कश्मीर के जख्मों पर हिंदू-राष्ट्रवादी नमक

संपादकीय
23 मई 2017


ट्विटर पर लगातार हिंदू आक्रामकता के साथ लिखने वाले फिल्म अभिनेता परेश रावल ने कल ही यह कहा कि कश्मीर में जिस तरह जीप के सामने पत्थरबाज को बांधा गया था, उसके बजाय लेखिका अरुंधति राय को बांधना चाहिए था। उनकी इस ट्वीट पर बड़ा बवाल हुआ, लेकिन घोर साम्प्रदायिकता, और आक्रामक राष्ट्रवाद के हिमायती इस बात पर बड़े खुश हो गए। अरुंधति राय पर यह आरोप लगते हैं कि वे नक्सलियों की साथी हैं, और कश्मीर के विभाजन की हिमायती हैं। खैर अरुंधति का जो कहना है, वह तो पूरा का पूरा मंच और माईक से कहा हुआ है, या कि लिखा हुआ है। लेकिन जब देश का कानून अब तक अरुंधति को कोई सजा नहीं दे पाया है, या कि ये कहें कि देश की या प्रदेश की सरकारें अरुंधति को सजा नहीं दिला पाई हैं तो क्या उनके बारे में ऐसी हिंसक बात लिखना ठीक है? और दूसरी बात यह भी कि परेश रावल की कही हुई यह बात एक किस्म से कश्मीर में फौज की उस कार्रवाई को सही भी ठहराती है जिसमें उसने एक कश्मीरी नौजवान को जीप के सामने बांधकर आक्रामक पत्थरबाजों के बीच से सुरक्षित निकलने का काम किया था। इसके बाद फौज की इसको लेकर आलोचना हुई थी, लेकिन सरकार ने इस कार्रवाई को सही ठहराया था, और दुनिया को हैरान करते हुए भारतीय सेना ने ऐसा करने वाले अपने मेजर का कल एक पदक देकर सम्मान भी किया है।
यह पूरा सिलसिला बहुत घातक है, और परेश रावल जैसे कमअक्ल वाले बड़बोले-बकवासी चर्चित व्यक्ति जैसी ही समझ वाली फौज का सुबूत भी है। एक तरफ तो फौज अपनी सारी ताकत के बावजूद कश्मीर को काबू में नहीं रख पा रही है, और दूसरी ओर हालत यह है कि कश्मीर के जख्मों पर एक तरफ आक्रामक हिंदुत्ववादी ऐसा नमक छिड़क रहे हैं कि वह बाकी भारत से कभी मन न मिला पाए, दूसरी तरफ जो फौज कश्मीर में तैनात है, वह खुद अपनी ऐसी अलोकतांत्रिक और हिंसक कार्रवाई करने वाले अफसर को सम्मानित कर रही है। हो सकता है कि यह सम्मान किसी और बहादुरी की वजह से हो, लेकिन यह सम्मान कश्मीर को और जख्मी करने वाला है, उसे और अलग-थलग करने वाला है।
देश के बहुत से समझदार और अलग-अलग तबकों का यह मानना है कि कश्मीर को जोड़कर रखने के लिए कोई जरूरी बात तो हो नहीं रही है, लगातार उसे बाकी देश से तोडऩे की हरकत चल रही है। कश्मीर हिंदुस्तान की धरती का एक टुकड़ा भर नहीं है, वह इंसानों की आबादी भी है, और वह पाकिस्तान के साथ जुड़ी हुई सरहद पर बसा हुआ प्रदेश है जो कि बाकी तमाम बातों से परे, हिंदुस्तानी फौजी जरूरतों के हिसाब से भी बहुत अहमियत रखता है। भारत सरकार को तुरंत अपनी कश्मीर-नीति के बारे में सोचना चाहिए, देश के बहुत से जानकार लोगों का यह मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के बाद कश्मीर का इतना खराब हाल बीच में कभी नहीं था।

भ्रमचारी-बलात्कारियों का हौसला ठंडा करने का तरीका कुछ हिंसक जरूर है...

आजकल
22 मई 2017
केरल से एक दिल दहलाने वाली खबर आई है कि बाईस बरस की एक युवती ने अपने घर पर आए हुए एक हिन्दू, भगवाधारी स्वामी के बलात्कार से थककर चाकू से उस स्वामी का गुप्तांग काट दिया, और मर्दानगी की उसकी शान को चौपट कर दिया। इसके बाद उसने खुद होकर पुलिस को खबर की, और अब उसे केरल के जागरूक समाज से लेकर मुख्यमंत्री तक की वाहवाही मिल रही है। इस स्वामी का उस घर में दाखिला इस लड़की के पिता के इलाज के नाम पर हुआ था, और वह पिछले आठ बरस से इससे बलात्कार करते आ रहा था। जाहिर है कि यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब यह लड़की नाबालिग बच्ची रही होगी, और जब उसका बर्दाश्त जवाब दे गया, तब उसने आत्मरक्षा में यह हिंसक कार्रवाई की है। इस स्वामी को केरल के एक बहुत ताकतवर हिन्दू संगठन से जुड़ा हुआ बताया गया है और सुबूत में ऐसी दर्जनों तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आ रही हैं जिनमें यह स्वामी इस हिन्दू ऐक्य वेदी नाम के संगठन के लोगों को लेकर वहां के मुख्यमंत्री से भी मिल रहा है, और इस संगठन के दूसरे कार्यक्रमों में भी शामिल है।
यह मामला महज हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं है क्योंकि हम लगातार ऐसी खबरें भी देखते और छापते आ रहे हैं जिनमें पश्चिम के देशों में जहां कानूनी जागरूकता और अधिकार अधिक हैं, वहां पर चर्च के पादरी छोटे-छोटे बच्चों का देह-शोषण करते हैं, और जब ऐसे मामले उजागर भी होते हैं, तो कैथोलिक समुदाय के दुनिया के मुखिया पोप की तरफ से उन्हें माफी भी मिल जाती है, और चर्च उन्हें कानून के हवाले नहीं करता। अमरीका की एक दूसरी घटना को भी इसी सिलसिले में याद करना जरूरी है जिसमें इस्कॉन नाम के बहुचर्चित हिन्दू संगठन के एक हॉस्टल में बच्चों का देह-शोषण किया गया, और उसके एवज में अदालत से बाहर मामले को निपटाने के लिए इस संगठन ने सैकड़ों करोड़ का भुगतान किया।
दरअसल धर्म से जुड़े हुए संगठनों के साथ यह दिक्कत हमेशा इसलिए बनी रहेगी कि बहुत से धर्मों में बहुत किस्म के काम करने वाले स्वामी, पादरी, या इसी तरह के दूसरे लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे ब्रम्हचारी रहेंगे, शादी नहीं करेंगे, और पूरा जीवन, पूरी ताकत ईश्वर की सेवा में लगा देंगे। धर्म से परे कुछ एक आध्यात्मिक संगठन, या कि योग-ध्यान से जुड़े हुए कुछ संगठनों में भी ऐसे लोग रहते हैं जो कि शादी नहीं करते।
हमारा तजुर्बा यह है कि ऐसे लोग शादी तो नहीं करते, लेकिन बर्बादी बहुत करते हैं। और चूंकि इनकी पहुंच पेशेवर वेश्याओं तक नहीं रहती, इसलिए ये लोग आसपास के बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं, या कि आस्थावान महिलाओं को दबोचते हैं। ब्रम्हचर्य की पूरी की पूरी सोच प्रकृति के खिलाफ है। करोड़ों साल से विकसित होकर बना हुआ मानव शरीर कई तरह की जरूरतों को लेकर इस शक्ल में आया है, और इनमें से भूख और प्यास की तरह ही सेक्स एक बड़ी जरूरत है। जो कोई ब्रम्हचर्य मानने की बात तय करते हैं, उनको खुद को इस बात का अंदाज नहीं रहता कि उनके इस फैसले के खिलाफ उनके तन-मन कब-कब बागी हो जाएंगे, और किस हद तक उनको परेशान करेंगे। लेकिन होता यह है कि सार्वजनिक रूप से जब एक बार सांसारिकता को छोड़कर लोग धर्म या आध्यात्म में शामिल हो जाते हैं, अलग-अलग रंग के चोले पहन लेते हैं, तो फिर उन्हें वहां से बाहर निकलना आसान भी नहीं लगता , क्योंकि वह बहुत बड़ी शर्मिंदगी की बात होगी।
हमारा यह भी देखा हुआ है कि जिन धर्मों में जिन भूमिकाओं के लिए लोगों की शादी पर रोक नहीं होती है, वैसे लोग बलात्कार या यौन शोषण कम करते हैं, उनके मामले कम सामने आते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि प्रकृति ने तन-मन की जो जरूरतें बनाई हैं, उनके पूरे होने का कोई साधन उनके पास रहता है, और अपनी न्यूनतम जरूरतों के पूरा होने पर अगर वे संतुष्ट रह पाते हैं, तो यह संभावना अधिक रहती है कि वे अपने आप पर अधिक काबू भी पा सकें। दूसरी तरफ जिन लोगों को ब्रम्हचारी रहने की मजबूरी रहती है, उनके तन-मन उन्हें ईश्वर या आध्यात्म से परे दूसरी तन की तरफ धकेलते रहते हैं, और मासूम बच्चे उनके शिकार होते हैं, अपने परिवार या जीवन से निराश होकर आई हुई आस्थावान महिलाएं अपनी कमजोर या नाजुक मानसिक हालत की वजह से जल्द ही उनकी शिकार हो जाती हैं।
धर्म सेक्स के खिलाफ बहुत सी बातें कहता है, वह सेक्स को मोटे तौर पर केवल मानव जीवन के आगे बढ़ाने के काम के रूप में देखता है, और बाकी तमाम जरूरतों को अनदेखा करता है। हर धर्म में काम वासना के खिलाफ बहुत सारी बातें लिखी जाती हैं, और हिन्दू धर्म सहित बहुत से धर्मों में तो प्रार्थनाओं से लेकर प्रवचन तक में यह बात खुलकर कही जाती है कि अगर किसी को स्वर्ग पाना है, ईश्वर को खुश करना है, तो उसे अपने आपको काम वासना से दूर रखना चाहिए। एक तरफ तो ईश्वर की ऐसी तस्वीरें और ऐसी कहानियां हिन्दू धर्म में भरी पड़ी हैं जिनमें ईश्वर एक से ज्यादा महिलाओं की तरफ खिंचे रहते हैं, किसी दूसरे की पत्नी पर भी हाथ डाल देते हैं, अपने आसपास के वर्जित रिश्तों के साथ भी बलात्कार कर देते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं देवताओं की पूजा करने वालों को प्रकृति के खिलाफ जाकर सेक्स से दूर रहने की धार्मिक नसीहत दी जाती है।
यह पूरा सिलसिला सेक्स को तो नहीं घटा पाता, सेक्स अपराधों को जरूर बढ़ा देता है। ब्रम्हचर्य की असली शक्ल भ्रमचर्य की है, वे ब्रम्ह को तो हासिल नहीं कर पाते, ब्रम्ह को पाने के भ्रम को जरूर हासिल कर लेते हैं। जो लोग लगातार अपने जीवन को सेक्स से दूर रखने के संघर्ष में लगे रहते हैं, उनसे यह उम्मीद करना एक दिमागी पाखंड है कि वे ईश्वर के करीब जाने का संघर्ष कर रहे होंगे। जब किसी ब्रम्हचारी या साध्वी-सन्यासी, या कि पादरी का जीवन प्रकृति के खिलाफ संघर्ष से भरा हुआ हो, तब उनके पास इतना वक्त कहां हो सकता है कि वे ईश्वर के करीब जाने का संघर्ष करें।
इस बात को एक दूसरी मिसाल से समझा जा सकता है कि बहुत से धर्मों में बहुत से त्यौहारों पर तरह-तरह से उपवास रखने की प्रथा है। किसी ईश्वर ने ऐसा कहा हो कि उसके लिए उपवास रखें, ऐसा तो नहीं लगता, लोगों ने तरह-तरह की तकलीफें पाने, तरह-तरह से अपने पर काबू पाने को धर्म, और ईश्वर तक पहुंचने का जरिया मान लिया है। जब धार्मिक उपवास चलते हैं, तो यह जाहिर है कि लोगों का ध्यान इस बात पर लगे रहता है कि भूखे रहने के घंटे कब खत्म होंगे, और कब उन्हें खाने को क्या-क्या मिलेगा, और ऐसे घंटों के लिए लोग तरह-तरह की चीजों का इंतजाम भी करके रखते हैं, उपवास के बाद के तरह-तरह के पकवान तैयार किए जाते हैं। ऐसे लंबे उपवासों के दौरान जब उपवास करने वाले लोग आपस में मिलते हैं, तो उनके बीच बहुत कम ही चर्चा ईश्वर के बारे में होते दिखती है, उनकी अधिक चर्चा उपवास और उपवासी पकवान तक सीमित रहती है, कि क्या-क्या खाया जा सकता है, कैसे-कैसे पकाया जा सकता है।
मतलब यह कि जिस चीज से दूर धकेलने की कोशिश होती है, खासकर प्रकृति की जरूरतों के खिलाफ जाकर जो करने की कोशिश होती है, उस दौरान लोगों के तन-मन उसी तरफ जाने की कोशिश करते हैं। जब लोगों के मन खाने में फंसे हों, तो बिना भोजन भजन आखिर कैसे हो सकते हैं? जब लोगों को मजबूरी में सेक्स से दूर रहना पड़े, तो जाहिर है कि उनके तन-मन उन्हें सेक्स की संभावनाओं की तरफ खींचते और धकेलते रहेंगे, और ईश्वर की बारी तो इस जरूरत के पूरे होने के बाद कभी आएगी तो आएगी।
दूसरी बात यह कि हर किस्म के धर्म में किसी भी पाप से मुक्ति पाने के लिए प्रायश्चित के कई तरह के रास्ते बना दिए गए हैं। धर्म को जब शोषण के सबसे बड़े और सबसे दीर्घकालीन हथियार की तरह डिजाइन किया गया, तो उसी साजिश के दौरान यह भी समझ लिया गया था कि इंसान तो इंसान ही रहेंगे, और उनकी इंसानी जरूरतें भी कायम रहेंगी। अगर पाप करने वाले लोगों को धर्म से निकाल देने का सिलसिला शुरू होगा, तो ईश्वर और उसके एजेंट पोप-पुजारी ये सब भूखे ही मर जाएंगे। इसलिए तमाम किस्म के मुजरिमों और पापियों को धर्म में बनाए रखने के लिए प्रायश्चित नाम की एक ऐसी लॉंड्री खोली गई जहां अपनी आत्मा लाकर लोग कुछ बिल चुकाकर उसे साफ करवा सकते हैं, और फिर छाती पर किसी बोझ के बिना बाकी दुनिया में जाकर एक बार फिर से पाप करना शुरू कर सकते हैं।
पश्चिमी देशों में ईसाई धर्म को मानने वालों के बीच अधिकतर जगहों पर लोकतंत्र कुछ अधिक विकसित है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान वहां पर धार्मिक भावना के मुकाबले कम नहीं है। इसीलिए अमरीका से लेकर फ्रांस और जर्मनी तक लोगों को धार्मिक पुस्तकों को जलाने की आजादी है, अलग-अलग धर्मों के ईश्वरों को लेकर कार्टून बनाने की आजादी है, और तरह-तरह के लतीफे गढऩे की आजादी है। ईसाईयों के बीच पश्चिमी देशों में चर्च के कन्फेशन चेम्बर को लेकर अनगिनत लतीफे हैं कि किस तरह लोग वहां जाकर अपने पाप की स्वीकारोक्ति करते हैं, और किस तरह उसके बाद दूसरी तरफ बैठा हुआ पादरी उन पापों को माफ करता है। इस चेम्बर को लेकर पादरियों के सेक्स को लेकर अब तक लाखों लतीफे और कार्टून बन चुके हैं कि वे किस तरह अपराधबोधग्रस्त लोगों का फायदा उठाते हैं, और खुद अपने लिए सेक्स की संभावनाएं ढूंढ लेते हैं।
बहुत से देशों में बहुत से धर्म अपनी खामियों और अपने पाखंड की चर्चा से परहेज करते हैं, न मजाकिया चर्चा, न ही गंभीर चर्चा। नतीजा यह होता है कि वहां पर पाखंड और पनपते चलता है, और उसे दबाकर, छुपाकर रखा जाता है। लोगों को याद होगा कि बहुत से स्वामियों के सेक्स की वीडियो रिकॉर्डिंग पिछले बरसों में सामने आई है, और हमने अपने खुद के इलाके में प्रदेश के सबसे बड़े कुछ मठों के महंतों की सेक्स की कहानियां सुनते-सुनते ही जिंदगी गुजारी है। यह सार्वजनिक चर्चा रहती है कि ब्रम्हचारी जीवन गुजारने वाले ऐसे महंत के सेक्स संबंधों से उनकी कौन-कौन सी संतानें हैं, और उन्हें मठ की जमीनों में से कौन-कौन सी जमीनें दी गई हैं। यह सिलसिला अनंत है, और चूंकि धर्म को बहुत से लोग कानून और तर्क से परे की चीज मान लेते हैं, इसलिए ऐसे भ्रमचर्य पर भी कोई चर्चा नहीं हो पाती है। ऐसी नौबत में ऐसे भ्रमचर्य का एक आसान और अच्छा इलाज यही है कि तेज धार वाला एक चाकू या उस्तरा रखा जाए, और धर्म की मर्दानगी का ऐसा विसर्जन कर दिया जाए। हमारा ख्याल है कि देश का कानून भी धर्म के बलात्कार के खिलाफ आत्मरक्षा के लोगों के अधिकार का सम्मान करेगा, केरल में जनता और मुख्यमंत्री ने यह सकारात्मक रूख दिखाया है, और शायद यही तरीका बाकी भ्रमचारी-बलात्कारियों का हौसला ठंडा कर सकेगा। 

