नक्सल मोर्चे को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारें भारी तनाव में

संपादकीय
30 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के नक्सल-कब्जे वाले इलाके में सड़कों का बनाना फिलहाल थम गया दिखता है क्योंकि केन्द्रीय सुरक्षा बलों के बारे में सरकार की तरफ से कहा गया है कि वे अब सड़क-निर्माण सुरक्षा का काम नहीं करेंगे। इस निगरानी में बहुत सी मौतें हो चुकी हैं, और अब केन्द्र सरकार भारी तनाव से गुजर रही है। केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकार भी इतने जवानों की मौत को लेकर एक तनाव में है, और अभी यह तय नहीं हो पा रहा है कि नक्सल हिंसा खत्म करने के लिए बस्तर में कितनी कड़ी और कितनी बड़ी कार्रवाई की जाए। यह बात तय है कि अगर बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों को झोंककर नक्सलियों को मारने की कोशिश एक फौजी अंदाज में की गई, तो उसमें बड़ी संख्या में बेकसूर आदिवासी भी मारे जा सकते हैं, जो कि इस किस्म के किसी भी मोर्चे पर आम बात रहती है। दूसरी बात यह भी है कि बस्तर का यह हिस्सा पड़ोसी राज्यों से मिला हुआ है, और एक राज्य में अगर सुरक्षा बलों का दबाव बहुत बढ़ता है तो नक्सली सरहद पार करके दूसरे राज्य में चले जाते हैं।
अब नक्सलियों के बहुत सीमित संख्या वाले वैचारिक समर्थकों को छोड़ दें, तो आम जनता का बहुमत इस सोच का है कि फौज को झोंककर नक्सलियों को एकमुश्त खत्म कर दिया जाए। यह आम जनता बस्तर जैसे इलाके के बाहर दूर शहरों में बसी हुई है, वह सोशल मीडिया तक अपने सरोकारों को सीमित रखती है, और वह विचलित होने पर तरह-तरह से ट्वीट करके देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रवाद, और नक्सल-विरोध को जाहिर करती है। यह वह जनता है जो नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच पिसने की नौबत नहीं झेलती है, और अपने घरों में सुरक्षित बैठी हुई वह फौजी कार्रवाई को एक अच्छा विकल्प समझती है। वह ऐसी जनता है जो देश की सरहद पर एक सिर के बदले दस सिर काटकर लाने, और पाकिस्तान पर हमला कर देने की हिमायती भी है। इसी सोशल मीडिया पर एक तबका ऐसा है जिसकी याददाश्त थोड़ी मजबूत है और जो केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को याद दिलाता है कि कुछ बरस पहले ऐसे ही नक्सल हमले के बाद स्मृति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चूडिय़ां भेजने का बयान दिया था, और आज फिर वैसा ही मौका आया हुआ है, तो वे अपनी चूडिय़ों का सदुपयोग करें।
लोकतंत्र में जब जनता का दबाव केन्द्र या राज्य सरकार पर पड़ता है, तो कई बार आहत और विचलित भावनाओं को शांत करने के लिए, कार्रवाई करते हुए दिखने के लिए भी सरकारें कई किस्म की कार्रवाई करती हैं। लोकतंत्र ऐसे जनदबाव से मुक्त भी नहीं रह सकता, लेकिन सत्ता को विपक्ष जैसी कार्रवाई की आजादी भी नहीं रहती है। सत्ता एक अलग किस्म की जिम्मेदारी सिखाती है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस ओहदे पर आने के ठीक पहले तक पाकिस्तान से जितने सिर काटकर लाने की ललकार लगाते आए हैं, अब वे वैसी कोई कार्रवाई न करके अपने को एक अधिक जिम्मेदार राजनेता साबित भी कर रहे हैं। हम किसी की पुरानी बातों को गिनाकर उन्हें उन दावों के मुताबिक आज भी गलत काम करने के लिए उकसाने पर भरोसा नहीं रखते, और चुनावी ललकार को सत्ता में आने के बाद भूल जाना बेहतर रहता है, चाहे वह देश की सरहद हो, या देश के भीतर प्रदेशों की सरहद पर नक्सल हिंसा हो।
छत्तीसगढ़ और केन्द्र सरकार दोनों से यह उम्मीद तो की जाती है कि वे नक्सल हिंसा पर काबू करें, और बेकसूर जवानों की इतनी बड़ी-बड़ी शहादतों को टालने का काम करें, उसे रोकने का काम करें। लेकिन इसके लिए कोई आसान रास्ता नहीं है, और केन्द्र सरकार से हजारों और जवानों की उम्मीद की जा रही है, ताकि नक्सल मोर्चे पर और कड़ी कार्रवाई की जा सके। यह कार्रवाई बहुत से कोलैटरल-डैमेज के साथ ही हो पाएगी, जिसका मतलब है कि बेकसूर इस कार्रवाई में बड़ी संख्या में पिसेंगे। ऐसी नौबत से बचने, अंतहीन खर्च से बचने, और आदिवासी इलाकों में विकास और जनकल्याण जमीन पर लाने के लिए एक दूसरा रास्ता भी सोचना चाहिए, और अपनाना चाहिए, बातचीत का। लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक ताकतों को, हिंसक और आतंकी मुजरिमों को बातचीत की टेबिल तक लाने का जिम्मा लोकतांत्रिक संस्थाओं का होता है, जैसे कि आज नक्सल-प्रभावित राज्यों की सरकारों और केन्द्र सरकार का है। यही लोकतंत्र की उपलब्धि होती है कि बंदूकों के साथ-साथ बातचीत का भी इस्तेमाल करके अलोकतांत्रिक ताकतों को लोकतंत्र की मूलधारा में लाया जाए। यही तरीका सबसे कम खून-खराबे का होता है, यही तरीका सबसे सस्ता होता है, और यही तरीका सबसे स्थायी भी होता है। भारत का इतिहास गवाह है कि पिछले कई दशकों में नक्सल हिंसा पर पूरी तरह काबू नहीं हो पाया है, और काबू करने की इस कोशिश में दोनों तरफ की बंदूकों से बड़ी संख्या में बेकसूर मारे गए हैं। ऐसी बेकसूर जिंदगियों को भी ध्यान में रखते हुए सरकारों को नक्सलिायों से बातचीत का रास्ता निकालना चाहिए। ऐसी बातचीत जब होगी, वह सरकारों की और लोकतंत्र की इज्जत बढ़ाएगी। लोकतंत्र में लोकतांत्रिक ताकतों की जिम्मेदारी ही सबसे अधिक होती है। छत्तीसगढ़ चूंकि आज नक्सल हिंसा का केन्द्र बना हुआ है, यहां की सरकार को बंदूकों की कार्रवाई के साथ-साथ बातचीत का रास्ता भी ढूंढना चाहिए, और इस राज्य के पास पिछले बरसों में एक कलेक्टर के अपहरण के बाद नक्सलियों से समझौता-वार्ता का अनुभव भी है।

भाजपा से बाकी पार्टियों को समझने-सीखने की जरूरत

संपादकीय
29 अप्रैल 2017


दिल्ली की लगातार मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित ने कल यह कहा कि कांग्रेस के अगले अध्यक्ष होने जा रहे, और आज के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को हर दिन दो-तीन घंटे पार्टी ऑफिस में देने चाहिए। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी ऐसा करती थीं, और इसी वजह से वे पार्टी के लोगों से मिल पाती थीं। अब यह सलाह यह भी बताती है कि राहुल गांधी कुछ घंटे भी पार्टी ऑफिस में नहीं बैठते। इस पार्टी का जो सफाया उत्तरप्रदेश में हुआ है, उसके बाद भी अगर पार्टी के भीतर से ऐसी सलाह उठने की नौबत बनी हुई है, तो इस पार्टी का भविष्य अंधकार के सिवाय और क्या होते दिखता है? कांग्रेस पार्टी से ही जिसकी राजनीति चलनी हो और जिसका भविष्य तय होना हो, उसे अगर पार्टी ऑफिस की ही फुर्सत नहीं है, तो फिर पार्टी को कोई दूसरा अध्यक्ष ढूंढना चाहिए, बजाय कुनबे के भीतर के वंशवादी राजतिलक के।
हम इस मुद्दे पर आज नहीं लिखते अगर अभी सामने यह खबर नहीं होती कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 2019 की चुनावी तैयारी के लिए 95 दिनों का भारत भ्रमण कर रहे हैं, और इसी के तहत वे आज जम्मू पहुंचे हैं। किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का ऐसा संगठित दौरा और बैठकों का सिलसिला उस पार्टी के चौकन्ने होने का एक सुबूत होता है। अगले पखवाड़े अमित शाह तीन दिन छत्तीसगढ़ में भी रहने वाले हैं, और जाहिर है कि अपनी पार्टी, और अपनी पार्टी की सरकार, इन दोनों को उन्हें अधिक करीब से देखने का मौका भी मिलेगा, और कार्यकर्ताओं से बेहतर बातचीत भी हो सकेगी। इससे संगठन के लोगों और सरकार पर निश्चित रूप से एक दबाव बनेगा क्योंकि आज पूरे देश में मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा को एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचाया है। आज पार्टी एक किस्म से इन्हीं दोनों के कब्जे में दिखती है, और तमाम राज्यों के संगठन भी यह मानकर चल रहे हैं कि मोदी के नाम पर भाजपा चुनाव ठीक उसी तरह जीत रही है जिस तरह कि एक वक्त इंदिरा के नाम पर कांग्रेस जीत जाती थी।
मोदी और अमित शाह से असहमति रखने वाले राजनीतिक दलों को भी उनके कामकाज के तरीके, और उनकी मेहनत से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। आज देश में चारों तरफ मोदी पर यह तोहमत लगाने वाले लोग कम नहीं हैं कि वे अम्बानी और अडानी के हाथों में खेलते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि उन पर, या उनके परिवार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लग पाया है, और देश में यह जनधारणा है कि मोदी राज में भ्रष्टाचार घटा है। इसके अलावा जिस राज्य में चुनाव हुए, वहां पर भाजपा ने बड़ी मेहनत से पहले से तैयारी की, और चुनाव को रणनीति के साथ लड़ा, और बहुत सी जगहों पर जीता भी। धीरे-धीरे करके भाजपा अपने दम पर, और अपने सहयोगी दलों के साथ एक-एक करके देश के इतने बड़े हिस्से पर काबिज हो चुकी है कि जैसा कभी जनसंघ या भाजपा ने सपना भी नहीं देखा था। इसलिए लोकतंत्र के भीतर जिन कानूनी तौर-तरीकों से चुनावी मुकाबला किया जा सकता है, उसकी तैयारी राजनीतिक दलों को आज की भाजपा से सीखने की जरूरत है। आज भारतीय जनता पार्टी कई जगह अपनी सरकारों के रास्ते भ्रष्टाचार में उलझी होगी, लेकिन देश में वामपंथी दलों के अलावा और कौन सी पार्टी है जो कि ऐसे भ्रष्टाचार में उलझी हुई न हो? ऐसी कौन सी पार्टी है जिसने दलबदलुओं को टिकट न दी हो? भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में आखिर में जाकर बस यही मायने रखती है कि कौन सी पार्टी बिना किसी जुर्म में फंसे अपने या पराये लोगों के मार्फत सदन में बहुमत बना सकती है। भारतीय जनता पार्टी ने आज मोदी-शाह की अगुवाई में पार्टी चलाने, और चुनाव लडऩे के कुछ नए तरीके सामने रखे हैं, उन्हें अपनाना हो, या कि न अपनाना हो, दूसरी पार्टियों को उनका अध्ययन जरूर करना चाहिए। हमें याद नहीं पड़ता कि किसी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष सौ दिनों के राष्ट्रीय दौरे पर इसके पहले इस तरह कभी निकला हो। 

बस्तर की आज की नौबत, सबसे काबिल को जिम्मा देना होगा...

