार्टी की लंबी परंपरा में भी कुनबापरस्ती के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की बहुत ही महत्वपूर्ण परंपरा जारी है, और आने वाले वक्त में देश की जनता यह बताएगी कि उसके लिए इन सिद्धांतों का कोई महत्व है या नहीं। हमारा मानना है कि चुनावी नाकामयाबी से परे भी किसी पार्टी के लिए धर्मनिरपेक्षता अधिक जरूरी बात है, और राहुल गांधी से देश को यह पुख्ता उम्मीद है कि चुनावी जीत-हार से परे वे इस पर टिके रहेंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 दिसंबर