जंगली जानवर कहीं मर रहे कहीं मार रहे, सोचना जरूरी

संपादकीय
22 मई 2017


छत्तीसगढ़ में आज लगातार दूसरा दिन है जब हाथियों के पैरों तले दो महिलाओं की मौत हो गई है। राज्य के जिन इलाकों में हाथी हैं, वहीं पर जंगल भी है, और वहां पर गांवों की अर्थव्यवस्था जंगलों पर टिकी हुई है। कभी महुआ बीनने, तो कभी तेंदूपत्ता के लिए गांव के लोग जंगल जाते हैं और हाथियों का शिकार हो जाते हैं। दूसरी तरफ लगातार इस प्रदेश में भालू मरते हुए दिख रहे हैं और आए दिन कहीं न कहीं भूख-प्यास से मरते हुए भालुओं की तस्वीरें आती हैं। इन दोनों के अलावा कई जगहों पर लोगों पर हमला करते हुए भालू की खबरें भी आती हैं, और लोग कहीं बिजली के तार बिछाकर तो कहीं जहर डालकर जानवरों को मारते हुए दिखते हैं।
इंसान और जानवरों का यह टकराव नया मुद्दा तो नहीं है, लेकिन यह बढ़ता हुआ मुद्दा जरूर है। छत्तीसगढ़ में जंगली जानवरों के हक को लेकर लोग हाईकोर्ट भी गए हुए हैं और सरकार वहां पर जवाब देने के लिए खड़ी हुई है। इस दिक्कत को देखें तो यह बात साफ समझ आती है कि जानवरों के हक के जंगलों पर जैसे-जैसे इंसान का कब्जा बढ़ा, वैसे-वैसे उनके पेड़ कटे, और उनके पीने के लिए पानी भी नहीं बचा। नतीजा यह होता है कि जंगल से जानवर आसपास की बस्तियों में कभी पालतू जानवरों के शिकार के लिए आ जाते हैं, तो कभी पानी पीने आ जाते हैं। और अगर इंसान यह सोचते हैं कि वे जंगलों पर काबिज होते जाएंगे, जंगलों के बीच से सड़कें निकालेंगे, वहां खदानों को खोदते रहेंगे, और पेड़ काटते रहेंगे, तो इसे बर्दाश्त करके जानवर चुप भी नहीं बैठेंगे। यह टकराव बढ़ते चलेगा, और हो सकता है कि धीरे-धीरे जानवर मिट ही जाएं। आज तो जहां जंगल बचे हुए हैं, वहीं पर जानवर हैं। और कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यह कहा था कि पड़ोसी राज्यों से हाथियों के छत्तीसगढ़ आने का यही मतलब है कि यहां पर जंगल अभी बचे हुए हैं। अगर जंगल न होते तो हाथी अपना इलाका छोड़कर यहां क्यों आते? लेकिन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच बरसों से हाथी-गलियारे की बात भी चल रही है, और ऐसा न होने पर हाथियों और इंसानों का टकराव होते चल रहा है, जिसमें आमतौर पर जान इंसानों की जा रही है, और ऐसे इंसानों की जा रही है जो कि जंगल गए बिना जिंदा रह नहीं सकते।
हमारा मानना है कि जंगलों में शहरों को घुसना बंद करना होगा। आज टेक्नालॉजी ने शहरों को आसमान की तरफ ऊपर उठने की सहूलियत दी है। शहरों को अपनी जमीन पर ऊंची इमारतें बनानी होगी, और जंगलों की तरफ जाना बंद करना होगा। इसके बिना यह तबाही नहीं रूकेगी, और जंगलों का मिटना महज जंगली जानवरों के लिए खतरा नहीं है, धरती के पर्यावरण के लिए भी खतरा है, और पेड़ों के घटते चले जाने से बारिश का पानी जड़ों के आसपास की मिट्टी को भी नदियों में ले आएगा, उनमें गाद भर देगा, नदियों की पानी की क्षमता घट जाएगी, और कुल मिलाकर जमीन के नीचे का पानी घट जाएगा। इसलिए जंगलों को बचाना जानवरों के लिए जरूरी नहीं है, यह इंसान के खुद के लिए जरूरी है, और आज जानवरों की बदहाली को एक संकेत और सुबूत मानना चाहिए कि इंसान अपने काम के जंगलों को खत्म कर रहा है, खत्म कर चुका है। इस मुद्दे पर राज्य और केन्द्र सरकार को बेबस करने के लिए वन्य प्राणी संगठनों और पर्यावरणवादियों को लगातार दबाव बढ़ाना होगा। 

मोदी सरकार के तीन बरस और भाजपा की रीति-नीति

संपादकीय
21 मई 2017


नरेन्द्र मोदी की सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर राजनीतिक और सरकारी दोनों किस्म के मोर्चों पर बहुत तरह के विश्लेषण होने शुरू हो गए हैं, और ये कई दिनों तक चलते रहेंगे। आर्थिक मोर्चे के अधिक जानकार लोग उस बारे में लिखेंगे, और विदेश नीति के जानकार लोग उस बारे में। लेकिन बहुत सी साधारण बातें हैं जिन पर लिखने के लिए एक साधारण समझ काफी होती है, और न्याय की सोच जरूरी होती है। इनमें से एक, राजनीतिक पैमाने पर तौला जाए तो नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्री बनने के पहले से जिस तरह देश के जनमत को झकझोर कर रख दिया था, और एक ऐतिहासिक जीत के  साथ वे भाजपा को सत्ता पर लेकर आए थे, उस पर तो लिखा जा चुका है, लेकिन उस राजनीतिक जीत की जो निरंतरता बनी हुई है, वह हैरान करने वाली है। एक के बाद दूसरा राज्य जीतकर भाजपा ने अपनी ताकत और अपनी जमीनी पकड़ को उसकी अपनी उम्मीद से बहुत अधिक बढ़ा लिया है। और देश के दूसरे राजनीतिक दलों के सामने यह बात न सिर्फ एक मिसाल की तरह खड़ी हो गई है, बल्कि एक ऐसी चुनौती भी बन गई है जिसका कोई मुकाबला 2019 के आम चुनावों में भी लोगों को नहीं दिख रहा है।
हम कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा करना चाहते हैं कि भाजपा की इस बुलंदी की क्या वजहें रही हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की गुजरात के कार्यकाल की जोड़ी दिल्ली में आकर पहली बार काम कर रही है, और उसने दिल्ली सहित पूरे देश के अपने संगठन को कुछ इस तरह मजबूत पकड़ में ले लिया है कि उनसे परे भाजपा में कुछ बचा हुआ दिखता नहीं है। अब कुछ लोगों को यह लग सकता है कि दो लोगों के हाथों में सत्ता का इतना इक_ा हो जाना लोकतांत्रिक नहीं है, लेकिन देश की अधिकतर पार्टियां तो ऐसी हैं जिनमें दो नेता भी नहीं, महज एक ही कुनबे के हाथ में पूरी ताकत है, ऐसे में दो लोगों के हाथों में ताकत को अलोकतांत्रिक कैसे कहा जाए? दूसरी बात यह कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने खुद अविश्वसनीय किस्म की रोजाना की मेहनत लगातार जारी रखी है, और उनकी पार्टी के जिला स्तर के नेताओं का भी यह कहना है कि जिस तरह पार्टी में एक वक्त संघ के प्रचारक आकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता का काम करते थे, आज उसी तरह भाजपा के हर सदस्य से पूर्णकालिक मेहनत करवाई जा रही है, और साल भर पार्टी के कार्यक्रम चल रहे हैं।
तीसरी बात यह कि भाजपा ने इन तीन बरसों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लेकर गोहत्या या नौजवानों के प्रेम जैसे बहुत से भावनात्मक मुद्दों को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचाने से कोई परहेज नहीं किया, और पार्टी के कुछ नेता अहिंसक बातें करते रहे, और कुछ दूसरे नेता घोर हिंसक और साम्प्रदायिक बातें करते हुए ही केन्द्रीय मंत्री, और राज्य के योगी सरीखे मुख्यमंत्री भी बनते रहे। देश की जनता के बीच एक धुंध सी कायम रही, और दोनों तरह के नेताओं की जगह बनाकर भाजपा ने हिन्दुओं के बीच अपने पांव पहले के मुकाबले बहुत अधिक फैला लिए। इसके साथ-साथ भाजपा ने बहुत सारी चीजों को लेकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद का नारा भी लगा दिया। जिस तरह की तकलीफदेह नोटबंदी रही, और उसमें तकलीफ पाते हुए लोग जिस तरह उस तकलीफ को देशभक्ति से जोडऩे के लिए उत्साही दिखे, वह एक अविश्वसनीय किस्म की बात रही। लोगों ने जब एक नामौजूद राष्ट्रीय जरूरत के नाम पर नोटों की अपनी सहूलियत, और रोज की अपनी कमाई को भूल जाने को भी बुरा नहीं माना, तो वह भाजपा के लिए उम्मीद से अधिक उपलब्धि थी।
लेकिन दूसरे राजनीतिक दलों को सीखने और समझने के लिए जो जरूरी है, वह भाजपा की मेहनत और उसका तौर-तरीका है। उसकी बहुत सी नीतियां गलत हो सकती हैं, लेकिन उसकी मेहनत और उसकी रणनीति ने उन गलतियों और उन गलत कामों को दबा दिया। जनता के बीच अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने और उन्हें प्रभावित करने की भाजपा की रणनीति से दूसरे राजनीतिक  दलों को सीखने की जरूरत है। भाजपा की आलोचना तो ठीक है, लेकिन देश के चुनावी लोकतंत्र में जिसे भी भाजपा से अगला चुनाव लडऩा है, वे भाजपा से कम से कम कुछ सीख भी लें।

कुछ के तलुए सहलाना और कुछ को पैरोंतले कुचलना...

संपादकीय
20 मई 2017


छत्तीसगढ़ में जनता की दिक्कतों को जानने के लिए चल रहे लंबे लोकसुराज कार्यक्रम में अभी एक जिले में लगातार दो दिन वहां के कलेक्टर पर भाजपा के दो नेता बरसे। एक भूतपूर्व मंत्री थे, और एक वर्तमान मंत्री। इन दिनों हर किसी के हाथ में मोबाइल फोन रहता है इसलिए इन दोनों घटनाओं की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तैर रही है। कुछ लोगों को लग सकता है कि नेताओं ने अफसर के साथ बुरा सुलूक किया है, कुछ लोगों को यह लग सकता है कि जनता की दिक्कतों की बात करने वाले सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेताओं के साथ बात करते हुए कलेक्टर का व्यवहार ठीक नहीं था। लेकिन इन दोनों में से जो भी बात सही हो, यह बात तो अपनी जगह सही है ही कि जिसके हाथ अधिक ताकत रहती है, उसका बर्ताव अपने से कमजोर लोगों के साथ अमूमन खराब रहता है। लोगों का बर्ताव अपने से बड़े ओहदे वाले, या कि अधिक ताकत वाले लोगों के साथ तो चाहते हुए, या कि मजबूरी में अच्छा रहता है, लेकिन जहां अपने से कमजोर लोग सामने आए, लोग अपने असली रंग में आने लगते हैं, और बदसलूकी शुरू हो जाती है।
आज ही महाराष्ट्र की एक खबर है कि किस तरह वहां जेल में बंद एक विधायक ने अदालत जाने के लिए गाड़ी लेट होने पर पुलिस को धमकाया और गालियां देते हुए कहा कि पुलिस उसे जानती नहीं है क्या? यह विधायक तीन सौ करोड़ के घोटाले में 19 महीने से जेल में है, लेकिन ऐंठ अभी तक गई नहीं है। पुरानी कहावत है कि रस्सी जल गई, लेकिन बल नहीं गया। ऐसा ही इस विधायक के बर्ताव से दिखाई पड़ता है, और महाराष्ट्र से परे कम से कम पूरे हिन्दुस्तान में तो यह दिखता ही है कि ताकत सिर चढ़कर बोलती है, और कमजोरी लोगों को पैरों पर गिरा देती है। अब अगर इसके पीछे की मानसिकता को देखें, तो इसकी एक बहुत अच्छी मिसाल इन दिनों हिन्दुस्तानी टीवी पर बड़े मशहूर हुए कपिल के कॉमेडी शो में देखने मिलती है।
जिन लोगों ने यह कार्यक्रम देखा है उन्होंने भी इस बात का एहसास नहीं किया होगा कि पूरे का पूरा कार्यक्रम इस सोच पर बनाया गया है कि इसका मुख्य किरदार कपिल शर्मा, अपने से कमजोर तमाम लोगों की खिल्ली उड़ाकर, उनको बेइज्जत करके, उनके साथ परले दर्जे की बदसलूकी करके लोगों को हंसाता है। दूसरी तरफ कार्यक्रम में आने वाले प्रमुख कलाकारों से वह शुरू से आखिर तक महज चापलूसी करता है, और मानो उनके तलुए सहलाता है। इस कार्यक्रम को अगर देखें तो यह इंसानी सोच के दो बिल्कुल अलग-अलग पहलुओं के बीच बना हुआ है। ताकतवर के तलुए सहलाओ, और कमजोर को पैरोंतले कुचलो। एक-दो बरस से लगातार यही करते-करते इस कामयाब कॉमेडियन की अपनी सोच यह हो गई कि कुछ महीने पहले उसने अपने ही साथियों से एक विमान में नशे में धुत्त होकर भारी बदसलूकी की, और उसके घमंड को देखकर वे कलाकार कार्यक्रम छोड़ गए।
शोहरत और कामयाबी की ताकत किस तरह सिर चढ़कर सब कुछ तबाह करती है, इसकी इससे बड़ी कोई मिसाल हाल के बरसों में हमें याद नहीं पड़ती। और कॉमेडी शो से लेकर राजनीति तक, सरकार तक, और सार्वजनिक जीवन तक लोगों का बर्ताव इन्हीं दो ध्रुवों के बीच कभी इधर तो कभी उधर खिसकते रहता है। बहुत से लोग तो ठीक इसी कॉमेडी शो की तरह, कुछ मिनट चापलूसी में लग जाते हैं, और कुछ मिनट दूसरे लोगों को दुत्कारने में। इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार को सत्तारूढ़ नेताओं और सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों के बर्ताव तय करने के लिए मेहनत करनी चाहिए। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के एक मंत्री महज तौलिया लपेटे हुए कुर्सी पर पसरे दिख रहे थे, और सामने उनके दरबार में बहुत सी बेबस महिलाएं अपनी अर्जियां लेकर खड़ी थीं। हमारा ख्याल है कि ऐसे बर्ताव चाहे वे मंत्रियों के हों, या कि अफसरों के हों, इसके खिलाफ जनता को भी उठ खड़ा होना चाहिए, और इसे जमकर धिक्कारना चाहिए, क्योंकि सरकारी कामकाज जनता के पैसों पर चलता है, वह किसी निजी टीवी कंपनी का बनाया हुआ कॉमेडी शो तो है नहीं। सरकार अगर खुद नहीं सुधरती, तो उसके लोगों की बदसलूकी के खिलाफ जनता को उठना चाहिए। सरकार की ताकत की ऐसी ही बददिमागी के चलते हुए दो दिन पहले बिलासपुर में एक गरीब औरत बच्चे को जन्म देने दो सरकारी अस्पतालों से भगा दिए जाने के बाद सड़क किनारे के किसी खंडहर में बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर हुई थीं। यह मामला खबरों से हटा नहीं है कि आज एक और तस्वीर छपी है कि किस तरह 92 बरस की एक बुजुर्ग महिला को वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए सरकारी दफ्तर में बुलाया गया, और उसके परिवार का एक आदमी उसे ठेले पर लिटाकर भरी धूप में वहां लेकर गया। सरकार अगर संवेदनशील नहीं होती, तो ऐसे मामलों को लोगों को उठाना चाहिए, और इनके लिए जिम्मेदार अफसरों या नेताओं के नाम दूसरों के सामने बार-बार दुहराने चाहिए।

भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए

संपादकीय
19 मई 2017


आज देश भर में कारोबारियों के बीच महज एक बात की चर्चा है कि नए लागू होने वाले जीएसटी से क्या-क्या फर्क पड़ेगा। बाजार का दोनंबरी हिस्सा इस बात को लेकर भी फिक्र में है कि क्या इससे बिना बिल, बिना टैक्स का धंधा करना मुश्किल हो जाएगा? लेकिन इन सबसे परे एक मजे की बात यह है कि यूपीए सरकार के पूरे दस बरस जीएसटी का पूरी ताकत से विरोध करने वाली एनडीए ने आज सरकार में रहते हुए इसे लागू किया है, और यूपीए ने विपक्ष के अपने हक का इस्तेमाल करते हुए पिछले ढाई बरस इसका विरोध किया, लेकिन अब साथ देकर संसद में जीएसटी बिल पास करा लिया, क्योंकि यह जीएसटी बिल यूपीए का ही बनाया हुआ था।
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ सहित भाजपा वाले राज्यों के वित्त और वाणिज्य मंत्रियों ने यूपीए की बुलाई हुई राज्यों की बैठकों में लगातार जीएसटी का जमकर विरोध किया था, और अब केन्द्र की सत्ता में आने के बाद अपने सारे विरोध को वापिस लेकर वित्तमंत्री अरूण जेटली मानो दूसरे पक्ष की तरफ से अदालत में जिरह करने लगे, और जीएसटी पास कराने के लिए पसीना बहाने लगे। लेकिन ऐसा सिर्फ इसी एक मामले को लेकर नहीं हुआ है, यूपीए सरकार का एक और बहुत बड़ा कार्यक्रम था आधार कार्ड का, जिसे एनडीए ने देश के लिए तबाही करने वाला, और गोपनीयता, निजता खत्म करने वाला करार दिया था, और घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर एनडीए की सरकार आधार कार्ड को खत्म कर देगी। लेकिन सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री से आधार कार्ड के जन्मदाता, कांग्रेस में शामिल हो चुके नंदन निलेकेणि ने मुलाकात की, और एक ही मुलाकात में नरेन्द्र मोदी आधार कार्ड पर कुछ ऐसे फिदा हुए कि सुप्रीम कोर्ट की सारी रोक-टोक के खिलाफ जाकर भी हर बात के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया, और अब तो भारत में आधार कार्ड को लेकर लतीफे और कॉर्टून बनते हैं कि इसके बिना लोग क्या-क्या नहीं कर सकते।
हम जीएसटी पर चर्चा के लिए आज यहां नहीं लिख रहे, हमारा मकसद राजनीति के इस पहलू पर लिखना था कि बहुत सी बड़ी योजनाओं और बड़ी नीतियों पर भारत की राजनीति में विरोध के लिए विरोध का जो माहौल है, उससे बड़ा नुकसान भी होता है। राजनीतिक दलों के बीच कटुता इतनी हावी हो जाती है कि जनकल्याण के लिए भी सत्ता और विपक्ष के बीच बातचीत नहीं हो पाती। एनडीए सरकार ने कश्मीर में भाजपा की पुरानी सारी कश्मीर-नीति या कश्मीर-रणनीति को किनारे धर दिया है, और अपने सारे सिद्धांतों को छोड़कर वह वहां पर राज्य सरकार में हिस्सेदार हो गई है। हम ऐसी बातों को याद दिलाकर एनडीए या भाजपा को कोई ताना देना नहीं चाहते क्योंकि भारत जैसे संसदीय-चुनावी लोकतंत्र में बहुत से मुद्दे चुनावों के साथ खत्म हो जाते हैं। जो नरेन्द्र मोदी पूरे चुनाव में नवाज शरीफ को मनमोहन सरकार की खिलाई बिरयानी को गिनाते हुए आमसभाओं में यह दावा करते थे कि किस तरह एक हिन्दुस्तानी फौजी के सिर के बदले दस या कितने सिर पाकिस्तानी सैनिकों के लेकर आएंगे, वही नरेन्द्र मोदी खुद होकर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाने पाकिस्तान गए, उनके परिवार के लिए तोहफे लेकर गए, और उनके परिवार से मोदी की मां के लिए आए हुए तोहफों को मंजूर भी किया।
भारतीय राजनीति में थोड़ी सी परिपक्वता बढऩे की जरूरत है। सत्ता और विपक्ष इन दोनों में रहते हुए तर्क और न्याय को छोडऩा नहीं चाहिए। देश के हित में क्या है, और दुनिया के हित में क्या है यह ध्यान में रखकर ही चुनावी राजनीति करनी चाहिए। यह एक अच्छी बात है कि यूपीए के बनाए हुए बहुत से कार्यक्रमों को, बहुत से नीतियों को, एनडीए लागू कर रही है, जारी रखे हुए हैं, और उनके लिए अंधाधुंध बजट भी दे रही है, जैसे कि आधार कार्ड के लिए, या कि मनरेगा की मजदूरी के लिए। भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए, और उसकी वजहें, महज कुछ ही वजहें हमने यहां गिनाई हैं।

किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव

संपादकीय
18 मई 2017


हरियाणा के मुख्यमंत्री रहते हुए ओमप्रकाश चौटाला पर शिक्षक भर्ती में बड़े घोटाले का मुकदमा चला, और दो बरस पहले अदालत से उन्हें दस बरस कैद मिली। वह कैद अब तक जारी है इससे यह जाहिर होता है कि उन्हें ऊपर की किसी अदालत से अधिक राहत नहीं मिल पाई। चौटाला परिवार के ऊपर सत्ता की ताकत से अंधाधुंध कमाई के राजनीतिक आरोप भी लगते रहे, और जब किसी को ऐसी सजा मिल जाती है, तो यह जाहिर रहता है कि उनके खिलाफ आरोप संदेहों से परे साबित हो चुके हैं। वरना हिन्दुस्तानी अदालतों से ताकतवर तो आमतौर पर बाहर अपनी कार तक लाल कालीन बिछाकर लौटते हैं, और वहां से जेल महज गरीब और कमजोर ही जाते हैं। लेकिन सत्ता पर बैठकर भ्रष्टाचार पर लिखने को नया कुछ भी नहीं है, चौटाला पर लिखने का मौका एक दूसरी वजह से है कि 82 बरस की उम्र में ओमप्रकाश चौटाला ने जेल के भीतर से बारहवीं की परीक्षा पास की है, और फस्र्ट डिवीजन में पास की है। अब इसके बाद वे कॉलेज की पढ़ाई करना चाहते हैं। परिवार ने बताया कि वे एक पारिवारिक शादी के लिए पैरोल पर घर आए थे, लेकिन परीक्षा देने के लिए फिर जेल लौट गए।
अब यह बात बड़ी दिलचस्प है कि 82 बरस की उम्र में, जब अगले आठ बरस जेल में और रहना है, तब कोई ताकतवर आदमी मेहनत से पढ़े, और इम्तिहान दे। इस बात को हम इस भरोसे के साथ लिख रहे हैं कि जिस भ्रष्टाचार की वजह से चौटाला जेल में है, वैसा कोई भ्रष्टाचार उन्होंने जेल के भीतर इस परीक्षा को पास करने के लिए नहीं किया होगा। अभी तक की खबरें बताती हैं कि उन्होंने मेहनत से पढ़ाई की है, और यह मेहनत, यह लगन, दूसरों के लिए कुछ सीखने की बात भी हो सकती है। एक अरबपति परिवार का एक बुजुर्ग, मुख्यमंत्री रहने के बाद 80 बरस की उम्र में जेल जाए, और वक्त का इस्तेमाल करके पढ़ाई करे, तो इससे जेल के भीतर के बाकी लोग, और जेल के बाहर के आजाद लोगों को भी यह सीखने का मौका मिलता है कि समय का कैसा इस्तेमाल किया जा सकता है।
आज जेल के बाहर भी हिन्दुस्तान में दसियों करोड़ ऐसे नौजवान हैं जो स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई के बाद निठल्ले बैठे हुए हैं, और उन्हें अपनी नालायकी, या निकम्मेपन को सही ठहराने के लिए कुछ तर्क भी हासिल हैं। अगर वे अनारक्षित तबके के हैं, तो वे आरक्षित तबकों को कोस लेते हैं, अगर वे गरीब हैं, तो उनके पास यह तर्क है कि सरकारी नौकरी तो बिना रिश्वत मिलती नहीं है। लेकिन खाली बैठे हुए लोग अंग्रेजी सीखें, कम्प्यूटर सीखें, तौर-तरीके सीखें, सामान्य ज्ञान बढ़ाएं, तो जीवन में उनकी सभी तरह की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की आबादी के एक बड़े हिस्से में लोगों के मन में चुनौतियों के लिए कोई सम्मान नहीं है, और बच्चे यह उम्मीद करते हैं कि मां-बाप उन्हें पढ़ाएं-लिखाएं, और उसके बाद उनके लिए एक नौकरी भी खरीद दें। और जब तक नौकरी न खरीदी जा सके, तब तक एक मोबाइल और एक मोबाइक जरूर खरीद दें। दूसरी तरफ दुनिया के जो विकसित और संपन्न देश हैं, उनमें खरबपतियों के बच्चे भी अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में जेब खर्च निकालने के लिए कहीं वेटर की तरह काम कर लेते हैं, कहीं कार धो लेते हैं, तो कहीं किसी और किस्म की मजदूरी कर लेते हैं। विकसित सभ्यताओं में उन बच्चों को हिकारत के साथ देखा जाता है जो अपने संपन्न मां-बाप के पैसों पर पलते हुए बिना कोई काम करते हुए कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में मेहनत को हिकारत से देखा जाता है, और यहां के नौजवान यह मानकर चलते हैं कि पढ़-लिख लेने के बाद थोड़े समय के लिए भी मेहनत का कोई काम करना उनका बड़ा अपमान होगा।
लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा, और यह सोचना होगा कि फिजूल गुजारा हुआ वक्त कभी दुबारा नहीं आता। घड़ी के कांटे उल्टे नहीं घूमते, और न ही चलती हुई घड़ी के कांटे थमकर यह इंतजार करते हैं कि उसे बांधे हुए लोग पहले कुछ और कर लें, तब फिर घड़ी आगे बढ़ेगी। लोग अगर यह सोचें कि हर दिन का एक तिहाई वक्त तो सोने में जाता है, बाकी वक्त में कुछ घंटे रोज के जरूरी कामों में जाते हैं। इस तरह किसी के पास भी जिंदगी में आधे से कम वक्त ही कुछ करने के लिए बचता है। इसलिए रोज एक घंटे बर्बाद करने वाले लोग भी रोज के पूरे समय में से दो घंटे बर्बाद कर लेते हैं। यह सोचकर लोगों को वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए, और इसकी संभावनाएं बहुत हैं। बयासी बरस की उम्र में एक अरबपति जेल में रहते हुए मेहनत करके पढ़ रहा है, और अगर बाकी की आठ बरस की कैद पूरी गुजारनी पड़ी, तो हो सकता है कि ओमप्रकाश चौटाला एमए-पीएचडी होकर जेल से निकलें। एक किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव होता है।

मोहब्बत का दुश्मन बना हुआ यह देश

संपादकीय
17 मई 2017


अभी जब यह अखबार तैयार हो रहा है छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक नौजवान ने एक युवती की कटार भोंककर हत्या की कोशिश की, और खुद एक टॉवर पर चढ़कर कूदकर जान दे दी। पिछले ही हफ्ते इसी राज्य के महासमुंद में दो नौजवानों ने एक साथ फांसी लगा ली, और उनके बारे में बाद में बताया गया कि उन दोनों की प्रेमिकाओं की किसी और से शादियां हो गईं, और इसी गम में उन्होंने जान दे दी। ऐसा कोई दिन नहीं होता जब प्रेम को लेकर कोई आत्महत्या न होती हो, यह एक अलग बात है कि नफरत को लेकर आत्महत्या करने की बात भी सुनाई नहीं देती है कि कोई व्यक्ति किसी विचारधारा या किसी नेता से नफरत करते हुए आत्महत्या कर ले।
भारत में लगातार प्रेम के खिलाफ एक नफरत का माहौल बढ़ते चल रहा है। दरअसल लोगों की जितनी दिक्कत किसी के प्रेम से है, उससे कहीं अधिक दिक्कत इससे है कि वह प्रेम किसी ऐसे न हो जाए जो कि किसी दूसरी जाति का हो, या कि किसी दूसरे धर्म का हो। बहुत से लोगों की दिक्कत यह भी रहती है कि अपने अमीर घर के लड़के या लड़की को किसी गरीब से मोहब्बत न हो जाए। ऐसे में धर्म और जाति व्यवस्था, आर्थिक असमानता, ये सब तो नौजवान मोहब्बत पर टूट ही पड़ते हैं, इनके अलावा भी परिवार के लोगों का भरोसा इस बात से भी टूटता है, और उन्हें इस बात से भी निराशा होती है कि घर के लड़के या लड़की के जीवनसाथी चुनने का मौका उन्हें नहीं मिल रहा। यह पूरा सिलसिला एक पूरी नौजवान पीढ़ी को निराशा में जीने या हताशा में मरने के लिए बेबस करके छोड़ रहा है।
हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि दुनिया में वही समाज आगे बढ़ते हैं, वही देश तरक्की करते हैं जहां पर नौजवान पीढ़ी को अपनी हसरतों को पूरा करने का मौका मिलता है। जो लोग प्रेम या सेक्स, या जीवनशैली को लेकर लगातार निराशा में जीते हैं, उनके कामकाज पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है, और देश की अर्थव्यवस्था पर भी। ऐसे में समाज के भीतर एक जागरूकता आना तो दूर रहा, लोग तभी अपने काबू को छोड़ पा रहे हैं जब शहरीकरण के चलते गांव छोड़कर लोग शहर आ जाएं, या कि नौजवान बच्चे मां-बाप का घर छोड़कर काम के सिलसिले में किसी दूसरे शहर या किसी दूसरे देश जाकर बस जाएं, तभी मां-बाप या समाज का शिकंजा ढीला पड़ता है।
भारत में समाज में जागरूकता की जरूरत इतनी अधिक है, और उसका कोई जरिया दिख नहीं रहा है, इसलिए रोजाना प्रेम को लेकर कई तरह से हत्या और आत्महत्या की नौबत आ रही है। दूसरी बात यह कि इस पूरे सिलसिले को एक निजी मामला मानकर लोग इसे एक सामाजिक समस्या भी नहीं मान रहे हैं। जबकि प्रेम विवाह से धर्म और जाति के बंधन टूटते हैं, दहेज प्रथा टूटती है, और कई तरह की वे बीमारियां हटती हैं जो कि एक ही रक्त समूह की जात-बिरादरी के भीतर शादियों से बढ़ती हैं। इसलिए देश के लोगों को प्रेम विवाह को बढ़ावा देने के लिए एक जागरूकता लाने की कोशिश करना चाहिए।