संपादकीय
28 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बस्तर में अभी ताजा नक्सल हमले को लेकर आज विधानसभा के एक दिन के सत्र में बहस चल रही है कि राज्य की नक्सल नीति सही है या गलत? यह एक दिन का सत्र वैसे तो जीएसटी विधेयक को राज्य विधानसभा की मंजूरी देने के लिए बुलाया गया है, लेकिन सुकमा का ताजा नक्सल हमला इतना बड़ा मुद्दा है कि उस पर चर्चा बिना पक्ष-विपक्ष एक साथ बैठ नहीं सकते थे। इस बीच कल से दिल्ली से भोपाल होते हुए रायपुर तक यह चर्चा चल रही है कि छत्तीसगढ़ में इस ताजा हमले के बाद अब राज्य के पुलिस-मुखिया को बदलना तय हो चुका है, और इस सिलसिले में एक अफसर का नाम भी हवा में तैर रहा है।
दरअसल बस्तर के हालात हर वक्त ऐसी नौबत लाते हैं कि राज्य सरकार नाकामयाबी की जिम्मेदारी किसी कंधे पर डालते हुए उसे किसी कुर्सी से हटा सके। इसमें पुलिस के अफसर भी हो सकते हैं, प्रशासन के अफसर भी हो सकते हैं, और किसी पद पर बैठे हुए राजनेता भी हो सकते हैं। लेकिन छोटे राज्य की कई दिक्कतों में से एक दिक्कत यह भी रहती है कि गिने-चुने ओहदों और गिने-चुने अफसरों के बीच पसंद-नापसंद की संभावना सीमित रहती है। छत्तीसगढ़ बहुत सी सरकारी कुर्सियों को लेकर यह दुविधा झेल रहा है, और हम यह भी नहीं मानते कि किसी एक वारदात के बाद किसी अफसर को बदलना जरूरी रहता है। यह भी देखने की जरूरत रहती है कि वारदात के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार दिखने वाले अफसरों के पीछे की व्यापक जिम्मेदारी क्या दूसरे अफसरों पर तो नहीं है? और बाकी तमाम बातों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की सरकार पर आज एक यह दबाव भी बना हुआ है कि आने वाले चुनाव को ध्यान में रखते हुए किस-किस बड़े ओहदे पर चेहरे बदले जाएं? और सरकार के सामने एक यह राजनीतिक दुविधा भी रहती है कि हालात सम्हालने के लिए किसी कड़क अफसर को जिम्मा दिया जाए, या फिर किसी नर्म अफसर को तैनात किया जाए ताकि चुनाव के समय सत्तारूढ़ पार्टी के लिए कुछ नर्मी भी हासिल रहे।
हमारा यह मानना है कि बस्तर का मोर्चा अपने आपमें महज बंदूकों की तैनाती से नहीं जीता जा सकता। इसके लिए प्रशासन के राजधानी से लेकर ब्लॉक स्तर तक के लोगों को संवेदनशील अगर नहीं बनाया जाएगा, तो पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की जान तो फालतू में जाती रहेगी। सरकार को किसी हमले के बाद प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, एक दीर्घकालीन योजना और सोच के तहत पूरे के पूरे प्रशासन को अधिक संवेदनशील, और कम भ्रष्ट बनाना होगा। आज खासकर बस्तर में यह बात बिल्कुल ही उल्टी है, अफसर और नेता वहां पर अधिक भ्रष्ट हैं, और कम संवेदनशील हैं। ऐसे में नक्सलियों को जमीन से उखाडऩा करीब-करीब नामुमकिन लगता है। अब तो यह भी लगने लगा है कि नक्सली आतंक के तले गांव के लोग उनके साथ रहते आए थे, लेकिन अब वे कुछ हद तक उनसे हमदर्दी भी रखने लगे हैं, क्योंकि वहां पर पुलिस और बाकी सरकारी अमला अपने को जनता का हमदर्द साबित नहीं कर पाए हैं।
हम विधानसभा या विधानसभा के बाहर सत्तापक्ष या विपक्ष के बीच नक्सल मोर्चे की सोच में किसी जरूरत का फर्क नहीं देखते, लेकिन हम यह जरूर देखते हैं कि काम करने के तौर-तरीकों में एक बुनियादी फेरबदल की जरूरत है। जब राज्य सरकार के फैसले बड़े अफसरों की तैनाती में बड़ी कड़ी पसंद या नापसंद से होने लगते हैं, तो जाहिर है कि कम काबिल लोग भी अधिक बड़ी जिम्मेदारी पा जाते हैं। सरकार को यह सोचना होगा कि उसकी पसंद कोई खास अफसर हैं, या कि व्यापक जनहित है? आने वाले हफ्तों में सरकार को ऐसे कई कड़वे फैसले करने पड़ सकते हैं, और अगर ये फैसले गलत हुए, मौजूदा सरकार के इस कार्यकाल में नौबत जरा भी नहीं सुधर पाएगी। सरकार को बड़े कड़े दिल के साथ सबसे काबिल लोगों को जिम्मा देना होगा।

अक्षय तृतीया के मौके पर एक चर्चा बालविवाह से महिला आरक्षण तक

संपादकीय
27 अप्रैल 2017


अक्षय तृतीया का मौका भारत के कई हिस्सों में बालविवाह लेकर आता है। इसके खिलाफ कानून बने एक जमाना हो गया, लेकिन गांव-जंगल और शहरों में भी होने वाले बालविवाह को रोक पाना सरकार के लिए एक मुश्किल काम होता है। एक तरफ तो मुस्लिम समाज में शरीयत का हवाला देकर कमउम्र बच्चियों की शादी को कानूनी ठहराने और करने की जिद कई जगहों पर देखने को मिलती है, लेकिन दूसरी तरफ हिन्दू समाज में, या आदिवासियों में भी बालविवाह जारी हैं। कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें जागरूक हो चुकी बच्चियों ने खुद पुलिस या अफसरों के पास जाकर अपनी होने जा रही शादी को रूकवाया है।
लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि कमउम्र के बच्चों की जब शादी कर दी जाती है, और कमउम्र की लड़की मां बन जाती है, तो उस लड़की की सेहत तो तबाह होती ही है, ऐसे बच्चे की सेहत भी खराब से शुरू होती है, और जिंदगी की आखिर तक कई हिसाब से कमजोर बनी रहती है। यह बात चिकित्सा वैज्ञानिकों ने निर्विवाद रूप से साबित की है कि कमउम्र में मां बनने वाली लड़की एक कमजोर बच्चे को जन्म देती है, और खुद की सेहत भी खतरे में डालती है। लेकिन भारत के बहुत से समाजों में लड़की की जुबान नहीं होती है, और मां-बाप जब और जहां, जैसे चाहें उसे एक खूंटे से बांध देने की तरह किसी लड़के से बांध देते हैं। इस बारे में न सिर्फ सरकार की कोशिश की जरूरत है, बल्कि समाज के भीतर लोगों को बालविवाह रोकने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। आज एक बड़ी चुनौती यह है कि जिन इलाकों या जिन समाजों में बालविवाह का प्रचलन है, वहां पर पड़ोसी या रिश्तेदार, या कि जात-बिरादरी के लोग चूंकि शादी के जलसे में शामिल होते हैं, इसलिए उनकी दिलचस्पी ऐसे जलसों को रोकने की नहीं होती। पुलिस में भी बहुत से मामलों में ऐसे समाज से आए हुए लोग रहते हैं, और वे भी ऐसी शादियों को अनदेखा करना बेहतर समझते हैं।
सरकार को स्कूल, मितानिन, और अलग-अलग इलाकों में काम करने वाले जनसंगठनों का हौसला बढ़ाकर निगरानी का काम करना चाहिए। ऐसे बालविवाह बड़ी संख्या में अक्षय तृतीया के दिन देखे महूरत पर होते हैं, और इसके कुछ दिन पहले से अगर नजर रखी जाए, और कुछ जिद्दी मां-बाप पर कानूनी कार्रवाई की जाए, तो कुछ बरसों में जाकर हालत सुधर भी सकती है। भारत में लड़कियों ने स्कूली पढ़ाई से लेकर कॉलेजों तक में अपनी काबिलीयत साबित की है, और अपने कुनबे का नाम रौशन भी किया है। ओलंपिक से लेकर बाकी मुकाबलों तक भारत की लड़कियां लड़कों से भी आगे साबित हुई हैं। पिछले दिनों आई कुछ फिल्मों में लड़कियों के गौरव का बखान भी समाज सुधार के काम आना चाहिए, और मां-बाप को यह लगना चाहिए कि लड़की बोझ नहीं है, और वह भी परिवार की ताकत है। यह जागरूकता रातों-रात नहीं आ सकती, और सिर्फ कानून से भी नहीं आ सकती।
आज भारत की भाषाओं और बोलियों में, जिन कहावतों और मुहावरों में लड़की और महिला के लिए अपमान की बात रहती है, उन सबका विरोध करने की जरूरत है। खुद महिलाएं यह नहीं समझ पातीं कि किसी अफसर के या नेता के नालायक होने पर उसे चूडिय़ां भेंट करना खुद महिलाओं का अपमान है, और यह हरकत ऐसा बताती है कि मानो चूडिय़ां कमजोरी का प्रतीक हैं, नालायकी का प्रतीक हैं। भारत की सामाजिक और राजनीतिक चेतना में लड़कियों और महिलाओं को बराबरी सम्मान और हक दिलाने के लिए सड़क से संसद तक लंबा संघर्ष लगेगा, और इसके बिना कन्या भ्रूण हत्या, बालविवाह, कन्याशिक्षा, दहेज हत्या, ऐसे मोर्चों पर समाज में सकारात्मक सोच विकसित नहीं की जा सकेगी। इस बारे में एक कदम संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का भी उठाने की जरूरत है। इससे सीधे-सीधे आम महिला को फायदा नहीं होगा, लेकिन समाज में महिलाओं के जायज हक की बात मजबूती से स्थापित होगी। लड़कियों और महिलाओं से जुड़े हुए बहुत सारे मामले ऐसे हैं जिन पर साथ-साथ काम करने की जरूरत है, बालविवाह से लेकर महिला आरक्षण तक।

बस्तर में खड़ा एक बड़ा सवाल, पुलिस-प्रशासन, अब कैसे हों?

संपादकीय
26 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के ताजा हमले के बाद राज्य सरकार में कई तरह के विचार-विमर्श चल रहे हैं, और जनता के बीच जो लोग जानकार हैं, वे भी यह सोच रहे हैं कि इस नक्सल हिंसा का खात्मा कैसे हो। अभी राज्य और केन्द्र सरकार दोनों ही इसी पखवाड़े दिल्ली में बैठकर इस पर विचार करने जा रहे हैं, और केन्द्रीय गृहमंत्री की इस बैठक में बाकी नक्सल प्रभावित राज्य भी शामिल होंगे। जो लोग लोकतंत्र के संघीय ढांचे के भीतर राज्य में जिला या संभाग स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था को जानते हैं, उसकी सीमाओं और संभावनाओं को समझते हैं वे बस्तर जैसे इलाके की मौजूदा व्यवस्था में किसी नई सोच को सामने रख सकते हैं।
बस्तर में एक तो पुलिस की व्यवस्था की बात है जिसमें राज्य और केन्द्र सरकार के सुरक्षा बल मिलकर काम कर रहे हैं, और एक किस्म से नक्सल मोर्चे को केन्द्रीय सुरक्षा बल ही मोटेतौर पर सम्हाल रहे हैं। वह एक अलग रणनीतिक योजना और मोर्चा है, और उस पर अधिक चर्चा यहां पर मुमकिन नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राज्य के प्रशासनिक ढांचे और जमीनी स्तर की सरकारी व्यवस्था को देखें तो बस्तर में सुधार की असीमित संभावनाएं दिखती हैं, और अगर इस दिशा में काम किया गया होता तो हो सकता है कि नक्सलियों को सरल आदिवासियों के इस इलाके में पांव जमाने का मौका भी नहीं मिला होता, और वे शायद यहां आते भी नहीं। और यह बदहाली अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से दशकों से चली आ रही है, और राज्य बनने के बाद भी पिछले डेढ़ दशक में इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।
जब कभी ऐसी कोई बड़ी घटना होती है तो आमतौर पर एक बड़े फेरबदल की चर्चा होने लगती है, और एक नई व्यवस्था की बात भी उठती है। लेकिन सवाल यह है कि चली आ रही मौजूदा व्यवस्था की बुनियादी खामियों के पीछे की वजहों को देखे बिना, उस नाकामयाबी को दूर किए बिना, महज इसलिए कोई नई व्यवस्था लागू की जाए कि उसकी आड़ में पुरानी नाकामयाबी छुप जाए, तो इसका कोई लंबा असर या लंबा फायदा नहीं मिल सकता। बस्तर में हो सकता है कि सरकार का एक तबका पुलिस और प्रशासन दोनों स्तर पर और अधिक अधिकार रखने वाले और बड़े अफसरों की तैनाती की बात सोचें, लेकिन जहां पर गिरावट और खामी जमीनी स्तर पर है, सरकार के सबसे निचले स्तर पर भी जहां काम गड़बड़ा गया है, वहां पर कलेक्टर और कमिश्नर जैसे बड़े अफसरों के ऊपर और किसी अफसर को बिठा देने से जमीनी हालात बेहतर होते नहीं दिखते। अब सरकार के भीतर प्रशासन की बेहतर समझ रखने वाले लोग हो सकता है कि कोई एक ऐसा मॉडल सोच लें जो कि निचले स्तर पर भी प्रशासनिक सुधार ला सके, लेकिन प्रशासनिक सुधार के लिए प्रशासन के ढांचे को ऊपर-ऊपर और अधिक भारी करना पता नहीं एक समझदार विकल्प होगा या नहीं?
यह बात जरूर है कि छत्तीसगढ़ में सरकार को पुलिस के हथियारबंद मोर्चे से परे भी प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर बनाने के बारे में सोचना होगा, और बस्तर के अलावा भी ऐसी सोच बाकी जगहों पर काम आ सकती है। राज्य सरकार ने पिछले बरसों में बस्तर और सरगुजा के लिए दो अलग विकास प्राधिकरण बनाकर उनकी बैठकें इन्हीं इलाकों में करके इन्हें मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की मौजूदगी में सर्वोच्च प्राथमिकता देकर वहां से जुड़े हुए फैसलों पर तेजी से अमल करवाया है, लेकिन अब यह जाहिर है कि वह कोशिश काफी नहीं हुई, और जनता से आने वाली बात तो यह बताती है कि नीति, कार्यक्रम, और योजना बनाने का जमीनी भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना नहीं रहता है। छत्तीसगढ़ में सरकार का कामकाज जिस बुरी तरह भ्रष्टाचार का शिकार है, उसके सुबूत खुद सरकार की एजेंसियों के छापे में दिखता है।
बस्तर में पुलिस ने पिछले बरसों में जो जुल्म और ज्यादतियां की थीं, उनका नुकसान सरकार अभी तक झेल रही है, और यह आगे भी जारी रहेगा। इसी तरह जो प्रशासनिक खामियां सरकार के निचले स्तर पर हैं, उनको सुधारने के लिए पता नहीं बस्तर में और अधिक बड़े अफसर की जरूरत है, या मौजूदा ओहदों पर ही बेहतर और संवेदनशील अफसरों की जरूरत है जो कि अपने नीचे के अमले को सुधार सकें, और आदिवासियों का विश्वास जीत सकें। बस्तर पहले ऐसे अफसर देख भी चुका है।

बस्तर में खड़ा एक बड़ा सवाल, पुलिस-प्रशासन, अब कैसे हों?