अन्ना हजारे, रविशंकर, रामदेव चुनिंदा निशानेबाजी के चैंपियन

संपादकीय
16 मई 2017


अन्ना हजारे ने पिछले हफ्ते भर में बहुत अरसे बाद मुंह खोला। अपने ही चेले रहे हुए अरविंद केजरीवाल पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो आरोपों की जांच की बात कहते हुए अन्ना ने केजरीवाल के खिलाफ सब कुछ कह दिया, मानो कि आरोप सही हों, और इस्तीफे का वक्त आ गया हो। कुछ इसी तरह का हाल रामदेव के बर्ताव में देखने मिलता है। योग-आयुर्वेद के दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी बन गए स्वघोषित बाबा, रामदेव को पिछले बरसों में लगातार यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर हमले के लिए सुर्खियां मिलीं, और फिर उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त खुलकर मोदी को वोट दिलवाए। ऐसे ही एक और व्यक्ति अपने आपको श्रीश्री कहने वाले रविशंकर हैं जो कि यूपीए सरकार के दिल्ली के भ्रष्टाचार से लेकर दूसरी कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार के खिलाफ घूम-घूमकर पिछले बरसों में बहुत बोलते रहे।
लेकिन इन तीनों में एक बात एक सरीखी है, कि इनके निशाने चुने हुए हैं, और इनकी बंदूक या तोप उन्हीं चुनिंदा निशानों को निपटाने के लिए निकलती हैं। जिस वक्त रविशंकर कर्नाटक में बैठे हुए येदियुरप्पा की भाजपा सरकार के भयानक और ऐतिहासिक भ्रष्टाचार को देख रहे थे, और उस मंत्रालय से महज कुछ मील की दूरी पर रविशंकर का आश्रम था, तब भी उस भ्रष्टाचार के खिलाफ रविशंकर का मुंह नहीं खुला। आज उत्तरप्रदेश में लगातार तरह-तरह की हिंसा चल रही है, साम्प्रदायिक तनाव चल रहा है, और योगी राज में बड़े-बड़े जुर्म भी हो रहे हैं, लेकिन भगवा भाईचारे के चलते हुए रामदेव का मुंह भी नहीं खुलता है, और आज भी उनके निशाने पर अपनी प्रतिद्वंदी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अलावा गैरभाजपा लोग ही रहते हैं। कमोबेश यही हाल अन्ना हजारे का है जिनके बारे में आज सोशल मीडिया पर लगातार यह पूछा जा रहा है कि जिस लोकपाल आंदोलन को लेकर वे दिल्ली में अपनी जान भी देने पर उतारू हो गए थे, आज मोदी सरकार के तीन बरस होने पर भी उनके मुंह से लोकपाल शब्द क्यों नहीं निकल रहा है? यूपीए सरकार के रहते तो अन्ना को यह लगता था कि लोकपाल एक ऐसी रामबाण दवा है जिससे कि भारतीय लोकतंत्र की सारी बीमारियां दूर हो जाएंगी, लेकिन अब अन्ना नाम का यह हकीम इस लोकपाल नाम की दवा की पर्ची लिखना ही भूल गया है।
और यह सब अनायास नहीं होता है, न ही अन्ना की उम्र उनकी याददाश्त पर हावी हो रही है, यह सब कुछ सोचा-समझा है, एकाएक ऐसे कुछ किरदार भारतीय राजनीति में आकर खड़े हो जाते हैं, और अपनी पसंदीदा, चुनिंदा सरकार पर हमले करना शुरू कर देते हैं। लेकिन उनके हमले उतनी ही भ्रष्ट, या उससे भी अधिक भ्रष्ट दूसरी सरकारों की तरफ कभी नहीं मुड़ते। यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है जहां पर जनता के प्रति जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त लोग जनमत को मोडऩे का काम एक योजना, या बेहतर यह कहना होगा कि एक साजिश, के तहत करते हैं, और किसी पार्टी को जिताने का, किसी को हराने का काम करते हैं। ऐसा न होता तो जब देश का सुप्रीम कोर्ट केन्द्र की मोदी सरकार को इस बात के लिए फटकार लगा रहा है कि वह लोकपाल नियुक्त क्यों नहीं कर रही है, और यह हुक्म दे रहा है कि तुरंत लोकपाल नियुक्त किया जाए, तब भी अन्ना हजारे अपनी जिंदगी के इस सबसे बड़े मकसद के बारे में मुंह भी नहीं खोल रहे हैं, उस तरफ देख भी नहीं रहे हैं। लेकिन वे दिल्ली को बड़ी बारीकी से देख रहे हैं, और यह घोषणा कर रहे हैं कि अगर केजरीवाल का भ्रष्टाचार साबित होता है तो वे दिल्ली आकर धरना देंगे। ऐसे गैरराजनीतिक नेताओं के, सामाजिक और धार्मिक नेताओं के, कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले चुनावी-राजनीतिक मकसद के मुद्दे जनता को समझने चाहिए।

हरियाणा में बढ़ते सेक्स-जुर्म के पीछे बकवासी नेता जिम्मेदार

संपादकीय
15 मई 2017


हरियाणा में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार, दलितों से बलात्कार, और स्कूल-कॉलेज की लड़कियों से छेडख़ानी की खबरें भयानक रफ्तार से आ रही हैं, और भाजपा सरकार के राज में वहां के हाल पिछली कांग्रेस सरकार के हाल से बहुत अधिक खराब दिख रहे हैं। वैसे तो बलात्कार और सेक्स-अपराध हर बार रोके जाने लायक जुर्म नहीं रहते हैं, क्योंकि इनके हो जाने के बाद ही आमतौर पर पुलिस तक बात पहुंचती है, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी है कि महिलाओं पर होने वाले जुर्म और जुल्म को लेकर सरकार का जो रूख रहता है, उससे भी ऐसे जुर्म के खतरे कम या ज्यादा होना तय होता है। हरियाणा के साथ यह बुरी नौबत पहले दिन से जुड़ी हुई है जब मनोहर लाल खट्टर ने वहां का राज सम्हाला। लोगों को अच्छी तरह याद है, और गूगल पल भर में सैकड़ों नतीजे पेश कर देता है कि किस तरह चुनाव के पहले ही खट्टर ने महिलाओं के बारे में बहुत ही अश्लील, भद्दी, और हिंसक बातें कही थीं। बलात्कार को लेकर खट्टर ने कहा था कि जिन औरतों को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं चली जातीं।
अब हरियाणा एक तो पहले से ही महिलाओं के साथ बेइंसाफी वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता, और इसका सबसे बड़ा सुबूत वहां आबादी के अनुपात में है, पूरे देश में लड़कियों का सबसे कम अनुपात इसी एक शहर में है। दूसरी तरफ यहां की खाप पंचायतें लगातार लड़कियों और महिलाओं पर तरह-तरह की रोक लगाती आई हैं, और कांग्रेस हो या भाजपा, इनका कभी यह हौसला नहीं रहा कि वे खाप पंचायतों के खिलाफ मुंह भी खोल सकें। नतीजा यह रहा कि जब दंगल जैसी फिल्म के रास्ते हरियाणा की कुछ बहादुर लड़कियां सामने आईं, और इसके पहले उन्होंने ओलंपिक में जाकर हिन्दुस्तान का सिर ऊंचा किया, तो फिर हरियाणा में लड़कियों के हक की चर्चा की सुगबुगाहट शुरू हुई। लेकिन आज भाजपा के राज में हरियाणा का हाल यह है कि वहां स्कूल की बच्चियां स्कूल की पोशाक में अनशन पर बैठी हैं कि उन्हें आते-जाते रास्ते में छेड़ा जाता है। छेडऩे वालों का यह हौसला, और उनकी यह सोच वहां की खाप पंचायतों और वहां के मुख्यमंत्री के मर्दाना बयानों से बढ़ती हैं। दिक्कत यह है कि खट्टर के ऐसे किसी भी बयान पर उनकी पार्टी की कोई नाराजगी सामने नहीं आई, और इससे हरियाणा के लोगों को ऐसा लगा कि लड़कियां और महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं, और उन पर कभी भी हाथ डाला जा सकता है।
हमने उत्तरप्रदेश में समाजवादी नेता आजम खान के अश्लील बयानों को लेकर भी कहा था कि बलात्कार की शिकार लड़की के खिलाफ ऐसा बयान देने वालों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए। बाद में कुछ लोगों के अदालत पहुंचने पर अदालत ने आजम खान की बांह मरोड़ी थी, और उनसे बिना शर्त माफी मंगवाई थी। हमारा यह मानना है कि पूरे देश में जहां-जहां किसी भी पार्टी के नेता, या कोई और सार्वजनिक व्यक्ति, जब कभी कोई हिंसक महिला-विरोधी बयान दें, तो उसके खिलाफ महिला आयोगों को, मानवाधिकार आयोगों को तुरंत नोटिस लेना चाहिए, और उन्हें नोटिस देना चाहिए। जब तक बकवासी नेता सजा नहीं पाएंगे, तब तक वे समाज में सेक्स-अपराधियों का हौसला बढ़ाने का काम ही करते रहेंगे। यह सिलसिला चारों तरफ की कोशिशों से रोकने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि किसी भी चुनाव के वक्त किसी भी पार्टी या नेता के ऐसे बयानों की रिकॉर्डिंग या कतरनों को लेकर जनता को जागरूक करना चाहिए कि क्या वे ऐसे लोगों को वोट देना चाहेंगे? अगर ऐसी मुहिम चलने लगी, तो नेताओं की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। दिक्कत यह है कि राजनीतिक दलों में से अधिकतर में ऐसे नेता भरे हुए हैं, और इसलिए इस तरह के मुद्दों को कोई पार्टी उठाती नहीं है। चुनाव के वक्त मतदाता-जागरूकता के लिए गैरराजनीतिक संगठनों को अभियान चलाना चाहिए। आज भी कुछ संगठन नेताओं और पार्टियों के खर्च, उनके अपराध को लेकर रिपोर्ट जारी करते हैं। कुछ दूसरे संगठनों को यह जिम्मा लेना चाहिए कि बकवास करने वाले नेताओं की कतरनों को चुनाव के वक्त जनता के सामने रखे, और जनमत को प्रभावित करे।

तीन तलाक का विरोध तो ठीक है लेकिन...

आजकल
15 मई 2017
इन दिनों उत्तरप्रदेश में हिन्दुत्ववादी लोग मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से बचाने पर जुट गए हैं। इन्हीं कोशिशों में एक यह है कि हनुमान मंदिर में मुस्लिम महिलाएं बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ कर रही हैं कि उससे वे तीन तलाक से छुटकारा पा सकेंगी। यह बात सही है कि सीता को रावण की कैद से छुड़ाकर लाने के लिए हनुमान ने बहुत कोशिश की थी। लेकिन जहां तक तीन तलाक से महिला को बचाने की बात है, तो रामकथा के प्रसंग को याद करने की जरूरत है। जब राम ने गर्भवती सीता को घर से निकाल दिया, तो वह एक किस्म से पत्नी का त्याग कर देना ही था, और सीता अकेले ही अपने गर्भ में पल रहे लव-कुश को लिए हुए हमेशा के लिए चली गई थी।
मुझे रामकथा की बहुत अधिक जानकारी नहीं है, लेकिन गर्भवती पत्नी को हमेशा के लिए घर से निकाल देने वाले राम के भक्त हनुमान ने उस वक्त सीता को बचाने के लिए क्या कुछ किया था? उस युग में कुछ न कर पाए हनुमान से आज मुस्लिम महिलाओं को उम्मीद दिलवाई जा रही है, हे राम!
मुस्लिम महिलाओं को इंसानी हक दिलाने की जिद तो अच्छी है क्योंकि इंसानी हक तो हर किसी को मिलने ही चाहिए। लेकिन कई तरह के सवाल उठते हैं कि जिन लोगों के अपने घरों में सिरफुटव्वल चल रहा हो, वे पड़ोसी के घर की बहस में दखल देने क्यों जा रहे हैं? आज हिन्दू या जैन समाज में कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेज तक की कहानियां आम हैं। हिन्दुओं के बीच अभी तक राज करने वाले हिंसक और हमलावर तबके से यह करते भी नहीं बन पाया है कि दलितों को पैरों तले कुचलने के लिए हिन्दू समाज के भीतर रखा जाए, मंदिरों में उन्हें आने दिया जाए, या कि मार-मारकर बाहर निकाला जाए, उनके पेशे को गंदा कहा जाए, उनके खानपान पर रोक लगाई जाए, उनसे गैरदलितों की शादियों को रोका जाए, और दलित महिलाओं के साथ जितना बन सके उतना बलात्कार किया जाए।
हिन्दू समाज के जो लोग आज मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी दिलाने के लिए लगे हुए हैं, उनके पास हिन्दू समाज के भीतर के इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, और न ही इस इम्तिहान में बैठने में उनकी कोई दिलचस्पी है। इसलिए तीन तलाक के मुद्दे पर उनकी मुस्लिम महिला-हिमायत देखकर थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि क्या हिन्दुओं ने अपने भीतर के सारे झगड़ों को सुलझा लिया है, और उनके पास बाकी दुनिया को सुधारने के लिए समय ही समय है?
गोमांस खाने न खाने को लेकर आज राष्ट्रीय हिंसा का एक सबसे बड़ा मुद्दा गैरहिन्दुओं पर हमले का नहीं है, यह हिन्दू समाज के एक बहुत ही छोटे हमलावर तबके का बहुसंख्यक हिन्दू आबादी पर हमला है, और खानपान की ऐतिहासिक हकीकत को नकारते हुए आज एक पाखंडी पवित्रता लादने की हिंसक जिद है। इसलिए हिन्दू समाज का जो सत्तारूढ़ तबका मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की हिंसा से आजाद करने का बीड़ा उठाए खड़ा है, वह सत्तारूढ़ तबका अपनी पवित्रतावादी पाखंडी मान्यताओं को दूसरी विचारधाराओं पर, हिन्दू समाज के दूसरे हिस्सों पर, आदिवासियों सरीखे गैरहिन्दुओं पर थोपने पर उतारू है, और उसके लिए मुस्लिम समाज की दकियानूसी मान्यताओं पर हमला अपने हमलावर मिजाज का एक विस्तार ही है, कोई मुस्लिम-कल्याण नीति नहीं है।
वैसे तो समाज सुधार के लिए जो कोई भी आगे आएं, वह एक अच्छी बात रहती है, लेकिन आज सुधार की जरूरत जिन लोगों को सबसे अधिक है, और जिनके भीतर के ताकतवर, बाहुबलि लठैत जिस तरह से कानून की बांह मरोड़ रहे हैं, और बेकसूरों को मार रहे हैं, तो सवाल यह भी उठता है कि सरकार और सत्तारूढ़ लोगों की प्राथमिकता मुस्लिम समाज की दकियानूसी मान्यताओं को खत्म करना होना चाहिए, या कि सत्तारूढ़ समाज के भीतर की ताजा खड़ी की जा रही हिंसा को खत्म करना होना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से तो यह कहा जा सकता है कि ये दोनों बातें साथ-साथ चल सकती हैं, लेकिन हमने यह देखा है कि सत्तारूढ़ पाखंड को खत्म करना तो दूर रहा, पाखंडी मुद्दों पर सत्ता के हिंसा को ताजा खड़ा करने की अंतहीन कोशिशें चल रही हैं, और कहीं पर रोमियो का लेबल लगाकर नौजवान भाई-बहनों को पीटा जा रहा है, तो कहीं सिनेमाघर से लौटते पति-पत्नी से शादी का प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है। कन्या भ्रूण हत्या पर बात ही नहीं हो रही है, दहेज और दहेज हत्या पर बात ही नहीं हो रही है, आबादी में हिन्दू लड़कियों का अनुपात लगातार गिरने पर बात ही नहीं हो रही है, और जिस गाय को बचाने के लिए इंसानों को मारा जा रहा है, उस गाय के लिए भी घूरे से परे किसी खाने के इंतजाम की बात नहीं हो रही है।
पाखंड से भरा हुआ ऐसा चाल-चलन लोगों की नीयत पर सवाल खड़े करता है कि आज मुस्लिम महिला के हिमायती बने हुए ये लोग अपने ही घरों में भ्रूण हत्या रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, लड़कियों को लड़कों के बराबरी के हक दिलाने के लिए क्या कर रहे हैं, दहेज और दहेज हत्या रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, विधवाओं की हालत सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं? ये लोग अपने समाज के भीतर अलग-अलग तबकों के खानपान, पहरावे, बोली और रिवाजों की विविधता के सम्मान के लिए क्या कर रहे हैं? ये लोग उत्तर-पूर्व और कश्मीर के लोगों की विविधता और असहमत राजनीतिक विचारधारा के साथ तालमेल बिठाने के लिए क्या कर रहे हैं?
ये वही लोग हैं जिन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मुस्लिम विरोधी नफरत सुलगाने वाले डोनाल्ड ट्रंप की जीत के लिए दिल्ली में हिन्दू-हवन किए थे और आज उस डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिमों से अधिक हिन्दुस्तानी-कामगारों के रोजगार की हत्या की है। इसलिए जब ऐसे लोग एकाएक मुस्लिम समाज की बेइंसाफी के खिलाफ खड़े होते हैं, तो उनकी लाठियों से कहीं अधिक उनकी नीयत को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हर लाठी के पीछे दर्जनभर सवाल साफ-साफ खड़े दिखते हैं, और ऐसे में लगता है कि गब्बर सिंह ने अगर रामगढ़ की बसंतियों को आयरन की टेबलेट बांटने की समाजसेवा कर रहा है, तो पहले वह अपनी और सांभा-कालिया की बाकी हरकतों पर जवाब तो दे दे। महिलाओं को आयरन की टेबलेट की जरूरत तो रहती है, लेकिन रामगढ़ के लोगों को गब्बर की बाकी हिंसा से आजादी की जरूरत भी तो रहती है। और आज तो पूरे देश में बहुसंख्यक हिन्दू और गैरहिन्दू तबकों पर, एक अल्पसंख्यक-हिन्दू तबके की लगातार बढ़ती हिंसा की जवाबदेही कोई नहीं उठा रहा है, हर किसी के पास महज चुप्पी है।

अगर योगी के ऐसे महंगे अंदाज हैं तो बाकी से फिर क्या उम्मीद?