संपादकीय
26 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के ताजा हमले के बाद राज्य सरकार में कई तरह के विचार-विमर्श चल रहे हैं, और जनता के बीच जो लोग जानकार हैं, वे भी यह सोच रहे हैं कि इस नक्सल हिंसा का खात्मा कैसे हो। अभी राज्य और केन्द्र सरकार दोनों ही इसी पखवाड़े दिल्ली में बैठकर इस पर विचार करने जा रहे हैं, और केन्द्रीय गृहमंत्री की इस बैठक में बाकी नक्सल प्रभावित राज्य भी शामिल होंगे। जो लोग लोकतंत्र के संघीय ढांचे के भीतर राज्य में जिला या संभाग स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था को जानते हैं, उसकी सीमाओं और संभावनाओं को समझते हैं वे बस्तर जैसे इलाके की मौजूदा व्यवस्था में किसी नई सोच को सामने रख सकते हैं।
बस्तर में एक तो पुलिस की व्यवस्था की बात है जिसमें राज्य और केन्द्र सरकार के सुरक्षा बल मिलकर काम कर रहे हैं, और एक किस्म से नक्सल मोर्चे को केन्द्रीय सुरक्षा बल ही मोटेतौर पर सम्हाल रहे हैं। वह एक अलग रणनीतिक योजना और मोर्चा है, और उस पर अधिक चर्चा यहां पर मुमकिन नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राज्य के प्रशासनिक ढांचे और जमीनी स्तर की सरकारी व्यवस्था को देखें तो बस्तर में सुधार की असीमित संभावनाएं दिखती हैं, और अगर इस दिशा में काम किया गया होता तो हो सकता है कि नक्सलियों को सरल आदिवासियों के इस इलाके में पांव जमाने का मौका भी नहीं मिला होता, और वे शायद यहां आते भी नहीं। और यह बदहाली अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से दशकों से चली आ रही है, और राज्य बनने के बाद भी पिछले डेढ़ दशक में इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।
जब कभी ऐसी कोई बड़ी घटना होती है तो आमतौर पर एक बड़े फेरबदल की चर्चा होने लगती है, और एक नई व्यवस्था की बात भी उठती है। लेकिन सवाल यह है कि चली आ रही मौजूदा व्यवस्था की बुनियादी खामियों के पीछे की वजहों को देखे बिना, उस नाकामयाबी को दूर किए बिना, महज इसलिए कोई नई व्यवस्था लागू की जाए कि उसकी आड़ में पुरानी नाकामयाबी छुप जाए, तो इसका कोई लंबा असर या लंबा फायदा नहीं मिल सकता। बस्तर में हो सकता है कि सरकार का एक तबका पुलिस और प्रशासन दोनों स्तर पर और अधिक अधिकार रखने वाले और बड़े अफसरों की तैनाती की बात सोचें, लेकिन जहां पर गिरावट और खामी जमीनी स्तर पर है, सरकार के सबसे निचले स्तर पर भी जहां काम गड़बड़ा गया है, वहां पर कलेक्टर और कमिश्नर जैसे बड़े अफसरों के ऊपर और किसी अफसर को बिठा देने से जमीनी हालात बेहतर होते नहीं दिखते। अब सरकार के भीतर प्रशासन की बेहतर समझ रखने वाले लोग हो सकता है कि कोई एक ऐसा मॉडल सोच लें जो कि निचले स्तर पर भी प्रशासनिक सुधार ला सके, लेकिन प्रशासनिक सुधार के लिए प्रशासन के ढांचे को ऊपर-ऊपर और अधिक भारी करना पता नहीं एक समझदार विकल्प होगा या नहीं?
यह बात जरूर है कि छत्तीसगढ़ में सरकार को पुलिस के हथियारबंद मोर्चे से परे भी प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर बनाने के बारे में सोचना होगा, और बस्तर के अलावा भी ऐसी सोच बाकी जगहों पर काम आ सकती है। राज्य सरकार ने पिछले बरसों में बस्तर और सरगुजा के लिए दो अलग विकास प्राधिकरण बनाकर उनकी बैठकें इन्हीं इलाकों में करके इन्हें मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की मौजूदगी में सर्वोच्च प्राथमिकता देकर वहां से जुड़े हुए फैसलों पर तेजी से अमल करवाया है, लेकिन अब यह जाहिर है कि वह कोशिश काफी नहीं हुई, और जनता से आने वाली बात तो यह बताती है कि नीति, कार्यक्रम, और योजना बनाने का जमीनी भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना नहीं रहता है। छत्तीसगढ़ में सरकार का कामकाज जिस बुरी तरह भ्रष्टाचार का शिकार है, उसके सुबूत खुद सरकार की एजेंसियों के छापे में दिखता है।
बस्तर में पुलिस ने पिछले बरसों में जो जुल्म और ज्यादतियां की थीं, उनका नुकसान सरकार अभी तक झेल रही है, और यह आगे भी जारी रहेगा। इसी तरह जो प्रशासनिक खामियां सरकार के निचले स्तर पर हैं, उनको सुधारने के लिए पता नहीं बस्तर में और अधिक बड़े अफसर की जरूरत है, या मौजूदा ओहदों पर ही बेहतर और संवेदनशील अफसरों की जरूरत है जो कि अपने नीचे के अमले को सुधार सकें, और आदिवासियों का विश्वास जीत सकें। बस्तर पहले ऐसे अफसर देख भी चुका है।

बस्तर के ताजा नक्सल-हमले से नौबत बदली नहीं है, वही है

संपादकीय
25 अप्रैल 2017


बस्तर के सुकमा में कल फिर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया और सीआरपीएफ के दो दर्जन से अधिक जवान शहीद हो गए। उनके नामों की लिस्ट देखें तो वे कई प्रदेशों से आए हुए थे, और नामों पर एक नजर डालने से ही पता लगता है कि आदिवासी बस्तर में लोकतंत्र का जिम्मा पूरा करने के लिए फतवे उठाकर आए हुए इन शहीदों में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, सभी शामिल थे। दूसरी तरफ केन्द्र और राज्य सरकार के पास बस्तर के पिछले हमले में हुई दर्जन भर शहादत के बाद कहने को नया कुछ नहीं है, क्योंकि बस्तर की इस खतरनाक और जटिल जमीनी हकीकत पर रणनीति को बहुत आसानी से और जल्दी-जल्दी बदला भी नहीं जा सकता। छत्तीसगढ़ को अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से विरासत में मिली हुई नक्सल-समस्या से जूझना आसान नहीं पड़ रहा, लेकिन केन्द्र सरकार की मदद से नक्सल मोर्चे पर प्रदेश सरकार लगातार बेहतर काम कर पा रही है। यह बात आज शहादत के आंकड़ों के बीच सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन सच यही है कि नक्सल कब्जे के इलाके धीरे-धीरे करके सरकार अपने कब्जे में ले रही है, और उन इलाकों में लगातार जो विकास हो रहा है, उसे पूरा करने के लिए रोज नए खतरे उठाने भी पड़ रहे हैं।
दरअसल देश के भीतर हो, या कि सरहद पर, मौत के आंकड़े जब जत्थे में आते हैं, तो वे हालात पर सोचने की ताकत को कमजोर कर देते हैं। अगर आंकड़े एक साथ बड़े होते हैं, तो वे सरकार को नाकामयाब साबित कर देते हैं, और वही आंकड़े अगर किस्तों में धीरे-धीरे आते हैं, तो सरकार की नाकामयाबी उस तरह सिर चढ़कर नहीं बोलती। छत्तीसगढ़ में जो लोग नक्सल मोर्चे पर दोनों तरफ की मौतों, और आदिवासियों की मौतों के आंकड़ों से परे देख पा रहे हैं, उनको यह समझ आ रहा है कि इलाके नक्सली-कब्जे से छुड़ाने के दौरान, और वहां पर सड़कें बनाने, बिजली ले जाने, जैसे कई विकास कार्यों में तैनात जवानों पर हमला नक्सलियों के लिए आसान हो जाता है। अगर राज्य की पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बल अपने सुरक्षित मोर्चों और छावनियों में बैठे रहते, तो इतनी मौतें नहीं होतीं। इसलिए आज ऐसे हमलों के साथ-साथ यह समझने और देखने की भी जरूरत है कि सरकार के काम को, विकास की योजनाओं को जब आगे ले जाया जा रहा है, तो उस दौरान भी ऐसे हमले हो रहे हैं, शायद बढ़ रहे हैं।
लेकिन आज बस्तर में जो हालात हैं उन्हें देखते हुए यह अनदेखा करना ठीक नहीं होगा कि आदिवासियों के एक तबके की हमदर्दी नक्सलियों के साथ इसलिए हो सकती है क्योंकि सरकार से, शहरी समाज और कारोबार से उन्हें शोषण और भ्रष्टाचार के बिना कुछ नहीं मिलता। यह बात जगजाहिर है कि बस्तर के अफसर-कर्मचारी, नेता और सत्ता के ओहदों पर बैठे हुए लोगों में से एक बड़ा हिस्सा खुले भ्रष्टाचार में शामिल रहता है, और इसलिए न सरकार की साख बन पाती है, न ही लोकतंत्र की। दूसरी तरफ जब पुलिस पर ज्यादती और हत्या-बलात्कार जैसे आरोप लगते हैं, तो यह मानना ठीक नहीं होगा कि वे सारे के सारे आरोप झूठे हैं। देश की सबसे बड़ी अदालतों से लेकर मानवाधिकार आयोगों तक ने ऐसे आरोपों को सही माना है, और यह बात बिल्कुल साफ है कि जिस परिवार के बेकसूर लोगों की हत्या हो, जिनकी बेकसूर बेटियों के साथ बलात्कार हो, उनकी कोई हमदर्दी सरकार के साथ नहीं हो सकती, और जमीनी आबादी के मन में नफरत पैदा करते हुए वर्दियां अपने सिर पर से खतरा कम भी नहीं कर सकतीं। सरकार को नक्सली मोर्चे पर खतरों को गिनाते हुए कभी भी यह कहने का हक नहीं मिल सकता कि विपरीत परिस्थितियों में लगातार काम करने की वजह से सुरक्षा बल हो सकता है कि कुछ ज्यादतियां करते हों। ऐसी ज्यादती से न सिर्फ उन गिने-चुने आदिवासी परिवारों पर जुल्म होता है, बल्कि पूरे इलाके के मन में सुरक्षा बलों के खिलाफ नफरत खड़ी हो जाती है, और उनमें से कुछ लोग नक्सलियों को खबर देकर सरकारी वर्दियों के लिए खतरा खड़ा कर सकते हैं।
सरकार के लिए नक्सल मोर्चा किसी जीत की नौबत नहीं है, यह हार और हार की नौबत है, जब तक कि इस समस्या को निपटा न लिया जाए। एक तरफ नक्सली हमलों से जिंदगियां जाती हैं, दूसरी तरफ सरकारी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों से सरकार पर तोहमत आती है। यह नौबत बदलने के लिए सरकार को बंदूक की लड़ाई के साथ-साथ बातचीत का रास्ता ढूंढना ही होगा। बंदूक छोडऩे की शर्त पर बातचीत करने की शर्त ठीक नहीं होगी, बिना किसी शर्त के कुछ मध्यस्थ लोगों के साथ बातचीत करनी चाहिए, क्योंकि पूरी दुनिया का यह इतिहास है कि कोई भी हथियारबंद आंदोलन महज बंदूकों के बल पर खत्म नहीं किए जा सकते। श्रीलंका में लिट्टे को खत्म करने के लिए फौज ने जितने बेकसूरों को मारा, वैसा भारतीय लोकतंत्र में संभव नहीं है। हम फिर इस बात को दुहराना चाहते हैं कि नक्सली जिन मध्यस्थ लोगों से बातचीत करने को तैयार हों, ऐसे लोगों को ढूंढकर छत्तीसगढ़ सरकार को अपने स्तर पर, और भारत सरकार को अपने स्तर पर वार्ता शुरू करनी चाहिए, क्योंकि इसमें नक्सलियों और सुरक्षा बलों के अलावा आम आदिवासी भी बड़ी संख्या में मारे जा रहे हैं, और इन इलाकों में लोकतंत्र के फायदे नहीं पहुंच पा रहे हैं। 