संपादकीय
14 मई 2017


उत्तरप्रदेश में एक योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा लगा था कि सरकार के कामकाज में कुछ सादगी भी आ सकती है। अपने शुरुआती हफ्तों में योगी आदित्यनाथ ने कुछ ऐसे फैसले लिए भी, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फैसले के पहले ही राज्य सरकार की गाडिय़ों से लालबत्तियां हटवा दी थीं। इसके अलावा उन्होंने छुट्टियां घटा दीं, काम के घंटे तय करने को कहा, और सरकारी दफ्तरों में गंदगी के खिलाफ मुहिम छेड़ी। लेकिन दूसरी तरफ अपनी पार्टी से परे के उनके अपने निजी, और घोर साम्प्रदायिक संगठन, हिन्दूवाहिनी, द्वारा उत्तरप्रदेश में कानून हाथ में लेकर हमला करना जारी रहा, और योगी के ऐसे भाषणों का कोई मतलब नहीं रहा कि उनकी सरकार सभी धर्मों को बराबर मानकर चलेगी। उनके खुद के इस आक्रामक और हिंसक संगठन ने एक किस्म से स्थानीय स्तर पर सरकार अपने हाथ में ले ली, और अफसरों से, खासकर पुलिस से, बदसलूकी में भाजपा के नेता भी शामिल रहे, और योगी की हिन्दूवाहिनी के लोग भी।
अब एक नई खबर सामने आई कि कश्मीर के मोर्चे पर तैनात सेना के एक जवान के शहीद होने के बाद जब योगी उसके घर मिलने गए, तो एक दिन पहले से अफसरों ने इस मामूली घर में जुगाड़ लगाकर, बांस-बल्ली से टांगकर एसी लगवा दिया, और घर के भीतर सोफा और कालीन सजा दिया। अगले दिन योगी आकर गए, और आधे घंटे बाद सारा सामान हटा दिया गया और एसी भी निकाल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि अगर एक योगी के भी मुख्यमंत्री बनने पर सादगी नहीं आ सकती, तो कब आएगी? बहुत से नेता सत्ता पर आते ही ऐसा बर्ताव करने लगते हैं कि उनके पुरखे मानो बादशाह रहे हों। और यह बात सही है कि सत्ता से हटने तक ये तमाम नेता अपनी बादशाहत बनाए रखने के लिए कालेधन का अंबार जुटा लेते हैं। इस तरह सत्ता का मतलब सत्तासुख और सुखी भविष्य दोनों ही हो जाता है।
यह सिलसिला लोकतंत्र को खोखला करते चलता है, और जनता की लोकतंत्र पर आस्था को खाते चलता है। जिस देश में गरीबों को महीनों तक सरकारी योजनाओं की मजदूरी नहीं मिल पाती है, जहां पर कुछ सौ रूपए की वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए बुजुर्गों को दर्जनों मील चलकर पहुंचना पड़ता है, और खाली हाथ लौटना पड़ता है, वहां पर अगर कुछ मिनटों के लिए भी मुख्यमंत्री बिना कालीन और बिना एसी न बैठ सकें, तो यह लोकतंत्र की शिकस्त है, भाजपा की शिकस्त है, और योगी-जीवन को लेकर जितने किस्म की जनधारणाएं हैं, उनकी भी शिकस्त है। यही काम अगर उत्तरप्रदेश के दलित परिवारों में खाने या सोने वाले राहुल गांधी के लिए किया गया होता, तो नेहरू-गांधी परिवार का राजकुमार कहकर उनका मखौल हफ्तों चला होता।
हमारा ख्याल है कि पूरे देश में अदालती दखल से सरकारी फिजूलखर्ची, और ऐशोआराम को खत्म करना चाहिए। सरकार हांकने वाले लोग खुद तो ऐसा नहीं करेंगे, लेकिन हो सकता है कि अदालत में कोई ऐसे फक्कड़ जज बैठे हों जो कि किफायत के लिए हुक्म दे सकें, न सिर्फ सरकार में बैठे लोगों के लिए, बल्कि खुद अदालत में बैठे बड़े जजों के लिए भी। देश भर में जनता के पैसों पर जिस किसी को सहूलियत देने का इंतजाम रहता है, वे लोग ऐशोआराम जुटाने में जुट जाते हैं। धीरे-धीरे एक-एक करके सभी पार्टियों का जब यह हाल हो जाता है, तो फिर लोगों की शर्म भी खत्म हो जाती है। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल जैसे राज्य को एक मिसाल की तरह देखना चाहिए जहां दशकों के वामपंथी राज के बाद भी जिस तरह की सादगी और किफायत की परंपरा जारी रही, उसका एक नैतिक दबाव था कि उन्हें हराकर सत्ता में आने वाली ममता बैनर्जी के सामने भी सादगी और किफायत की एक बेबसी थी, और उन्हें अपनी सरकार को इस रास्ते पर ही चलाना पड़ा। हो सकता है कि वे खुद होकर भी ऐसा करतीं, लेकिन अगर वो ऐसा करना न भी चाहतीं, तो भी वामपंथी मिसाल के सामने जनता उनकी फिजूलखर्ची को खारिज कर देती। आज हाल यह है कि बाकी प्रदेशों में सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में बैठे हुए लोग भी जनता के पैसों पर हर किस्म की फिजूलखर्ची जारी रखते हैं, और जनता यह देख-देखकर राजनीति के लिए ऐसी हिकारत मन में पाल लेती है कि वह लोकतंत्र से हिकारत में बदल जाती है।

उत्साही समाजसेवियों को सरकारी बढ़ावा भी मिले

संपादकीय
13 मई 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज मुख्यमंत्री ने एम्स के पास मरीजों के रिश्तेदारों के ठहरने के लिए बनाई जा रही एक धर्मशाला का भूमिपूजन किया है। इसे एक निजी ट्रस्ट बना रहा है, और यह ट्रस्ट पहले से प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल, रायपुर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के पास बरसों से यह काम कर रहा है। बहुत ही रियायती दाम पर गरीब मरीजों के साथ आए लोगों के रहने और खाने-पीने का एक बहुत अच्छा और साफ-सुथरा इंतजाम संभव हो सकता है, यह इन बरसों में देखने मिला है, और इसके साबित होने के बाद राज्य सरकार ने वहीं पर बनी एक दूसरी सरकारी धर्मशाला भी इसी ट्रस्ट को चलाने के लिए दे दी है। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि मेकाहारा के पास की यह पहली धर्मशाला भी सब्जी बेचकर कमाने वाली बिन्नी बाई नाम की एक महिला ने अपने लाखों रूपए देकर बनवाई थी, और अब यह दूसरा ट्रस्ट अपनी बनाई धर्मशाला के साथ इसे भी चला रहा है।
ऐसी कुछ मिसालें यह साबित करती हैं कि अगर समाज में उत्साही लोग रहें, और उनकी साख की विश्वसनीयता रहे, तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके लिए अपने पैसे भी खर्च करने होते हैं, और दूसरे लोग भी साथ जुट जाते हैं। और यह बात कोई अकेले छत्तीसगढ़ में ही नहीं है, देश भर में जगह-जगह समाजसेवा की ऐसी मिसालें सामने आती हैं, और बहुत से लोग दूसरों को देखकर, उनसे सीखकर भी ऐसा काम करते हैं। इस बात की तारीफ में हम इसलिए लिख रहे हैं कि पूरे प्रदेश में जहां-जहां अस्पताल हैं, वहां-वहां मरीजों के साथ आकर सैकड़ों लोगों को रहना पड़ता है, और उनके लिए कोई इंतजाम नहीं हो पाता। गरीब रिश्तेदार तो अस्पताल के बरामदों में या किसी पेड़ के नीचे भी सो जाते हैं, लेकिन उनके नहाने-खाने का कोई इंतजाम नहीं रहता। उनकी इतनी क्षमता भी नहीं रहती कि वे खर्च करके यह काम कर सके। इसलिए अगर कोई ट्रस्ट ऐसा काम कर रहा है, तो उससे दूसरे शहरों के दूसरे लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए, और सरकार को भी उनका हौसला बढ़ाना चाहिए।
रायपुर में ही एक दूसरी ऐसी मिसाल एक चिकित्सा जांच केन्द्र की है जिसे एक व्यापारी परिवार ने अपने पैसों से बनवाया है, और वहां पर रोजाना सैकड़ों लोगों की रियायती जांच होती है। वैसे तो सरकार को यह सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए, लेकिन भारत में सरकारी ढांचा जितने भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार रहता है, उसके चलते सरकार ऐसी इमारत चाहे बना दे, उसे सरकारी कर्मचारियों के भरोसे चलाया नहीं जा सकता। इसके लिए बहुत ही समर्पित समाजसेवी रहना जरूरी है, और जहां-जहां ऐसे लोग सामने आते हैं, सरकार को जमीन से लेकर दूसरे किस्म के अनुदान तक का इंतजाम करना चाहिए, ताकि गरीबों की सेवा हो सके, उन्हें सहूलियत मिल सके। इससे परे भी बहुत से ऐसे दायरे हैं जिनमें समाज की सबसे जरूरतमंद लोगों के लिए बाकी सक्षम समाज कुछ कर सकता है, और इसी छत्तीसगढ़ में बढ़ते कदम नाम की एक संस्था ने मृत्युकर्म से जुड़े हुए बहुत से कामों के लिए अपनी मुफ्त की सेवा देना शुरू किया, और उसे लगातार बढ़ाया है। दूसरी तरफ इसी संस्था ने रक्तदान-नेत्रदान से लेकर शरीरदान तक की प्रेरणा देने, और करवाने का रिकॉर्ड भी बनाया है। इसी तरह कुछ संस्थाएं स्कूली बच्चों की पुरानी किताबों को इकट्ठा करके उन्हें दूसरे जरूरतमंद बच्चों को देने का काम कर रही हैं। समाज और सरकार को ऐसी कोशिशों का हौसला बढ़ाना चाहिए।

ईवीएम पर आयोग की चुनौती बरसों देर से सामने आई...

संपादकीय
12 मई 2017


चुनाव आयोग ने आज राजनीतिक दलों की बैठक बुलाकर यह चुनौती दी है कि वे ईवीएम के साथ छेडख़ानी करके दिखाएं। पिछले दिनों पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में निराश और हक्का-बक्का आम आदमी पार्टी ने सबसे जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया था, और बाद में उत्तरप्रदेश चुनाव में मटियामेट हो गईं मायावती ने भी यही राग अलापा था कि उन्हें ईवीएम ने हराया है। अब उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि जो भाजपा उत्तरप्रदेश में सपा की सरकार रहते हुए इतने बड़े पैमाने पर ईवीएम धांधली कर सकती थी, तो उसने पंजाब को अपने हाथ से क्यों जाने दिया, और गोवा-मणिपुर में कुछ सीटों से अपना बहुमत क्यों खोया? उत्तरप्रदेश में तो चुनाव करवाने वाले कर्मचारी-अधिकारी लंबे समय से सपा सरकार के तहत काम कर रहे थे, लेकिन पंजाब और गोवा में तो सरकार में भाजपा थी, और कर्मचारी उसके मातहत थे जहां ईवीएम के साथ अगर कोई छेडख़ानी हो सकती थी, तो वह भाजपा के लिए आसान थी। इसलिए ईवीएम की हैकिंग अगर तकनीकी रूप से संभव भी है, तो भी अपनी वजहों से हार को मशीन पर थोपना राजनीतिक दलों के लिए आत्मघाती था, क्योंकि इससे वे खुद ही अंधेरे में जीते हैं।
चुनाव आयोग ने आज यह काम सही किया है कि राजनीतिक दलों को ईवीएम-हैकिंग की चुनौती दी है। दुनिया में बड़ी से बड़ी कंपनियों के फोन-कम्प्यूटर हैक हो जाते हैं, और इसके लिए ये कंपनियां खुद भी हैकर्स को तनख्वाह पर रखती हैं, और बाहर के लोगों को हैकिंग करके दिखाने पर ईनाम भी देती हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी रहता है कि ऐसी कमजोरियां सामने आने पर कंपनियां अपनी मशीनों को, या कि उनके सॉफ्टवेयर को मजबूत बना पाती हैं। भारत का चुनाव आयोग दुनिया के कई देशों में चुनाव करवाने में प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद करता है, और भारतीय चुनाव आयोग की साख बड़ी ऊंची मानी जाती है। ऐसे में अपनी मशीनों को लेकर उसके मन में यह भरोसा रहना चाहिए था कि उन्हें कोई हैक नहीं कर सकते। विपक्ष में रहने वाले दल बरसों से ईवीएम पर शक जाहिर करते आए हैं, और आज भाजपा के एक सांसद ने तो ईवीएम के खिलाफ कुछ बरस पहले एक पूरी किताब ही लिखी थी जो कि बाजार में भी है। आज भाजपा के विरोधी शक जाहिर कर रहे हैं, और ऐसे में चुनाव आयोग को बहुत पहले से यह चुनौती पार्टियों के सामने रख देनी थी। कई बार मुजरिमों से भी पुलिस को सीखने मिलता है, नकली चाबी से ताले खोलने वालों के तजुर्बे से ताला बनाने वाली कंपनियां बहुत कुछ सीख पाती हैं।
इस पूरे सिलसिले में एक ही बात हमारी समझ में नहीं आई है कि भारत जैसे आईटी-दिमागों से संपन्न इस देश में चुनाव आयोग ने पहले ही अपनी मशीनों को राजनीतिक दलों और जानकारों के सामने क्यों नहीं रख दिया था? ऐसा करके या तो आयोग की मशीनों की कमजोरी और खामी सामने आती, या फिर जनता के बीच गलतफहमी फैलाने की राजनीतिक कोशिशें थमतीं। आयोग की यह पहल बहुत देर से आई है, और देश की साखदार संस्थाओं को जनता के बीच भरोसा बनाए रखने के लिए समय रहते काम करना चाहिए। जब अपने आपको चुनाव विशेषज्ञ कहने वाले एक व्यक्ति ने ईवीएम की अविश्वसनीयता पर पूरी किताब लिख मारी थी, तभी अगर उसके दावे चुनाव आयोग झूठे साबित कर देता, तो आज वह आदमी भाजपा का सांसद नहीं बना होता। ईवीएम पर शक और तोहमत लगाकर, उस सीढ़ी पर चढ़कर एक शक्की तो संसद पहुंच गया, और चुनाव आयोग उसके बाद भी बरसों बैठे रहा। लोकतंत्र में जनधारणा का ख्याल रखना भी जरूरी रहता है, और हम उम्मीद करते हैं कि चुनाव आयोग की चुनौती से जो भी साबित हो, किसी न किसी की साख जरूर बढ़ेगी, ईवीएम और चुनाव आयोग की बढ़ेगी, या मशीनों को अविश्वसनीय बताने वाले नेताओं की बढ़ेगी। लोकतंत्र और जनता इन दोनों ही हालात में जीतेंगे।

कश्मीर के हालात खतरनाक, पर टापू जैसा जीतना असंभव

संपादकीय
11 मई 2017


कश्मीर में कल जिस तरह वहां के एक नौजवान की प्रताडऩा के बाद की लाश सामने आई है, वह दिल दहलाने वाली बात है। बाईस बरस का यह कश्मीरी फौज में भर्ती हुआ था, और पहली बार अपने गांव गया था, जहां आतंकियों ने उसका अपहरण किया, और फिर बहुत बुरी यातना के बाद उसकी लाश को फेंक दिया। पहले से तनाव में चल रहे, बहुत बुरी तरह हिंसा और अलगाव झेल रहे कश्मीर में यह मौत तनाव को किस तरफ मोड़ेगी यह तो साफ नहीं है लेकिन इसने वहां के लोगों को भी हिलाकर रख दिया है।
कश्मीर में जनता का एक हिस्सा अलगाववादियों के साथ है, और उन्हें बाकी हिन्दुस्तान के लोग चाहे राष्ट्रविरोधी कहें, वे अपनी जगह इस तर्कसंगत बात को दोहराते हैं कि जब कश्मीर का भारत में विलय हुआ था, तब यह साफ था कि वहां की जनता जनमत संग्रह करेगी और भारत या पाकिस्तान में रहने की अपनी पसंद से अपना भविष्य तय करेगी। लेकिन जनमत संग्रह के साथ कुछ और शर्तें भी जुड़ी हुई थीं, जिनमें पाक कब्जे वाले कश्मीर से फौजों का हटना भी था, और वह शर्त पूरी न होने की बात कहते हुए भारत ने जनमत संग्रह की संभावना को खारिज ही कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि अब धीरे-धीरे भारत जनमत संग्रह का कोई भविष्य नहीं देखता और वह कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग मानते हुए ही आगे किसी बातचीत के लिए तैयार होता है, चाहे वह पाकिस्तान से हो, चाहे वह कश्मीर के अलगाववादियों से हो।
कश्मीर में लगातार फौज की मौजूदगी से हालात ऐसे बने हैं कि फौज पर तरह-तरह की हिंसा के आरोप लगते हैं, और जब वहां के स्थानीय नौजवान पुलिस और सेना पर, केन्द्रीय सुरक्षा बलों पर पथराव करते हैं, तो जवाबी पुलिस कार्रवाई की वजह से कश्मीरियों को आए जख्म हालात को और बिगाड़ते हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है, और अदालतों को यह समझ नहीं आ रहा है कि जब तक पथराव चलते रहेगा, तब तक कैसे सुरक्षा बलों से यह कहा जाए कि वे छर्रे वाली बंदूकें इस्तेमाल न करें। दूसरी तरफ कश्मीर के मुद्दे को, उसकी जटिलता को, समझने वाले लोगों का यह कहना है कि कश्मीर की समस्या को एक टापू की तरह नहीं सुलझाया जा सकता, और बाकी देश में जब लगातार माहौल मुस्लिमों के खिलाफ बना रहे, जब देश में जगह-जगह कश्मीरियों पर कुछ हमले भी हों, तब कश्मीरी नौजवानों की नाराजगी को खत्म कर पाना आसान नहीं है। यह एक और बात है कि बार-बार ऐसे सुबूत सामने आते हैं कि पत्थरबाजों को अलगाववादी ताकतें, या कि आतंकी ताकतें, भाड़े पर लेती हैं, और पथराव करना सैकड़ों नौजवानों का पेशा सा हो गया है, तो यह समझ पड़ता है कि कश्मीर में राजनीतिक पहल की जरूरत है, और महज बंदूकों से बात बनने वाली नहीं है। बंदूकें तो कश्मीर में आधी सदी से तैनात हैं लेकिन बात किसी किनारे पहुंच नहीं रही है।
कश्मीर में आज राज्य सरकार भाजपा के साथ गठबंधन वाली है, यह पहला मौका है जब भाजपा जम्मू-कश्मीर सरकार में सत्ता में भागीदार है, और यह भी एक अनोखा मौका है कि वह केन्द्र सरकार में भी इसी वक्त गठबंधन की मुखिया है, और सरकार पर उसका लगभग एकाधिकार है। जहां तक कश्मीर का सवाल है, तो राज्य के भीतर तो भाजपा ने दशकों से चले आ रहे अपने खुद के सभी विवादास्पद मुद्दों को ताक पर धर दिया है, और गठबंधन में छोटे भागीदार की तरह काम कर रही है। लेकिन ऐसा लगता है कि इतना काफी नहीं है, और कश्मीर के हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बाकी देश के हालात सुधारने की जरूरत है, क्योंकि आज अगर देश में यह माहौल बन रहा है कि हिन्दुओं के भीतर ही एक अल्पसंख्यक तबके के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों के मुताबिक देश की बाकी पूरी आबादी को रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो इस तरह का साम्प्रदायिक तनाव बाकी देश के साथ-साथ कश्मीर को भी प्रभावित कर रहा है, और मोदी सरकार, भाजपा, इनकी जैसी साख की जरूरत कश्मीर में है, वैसी साख बन नहीं रही है। बाकी देश में अलग दिक्कत चल रही है, लेकिन खास कश्मीर के सिलसिले में यह कहना जरूरी है कि उसे एक टापू की तरह नहीं जीता जा सकता, बाकी देश के साथ मिलाकर ही देखना होगा।

भारत में केन्द्र और राज्य स्तर पर नई संवैधानिक जांच एजेंसी बनें

संपादकीय
10 मई 2017


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वहां की संघीय जांच एजेंसी, एफबीआई के डायरेक्टर को बर्खास्त कर दिया है। इसे लेकर अमरीका में भारी बहस शुरू हो गई है क्योंकि इसी डायरेक्टर की निगरानी में अमरीकी चुनाव के दौरान ट्रंप के सहयोगियों और रूस की सरकार के बीच के ऐसे तालमेल की जांच चल रही है जो कि राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने वाली कही जा रही है। वहां पर यह संवैधानिक मुद्दा उठ खड़ा हुआ है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार, उनकी कंपनियां, उनके सहयोगी जिस तरह की जांच में घिरे हुए हैं, उस जांच के बीच जांच के सबसे बड़े अफसर को इस तरह से बर्खास्त करना राष्ट्रपति के अधिकारों, और राष्ट्रपति पर चल रही जांच के बीच सीधे-सीधे टकराव का मामला है। अमरीकी मीडिया कल से इस मुद्दे पर उबला हुआ है, और यह मामला अमरीकी से परे भी हितों के टकराव का ऐसा सवाल खड़ा करता है जिसे दुनिया के बाकी हिस्सों में भी सोचा-विचारा जा सकता है।
भारत में राजनीतिक ताकतों से जुड़े मामलों की जांच उन्हीं नेताओं के मातहत काम करने वाली एजेंसियां करती हैं जिनके अफसरों का भविष्य इन्हीं नेताओं के हाथ रहता है। नतीजा यह होता है कि सत्ता के काबू से परे की कोई जांच एजेंसी रहती नहीं है, और इसमें काम कर रहे लोग सीधे-सीधे सरकार के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और अपने आगे के सरकारी करियर के लिए सरकार चला रहे नेताओं का मुंह तकते हैं। ऐसे में देश में लोकपाल या लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्थाओं का मुद्दा उठता है कि सरकार से परे की ऐसी जांच एजेंसियों को कमजोर बनाकर क्यों रखा जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की सारी दलीलों को खारिज करते हुए यह हुक्म दिया है कि लोकपाल के मौजूदा कानून के तहत ही तुरंत लोकपाल की नियुक्ति की जाए। मोदी सरकार के तीन बरस पूरे होने को आ रहे हैं, और अब तक लोकपाल न बनाने के लिए लोकपाल-कानून में ही फेरबदल की चर्चा जारी है। इसी देर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अभी साफ-साफ आदेश दिया है।
केन्द्र से परे राज्यों में भी भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां सरकार के मातहत काम करती हैं, और इसे लेकर उन पर गंभीर आरोप भी लगते हैं। हमारा ख्याल है कि राजनीतिक जीवन में पारदर्शिता और शुचिता के लिए यह जरूरी है कि जिस तरह लोकसेवा आयोग के संवैधानिक पद पर नियुक्ति के बाद लोग किसी भी तरह का सरकारी पद नहीं ले सकते, उसी तरह की एक जांच एजेंसी होनी चाहिए, जिसमें जाने के बाद लोग सरकार में न लौट सकें, न ही कोई सरकारी मनोनयन पा सकें। भारत के संघीय ढांचे में यह भी जरूरी है कि राज्यों के भीतर भी ऐसी नियुक्तियां राज्य के अफसरों से परे, देश के दूसरे हिस्सों से आए हुए जांच अफसरों में से हो, ताकि वे स्थानीय शासन के प्रभाव और दबाव से मुक्त रहें। यह बात सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं सुहाएगी, लेकिन अगर भारत में जांच और मुकदमों को सत्ता के दबाव से परे रखना है, तो देश में एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था बनानी जरूरी है जैसी कि चुनाव आयोग, या लोकसेवा आयोग की है, जहां पर पहुंचने के बाद लोगों का सरकार से उपकार लेने-देने का सिलसिला खत्म हो जाए। फिर दूसरी बात यह कि ऐसी तमाम नियुक्तियां अपने राज्य से परे ही होनी चाहिए, और इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे अफसरों का एक पूल बनाया जा सकता है, और राज्यों को अफसरों का बंटवारा किया जा सकता है।
आज भारत में जांच और मुकदमे पर किसी को कोई भरोसा नहीं रहता है, जो लोग सत्ता पर बैठे हैं, वे किसी भी किस्म की कार्रवाई से बहुत दूर तक बचते चलते हैं, और उनको सजा मिलने की गुंजाइश लगातार कमजोर की जाती है। भारत के संविधान विशेषज्ञों को एक ऐसी नई व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जो कि केन्द्र और राज्य सरकार के असर से परे की हो, और जिसमें देश भर के अधिकारियों और कर्मचारियों को लाकर सत्ता के भ्रष्टाचार और सत्ता के जुर्म की जांच में ईमानदारी की संभावना पैदा की जा सके। यह एक बिल्कुल नई और मौलिक सोच होगी, लेकिन यह बहुत मुश्किल बात भी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट अपना घर सुधारने की पहल करे

संपादकीय
09 मई 2017


कोलकाता हाईकोर्ट के एक दलित जज का सुप्रीम कोर्ट के साथ महीनों से चलते आ रहा टकराव आज एक अभूतपूर्व नौबत लेकर आया, और सुप्रीम कोर्ट ने इस जज को अपनी अवमानना का दोषी ठहराते हुए 6 महीने की कैद सुनाई है। हाईकोर्ट जज ने लगातार सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह तोहमत लगाना जारी रखा था कि उनके साथ दलित होने की वजह से प्रताडऩा की जा रही है। उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिकार क्षेत्र को लेकर एक बड़ा टकराव खड़ा किया था और घर बैठे उन्होंने अपने को अदालत मानते हुए सुप्रीम कोर्ट जजों को सजा सुना दी थी, और पुलिस को हुक्म दिया था कि इन जजों को जेल भेजा जाए।
दरअसल, भारत की न्याय व्यवस्था में यह एक बुनियादी खामी है कि सुप्रीम कोर्ट के हाथ हाईकोर्ट का प्रशासन नहीं रहता, और हाईकोर्ट के अदालती फैसलों पर तो सुप्रीम कोर्ट फैसला दे सकता है, लेकिन प्रशासनिक मामलों में उसका हाईकोर्ट पर काबू नहीं रहता। इसी तरह, खुद सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में प्रशासनिक रूप से बेकाबू सा रहता है, और सरकार के पास अदालत की मनमानी पर कार्रवाई करने के लिए कोई अधिकार नहीं रहते। किसी जज को हटाना हो तो उसके लिए संसद में बड़ी संख्या में सांसदों की तरफ से प्रस्ताव लाना पड़ता है, और उसके बाद भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह काम इतना मुश्किल रहता है कि देश के इतिहास में ऐसे गिने-चुने ही मौके आए हैं, जबकि जजों के बारे में कई बार ऐसी चर्चा आती है कि उनमें बहुत से जज भ्रष्ट रहते हैं, जिनपर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है।
संसद, सरकार, और अदालत, भारतीय लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों का  एक-दूसरे पर नियंत्रण बनाया तो गया है, लेकिन इन तीनों के बीच अदालतों का अधिकार क्षेत्र मनमानी का खतरा लिए हुए दिखता है। हमारे पास इसका कोई आसान इलाज नहीं है क्योंकि ऐसी किसी भी दिक्कत के चलते हुए हड़बड़ी में जब कोई इलाज ढूंढा जाता है तो उसका साईड रिएक्शन अधिक खतरनाक हो सकता है। लेकिन यह बात तय है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बीच एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था कायम करना जरूरी है क्योंकि जजों के भ्रष्ट होने पर भी उनके ऊपर कोई कार्रवाई होते हम नहीं देखते हैं। लोगों को याद होगा कि भूतपूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह खुला आरोप लगाया था कि उनमें से आधा दर्जन से अधिक भ्रष्ट हैं, उनके ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का मुकदमा भी शुरू किया था, लेकिन साहसी पिता-पुत्र ने कोई माफी मांगने से इंकार कर दिया था, और भ्रष्टाचार की जांच भी नहीं करवाई गई।
हमारा यह मानना है कि अदालतों को अपनी अवमानना से अधिक फिक्र इस बात की करनी चाहिए कि उन पर लगने वाले आरोपों की जांच हो रही है या नहीं। जजों के हाथ में लोगों की जिंदगी के ऐसे मायने रखने वाले पहलू रहते हैं कि उन्हें संदेह से परे जीना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को खुद ही जजों पर लगने वाले भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के आरोपों की जांच के लिए अदालत से बाहर की एक प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। अदालत के भीतर कोई जांच निष्पक्ष और ईमानदार नहीं हो सकती।

केजरीवाल का राजनीतिक अंदाज आज उन पर भारी

संपादकीय
08 मई 2017


दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार से हटाए गए एक मंत्री ने अगले ही दिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तगड़ा हमला किया और कहा कि उसने मुख्यमंत्री को 2 करोड़ रुपये नगद वसूली करते अपनी आंखों से देखा है। इसके बाद आज इस मंत्री ने भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो जाकर केजरीवाल सरकार के भ्रष्टाचार के कुछ मामले दिए। इसे लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है कि जब महीनों पहले इस मंत्री ने अपने मुख्यमंत्री को ऐसी गैरकानूनी उगाही करते देखा तो उसी वक्त इसकी शिकायत क्यों नहीं की? और अब शिकायत की तब सूझी जब उसे बर्खाश्त कर दिया गया है। इस मौके पर सब लोग अपने-अपने हाथ धो रहे हैं, और भाजपा के विरोधियों ने यह ढूंढ कर निकाला है कि इस मंत्री,कपिल मिश्रा, की मां भाजपा की एक नेता थीं, और वे भाजपा से चुनाव लड़कर जीती भी थीं। दूसरी तरफ, केजरीवाल से अब अलग हो चुके बहुत से लोग यह याद दिला रहे हैं कि केजरीवाल की तो पूरी की पूरी राजनीति ही ऐसे आरोपों को लेकर चलती आई है और वे बिना किसी बुनियाद के लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का काम करते रहे हैं। यह बात सही भी है कि केजरीवाल का अंदाज पत्थर उछालकर भाग लेने जैसा रहा है, और वे इसी आदत के चलते अदालतों में मानहानि के मुकदमे भी झेल रहे हैं।
सार्वजनिक जीवन में आरोपों को लेकर दो बातें साफ रहनी चाहिए, पहली तो यह कि जब तक सबूत न हो तब तक सारे आरोप संदेह की तरह ही सामने रखने चाहिए, और फिर अगर किसी ने संदेह न जताकर सीधे आरोप लगाए, तो फिर उस आरोप को साबित करने की जिम्मेदारी भी उसी पर आनी चाहिए। अरूण जेटली पर लगाए गए ऐसे ही आरोपों को लेकर केजरीवाल अदालती कटघरे में है, और साबित कुछ नहीं कर पा रहे हैं। लोकतंत्र में किसी की इज्जत को उछालना एक बड़ा आसान काम होता है, लेकिन हमारा मानना है कि ऐसा करने वाले नेता, या करने वाला मीडिया कानून के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। केजरीवाल सरकार के अनगिनत मंत्री और विधायक एक-एक करके कई तरह के मामलों में फंस गए हैं, और ये मामले आर्थिक भ्रष्टाचार से परे के भी हैं। केजरीवाल की दिक्कत यह है कि उन्होंने अपने साथियों सहित राजनीति में ईमानदारी के पैमाने इतने ऊंचे कर दिए थे कि अब उनपर खरा उतर पाना उनके खुद के लिए भी मुश्किल हो रहा है।
हम किसी भी जांच को महज इसलिए टालने के खिलाफ है कि उसे लेकर सरकार पर राजनीति करने और विरोधियों को फंसाने के आरोप लग सकते हैं। ऐसे में तो देश की सारी पार्टियों, और सारे नेता मिलकर संगठित भ्रष्टाचार की गिरोहबंदी करने लगेंगे कि कोई किसी को फंसने न दे। लोकतंत्र में जो लोग ऊंची कुर्सियों पर बैठे हैं, उन्हें सबसे पहले उच्च स्तरीय जांच के लिए तैयार भी होना चाहिए। केजरीवाल की पूरी राजनीति भ्रष्टाचार के आरोपों को लगाने से शुरू हुई थी, और उस समय से उनकी कही हुई बातों को निकालकर उन्हें आज उस पर अमल करने को कहना चाहिए। 

पाकिस्तानी मरीजों को इलाज के लिए हिंदुस्तानी वीजा नहीं!