एक के बाद एक कई देशों में हिन्दुस्तानी कामगार दिक्कत में

संपादकीय
24 अप्रैल 2017


ब्रिटेन से खबर आई है कि वहां दो कारखानों में छापे के दौरान 38 हिन्दुस्तानियों को हिरासत में लिया गया जो कि वीजा का वक्त खत्म होने के बाद वहां बने हुए थे। यह खबर एक हफ्ते में भारतीय कामगारों से जुड़ी तीसरी निराशाजनक खबर है। पहले भारत आकर ऑस्ट्रेलिया लौटे वहां के प्रधानमंत्री ने वापिस घर पहुंचते ही हिन्दुस्तानियों पर कड़े वीजा प्रतिबंध की घोषणा की, उसके बाद अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय कामगारों के वीजा नियमों को और कड़ा किया। और अब ब्रिटेन की यह खबर। ये तीनों देश भारतीय कामगारों के लिए बड़ी जगह हैं, और अगर वहां उनका काम कम होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था को भी एक नुकसान पहुंचेगा, और वहां पर जमे जमाए काम वाले इन लोगों की हालत भी डांवाडोल होगी।
भारत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम सम्हालने के बाद से लगातार विदेशी मोर्चे पर एक अभूतपूर्व सक्रियता दिखाई, और बहुत सी खबरें पाईं। लेकिन जिन देशों के साथ भारत को फायदा होते दिखा, उनमें कई देश तो ऐसे थे जिनको भारत से बहुत बड़ा कारोबारी फायदा हो रहा था, और उनसे भारत को महत्व मिलना स्वाभाविक ही था। दूसरी तरफ अमरीका के साथ भारत के जो अच्छे संबंध ओबामा के रहते दिख रहे थे, उनका कोई फायदा अभी दिख नहीं रहा है। नए राष्ट्रपति ट्रंप के आने के बाद भी हिन्दुस्तानियों के वहां काम करने को लेकर नई दिक्कतें बढ़ रही हैं, और भारत की सरकार इसमें कुछ भी करने की हालत में नहीं दिख रही है। अमरीका की मौजूदा सरकार का जो रूख है वह भारत के सीधे-सीधे खिलाफ न होने पर भी इतना तो है ही कि वह भारत को किसी प्राथमिकता में नहीं रख रहा है। उसके निशाने पर वैसे तो आधा दर्जन मुस्लिम देश हैं, लेकिन ट्रंप की चुनावी घोषणाओं में ही यह शामिल था कि किस तरह विदेशी लोगों से रोजगार वापिस लेकर अमरीकी लोगों को काम मुहैया कराया जाएगा। फिलहाल ट्रंप के आने के बाद से अब तक भारत सरकार का अमरीका के साथ किसी असरदार बातचीत का कोई संकेत नहीं है। अमरीका में भारतवंशीय लोगों पर नस्लवादी हमले हुए, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने, या विदेश मंत्री ने इस पर एक ट्वीट करने की भी पहल नहीं की। इससे जाहिर है कि भारत का फिलहाल कोई असर अमरीकी सरकार पर नहीं है, प्राथमिकता की बात तो दूर रही।
ऐसी नौबत में एक बात साफ दिखती है कि भारत को आगे-पीछे यह जरूर सोचना पड़ेगा कि वह दूसरे देशों में मजदूरी के काम के बजाय अपने खुद के देश में ऐसे लोगों को रोजगार या कारोबार के लिए कैसे बढ़ाए? वैसे तो स्टार्टअप से लेकर मेक इन इंडिया तक कई तरह के नारे पिछले एक बरस में केन्द्र सरकार ने उछाले हैं, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था में इन नारों का असर नहीं दिख रहा है। केन्द्र सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि इस देश के माहौल में आदिम युग जैसी जो अलोकतांत्रिक हिंसा बढ़ती जा रही है, क्या उसकी वजह से पूंजीनिवेश से लेकर दूसरे देशों से लोगों का भारत आना तक घट रहा है? यह एक आसान नौबत नहीं है क्योंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह मंदी से गुजर रही है, और आज तो हिन्दुस्तान का काम सस्ते तेल की वजह से खिंच रहा है, आगे चलकर हिन्दुस्तानियों के रोजगार संपन्न पश्चिमी देशों में घटते जाएंगे तो क्या होगा? 

बेकाबू रफ्तार से अनिवार्य किए जा रहे आधार कार्ड के खतरे

संपादकीय
23 अप्रैल 2017


सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर केन्द्र सरकार से नाराजगी जाहिर की है कि उसकी मनाही के बावजूद सरकार तरह-तरह के कामों के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल अनिवार्य कैसे करती चल रही है? अदालत ने पूछा है कि जब यह कह दिया गया था कि किसी भी बात के लिए आधार को अनिवार्य न किया जाए, तब बैंक खातों से लेकर सिमकार्ड तक, और रेल रिजर्वेशन से लेकर कई दूसरे जरूरी कामों तक आधार कार्ड को जरूरी कैसे बनाया जा रहा है? दूसरी तरफ आज ही एक खबर है कि झारखंड में सरकार की एक वेबसाइट की एक गलती से दस लाख से ज्यादा लोगों के आधार कार्ड नंबर उनकी पहचान के साथ लीक हो गए हैं, और अब उनकी जानकारी उनके लिए कई तरह के खतरे खड़ी कर सकती है। लोगों को याद होगा कि हर कुछ दिनों में देश में कहीं न कहीं से यह खबर आती है कि बैंक खातों का नंबर, या कि आधार कार्ड का नंबर लेकर किस तरह से ठगी और जालसाजी चल रही है, और सरकार के पास इसके रोकथाम का कोई औजार दिखता नहीं है।
हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि भारत जिस रफ्तार से घर-घर तक, और हर नागरिक तक की पहचान डिजिटल तरीके से करते चल रहा है, और हर छोटे-बड़े काम के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य बनाया जा रहा है, यह तैयारी चल रही है कि किस तरह लोग आधार कार्ड नंबर और अपने अंगूठे के निशान के साथ भुगतान कर सकेंगे। ऐसे में एक दूसरी खबर यह भी है कि छत्तीसगढ़ की राशन दुकानों में बड़ी संख्या में लोगों को आधार कार्ड को लेकर एक परेशानी झेलनी पड़ रही है। उनके राशन कार्ड में सदस्यों की संख्या अलग है, और आधार कार्ड में अलग है, तो उन्हें राशन कम लोगों के लिए ही मिल रहा है। हो सकता है कि लोगों की अपनी दी गई जानकारी भी गलत हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि सरकार की दर्ज की गई जानकारी में गलती हो, और अब अचानक सात लोगों के परिवार को चार लोगों का राशन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड की अनिवार्य के खिलाफ दायर की गई एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इसे अनिवार्य बनाने पर रोक लगा दी है। लेकिन देश में सरकारें और प्रशासन अपनी मर्जी से जगह-जगह अदालती आदेश के खिलाफ जाकर आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी उन लोगों को भी गैस एजेंसियों से रसोई गैस बिना आधार कार्ड नहीं मिल रही जो कि सरकारी रियायत को छोड़ चुके हैं, और खुले बाजार से बिना किसी रियायत वाली रसोई गैस ले रहे हैं।
भारत में सरकारें न तो साइबर और डिजिटल सुरक्षा के लिए तैयार हैं, और न ही दुनिया की कोई भी ताकत हैकरों और साइबर-मुजरिमों के मुकाबले में पूरी तरह से सुरक्षा जुटा पाती हैं। ऐसे में भारत के हर नागरिक की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को तो आधार कार्ड दर्ज करते चल रहा है, हर सफर, हर खरीदी, हर बैंक भुगतान, हर सरकारी काम आधार कार्ड के रास्ते अपने डिजिटल पदचिन्ह छोड़ते चल रहे हैं। ऐसे में लोगों की निजी जिंदगी, और उनकी हर तरह की गोपनीयता बुरी तरह खतरे में है। सरकार ने अब तमाम सरकारी अनुदान, या कि मजदूरी, इन सबको अनिवार्य रूप से बैंक से भी जोड़ दिया है, और आधार कार्ड से भी। यह सिलसिला खतरनाक है, और यह देश एक बुलबुले पर बैठा हुआ है जिसे कि कोई भी साइबर-आतंकी ताकत पल भर में फोड़ सकती है, और उस हालत में देश की सारी व्यवस्था पल भर में चौपट हो सकती है। आज हर काम के लिए आधार कार्ड जरूरी किया जा रहा है, और कल आधार कार्ड का ढांचा ही अगर साइबर-हमले में तबाह कर दिया जाएगा, तो देश की जिंदगी मानो थम जाएगी।
एक नारे की तरह डिजिटल-विकास अच्छा तो लगता है, लेकिन कम्प्यूटरों पर जो लोग ऐसी योजनाओं को, और ऐसी व्यवस्था को बहुत आकर्षक दिखाते हैं, उन्हीं में से एक की गलती से एक प्रोग्राम ऐसा बन गया कि दस लाख से अधिक लोगों के नाम-पते, आधार नंबर, और बैंक खाते सब उजागर हो गए हैं। सरकारों को एक राजनीतिक फायदे के लिए नारेनुमा कोई भी योजना ऐसी, और ऐसे रफ्तार से लागू नहीं करनी चाहिए जो कि उनके काबू के बाहर हो।

रविशंकर प्रसाद की कही बातें और मुस्लिमों के जख्म हरे...

संपादकीय
22 अप्रैल 2017


देश में मुस्लिमों को लेकर भारतीय जनता पार्टी नेताओं और उनके सहयोगी संगठनों के लोगों की कही बातों से पैदा होने वाली गलतफहमियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक तरफ जब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने राज्य में कश्मीरी छात्रों पर बार-बार होने वाले हमलों को लेकर कड़ी कार्रवाई की बात कह रही हैं, और कश्मीरी बच्चों को अपना बच्चा कह रही हैं, तब दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद खुद होकर मुस्लिमों के बारे में एक ऐसी बात कह रहे हैं जिससे खुद उनकी कही हुई बात के खिलाफ माहौल बन रहा है। राजस्थान की बात का लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी यह कहा है कि कश्मीर के लोग देश के परिवार के लोग हैं, और उन्हें पूरी सुरक्षा दी जाएगी, लेकिन ऐसे माहौल में रविशंकर प्रसाद की कही हुई एक बात से मुस्लिमों का फिर भड़कना, और उनके जख्म फिर हरे हो जाना तय है। कांग्रेस के एक बड़े मुस्लिम नेता सलमान खुर्शीद, और मुस्लिम राजनीति करने वाले ओवैसी ने रविशंकर प्रसाद के बयान पर कड़ा हमला किया है।
कल रविशंकर प्रसाद ने एक कार्यक्रम में मंच से यह कह दिया कि मुसलमान भारतीय जनता पार्टी के लिए वोट नहीं करते हैं, लेकिन भाजपा की सरकारें उन्हें पर्याप्त इज्जत देती हैं। उन्होंने कहा कि देश में भाजपा के 13 मुख्यमंत्री हैं, और देश पर भी भाजपा का राज है, लेकिन क्या कभी किसी नौकरीपेशा या व्यापार करने वाले सज्जन मुसलमान को प्रताडि़त किया गया है? रविशंकर प्रसाद सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े नामी वकील हैं, और उनसे यह उम्मीद की जाती है कि उनकी कही बातें कम से कम तर्कसंगत और न्यायसंगत तो होनी ही चाहिए। लेकिन यहां पर वे चूक कर गए, और देश में आज घायल चल रही एक बिरादरी के बारे में उन्होंने गैरजिम्मेदारी की बात कही क्योंकि कोई वोट किसी को दे या न दे, निर्वाचित सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी होती है कि वह सबके साथ बराबरी का बर्ताव करे, और ऐसा करना किसी बड़प्पन की बात नहीं है, यह संवैधानिक जिम्मेदारी की बात है, और इसे गिनाना एक ओछेपन की बात है। फिर जब कभी ऐसी बात गिनाई जाती है तो कहने वाले की नीयत पर एक शक भी होता है कि क्या जुबानी जमाखर्च के लिए ऐसी सफाई दी जा रही है?
आज हम देख रहे हैं कि कश्मीर में एक स्थानीय मुस्लिम नौजवान को थलसेना के सैनिकों ने किस तरह गाड़ी पर सामने बांधकर बहुत से गांवों से गुजारा ताकि वहां सेना पर होने वाले आम पथराव से गाडिय़ों के काफिले को बचाया जा सके। आज देश में समझ न रखने वाले कई लोग सेना की इस बात को यह कहकर सही ठहरा रहे हैं कि जब कश्मीर के बहुत से नौजवान रात-दिन सैनिकों पर पथराव करते हैं, तो उसके जवाब में सैनिकों का ऐसा करना क्या गलत है? इसमें बुनियादी तौर पर गलत यह है कि कश्मीरी पत्थरबाजों ने संविधान की शपथ नहीं ली है, और न ही वे सरकारी नियमों से बंधे हुए हैं, इसलिए उनका जुर्म करना एक आम मुजरिम की तरह है, और उसके लिए वे सजा के हकदार भी हैं। दूसरी तरफ जब सेना देश के कानून के खिलाफ, मानवाधिकार के खिलाफ, इंसानियत के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है, तो उससे पूरे लोकतंत्र की साख पर आंच आती है, सरकार की फजीहत होती है, और देश भर में जनता का भरोसा सेना पर से उठता है कि वह भी जुल्म और ज्यादती करने वाली एक फौज है। इसलिए जब आज देश में कहीं गाय के नाम पर किसी गौपालक मुस्लिम को सड़कों पर पीटकर मारा जा रहा है, कहीं मुस्लिम समाज के अपने धार्मिक नियमों के तहत प्रचलित तलाक की एक बुरी प्रथा को खत्म करने की कोशिश की जा रही है, तो ऐसे नाजुक माहौल में सरकार को, सत्ता से जुड़े हुए लोगों को बहुत जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए, क्योंकि देश में अगर धार्मिक आधार पर लोगों को ऐसा लगने लगे कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है, तो यह बहुत खतरनाक बात है।

आजादी का अधिकार बिना जिम्मेदारी नहीं

संपादकीय
21 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश की वाराणसी की खबर है कि जिला प्रशासन ने आदेश निकाला है कि वाट्सएप के ग्रुप में जो बातें उसके सदस्य पोस्ट करते हैं, उसके लिए ग्रुप के एडमिन जिम्मेदार होंगे। अभी यह एक अफसर का आदेश है और आगे चलकर इसे अदालतों में चुनौती भी मिलेगी, लेकिन तब तक उन लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए जो कि आज मुफ्त के इस संचार-औजार का इस्तेमाल कर रहे हैं, जमकर कर रहे हैं।
लोगों को अपने समूह में मनचाही बातें करने, लिखने, और भेजने की आजादी तो है, लेकिन कोई भी आजादी कुछ जिम्मेदारियों के साथ ही आती है। बीती रात दिल्ली में एक स्कूली छात्र ने कार से सड़क किनारे सोए लोगों को कुचल डाला, एक की मौत हो गई, कई जख्मी हो गए। अब उसके परिवार के खिलाफ भी जुर्म दर्ज हो रहा है जिसके नाम कार थी? बिना ड्राइविंग लाइसेंस यह लड़का गाड़ी चला रहा था। एक गाड़ी कुछ शर्तों के साथ मिलती है, सड़क पर उसे चलाने के कुछ नियम रहते हैं, और कुछ बुनियादी जिम्मेदारियां भी रहती हैं। कार एक मशीनी औजार है जिसके इस्तेमाल का हक जिम्मेदारी की शर्तों के बिना नहीं मिलता। यह ठीक वैसा ही है कि पिस्तौल का लाइसेंस इस शर्त के साथ आता है कि कोई दूसरा उसे इस्तेमाल न करे, उसका बेजा इस्तेमाल न हो।
वाट्सएप जैसी संचार-सुविधा से आज पल भर में दुनिया भर में कोई वीडियो, कोई तस्वीर, या कोई लेखन फैलाया जा सकता है, और उसका विस्तार फिर बेकाबू हो जाता है। इसलिए ऐसे समूहों में जो पोस्ट होता है उसकी जिम्मेदारी किसी को तो लेनी ही होगी। कोई अपनी लाइसेंसी बंदूक चौराहे पर छोड़कर जिम्मेदारी से बच तो नहीं सकते। इसलिए सरकारों के भारत के बहुत कड़े आईटी कानून के तहत यह गारंटी करनी चाहिए कि ऐसे समूहों में पोस्ट होने वाली बातों के लिए उनके एडमिन को जवाबदेह और जिम्मेदार बनाया जाए। आज हिंदुस्तान में अचानक नफरत और बर्बादी पर भरोसा रखने वाले लोग रातों रात अभिव्यक्ति की एक ऐसी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिनकी सोच इस देश के कानून के ठीक खिलाफ है। नए औजार और नई तकनीक किसी को लोकतंत्र और इंसानियत को तबाह करने का हक नहीं दे देते। इसलिए देश के कानून को अपनी जिम्मेदारी कड़ाई से पूरी करनी चाहिए। संचार साधनों पर एक बार किए गए पोस्ट का सुबूत जुटाना आसान रहता है, सरकारी एजेंसियां कुछ सौ लोगों को सजा दिला देंगी तो बाकी को भी सबक मिलेगा। आज सोशल मीडिया और ऐसे समूहों पर रात-दिन लोगों को हत्या और बलात्कार की धमकी दी जा रही है, और सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर रही हैं।

जनता की नफरत की एक वजह, लालबत्ती खत्म...