संपादकीय
07 मई 2017


पाकिस्तान ने भारत सरकार से इस बात को लेकर विरोध दर्ज कराया है कि वहां से हिन्दुस्तान आने वाले मरीजों को भारत में इलाज के लिए वीजा देना बंद कर दिया है। भारत की आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के चलते आस-पड़ोस के सभी देशों से बड़ी संख्या में मरीज आते हैं, और छत्तीसगढ़ की राजधानी में भी एक समाजसेवी अस्पताल में कई देशों के मरीजों का, बच्चों का ऑपरेशन हो रहा है। लेकिन पाकिस्तान के इस विरोध के साथ इस बात को जोड़कर देखना होगा कि सरहद पर किस तरह का तनाव चल रहा है, और इस तनाव की वजह से खेल, सिनेमा, टीवी, साहित्य समेत इलाज जैसी गैरफौजी बातों पर भी असर पड़ रहा है।
दोनों देशों में फौजी लोगों, और फौज को लेकर युद्धोन्माद से भरे हुए लोग सरहद के तनाव को बढ़ाते चलने में लगे रहते हैं। दूसरी तरफ अनगिनत लोग ऐसे हैं जिनके एक-दूसरे देश में रिश्तेदार हैं, तीर्थ हैं, और दिलचस्पी है, लेकिन इन लोगों का आना-जाना इस पर टिका रहता है कि कब दोनों देशों के बीच तनाव कितना है। पाकिस्तान में जाहिर तौर पर इलाज की वैसी सहूलियतें नहीं है जैसी कि हिन्दुस्तान में हैं, और इसीलिए वहां से लोग गंभीर बीमारियों के इलाज और ऑपरेशन के लिए भारत आते हैं। यहां पर हम भारत सरकार को यह सुझाव देना चाहेंगे कि सरहद पर चाहे कितना ही तनाव क्यों न हो, मरीजों पर किसी तरह की रोक नहीं लगानी चाहिए। जो लोग इलाज के लिए दूसरे महंगे देशों में नहीं जा पाते, वे ही लोग भारत आते हैं। और एक बड़ा देश, एक विकसित देश होने के नाते भारत की यह जिम्मेदारी है कि इस मानवीय काम में वह सरहद के किसी तनाव को आड़े न आने दे। अगर जरूरत हो तो वहां के फौजी अफसरों को, वहां के नेताओं को इलाज के लिए आने से रोक दे, लेकिन वहां के आम लोगों को तो बिल्कुल नहीं रोकना चाहिए, और वहां के बड़े लोग, खास लोग, ऐसे हैं जो कि अपनी काली या सफेद कमाई से दुनिया के महंगे देशों में भी जा सकते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का एक बहुत बुरा नुकसान दोनों देशों के सबसे गरीब लोगों को होता है जिनके मुंह का कौर छीनकर फौजों पर खर्च किया जाता है, और सरकारों के कामकाज का एक बड़ा हिस्सा इसी सरहदी तनाव पर खर्च हो जाता है। अगर ऐसा न हो तो दोनों देशों में कोई कुपोषण न रहे, कोई गरीब न रहे, और कोई बिना इलाज के न रहे। दिक्कत यह है कि सरहद के तनाव के फैसले सरहद से दूर राजधानियों में बैठकर लिए जाते हैं, और ऐसे लोगों द्वारा लिए जाते हैं जो कुपोषण या भूख को जानते भी नहीं हैं। अगर इन दोनों देशों में रिश्ते ठीक रहें, तो आपसी कारोबार भी इतना बढ़ सकता है कि किसी तीसरे मुल्क तक कमाई जाने के बजाय आपस में ही बहुत सा फायदा हो सकता है। नेता और फौजी अफसर, हथियारों के सौदागर, और उनके दलाल मीडिया के कुछ लोग, ये तमाम लोग मिलकर देशों के बीच तनाव को अपना पेशा बना लेते हैं, और इसके बीच दोनों तरफ के गरीब पिसते हैं। सरकारों से परे जनता के बीच से यह जागरूकता उठनी चाहिए कि दोनों देशों के बीच तनाव से किसी का फायदा नहीं हो रहा है, और दोनों देश दीवालिया हो रहे हैं।

सरकारी सेवानियम और अभिव्यक्ति की आजादी

संपादकीय
06 मई 2017


छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा जीतकर आने वाली एक नौजवान अधिकारी वर्षा डोंगरे को आज सुबह राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया, उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर राज्य सरकार की नक्सल और आदिवासी मामलों में रीति-नीति के खिलाफ बड़े आक्रामक अंदाज में लिखा था, और सरकार के दूसरे आलोचकों ने इसे हाथों-हाथ उठाया था, और चारों तरफ फैला दिया था। इस पोस्ट में यह भी लिखा हुआ था कि उन्होंने एक जेल अधिकारी की हैसियत से काम करते हुए जेल में ऐसी महिलाओं से बातचीत की है जिनके साथ सुरक्षा बलों ने बस्तर में सेक्स-बदसलूकी की थी। यह आरोप राज्य शासन के सुरक्षा कर्मचारियों और केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारियों पर लंबे समय से लगते आ रहा है, और बस्तर के आदिवासियों महिलाओं ने आरोपों को लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक दौड़ लगाई है। अब राज्य शासन की एक जेल-अधिकारी के ऐसे कथित पोस्ट को लेकर सरकार की काफी फजीहत हो रही है, और यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमों में अब मानवाधिकारवादियों के वकील वर्षा डोंगरे को गवाह बनाकर बुलाएं।
इस निलंबन के बाद सरकार आलोचना के कटघरे में आएगी कि उसने सच कहने वाली एक अफसर को निलंबित किया है। लेकिन हमारा सोचना इस बारे में थोड़ा सा अलग है। सरकार का काम कुछ नियमों से बंधा रहता है, और जो लोग सरकार से वेतन और बाकी सुविधाएं, नौकरी की सुरक्षा पाते हैं, उन्हें यह सब कुछ जिम्मेदारियों और जवाबदेही के साथ ही मिलते हैं। शासन के सेवानियमों में यह भी है कि राज्य शासन के कामकाज या उसकी रीति-नीति की आलोचना न की जाए। और ये नियम सोशल मीडिया के पैदा होने के बाद के नहीं है, ये पहले से चले आ रहे हैं, यह एक अलग बात है कि सोशल मीडिया पर अपनी नई ताजी सक्रियता के चलते अब बहुतसे अधिकारी बहुत से मुद्दों पर खुलकर ऐसी बातें लिखने लगे हैं जो कि उनके सेवानियमों के खिलाफ जाती हैं। दूसरी तरफ देश में कई ऐसे चर्चित अफसर भी हुए हैं जिन्होंने सरकार से असहमति होने पर कामकाज छोड़कर सामाजिक आंदोलनकारी के रूप में काम किया है, या कि केजरीवाल की तरह राजनीति में आए हैं।
हम अगर वर्षा डोंगरे के ही मामले की बात करें, और इसे सच मानें कि उन्होंने ऐसी पोस्ट लिखी थी, और यह भी सच मानें कि उन्हें जेल में या कहीं और महिलाओं ने अपने सेक्स-शोषण की, जुल्म की, बातें बताई थीं। तो ऐसे में भी हमारा ख्याल है कि उनके पास सरकार के भीतर, औपचारिक रूप से भी इन बातों को रखने का एक विकल्प मौजूद था, जो कि सरकार के सेवा-नियमों के हिसाब से ठीक भी रहता। लेकिन उन्होंने अपनी ऐसी जानकारी को सरकार के सामने रखने के बजाय सोशल मीडिया पर जब रखा है, तो सरकार भी उस पर कार्रवाई करने की आजादी रखती है, हक रखती है। सरकार और वर्षा डोंगरे के बीच की यह लड़ाई सच की लड़ाई नहीं है, सच तो दोनों ही हो सकते हैं, यह लड़ाई, या कि यह कार्रवाई सरकारी सेवानियमों की है, जिसके तहत राज्य सरकार इस बात के लिए भी जिम्मेदार है कि उसके अधिकारियों-कर्मचारियों का आचरण कैसा रहे।
दरअसल वर्षा डोंगरे ने राज्य शासन और पीएससी के खिलाफ मुकदमा लड़ते हुए, और अदालत में बिना वकील अपना पक्ष खुद रखते हुए जो एक लंबी लड़ाई जीती है, उसकी वजह से भी यह हो सकता है कि उनके मन में बेइंसाफी के खिलाफ, हिंसा के खिलाफ एक नाराजगी भरी हुई हो। आज वे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ कुछ लोगों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में की गई अपील को लेकर एक बार फिर अदालत में खड़ी हैं, और उनके दिमाग में सरकारी व्यवस्था के खिलाफ एक नाराजगी भी भरी हुई है। लेकिन हर ओहदे और हर भूमिका की अपनी सीमाएं होती हैं, जिन लोगों को ऐसी सीमाओं के बाहर जाकर काम करना हो, उनके लिए रास्ते खुले रहते हैं। सरकार में काम करते हुए सरकार की किसी गलती, या गलत काम की जानकारी होने पर उसे सरकार के भीतर ही ऊपर तक पहुंचाने का जो रास्ता है, हमारा ख्याल है वही रास्ता वर्षा डोंगरे के लिए ठीक होता, न कि उसे सेवानियमों के खिलाफ जाकर सार्वजनिक रूप से उठाने के। सरकारी सेवानियम नौकरी में रहने तक अभिव्यक्ति की आजादी पर हावी रहते हैं, यह बात अच्छी हो या बुरी हो, जायज हो या नाजायज हो, जब तक ऐसे सेवानियम हैं, तब तक या तो लोग सरकार के खिलाफ सरकार के बाहर न बोलें, या कि जैसा कि इस मामले में हो सकता है, इन नियमों को चुनौती देकर अदालत की एक नई व्याख्या मांगें।

शहरी सफाई में इस प्रदेश में अच्छी और बुरी, दोनों मिसालें

संपादकीय
05 मई 2017


देश भर के शहरों की स्वच्छता के सर्वे में छत्तीसगढ़ के पास खुश होने को अंबिकापुर, राजनांदगांव, कोरबा और दुर्ग, ये चार म्युनिसिपल हो सकते हैं, लेकिन राजधानी रायपुर की बदहाली जारी है और देश के साफ शहरों में इसका नंबर सवा सौ शहरों के बाद लगता है, और इस शहर के अधिकतर हिस्से को देखने वालों को इस बात की भी हैरानी होती है कि इसका नंबर 129वां भी कैसे आ गया? शहर की गंदगी का हाल यह है कि मानो सफाई का काम म्युनिसिपल की बुनियादी जिम्मेदारी है ही नहीं, और राजधानी का म्युनिसिपल सैकड़ों करोड़ के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने वाली एक कंस्ट्रक्शन कंपनी भर है।
छत्तीसगढ़ के रायपुर और बिलासपुर जैसे शहरों को यहीं के एक किनारे पर बसे हुए अंबिकापुर से सबक लेने की जरूरत है जहां पर एक उत्साही कलेक्टर ने म्युनिसिपल को साथ जोड़कर न सिर्फ शहर को साफ कर दिखाया, बल्कि कचरे की अलग-अलग किस्मों को अलग-अलग करने का एक बड़ा काम भी किया है, और इससे बाकी प्रदेश को जो सीखना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। एक बरस पहले मुख्यमंत्री ग्राम सुराज के दौरान जब सरगुजा पहुंचे थे, तो वहां अंबिकापुर में उन्होंने बदली हुई तस्वीर देखी थी। महिला जनसंगठनों को साथ लेकर प्रशासन और म्युनिसिपल ने पूरे शहर से कचरा उठाने से लेकर उस कचरे के निपटारे तक का काम बड़े अच्छे तरीके से किया था, और राज्य शासन के तमाम बड़े लोगों ने उसे देखा भी था। लेकिन वाहवाही के बाद वहां से बाकी किसी शहर ने कुछ नहीं सीखा। खासकर राजधानी के म्युनिसिपल का हाल सबसे ही निराशाजनक है, जहां पर राज्य बनने के बाद से अब तक निगम सीमा में ही हजारों करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं, लेकिन म्युनिसिपल अपनी पहली बुनियादी जिम्मेदारी, सफाई को ही नहीं कर पाया।
दरअसल शहरों को साफ रखना एक ऐसा काम है जिसे जनता को साथ जोड़े बिना सिर्फ अफसर या निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधि अपने दम पर कभी नहीं कर सकते। और आज रायपुर में हाल यह देखने मिलता है कि सत्ता और जनता, ये दो बिल्कुल अलग-अलग तबके हैं, और इन दोनों का आपस में कोई संबंध, कोई लेन-देन, सफाई के मामले में नहीं रह गया। शहर गंदा है, यह तो शहर का हर हिस्सा चीख-चीखकर बता ही देता है, लेकिन एक दूसरा बड़ा खतरा बारूद के ढेर की तरह खड़ा हो रहा है कि शहर के ठोस कचरे का अलग-अलग निपटारा नहीं किया जा रहा, और जो कचरा सड़कर धरती से मिल सकता है, उसका बायो-इस्तेमाल नहीं हो रहा, और बाकी तरह के कचरे को अलग-अलग नहीं किया जा रहा। शहर में जब तक लोगों के बीच ऐसी सभ्यता फैलाई नहीं जाएगी, तब तक म्युनिसिपल चाहे जितना खर्च कर ले, न तो कचरे का कोई इस्तेमाल होगा, न कचरा कम होगा, न सफाई बढ़ेगी। दूसरी तरफ रायपुर सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में भी बार-बार आता है, और उसकी एक वजह शहरी कचरा भी है जिस पर काबू किए बिना शहर का पर्यावरण नहीं सुधरेगा। कचरे के अलावा भी म्युनिसिपल की कई तरह की जिम्मेदारियां हैं, लेकिन वे भी तिरस्कृत पड़ी रहती हैं, और नेता-अफसर जलसों में मगन रहते हैं।
आज दिक्कत यह है कि स्थानीय निर्वाचित संस्थाएं हों, या कि विकास प्राधिकरण जैसी बनाई गई और मनोनीत लोगों की संस्था हो, इन सबको बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाकर घोषित और अघोषित कमाई से बड़ी प्राथमिकता और कुछ नहीं दिखती है।  यह सिलसिला बदलने के लिए ऐसे अफसरों की जरूरत है जिन्हें अपने ओहदों पर गुरूर न हों, और जो एक चुनौती मानकर शहर को सुधार सकें। हम एक बार फिर अंबिकापुर की मिसाल देना चाहेंगे जहां पर सीमित साधनों में भी अफसरों ने यह कर दिखाया है, और दूसरी तरफ रायपुर-बिलासपुर जैसी जगहों पर पिछले बहुत बरसों से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में शहरों को फंसाकर रख दिया गया है, और साफ-सफाई का कोई ठिकाना नहीं है। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को म्युनिसिपलों में अफसरों की तैनाती के वक्त यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका मिजाज कैसा है, क्या वे गली-गली घूमकर काम करवाने में भरोसा रखते हैं, या फिर वे ओहदे को शान समझकर बैठे रहते हैं। मेहनत में ईमानदार, और कल्पनाशील अफसरों की कमी नहीं है, और राज्य शासन को छांटकर ऐसे अफसरों को म्युनिसिपलों में रखना होगा, क्योंकि शहरों की सफाई और उन्हें सुधारने, उनका रख-रखाव करने का जिम्मा एक अलग तरह का है। स्थानीय शासन विभाग से परे, पर्यावरण विभाग को भी इसमें दखल देनी चाहिए, क्योंकि शहरों का पर्यावरण म्युनिसिपल के काम से सीधा प्रभावित होता है। 