संपादकीय
20 अप्रैल 2017


कल सुबह इसी वक्त जब हमने इसी जगह लिखा था कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लाल बत्तियां बंद करवा देनी चाहिए क्योंकि वे सत्ता को जनता से दूर कर रही हैं, तब ऐसी कोई चर्चा भी नहीं थी कि दोपहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में लाल बत्तियां खत्म करने जा रहे हैं। इस पहली मई, मजदूर दिवस से अंग्रेजी सामंतवाद का यह एक बोझ खत्म होने जा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से लगातार इस बात की वकालत कर रहे थे और हाल में कुछ मुख्यमंत्रियों ने ऐसा किया भी था। प्रधानमंत्री की इस पहल को सरकार में एक सादगी, किफायत और जनसेवा के रूप में देखते हुए देश की बाकी सरकारों को भी अपने-अपने स्तर पर तय करना चाहिए कि कौन सी बातें उन्हें जनता से दूर ले जाती हैं और उन बातों को खत्म करना चाहिए। कुछ दिन पहले जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री दिल्ली पहुंचीं तो उन्हें लेने नरेन्द्र मोदी बिना सुरक्षा, बिना लालबत्ती, सादी गाड़ी में, बिना टै्रफिक रोके एयरपोर्ट गए थे, वह बात शायद इस फैसले का एक ट्रायल थी।
प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने राष्ट्रपति के संबोधन में महामहिम लिखना बंद करवाया, बाद में राज्यों के राज्यपालों को भी यह बात माननी पड़ी। राष्ट्रपति भवन से लेकर छत्तीसगढ़ के इक्कीसवीं सदी में बने राजभवन तक में कार्यक्रमों के लिए दरबार हॉल हैं। ऐसे सामंती नाम भी खत्म होने चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में दरबार शब्द महज व्यंग्य और गाली की तरह इस्तेमाल हो सकता है, किसी सम्मान के लिए नहीं। कुछ हफ्ते पहले हमने भारत की गर्मी और जनता के पैसों पर एयरकंडीशनिंग की चर्चा करते हुए लिखा था कि अंग्रेजों की छोड़ी गंदगी को भारतीय अदालतों में काले कोट और काले लबादों की शक्ल में ढोना बंद करना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी भारतीय आत्मगौरव दिखाते हुए अंग्रेजी पोशाक की ऐसी बंदिश फेंक देनी चाहिए जिसकी वजह से वकील और जज इंग्लैंड के मौसम में जीते हैं।
सत्ता के लोगों को सायरन, पायलट गाड़ी, और गाडिय़ों के काफिले भी खत्म करना चाहिए। जगह-जगह सत्ता के लिए जनता को चौराहों पर रोका जाता है और इससे सड़क पर कोई मरीजों की मौत भी हुई है, घायल भी अस्पताल नहीं पहुंच पाए। सत्ता को पता नहीं जनता की उस नफरत का अहसास होता है या नहीं जो फंसी हुई जनता के मन से निकलती है। छत्तीसगढ़ की जनता को याद है कि राजधानी के सांसद ने अपने ही शहर में बिना लालबत्ती या सायरन निकलने से मना कर दिया और सरकार पर दबाव डालने का सार्वजनिक बयान भी दिया था। अपने ही शहर में लोग सायकल से किस तरह सायरन तक पहुंचते हैं इसकी और भी बहुत सी मिसालें हैं। छत्तीसगढ़ का अकेला एयरपोर्ट राजधानी रायपुर में होने से बिलासपुर हाईकोर्ट के जज भी लालबत्ती, सायरन, और पायलट गाड़ी के साथ आते-जाते दिखते रहते हैं मानो एयरपोर्ट पहुंचते ही उन्हें फैसला सुनाने की हड़बड़ी हो। जब देश की बड़ी अदालतें ही अपने ऐसे अलोकतांत्रिक ताम-झाम का मोह नहीं छोड़ पातीं, तो उनके पास जाकर कौन गुहार लगा सकते हैं कि सरकार में सादगी लाई जाए।
सरकारों को मंत्रियों और अफसरों के घर-दफ्तरों के खर्च में भी कटौती करनी चाहिए। इसके लिए हर राज्य को एक किफायत कमेटी बनानी चाहिए जो निजी कामों के लिए कर्मचारियों, गाडिय़ों, बिजली, और बाकी खर्च की सीमा तय करे। सत्ता को जनता के रूख को पहचानना चाहिए, जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में पांचों राज्यों में मौजूदा सरकारों को पलट दिया, इससे जनता की नाराजगी साफ दिखती है और कोई पार्टी या नेता इससे नहीं बच पाए। दीवारों पर लिखी इस बड़ी-बड़ी लिखावट को अनदेखा करना ठीक नहीं।
भारत की हिंदुस्तानी जुबान में लालबत्ती शब्द अच्छा नहीं रहा। लालबत्ती इलाका या रेड लाईट एरिया सबसे बुरे माने जाने वाले धंधों का रहा। इससे छुटकारा ही ठीक है। यह एक और बात है कि प्रधानमंत्री के हाथ पूरे देश के लिए नियम बदलना है, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले दिन से ही लालबत्ती हटा दी थी। देर से ही सही, भारतीय सत्ता को बदनाम रेड लाईट छोडऩी चाहिए।

सरकारी अमले को मठाधीश जैसा नहीं जनसेवक बनना होगा

संपादकीय
19 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भयानक गर्मी के बीच हफ्तों चलने वाले अपने सालाना दौरे में अपनी अभूतपूर्व गर्मी दिखाई है। उन्होंने सरगुजा में दो कलेक्टरों को मौके पर ही बदलने की घोषणा की, और एक जिला पंचायत अध्यक्ष को भी हटा दिया। उनके ऐसे तेवर उनके पिछले तेरह-चौदह बरस में कभी नहीं दिखे थे और इससे राज्य के बाकी सरकारी अमले में एक सिहरन दौड़ जानी चाहिए। खुद मुख्यमंत्री के लिए यह मौका अभी नहीं तो कभी नहीं किस्म का है क्योंकि दो बरस बाद के चुनावों में जीत या हार कुछ हद तक कलेक्टरों की काबिलीयत पर भी टिकी रहेगी। कलेक्टर और एसपी जैसे ओहदे हमेशा ही मुख्यमंत्री की निजी पसंद से भरे जाते हैं और छोटे से राज्य में मुख्यमंत्री की सीधी नजर भी इन ओहदों पर रहती है।
राज्य सरकार के ढांचे में वैसे तो जिलों के प्रभारी सचिव भी बनाए जाते हैं जो कि राज्य के बड़े अफसर होते हैं और कलेक्टरों के साथ संपर्क में रहते हैं। हर जिले का कोई न कोई प्रभारी मंत्री होता है जो कि आमतौर पर दूसरे जिले का होता है। हर कुछ कलेक्टरों के ऊपर एक संभागीय कमिश्नर होता है जिसे खुद भी कलेक्टरी का खासा तजुर्बा होता है। इनके अलावा जिले के पक्ष-विपक्ष के विधायक होते हैं जो कि सरकारी कामों पर नजर रखते हैं। शासन, प्रशासन और राजनीतिक निगरानी की इतनी सतहों के बाद भी अगर किसी जिले में काम खराब होता है तो वह फिक्र की बात है। इसलिए भी कि हर आईएएस अफसर का सपना एक अच्छी कलेक्टरी रहता है, और उसकी स्मृतियां भी कभी अपनी जिला-पोस्टिंग से परे नहीं रह पातीं।
लोकसुराज जैसा जनसंपर्क कार्यक्रम हो या कि मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टरों तक के जनदर्शन कार्यक्रम, इन सबमें भीड़ इस बात की भी सुबूत होती है कि शासन-प्रशासन में अपनी रोजाना की जिम्मेदारी ठीक से पूरी नहीं हो रही। और इस ठीक का ठीक होना आसान नहीं होता। इसके लिए मंत्रियों और अफसरों का जनसेवा के लिए समर्पित होना भी जरूरी होता है। और यह समर्पण सरकारी नियमों से या मंत्री पद की शपथ से नहीं आ जाता? इसके लिए लोकतंत्र और जनकल्याण की एक गहरी आस्था भी जरूरी होती है जिसकी बहुत कमी आज के अधिकतर नेताओं और अफसरों में दिखती है। ऐसे में छोटे कर्मचारियों पर कोई तोहमत लगाना बेकार है।
छत्तीसगढ़ में सरकार को लीक से हटकर एक मौखिक पहल करने की जरूरत है। जिला कलेक्टरों का यह नाम तब तो ठीक था जब वे अंग्रेजी राज में टैक्स कलेक्ट करते थे, आज तो वे जितना कलेक्ट करते हैं, उससे अधिक खर्च करते हैं इसलिए यह नाम जाना चाहिए। कलेक्टरों को जिलाधीश भी कहा जाता है जो कि मठाधीश जैसा लगने वाला नाम है और यह नाम भी जाना चाहिए। अधिकारी शब्द की जगह सेवक शब्द आना चाहिए, जैसे कि जिला जनसेवक। जब तक कलेक्टरों का नाम जिला जनसेवक नहीं होगा तब तक सेवा की सोच नहीं आ पाएगी। इसके अलावा सरकार को मंत्रियों और अफसरों की गाडिय़ों से लाल-नीली बत्तियां भी हटानी चाहिए, सायरन और बत्तियां बददिमागी बढ़ाते हैं और मंत्री-अफसर जनता से कट जाते हैं। सरकार को फाइलों पर लगने वाले पदनाम लाल फीतों को भी बदलना चाहिए। लाल रंग ट्रैफिक को रोकने वाला होता है और लाल फीताशाही की सोच ऐसी ही रहती है। इसे बदलकर हरा रंग करना चाहिए ताकि फाइलें आगे बढ़ सकें। अफसरों और मंत्रियों का बुरा बर्ताव भी सख्ती से बंद करवाना चाहिए और आए दिन मीडिया में आने वाली खबरों पर पार्टी संगठन को भी ध्यान देना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक हैरतअंगेज ताकत के साथ काम करते हैं। उनकी मेहनत में कुछ और मौलिक सुधारों से अधिक असर आ सकता है। देश में जगह-जगह अलग-अलग मुख्यमंत्री सादगी और सुधार की बातें करते रहे हैं। आने वाला वक्त जनता की कड़ी कसौटी का है, छत्तीसगढ़ के सरकारी अमले को भी मठाधीश के बजाय जनसेवक बनना चाहिए। 

किसी भी धर्म को शोर और हल्ले की आजादी क्यों हो?

संपादकीय
18 अप्रैल 2017


फिल्म और टीवी कलाकार सोनू निगम ने एक नए विवाद को शुरू कर दिया है, उन्होंने कहा कि सुबह-सुबह मस्जिद के अजान की आवाज लाउडस्पीकर पर आकर उनकी नींद खराब करती है। यह बात वैसे तो बहुत मासूम है लेकिन आज हिन्दुस्तान की हवा में इतनी सनसनी फैली हुई है कि लोग हर बात के पक्ष और विपक्ष में लाठी लेकर टूट पड़ते हैं। इनकी इस बात पर कई लोगों ने खूब हमला किया, कई तटस्थ लोगों ने याद दिलाया कि रात-रात भर दूसरे धर्मों के भजन और रतजगे का शोर भी झेलना पड़ता है। ऐसे माहौल के बीच में लोगों को ठीक उसी तरह हाथ साफ करने का मौका मिलता है जिस तरह सड़क पर किसी की पिटाई होती रहे तो आते-जाते तमाम राहगीर दो-दो हाथ लगाते चलते हैं।
सोनू निगम ने न तो कोई गलत बात कही क्योंकि सदियों पहले कबीर इसी बात को तब कह गए थे जब लाउडस्पीकर बना भी नहीं था, और उन्होंने कहा था कि मस्जिद की मीनार पर चढ़कर मुल्ला इस तरह बांग देता है कि मानो खुदा बहरा हो गया हो। यह बात कहने का हौसला उन्हीं का था, और आज हिन्दुस्तान में यह बात कहना आसान नहीं है। और तब से लेकर अब तक धीरे-धीरे लाउडस्पीकर बढ़ते चले गए, और मस्जिदों से परे भी मंदिर, गुरुद्वारे, और धार्मिक जलसों पर घर-घर से धार्मिक संगीत निकलकर मीलों तक फैलने लगा। अब जैसे-जैसे आबादी घनी होती चली गई यह शोर परेशान करने लगा और भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी धार्मिक या किसी भी तरह के शोरगुल के खिलाफ बड़े कड़े हुक्म दिए हुए हैं। यह एक अलग बात है कि बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट का हाल परिवार के उस बुजुर्ग सयाने की तरह का होकर रह गया है जो कि बोलता बहुत अच्छी बातें है, लेकिन परिवार में उसकी बात सुनता-मानता कोई नहीं है।
हमारा ख्याल है कि किसी एक धर्म की चर्चा किए बिना, पूरे देश से सभी धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर को हटा देना चाहिए, और दूसरी बात यह भी है कि ऐसे लाउडस्पीकर पर सरकार एक नियम बनाकर लाइसेंस भी लागू कर सकती है कि उसका इस्तेमाल करने के पहले अगर इजाजत न ली गई, तो कितना बड़ा जुर्माना हो सकता है, और कितनी कड़ी कैद हो सकती है। फिर यह जुर्माना और कैद न सिर्फ लाउडस्पीकर किराए पर चलाने वाले लोगों के लिए हो, बल्कि उन लोगों के लिए भी हो जो कि धर्मस्थलों के प्रभारी हैं, या जिनके घरों पर इनको लगाया जाता है। यह एक खतरनाक नौबत है कि दूसरों का जीना हराम करते हुए धर्म के नाम पर, या कि किसी और नाम पर इस तरह का कोलाहल किया जाता है कि बीमार तो बीमार, पढऩे वाले बच्चे तक थककर आत्महत्या की कगार पहुंच जाते हैं। भारत में जितना शोर है, उतना शायद ही किसी और देश में देखने मिलता होगा, और धर्म से आगे बढ़कर अब यह शादियों में, निजी कार्यक्रमों में भी इस हद तक देखने मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अपने ही आदेशों को लेकर शर्म से डूब मरें कि उनकी कोई सुनवाई इस देश की सरकारों में नहीं रह गई है।

अफसोस कि वे हुए ही क्यों?

आजकल
17 अप्रैल 2017
अभी दो दिन पहले डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की जन्मतिथि आई, तो अलग-अलग पार्टियों और अलग-अलग नेताओं ने उसे अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल किया। बौद्ध समाज के लोग अंबेडकर के अनुयायियों में सबसे अधिक हैं, और उनके लिए भी यह दिन गौरव का एक दिन रहता है, और उन पर होती ज्यादतियों के खिलाफ यह दिन प्रतिरोध की एकजुटता का भी रहता है। लेकिन इन सबसे परे जो कुछ बातें इस बरस चर्चा में आईं उनमें से एक यह कि राजस्थान में इस मौके पर अंबेडकर प्रतिमा को सार्वजनिक रूप से बाल्टी भर दूध से नहलाया गया।
दूध से किसी प्रतिमा को नहलाने का एक मतलब यह भी होता है कि उतने दूध को बर्बाद करना। और फिर यह स्विटजरलैंड तो है नहीं जहां पर कि दूध इतना अधिक होता है कि उसे चॉकलेट बनाकर, मक्खन बनाकर पूरी दुनिया में बेचना पड़े, यह तो वह देश है जिसमें दसियों करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और जहां के बच्चों को दूध-मक्खन महज कृष्ण की कहानियों में नसीब होता है। ऐसे में दलित गरीबों के मसीहा अंबेडकर की प्रतिमा को दूध से धोना उसी हिन्दू-रिवाज का एक सिलसिला है जिसके कि खिलाफ अंबेडकर ने बगावत की, और दलितों को उस हिन्दू धर्म से बाहर निकालकर बौद्ध बनाया, और सम्मान की, समानता की एक जिंदगी दिलवाई।
लेकिन यह अकेला ऐसा मामला नहीं है जिसमें रीति-रिवाज इस तरह हावी हो जाते हों। एक पुरानी मिसाल कबीर की है जिन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के ढकोसलों के खिलाफ एक दमदार बगावत की, सारे पाखंडों को चकनाचूर करने का साहस दिखाया, और उसके बाद आज उन्हीं के नाम का मूर्तिकरण करके, उनको उपासना का केन्द्र बनाकर, उनको सजाकर-बिठाकर एक ऐसा सिलसिला खड़ा कर दिया गया है जिसके खिलाफ कबीर हमेशा रहे।
कुछ ऐसा ही हाल गांधी का किया गया, और गांधी के नाम पर पलने वाले, गांधी के नाम की खाने वाले कांग्रेसियों ने भ्रष्टाचार के नए रिकॉर्ड कायम किए, गांधी की सादगी को घूरे पर फेंक दिया, और गांधी के नामलेवा भी बने रहे। गांधी से सबसे दूर जाने वाले ऐसे कांग्रेसियों ने गांधी की प्रतिमाएं तो खूब बनवा दीं, लेकिन गांधी की इज्जत घटा दी। जिन लोगों ने गांधी के काम को नहीं जाना है, और जो लोग ऐसी ही गांधी-संतानों को देखकर गांधी के बारे में अंदाज लगाते हैं, उनकी नजर में गांधी की इज्जत जरूरत से बहुत कम रह गई है। लेकिन गांधी के साथ यह ज्यादती महज कांग्रेसियों ने नहीं की है, उन लोगों ने भी की है जो कि गांधी के हत्यारों के हमकदम रहे, हमख्याल रहे, और हमदर्द रहे। उन लोगों ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए अपनी दीवारों पर गांधी को टांग लिया, गांधी का नाम लिया, और इससे जितना फायदा पा सकते थे, उतना फायदा पा लिया, पा रहे हैं।
कुछ ऐसा ही भगत सिंह के साथ किया गया, उसकी शहादत, उसकी बहादुरी, उसकी समझ, और उसकी इंसानियत इन सबको कुचलकर उसके ऊपर उसकी प्रतिमाएं जगह-जगह खड़ी कर दी गईं, और भगत सिंह की बातों को सोच-समझकर साजिश के तहत खत्म करने की कोशिश की गई। भगत सिंह ने अपने आपको जिंदगी भर एक नास्तिक कहा, एक नास्तिक की जिंदगी जीते रहे, और जमकर लिखा कि वे नास्तिक क्यों हैं। लेकिन आज उनकी प्रतिमा पर अंग्रेजी टोपी लगे, या कि सिक्ख पगड़ी लगे, इसे लेकर शास्त्रार्थ चलता है, बहस होती है, और उन लोगों के बीच होती है, जिनको भगत सिंह के सिद्धांतों और उनके मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी तरफ यह भी होता है कि जिस शहर में मैं रहता हूं, वहां पर जब भगत सिंह की याद में जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर कोई सार्वजनिक कार्यक्रम होता है तो सड़क किनारे या चौराहे पर होते हुए कार्यक्रम में भी अधिकतर लोग सिक्ख ही रहते हैं, बाकी लोगों को मानो हिन्दुस्तान की आजादी अब तक मिली नहीं है, और उन्हें भगत सिंह की शहादत से कोई फायदा हुआ नहीं है। जो राजनीतिक दल भगत सिंह के घोषित वामपंथ के ठीक खिलाफ हैं, वे राजनीतिक दल भी भगत सिंह की शोहरत को दुहने में जुट गए, और अब तो साम्प्रदायिक ताकतें भी मानो भगत सिंह की सबसे बड़ी भक्त हो गई हैं।
कुछ ऐसा ही अंबेडकर के साथ हो रहा है जिनकी याद में महाराष्ट्र के विदर्भ में हर गांव, हर मुहल्ले में अंबेडकर की प्रतिमाएं दिखती हैं, और कई जगह तो उनके मंदिर भी दिखते हैं। मंदिरों की जिस सोच के खिलाफ अंबेडकर ने हिन्दू समाज के भीतर बगावत की, उन्हीं मंदिरों के ढांचे बनाकर अंबेडकर को बिठा दिया जा रहा है, उनकी प्रतिमाओं को बनाकर मानो इस बात को काफी मान लिया जा रहा है कि अंबेडकर के संघर्ष का पूरा सम्मान हो गया। और अब रही-सही कसर पूरी करने के लिए उनकी प्रतिमाओं को दूध से धोया जा रहा है, और हो सकता है कि अधिक वक्त न लगे कि आसपास तुलसी और गंगाजल का इस्तेमाल भी होने लगे।
जिन लोगों को शिर्डी के सांई बाबा की जिंदगी की थोड़ी जानकारी, वे भी जानते हैं कि सांई बाबा हिन्दू थे या मुस्लिम थे यह भी किसी को नहीं पता था, और वे जिंदगी भर किसी पेड़ के नीचे या किसी सार्वजनिक जगह पर पड़े रहे। लेकिन आज शिर्डी में उनके साथ यह हुआ कि उनकी प्रतिमा से लेकर वहां की उपासना तक, इन सबका इस कदर हिन्दूकरण कर दिया गया है कि वहां पहुंचकर किसी दूसरे धर्म के लोगों को असुविधा लगने लगे। और न सिर्फ शिर्डी में, देश भर में भी जगह-जगह उनके मंदिर बनाए गए, जो अपने आपमें एक हिन्दू प्रतीक हैं, भीतर उनकी प्रतिमा बनाई गई, जो कि जाहिर तौर पर इस्लाम के तहत बुतपरस्ती में आती है, और भीतर आरती, माला, दिया, और इस तरह के दूसरे हिन्दू प्रतीकों से उन्हें घेर दिया गया। हिन्दू और मुस्लिम एकता का एक बड़ा प्रतीक धीरे-धीरे एक भगवाकरण का कैदी होते चले गया, और हो सकता है कि कुछ अरसे बाद मुस्लिमों को यह लगने लगे कि सांई बाबा तो हिन्दुओं के ही थे।
आज जरा देर के लिए यह सोचें कि अगर कबीर, गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर, या कि सांई बाबा कहीं पर होंगे, और वे उनकी आज इस्तेमाल हो रही स्मृतियों के बारे में सोचेंगे, तो हक्का-बक्का रह जाएंगे कि वे कहां फंस गए हैं। इनमें से हर कोई अपने आज के भक्तों के घेरे से निकलकर भागने को उतारू दिखेंगे, और शायद यह अफसोस भी करने लगेंगे कि वे हुए ही क्यों?

आज मुस्लिम महिला का दिन आ गया दिखता है...

संपादकीय
17 अप्रैल 2017


देश में आज अचानक मुस्लिमों के तीन तलाक का मामला बहुत जोर पकड़ता दिख रहा है। उत्तरप्रदेश में, जहां कि देश की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, वहां पर भाजपा को जितनी बड़ी जीत मिली है उसे देखते हुए भाजपा बहुत उत्साह में है, और चुनाव के पहले उसने मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की बेइंसाफी से बचाने के लिए जो चुनावी वायदा किया था, अब उसे पूरा करने में उसके ऊपर किसी वायदाखिलाफी की बात भी नहीं आ सकती, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि इस चुनाव में भाजपा को मुस्लिम-बहुल इलाकों से भी जो अभूतपूर्व और अप्रत्याशित बहुमत मिला है, वह मुस्लिम महिलाओं का है। हम इस बात पर कोई भरोसा नहीं करते कि उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत ईवीएम की दिलवाई हुई है, क्योंकि अगर ऐसा मुमकिन होता तो भाजपा बाकी राज्यों में अपने मुख्यमंत्री क्यों खोती, पंजाब में अपनी ऐसी दुर्गति क्यों करवाती? इसलिए मोदी के विरोधियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि कौन सी बातों ने भाजपा को इतना जनमत दिलाया है।
हमारा मानना है कि मुस्लिम समाज को एक वोट बैंक मानकर चलना एक घिसीपिटी सोच है जो कि सच नहीं है। और खासकर तब जब मुस्लिम महिला के हक का मामला, और मुस्लिम आदमी की धाक का मामला आमने-सामने हो। इस देश में मुस्लिम महिला को उसका पति तीन बार तलाक कहकर छोड़ सकता है, और मुस्लिम समाज के जो धार्मिक ठेकेदार हैं, वे अपने लोगों, खासकर अपने मर्दों की इस तानाशाही को घटाने को तैयार नहीं हैं, और इक्कीसवीं सदी में आकर भी वे गुफा की तरह जीना चाहते हैं। ऐसे में जब भाजपा से मुस्लिम महिलाओं को यह उम्मीद दिखी कि वह ऐसे अमानवीय तलाक से उसे आजादी दिला सकती है, तो उन्होंने भाजपा को वोट दिया। बाकी राज्यों में मुस्लिम आबादी इतनी बड़ी नहीं थी कि वहां भाजपा को इसका कोई फायदा मिलता।
आज बाकी पार्टियों को भी यह समझने की जरूरत है कि कोई पहल अगर हिन्दुत्व वाली भाजपा कर रही है, तो उसका मतलब यह नहीं कि बाकी पार्टियां उसका विरोध करने लगें। अगर कोई मुद्दा सही है, तो आज भाजपा की तरह बाकी पार्टियों को भी खुलकर सामने आना पड़ेगा, और मुस्लिम महिला का साथ देना पड़ेगा। इस बात का कोई न्यायसंगत तर्क नहीं हो सकता कि मुस्लिम मर्द अपनी पत्नियों को अमानवीय हालत में रखते रहें, और अल्पसंख्यक नाराज न हों, इसलिए बाकी पार्टियां चुप बैठी रहें। वामपंथी हों या कांग्रेसी, उन्हें यह भी समझना होगा कि अल्पसंख्यक तो मुस्लिम महिला भी है, और वह मुस्लिम आबादी का आधा हिस्सा भी है, अगर उसे अपने साथ सदियों से चले आ रहे जुल्म से छुटकारा पाने का एक रास्ता दिखेगा तो वह उस तरफ जाएगी ही जाएगी।
कांग्रेस का पुराना इतिहास बहुत ही खराब रहा है, और विदेश में पढ़े हुए, पायलट रहे हुए, एक नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जिस तरह अपने ऐतिहासिक संसदीय-बाहुबल से एक अकेली शाहबानो का गला घोंट दिया था, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में संविधान संशोधन करवा दिया था, आज दिन उसका ठीक उल्टा दिख रहा है। आज अपने ऐतिहासिक बहुमत, और हैरान करने वाली लोकप्रियता के बीच नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी अगर तीन तलाक जैसी दकियानूसी बात से मुस्लिम महिला को आजाद कर सकते हैं, तो देश की महिलाएं, न सिर्फ मुस्लिम महिलाएं, बल्कि बाकी महिलाएं भी उनके साथ रहेंगी, और लोग आज इस साफगोई को पसंद कर रहे हैं कि जो कहा सो किया। आज बाकी राजनीतिक दलों को और सामाजिक संगठनों को मुस्लिम महिला का साथ देते हुए खुलकर सामने आना चाहिए। आज मुस्लिम महिला का दिन आ गया दिखता है। 