लोक सुराज की कड़ी मेहनत के साथ-साथ कुछ और भी जरूरी

संपादकीय
04 मई 2017


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पूरी सरकार के साथ गर्मी के सबसे अधिक गर्म दिनों में सुबह से शाम तक लगातार लोक सुराज का दौरा कर रहे हैं, और इतना विशाल, इतना विस्तृत जनसंपर्क आसान बात नहीं रहती। उन्होंने इस अभियान की शुरुआत में ही यह साफ किया था कि वे लोगों की नाराजगी या संतोष को भी देख लेना चाहते हैं जो कि लगातार चल रही सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी के नाम से कई प्रदेशों में देखने मिलती है। जनता की नाराजगी और शिकायतों का ऐसा सामना कुछ तकलीफदेह तो रहता है क्योंकि सरकार के कामकाज में कमियां और खामियां दोनों ही आम बात रहती हैं, लेकिन लोगों के मुंह से उनकी दिक्कत-परेशानी, उनकी शिकायत, और उनकी मांग-उम्मीदों को सुनना, और प्रदेश-जिले स्तर के अफसरों के साथ उन्हें मौके पर ही निपटाना प्रतीकात्मक ही सही लेकिन एक बड़ा काम है। उनके मंत्री भी जगह-जगह दौरे कर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का दौरा सबसे ही कड़ा है, सबसे ही मुश्किल है, और इसकी वजह से पूरे प्रदेश के अफसरों को अपने-अपने इलाकों में, अपने-अपने विभागों के कामकाज में चौकन्ना रहना पड़ रहा है।
वैसे तो आदर्श स्थिति यह होती कि जनदर्शन या ऐसे जनसंपर्क की नौबत ही नहीं आती, लेकिन भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में कभी भी ऐसी आदर्श स्थिति नहीं आ सकती जिसमें कि सुधार की गुंजाइश न हो, या कि गड़बडिय़ों को पकड़ा न जा सके। लोक सुराज का यह अभियान मुख्यमंत्री को प्रदेश के जिला स्तर के अफसरों के कामकाज को बेहतर समझने का एक मौका भी दे रहा है, और सरकारी अमला यह उम्मीद भी कर रहा है कि इस अभियान के पूरे होने के बाद बहुत से तबादले होंगे, और कई महत्वपूर्ण कुर्सियों पर जाने वाले लोग चुनाव तक वहां रहेंगे। यह भी उम्मीद की जा सकती है कि लोक सुराज दौरा शुरू होने के पहले से शिविर लगाकर लोगों से जो शिकायतें और मांग इक_ी की गई थीं, उनमें से संभव बातों को चुनाव तक पूरा करने का मौका सरकार को मिल जाएगा। अब छत्तीसगढ़ सरकार चुनाव-मोड में आ चुकी है, और केवल ऐसे ही कामों को उठाया जाएगा जिन्हें चुनाव आचार संहिता के पहले पूरा करके, या एक शक्ल देकर जनता के सामने रखा जा सकेगा।
लेकिन हम आज एक दूसरी बात करने के लिए इस चर्चा को छेड़ रहे हैं, न कि महज इस अभियान के बारे में लिखने को। यह अभियान तो अगले एक पखवाड़े में पूरा हो जाएगा, लेकिन सरकार के कामकाज को लेकर एक कमी शायद उसके बाद भी बनी रहेगी, जिसके लिए राज्य सरकार प्रदेश स्तर पर कभी-कभी कोशिश करती है। ऐसे अभियानों से परे भी प्रशासनिक सुधार एक ढांचागत सुधार से ही आ सकता है। और इसके लिए सरकार को अपने जमीनी स्तर के कामकाज में कागजों और फाईलों को कम करना पड़ेगा। आज जरा-जरा सी बात के लिए लोगों को सरकार में बहुत से कागज जमा करने पड़ते हैं, बहुत से धक्के खाने पड़ते हैं, और किसी को यह भरोसा नहीं रहता कि एक छोटी सी पटवारी-नकल जैसी बात उसे कितने महीने में मिल पाएगी, या कि तहसील का कोई नामांतरण कितने दिनों में हो पाएगा, या कि राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल मेकाहारा में एमआरआई की बारी कितने हफ्तों में आ सकेगी। सरकार को अपने कामकाज को बेहतर बनाने के लिए लोगों से भरवाए जाने वाले कागज घटाने चाहिए, हर कागज में मांगी जाने वाली जानकारी को घटाना चाहिए। अमरीका जैसे विकसित देश को देखें तो वहां सरकार के हर फॉर्म पर यह छपा होता है कि उसे भरने में औसतन कितनी देर लगेगी। भारत के प्रदेशों में सरकारी दफ्तरों का भ्रष्टाचार इस बात पर पनपता है कि लोगों से अधिक से अधिक जानकारी कैसे मांगी जाए, और उनमें से किसी भी जानकारी के न होने पर उनसे रिश्वत कैसे ली जाए। सरकार को जनता के बीच के लोगों की एक साधारण कमेटी बनाकर सरकारी कामकाज के जाल को घटाना चाहिए।
एक दूसरी बात जो बहुत महत्वपूर्ण है, और जो सरकार में कभी-कभी चर्चा में आती है, लेकिन आई-गई भी हो जाती है, वह है सरकारी दफ्तरों में अफसरों और कर्मचारियों की मौजूदगी। राज्य सरकार को बहुत ही कड़ाई से यह नियम लागू करना चाहिए कि हफ्ते में कम से कम एक दिन मुख्यमंत्री से लेकर पटवारी तक, हर कोई सुबह से शाम तक अपने दफ्तर में मौजूद रहें, और हफ्ते के ऐसे दिन को किसी भी तरह की बैठक या दौरों से मुक्त रखा जाए। इतना करने के बाद सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कौन से ऐसे दफ्तर हैं जहां पर जनता के काम ज्यादा पड़ते हैं, और वहां ऐसी अनिवार्य मौजूदगी के दिन एक से अधिक भी रखने चाहिए, और ऐसे दिनों में पूरे वक्त की मौजूदगी की गारंटी भी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से कभी-कभी ऐसी पहल शुरू भी हुई, लेकिन नियम-कायदों को नापसंद करने वाले लोगों ने आनन-फानन ऐसी व्यवस्था को चौपट कर दिया। इसलिए हमारा यह मानना है कि राज्य में वही व्यवस्था लागू हो सकती है जो कि मुख्यमंत्री के स्तर से शुरू हो, और जिसे वे अपने ऊपर भी लागू करें। सरकार को जनता से अपना फासला घटाना चाहिए, और इसके लिए सरकारी दफ्तरों को जनता के प्रति जवाबदेह रहते हुए हर हफ्ते काफी वक्त के लिए हर अफसर-कर्मचारी की मौजूदगी घोषित करनी चाहिए। देश के अलग-अलग राज्यों में ऐसी पहल हो भी रही है, और हम पिछले बरसों में इसी जगह लगातार यह सलाह देते भी आए हैं।
लोक सुराज निपटाने के साथ-साथ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को सरकार की जनता के लिए उपस्थिति की ऐसी गारंटी लागू करनी चाहिए, और इससे जनता की शिकायतें दूर भी होंगी।

खुफिया निगरानी के जमाने में नसीहतों की क्लास की जरूरत

संपादकीय
03 मई 2017


दिल्ली में इन दिनों एक चटपटा केस खबरों में हैं कि गुजरात से आए हुए एक भाजपा सांसद ने एक महिला के साथ बलात्कार किया, या कि उस महिला ने इस सांसद को अपने सेक्स-जाल में फांसकर उसका वीडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल किया। दोनों तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई है, और मामला जांच के बाद साफ हो पाएगा। सांसद और महिला, दोनों ही वयस्क हैं, और दोनों ही अनुभवी लोग दिखते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को अपने आपको किस हिसाब से बचाकर रखना चाहिए ताकि उनका राजनीतिक या सामाजिक जीवन किसी एक स्कैंडल के साथ खत्म न हो जाए।
यह बात सिर्फ राजनीति के लोगों को समझने की जरूरत नहीं है, बल्कि घर से लेकर कारोबार तक, और सरकारी दफ्तरों से लेकर खेल के मैदान तक, सभी जगहों पर लोगों को सावधान रहना चाहिए। अब चौथाई सदी पहले जैसा माहौल नहीं रहा, जब लोग अपने घर या दफ्तर की महिला कर्मचारी का देह शोषण करके भी बच निकलते थे, क्योंकि ऐसे मामलों की शिकायत ही आमतौर पर नहीं होती थी। लेकिन आज कानून की जागरूकता भी बढ़ गई है, और कानून तक लोगों की पहुंच भी बढ़ गई है। ऐसे में लोगों को अपना चाल-चलन साफ-सुथरा रखने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। सार्वजनिक जीवन से परे भी निजी जिंदगी के बहुत से मामले आज अदालतों तक पहुंच रहे हैं जिनमें आमतौर पर एक लड़की या महिला की शिकायत रहती है कि किसी आदमी ने उनसे शादी का वायदा करके उनका देह शोषण किया और उसके बाद शादी से इंकार कर दिया। ऐसी वायदाखिलाफी और सेक्स-संबंध को लेकर अदालतों का एक नया रूख सामने आ रहा है जिसमें अदालतें यह मान रही हैं कि हर वायदाखिलाफी को बलात्कार करार नहीं दिया जा सकता, और एक वयस्क लड़की को संबंध बनाने के पहले यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे हर संबंध शादी में बदलें यह जरूरी भी नहीं है। हमने भी पहले कई बार इस बात को लिखा था कि शादी का वायदा करने के बाद आपसी सहमति से बने देह संबंधों को वायदाखिलाफी की नौबत आने पर बलात्कार कहना सही बात नहीं होगी। कई बरस पहले हमने इसी जगह यह बात लिखी थी और पिछले साल-छह महीने में कई प्रदेशों के हाईकोर्ट इस तरह की बात लिख चुके हैं।
आज जब चारों तरफ खुफिया कैमरों और मोबाइल फोन से होने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग का जमाना है, तब लोगों को अपनी पतलून के बेल्ट, और पजामों के नाड़े मजबूती से बांधकर रखना चाहिए। पुराने जमाने में किसी की तारीफ करते हुए कहा जाता था कि वह लंगोट का पक्का आदमी है। इसका मतलब होता था कि वह आदमी राह चलते देह संबंधों में नहीं उलझता है। आज हर किसी को यह सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि एक महिला के अधिकार ऐसे मामलों में आदमी के मुकाबले अधिक वजन रखते हैं, और उसकी बात पर अदालत भी अधिक गौर करती है। लोगों को यह समझना चाहिए कि कानूनी या सेहत के खतरे उठाते हुए ऐसे संबंध न सिर्फ लोगों की निजी साख को खत्म करते हैं, बल्कि उनके परिवार की साख भी ऐसे विवादों के बाद आंच झेलती है। यह दौर टेक्नालॉजी के अंतहीन खुफिया इस्तेमाल का है, और लोग तो आज किसी को एक तस्वीर भेजकर, या कुछ शब्द भेजकर भी इतने सुबूत खड़े कर देते हैं कि किसी शिकायत की नौबत आने पर वे जेल भेजे जा सकें। हमारा ख्याल है कि सरकार, समाज, परिवार, और राजनीतिक दल, इन तमाम जगहों पर लोगों को अब हमेशा के लिए खड़े हो चुके ऐसे कानूनी खतरे पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए, और लोगों में समझ पैदा करनी चाहिए कि कुछ मिनटों के देह सुख के लिए वे न तो बीमारियों के खतरे में पड़ें, और न ही कानूनी खतरे में पड़ें। खासकर जो राजनीतिक  दल अपने लोगों के चुनाव में जीतकर आने और उनकी साख को लेकर फिक्रमंद रहते हैं, उन्हें तो बंद कमरे के भीतर अपने लोगों के लिए नसीहतों की ऐसी क्लास लगानी चाहिए, और पार्टियों को खुद भी अपने लोगों पर ऐसी नजर रखनी चाहिए। 

सोशल मीडिया ने देशप्रेम के झांसे का बहुत बड़ा मौका जुटा दिया है

संपादकीय
02 मई 2017


इन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव को लेकर कम से कम भारत में जो लोग हमें सोशल मीडिया पर दिख रहे हैं, वे राष्ट्रभक्ति, देशप्रेम के साथ-साथ राष्ट्रवाद से सराबोर हैं, और वे इस अंदाज में फेसबुक या ट्विटर पर नारे लिख रहे हैं कि वे खुद ही जाकर एक हिन्दुस्तानी सैनिक के कटे सिर के बदले पचास पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट लाएंगे। यह सिलसिला कुछ नया नहीं है, और सोशल मीडिया के पहले जब टीवी चैनल सड़क किनारे लोगों को रोककर उनकी प्रतिक्रिया लेते थे, तब भी इसी किस्म की बात कही जाती थी, और दिखाई जाती थी।
अब इसे कुछ समझने की जरूरत है कि लोगों की ऐसी सोच की वजह क्या है, और उससे नफा-नुकसान क्या है। दरअसल इंसानी सोच बहुत किस्म के झांसे को अपने खुद के लिए खड़ी करती है, और अपने शरीर को तकलीफ से बचाकर चलती है। लोग इन दिनों प्रचलन में आ चुके फिटनेस बैंड पहनकर यह समझ लेते हैं कि वे अपनी फिटनेस के लिए चौकन्ने हैं। यह एक किस्म की मनोवैज्ञानिक तसल्ली होती है, जो कि अपने आपके दिमाग को संतुष्ट कर देती है, और चर्बी को तकलीफ नहीं देती। और सदियों से यह भी चले आ रहा है कि लोग पुण्य कमाने के लिए, अपने पाप धोने के लिए, कहीं मछली को आटे की गोलियां डालते हैं, कहीं बंदर को चना खिलाते हैं, कहीं पंछी के लिए पानी के कटोरे रखते हैं, कहीं गाय ढूंढकर उसे एक रोटी दे देते हैं, और सबसे लोकप्रिय झांसा है जाकर ईश्वर को थोड़ा सा चढ़ावा चढ़ाना, और फिर उससे बड़ी सी उम्मीद कर लेना।
ऐसी हरकतों से भला तो शायद ही किसी का होता हो, सिवाय अपने आपके। यह झांसा तरह-तरह के अपराधबोध से मुक्ति पाने में मदद करता है, और लोगों को लगातार एक आत्मसंतुष्टि और एक गौरव में जीने का मौका देता है। लोग अपने को दानी और समाजसेवी कहने का एक मौका पाते हैं, एक वजह पाते हैं, और बाकी वक्त उसकी चर्चा का रास्ता निकाल लेते हैं। आमतौर पर जो लोग रात-दिन टैक्स चोरी में लगे रहते हैं, जो मिलावट करते हैं, नाप-तौल की चोरी करते हैं, और दूसरे तरह के जुर्म में शामिल रहते हैं, वे लोग जरूर ईश्वर को भी झांसा देने का काम नियमित रूप से करते हैं, वे तरह-तरह की मनौतियां भी मान लेते हैं, और अपनी आत्मा को मानो किसी लॉंड्री में ले जाकर ड्राईक्लीन करवाने के अंदाज में धर्मस्थान जाकर काली कमाई का थोड़ा सा हिस्सा चढ़ाकर आ जाते हैं। लोगों को याद होगा कि इमरजेंसी के वक्त खबरों में आए और जेल गए, देश के एक सबसे बड़े तस्कर हाजी मस्तान को मुंबई शहर में गरीब मरीजों के लिए कुछ एंबुलेंस चलाने के लिए भी जाना जाता था, हालांकि उस दौर में भी उनका मुख्य काम तस्करी था, और समाजसेवा के काम में अपनी कमाई की थोड़ी सी जूठन खर्च करके वे ढेर सी तसल्ली पा जाते रहे होंगे।
देशप्रेम और राष्ट्रवाद कुछ इसी किस्म की बातें हैं, और लोगों को सरहद पर कुर्बानी देने के नारे सुहाते हैं, क्योंकि वे खुद सरहद से बहुत दूर हैं, और फौज में भी नहीं हैं। उनको पाकिस्तान पर हमला करने, जंग छेड़ देने की बात सुहाती है, क्योंकि उनका अपना घर सरहद पर बसा हुआ नहीं है, और वे जंग के धमाकों को घर बैठे टीवी पर देखेंगे, न कि उनकी छत को तोड़ते हुए कोई गोला भीतर पलंग पर गिरेगा। एक दूसरी दिक्कत यह है कि ऐसे लोग अपनी नासमझी में युद्धोन्माद को देशप्रेम मान बैठते हैं, और देशप्रेम की बाकी तमाम जरूरतों को किनारे रख देते हैं। सोशल मीडिया पर भी किसी ने कुछ समय पहले यह लिखा था कि देशप्रेम के लिए सरहद पर जाकर लडऩा ही जरूरी नहीं है, देश के भीतर साफ-सुथरी जगह पर थूकना बंद करके भी देशप्रेम दिखाया जा सकता है, पार्किंग ठीक करके, या कि ट्रैफिक नियमों को मानकर भी देशप्रेम दिखाया जा सकता है। आमतौर पर देशप्रेम और राष्ट्रवाद की बातें करने वाले लोग अपनी जिम्मेदारी सरहद पर शहादत की चर्चा में साबित कर लेते हैं, क्योंकि वहां उनका खुद का सिर दांव पर नहीं लगा है।
इसलिए जिस तरह लोग अपने अपराधबोध से मुक्त होने के लिए कहीं पशु-पक्षियों को झांसा देते हैं, कहीं ईश्वर को झांसा देते हैं, ठीक उसी तरह देश को भी झांसा देते हैं, यह साबित करते हुए कि वे देश की फिक्र में दुबले हुए जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने लोगों को एक नए किस्म का धर्मस्थल दिला दिया है जहां पर वे झांसा देने का काम कुछ और कर सकते हैं, और हो सकता है कि उनके दिमाग का एक हिस्सा उनके ही दिमाग के बाकी हिस्से को अंधेरे में रखते हुए ऐसा झांसा दे रहा हो, और दिमाग के ऊपर का सिर देशप्रेमी होने के गौरव में तना हुआ भी हो।