आतंक की फंडिंग और पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वालों का धर्म

संपादकीय
16 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कल कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनके बारे में पुलिस ने कहा कि ये लोग कश्मीर के आतंकियों के लिए आने वाली पैसों के खाते सम्हालते थे, और इनके खातों में बाहर से बड़ी रकम आती थी, और ये लोग उन्हें आतंकियों तक पहुंचाने का काम करते थे। पुलिस ने यह बात गिरफ्तार लोगों के बयानों की बुनियाद पर कही है, और बैंकों के खातों की जानकारी भी निकाल ली है। पुलिस का यह भी कहना है कि छत्तीसगढ़ के ही कुछ और लोग इसी आतंक-फंडिंग के जुर्म में फरार हैं, और उनकी तलाश की जा रही है। कश्मीर में ये लोग आतंकियों तक पैसा पहुंचाने के लिए जिन लोगों तक रकम पहुंचाते थे, उनमें से दो लोगों के नाम सामने आए हैं, और हैरान करने वाली बात यह है कि ये सारे के सारे नाम हिन्दू नाम हैं, और इनके बारे में पुलिस ने बताया है कि ये लोग पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी का काम करते थे।
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही मध्यप्रदेश की पुलिस ने वहां के एक भाजपा पदाधिकारी सहित कुछ दूसरे लोगों को गिरफ्तार किया कि वे लोग पाकिस्तान की आईएसआई के लिए जासूसी कर रहे थे। इसमें भाजपा का जो पदाधिकारी पकड़ाया था, उसकी तस्वीरें भी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के साथ उसके फेसबुक पेज पर सजी हुई थीं। इन दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है, और ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि यहां की पुलिस हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए उन पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने और आतंकियों तक पैसे पहुंचाने का झूठा आरोप लगाकर उनके खिलाफ झूठे केस बनाएगी। और ये सारे नाम हैरान करने वाले भी हैं, क्योंकि अगर ये नाम मुस्लिमों के होते तो उन्हें गद्दार कहते हुए उन्हें फांसी देने, चौराहों पर पत्थरों से मारने, और पाकिस्तान भेज देने जैसी मांग उठने लगती। अब चूंकि भाजपा की पुलिस ने ही इन्हें गिरफ्तार किया है, इसलिए ऐसे हिन्दुओं के खिलाफ पाकिस्तानपरस्त होने की बात भी नहीं उठ रही है।
लोगों को यह समझना चाहिए कि धार्मिक कट्टरता और आतंक के लोग किसी मजहब से जुड़े हो सकते हैं, किसी धर्म से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि वे उस आतंक के पैसों के हाथ बिके हुए हों जो कि किसी दूसरे धर्म का है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के ये मामले इसी बात का सुबूत हैं, और इन दोनों ही राज्यों में इतने लंबे समय से भाजपा की सरकारें चली आ रही हैं कि ऐसे हिन्दुओं के खिलाफ कोई झूठे सुबूत गढऩे का वक्त भी इन बरसों में किसी को नहीं मिला होगा, न ही किसी को सूझा होगा, और न ही इन सुबूतों में कोई कमी दिख रही। इस बात पर चर्चा आज इसलिए जरूरी है कि सोशल मीडिया सहित भारतीय राजनीति में बहुत से लोग लगातार एक सवाल उठाते हैं कि जहां कहीं आतंकी हमला होता है, वहां पर उसमें कोई मुस्लिम शामिल क्यों पाया जाता है। हमारे इन दो राज्यों से परे भी देश में जगह-जगह भाजपा की सरकारों वाले राज्यों में ऐसे अनगिनत हिन्दू गिरफ्तार हुए हैं जो कि तरह-तरह के आतंक में लगे हुए थे। कर्नाटक में जब भाजपा की सरकार थी, वहां पर पाकिस्तान के झंडे फहराकर साम्प्रदायिक दंगा करवाने की कोशिश में कुछ हिन्दुओं को, और हिन्दू संगठनों के सक्रिय लोगों को भाजपा की ही पुलिस ने गिरफ्तार किया था जिन पर अभी मुकदमा चल ही रहा है। अभी-अभी राजस्थान का एक फैसला आया है जिसमें अजमेर दरगाह पर बम विस्फोट करने के जुर्म में कुछ लोगों को सजा हुई है, और ये तमाम हिन्दू लोग निकले हैं, और अदालत के बाहर की जो तस्वीरें आई हैं उनमें वे भगवा पहने हुए भी दिख रहे हैं, माथे पर तिलक लगाए हुए भी दिख रहे हैं।
इसलिए विविधताओं से भरे हुए इस देश में किसी धर्म या किसी जाति, किसी क्षेत्र या किसी भाषा के लोगों को किसी पूर्वाग्रह के साथ देखना और दिखाना ठीक नहीं है। और यह भी समझने की जरूरत है कि लगातार हिन्दू संगठनों में सक्रिय रहने वाले लोग भी मुस्लिम आतंकी संगठनों, मुस्लिम देश की आईएसआई जैसी खुफिया एजेंसी के हाथों कैसे बिक जाते हैं, और यह भी समझने की जरूरत है कि इनमें से कोई भी भूख से मरते हुए हिन्दू नहीं थे कि जिनके सामने जिंदा रहने के लिए जासूसी करना या आतंक का साथ देना जरूरी रहा हो। इसी सिलसिले में एक आखिरी बात यह कि जो लोग सोशल मीडिया पर हिंसक बातों को करने के लिए रात-दिन सक्रिय रहते हैं, वे लोग अपने धर्म के लोगों की गिरफ्तारी के बाद जुबान क्यों सिल लेते हैं?

स्मृति अवकाशों की समाप्ति की योगी की राय सही

संपादकीय
15 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंबेडकर जयंती के एक समारोह में कहा कि महान लोगों के जन्मदिन पर स्कूलों में होने वाली छुट्टियों को खत्म करना चाहिए क्योंकि ऐसी छुट्टियां इतनी बढ़ती जा रही हैं कि साल में कुल सवा सौ दिन पढ़ाई हो पाती है, जबकि सरकारी लक्ष्य सवा दो सौ दिनों का है। योगी की और कई बातों से असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन यह एक बात उन्होंने पते की की है जिससे स्कूलों की हालत सुधर भी सकती है। आज तो गुजर चुके महान लोगों का सम्मान करने के नाम पर कहीं चबूतरों पर उनकी प्रतिमाएं खड़ी कर दी जाती हैं, जिनमें जनता का पैसा लगता है, तो कहीं पर उनके जन्मदिन पर या पुण्यतिथि पर स्कूल-कॉलेज बंद रहते हैं, और कुछ तारीखें ऐसी भी रहती हैं जिनमें सरकारी दफ्तर भी बंद रहते हैं। यह सिलसिला खत्म करना बहुत जरूरी इसलिए है कि ऐसे दिनों पर छुट्टी से इन महान लोगों के सम्मान बढऩे का, या कि उन्हें याद करने का कोई काम नहीं होता बल्कि लोग ऐसे तमाम काम करने लगते हैं जो उजागर हो जाएं तो महान लोगों का अपमान होने लगे। फिर स्कूल और कॉलेज को धार्मिक, राजनीतिक, और जातिगत वजहों से शुरू की गई ऐसी छुट्टियों से आजाद रखना चाहिए, और ऐसी बातों को उनकी किताबों से भी बाहर रखना चाहिए। ऐसा न होने पर सत्ता में आई राजनीतिक पार्टी अपनी मर्जी से पढ़ाई के दिन घटाती जाएगी, और किताबों को ऐसे पाठों से लादती जाएगी।
दरअसल भारत में स्कूली पढ़ाई को, स्कूलों को, और स्कूली किताबों को तय करने का काम शिक्षा के जानकार लोगों के बजाय सत्तारूढ़ नेता और सत्ता चला रहे अफसर करते हैं। न तो इनके पास शिक्षा की जरूरतों की समझ होती, और न ही बाल मनोविज्ञान की कोई जानकारी होती। ऐसे में आए दिन यह भी देखने मिलता है कि कोई भी अफसर अपनी मर्जी से स्कूली बच्चों के जुलूस निकालकर उन्हें जानवरों के रेवड़ की तरह हांकने का काम करने लगते हैं, किसी भी मंत्री-मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में स्कूलों से निकालकर बच्चों को झोंक दिया जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में प्रौढ़ साक्षरता का इम्तिहान चल रहा था, और परीक्षा दे रही महिलाओं को वहां से निकालकर किसी मंत्री के कार्यक्रम में भेज दिया गया था।
किसी भी महान व्यक्ति की स्मृति में उनके जन्मदिन या उनकी पुण्यतिथि पर स्कूल-कॉलेज में बच्चों के बीच दस-पन्द्रह मिनट का कोई भाषण हो सकता है जिससे कि उन्हें जानकारी मिल जाए। छुट्टी से न किसी की जानकारी में कोई इजाफा होता, और न ही कोई सम्मान बढ़ता। सम्मान करने के नाम पर उत्पादकता को खत्म करने का सिलसिला पूरी तरह गलत है। और हम इस बात को पढ़ाई को बढ़ाने के लिए नहीं कह रहे, स्कूलों में पढ़ाई कितनी हो, खेलकूद कितना हो, और बाकी काम कितने हों, इसे तय करना विशेषज्ञों का जिम्मा होना चाहिए। हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि स्कूलों में जाने के दिन बढऩे चाहिए, और स्मृति-अवकाश का सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए। इस देश में स्थानीय परंपराओं के मुताबिक त्यौहार, और स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस जैसे दो मौके काफी हैं, इनसे परे की छुट्टियां खत्म होनी चाहिए।

दुनिया के सबसे बड़े वर्दीधारी गुंडे ने गिराया सबसे बड़ा बम

संपादकीय
14 अप्रैल 2017


कल रात अफगानिस्तान-पाकिस्तान सरहद पर अफगानिस्तान की जमीन पर आईएस के अड्डे पर अमरीका ने एक बड़ा बम गिराया जिसे वह दुनिया के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा गैरपरमाणु बम कह रहा है। करीब दस हजार किलो वजन का यह बम अमरीकी फौज ने पहली बार इस्तेमाल किया है, और युद्धोन्मादी, नफरतजीवी अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने अपनी फौज को खुली छूट दी है कि वे दुनिया में अलग-अलग जगहों पर तैनात अमरीकी फौज की कार्रवाई खुद तय करें। इस बम ने दुनिया को हैरान इसलिए किया है कि ट्रंप या अमरीका ने पिछले कई महीनों में अफगानिस्तान में आईएस की ऐसी मौजूदगी की कोई बात नहीं कही थी कि उसकी वजह से अफगान गांवों के इस इलाके में ऐसी बड़ी कार्रवाई की जाए। अभी इस बम को चौबीस घंटे भी नहीं हुए हैं, और वहां की जमीनी हालत अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन ट्रंप के रूख से यह समझ पड़ता है कि इतना हमलावर कोई दूसरा अमरीकी राष्ट्रपति आज तक आया नहीं होगा। अभी चार दिन ही हुए हैं जब चीनी राष्ट्रपति से बात करते हुए, केक खाते हुए ट्रंप ने सीरिया पर पांच दर्जन बड़े मिसाइल गिराए थे, और यह दावा था कि सीरिया अपने लोगों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी तरफ सीरिया के राष्ट्रपति असद ने खुलकर कहा है कि ऐसे किसी रासायनिक हथियार के बारे में सीरिया को मालूम भी नहीं है और शायद यह गढ़े हुए सुबूतों के आधार पर किया गया अमरीकी हमला है। लोगों को याद होगा कि अमरीका ने जब इराक पर हमला किया था, तब भी राष्ट्रपति बुश ने यह झूठा दावा किया था कि उसके पास इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि इराक के पास व्यापक जनसंहार के हथियार हैं, और बाद में इराक को तबाह करके भी ऐसा कोई सुबूत न अमरीका को मिला, न दुनिया के सामने आया, और अमरीकी दावा झूठा साबित हुआ।
दूसरी बात यह कि दुनिया से अगर अलकायदा या आईएस जैसे धर्मान्ध और कट्टर आतंकियों को खत्म करना है, तो उसके लिए साथ में बेकसूरों को मारने की एक सीमा होनी चाहिए। सीरिया में जिस जगह मिसाइलें गिराई गईं, वहां पर कितने लोगों की मौत हुई यह अभी सामने भी नहीं आया है, दूसरी तरफ अफगानिस्तान में जहां यह बम गिराया गया है, वहां अमरीकी फौजों की पहुंच थी, और उसके बावजूद इतनी व्यापक तबाही करने वाले बम को गिराने की कौन सी मिलिट्री मजबूरी थी, यह भी साफ नहीं है। लोगों का मानना है कि जब खुद अमरीका कह रहा है कि सात-आठ सौ लोग ही आईएस में रह गए हैं, तब उनमें से कुछ दर्जन लोगों को मारने के लिए इतनी तबाही वाले बम को गिराना एक अंतरराष्ट्रीय गैरजिम्मेदारी की बात है। किसी भी कार्रवाई के अनुपात का भी न्यायोचित होना जरूरी रहता है, और अमरीका हमेशा से पूरी दुनिया पर ऐसे मनचाहे और अनचाहे हमले करते आया है जो कि नाजायज अधिक रहे हैं, गैरजरूरी अधिक रहे हैं, बदनीयत अधिक रहे हैं।
हिन्दुस्तान के एक जासूसी उपन्यास के नाम की तरह आज अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा वर्दीधारी गुंडा हो गया है। फिर ऐसे हमलावर देश में आज ट्रंप नाम का एक ऐसा राष्ट्रपति आ गया है जो कि दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ धकेल रहा है। अफगानिस्तान आज इस हालत में भी नहीं है कि वह अमरीकी फौजी कार्रवाई का कोई विरोध करे, और अभी तो यह भी साफ नहीं है कि वह इसके खिलाफ है या नहीं। दूसरी तरफ कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि अफगानिस्तान के एक कम बसाहट के इस कथित आतंकी-ठिकाने पर अमरीकी बमबारी का एक दूसरा मकसद है कि वह उत्तरी कोरिया के तानाशाह की परमाणु युद्ध की हसरतों को एक चेतावनी देना चाहता है। उसने अपने जंगी जहाज उत्तर कोरिया के आसपास तैनात कर दिए हैं, और जिस तरह उसने अपने जहाज से सीरिया पर मिसाइलें गिराई थीं, अपनी वायुसेना से अफगानिस्तान पर बम गिराया है, हो सकता है कि यह उत्तर कोरिया को एक चेतावनी हो। फिलहाल पाकिस्तान को भी इसे एक चेतावनी मानना चाहिए क्योंकि अफगानिस्तान के बहुत से लोगों ने कहा है कि यह बम तो पाकिस्तान पर गिराना चाहिए था जहां से आईएस आतंकी अफगानिस्तान भेजे जा रहे हैं।

संसद में संस्कृति मंत्री का सीता पर बयान महत्वपूर्ण

संपादकीय
13 अप्रैल 2017


संसद में मोदी सरकार के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने भाजपा के ही एक सदस्य के सवाल के जवाब में कहा कि बिहार की सीतामढ़ी में सीता की जन्मस्थली का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने कि सीता की जन्मस्थली आस्था का विषय है जो प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करता। इस मुद्दे पर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सहित बहुत से सांसद चढ़ बैठे और मंत्री से माफी की मांग की।
भाजपा के सदस्य और मोदी सरकार के मंत्री का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है कि देश के कई हिस्सों में आस्था और प्रमाण का झगड़ा चल रहा है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा लगातार अयोध्या में राम जन्मभूमि का मुद्दा उठाते आई है, और अयोध्या से दूर, रामकथा की लंका में भी जाने के रास्ते पर रामसेतु का विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। राम जन्मभूमि का मुद्दा हिन्दू और मुस्लिम, दो समुदायों के बीच उस जमीन पर हक की लड़ाई है जो कि हिन्दुओं के मुताबिक राम जन्मभूमि है, और मुस्लिमों के मुताबिक बाबरी मस्जिद। लेकिन रामसेतु का मामला भारत सरकार और हिन्दू संगठनों के बीच की कानूनी लड़ाई है, जिसमें भारत से श्रीलंका के बीच के समंदर के पानी के नीचे डूबे हुए एक ढांचे को हिन्दू संगठन राम की सेना का बनाया हुआ पुल बताते हैं, और भारत सरकार ने उसे एक प्राकृतिक ढांचा बताया था। अब मोदी सरकार के आने के बाद हो सकता है सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रूख कुछ बदला हो।
विपक्ष में रहते हुए भाजपा का रूख राम जन्मभूमि पर जो था, अब सरकार में आने के बाद वह रूख चुप बैठा हुआ है, और सीता जन्मभूमि को लेकर सरकार का जवाब यह साफ करता है कि जब प्रमाण की बात आती है, तो आस्थाओं के कोई प्रमाण नहीं होते हैं। संसद से लेकर अदालत तक केन्द्र सरकार का यह रूख जगह-जगह काम आएगा, इस्तेमाल किया जाएगा, हालांकि मंत्री ने यह साफ किया है कि आस्था प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करती। लोकतंत्र में कई बार यह देखने में आता है कि विपक्ष में रहते हुए किसी पार्टी का जो भी रूख रहता हो, सत्ता में आने के बाद सत्ता की जिम्मेदारियां कुछ फेरबदल जरूर ला देती हैं। अब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही देखें, उन्होंने सरकार सम्हालने के बाद से गैरजिम्मेदारी की वैसी कोई बातें नहीं कही हैं जो कि बरसों से उनकी पहचान बनी हुई थीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखें तो सत्ता में आने के पहले तक वे लगातार दिन में कई बार चुनावी सभाओं में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भारत में बिरयानी खिलाने को लेकर हमला करते थे, और एक-एक हिन्दुस्तानी सैनिक की मौत पर दर्जन भर पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटकर लाने का दावा करते थे। लेकिन सत्ता में उन्हें सियासती हकीकत सिखाई, और वे खुद बिना बुलाए जाकर नवाज शरीफ के घर पर सालगिरह और शादी की मिठाई खाकर आ गए।
हम रूख के ऐसे बदलाव को लेकर ताना कसने के खिलाफ हैं, और हम पुराने बयानों की याद दिलाकर यह उलाहना भी देना नहीं चाहते कि उस वक्त के वायदे के मुताबिक अब हिंसा क्यों नहीं की जाती, अब हमला क्यों नहीं किया जाता। सोच में ऐसा फर्क कोई बुरी बात नहीं है, अगर यह लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते, और इंसाफ के भले के लिए हो। हमारा ख्याल है कि संसद में संस्कृति मंत्री का आस्था और प्रमाण को लेकर दिया गया बयान अदालत में भी उन लोगों के काम आएगा जिन पर आस्था के नाम पर अब तक हमले होते रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि लोकतंत्र में कभी भी आस्था प्रमाणों पर हावी नहीं हो सकती, और आस्था को उन प्रमाणों का विकल्प नहीं माना जा सकता जो कि मौजूद नहीं है। राम जन्मभूमि एक ऐसा ही विवाद है, और इसे भी ऐसी ही सोच के साथ निपटाने की जरूरत है। संस्कृति मंत्री के बयान के दो तरह के मतलब निकाले जा सकते हैं, और हम इसमें से वह मतलब निकाल रहे हैं जो कि लोकतंत्र और न्याय के पक्ष में जाता है।

भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच मौत की एक सजा का तनाव और

संपादकीय
12 अप्रैल 2017


भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर एक बड़ा तनाव खड़ा हो गया है, वहां पर गिरफ्तार किए गए भारत के एक रिटायर्ड नौसेना अफसर को भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के लिए पाकिस्तान में जासूसी करने के आरोप में वहां की एक फौजी अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। पाकिस्तान का कहना है कि कुलभूषण नाम का यह भारतीय वहां पर जासूसी कर रहा था, और पिछले बरसों में कुलभूषण के कुछ ऐसे वीडियो भी पाकिस्तान में जारी किए थे जिसमें वह इस काम का जुर्म मानते हुए दिखाई देता है।
भारत की संसद इस मुद्दे को लेकर उबल पड़ी है, और सत्ता पक्ष और विपक्ष में इस पर एकता का हाल यह है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कांग्रेस पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के बड़े जानकार शशि थरूर से भारत के विरोध-प्रस्ताव को तैयार करने का अनुरोध किया है। भारत के किसी व्यक्ति को पाकिस्तान में मौत की सजा हो, तो भारत के लोगों का उबलना स्वाभाविक है। लेकिन क्या यह उबलना जायज भी है, इस बारे में सोचने की जरूरत है। भारत का कहना है कि पिछले बरसों में पाकिस्तान में मौजूद उसके राजनयिकों ने एक दर्जन से अधिक बार वहां की सरकार से यह अपील की थी कि भारत के इस नागरिक से उन्हें जेल में मिलने का मौका दिया जाए, लेकिन एक बार भी उन्हें यह मौका नहीं मिला। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों के तहत शायद पाकिस्तान की यह मनाही जायज नहीं थी, और भारत अपने एक नागरिक की मदद नहीं कर सका। दूसरी तरफ अब भारत का यह कहना है कि पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए गए कुलभूषण पर वहां मुकदमा एक फौजी अदालत में चलाया गया, और उस पर फौज का कोई आरोप नहीं था, और यह अदालती कार्रवाई जायज नहीं थी। भारत ने यह भी कहा है कि वह लीक से हटकर भी कार्रवाई करेगा ताकि अपने इस नागरिक को बचा सके। पाकिस्तान का यह कहना है कि कुलभूषण के पास अभी वहां की ऊंची अदालत में अपील करने के लिए छह महीने का समय है, और उसे इस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच लोगों पर कार्रवाई इस बात पर टिकी रहती है कि दोनों सरकारों के बीच संबंध कैसे हैं? अगर संबंध अच्छे रहते हैं तो गलती से सरहद पार करके आ गए बच्चे या बड़े भी वापिस पहुंचा दिए जाते हैं, या कि एक-दूसरे की समुद्री सरहद में पकड़ाए गए मछुआरे लौटा दिए जाते हैं। लेकिन जब सरकारों में तनातनी चलती रहती है, तो न तो क्रिकेट हो पाती है, न फिल्में रिलीज हो पाती हैं, और न ही एक-दूसरे देश में जाकर फिल्मी कलाकार काम कर पाते हैं। आम नागरिकों को भी तीर्थयात्रा के लिए, या कि रिश्तेदारी में आने-जाने के लिए मौका नहीं मिलता है, क्योंकि दोनों ही देश वीजा देने के मामले में तंगदिली दिखाने लगते हैं। और अभी कुल पौन सदी पहले तक तो दोनों ही देश एक थे, और दोनों के बीच रिश्तेदारी से लेकर कारोबार तक, और खेल से लेकर कला तक, इस तरह के जटिल अंतरसंबंध बने हुए हैं कि सरकारों के बीच की सारी तनातनी के बावजूद वे कायम रहते हैं।
हमारा ख्याल है कि कुलभूषण के मामले को अलग-थलग करके देखना मुमकिन नहीं होगा, और दोनों देशों की सरकारों को तनाव कम भी करने होंगे। जब आपस में टकराव अधिक रहता है, तो उसका नतीजा सरहद के दोनों तरफ की जमीन पर भी दिखता है। पिछली चौथाई सदी में सबसे कम मतदान भारत के कश्मीर में अभी इसी हफ्ते दिखाई पड़ा है। कश्मीर में तनाव का सीधा रिश्ता भारत और पाकिस्तान के तनाव से रहता है, और सरहद के इस राज्य की हकीकत को अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज भारत और पाकिस्तान दोनों को यह भी समझना चाहिए कि दुनिया की दो बड़ी फौजी ताकतें, अमरीका और चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच दखल देकर, और दोनों तरफ अलग-अलग भी अपनी ताकत बढ़ाने में लगी हुई हैं, इससे इन दोनों देशों के बीच आपसी मतभेदों को आपस में निपटाने की चली आ रही लंबी और पुरानी सहमति भी खत्म होने का एक खतरा है, और दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ अंधाधुंध फौजी खर्च भी कर रहे हैं। अगर रिश्ते ठीक रहें तो यह खर्च घटेगा, और कारोबार से दोनों ही देशों की कमाई भी बढ़ेगी। यह एक मौका आया है जब दोनों देशों को तनाव घटाने की एक और कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि जनता के हित में शांति के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।

आधी प्लेट में भरता पूरा पेट और बाजार दुगुना बेचता हुआ

संपादकीय
11 अप्रैल 2017


भारत सरकार एक कानून बनाकर देश के रेस्त्रां में खाने की प्लेट को छोटा भी करने की सोच रही है। आज आमतौर पर होटल-रेस्त्रां में दो अलग-अलग आकार की प्लेट में खाना नहीं बेचा जाता, और लोगों को मजबूरी में अधिक खाना बुलवाकर उसे जूठा छोडऩा पड़ता है। कई बार यह भी होता है कि पैसे तो खर्च हो ही चुके हैं इसलिए टेबिल पर आ गए खाने को खत्म करने की इच्छा भी रहती है, और लोग जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। खाना या तो प्लेट में खराब होता है, या पेट में। ये दोनों ही नौबत बहुत खराब है और अमरीका जैसे पूंजीवादी देश की बाजार व्यवस्था का यह असर है कि लोगों को न छोटी बोतल बेची जाए, और न ही खाने के सामान की छोटी पैकिंग या छोटी सर्विंग बेची जाए।
आज भी देश में मध्यम दर्जे के कई ऐसे रेस्त्रां रहते हैं जो कि आधी प्लेट के हिसाब से भी खाने के सामान सर्व करते हैं। इंडियन कॉफी हाऊस जैसे कई जिम्मेदार संस्थान हैं जो कि एक इडली, या एक वड़ा, या कि आधा प्लेट चावल भी देते हैं, और न लोगों का पैसा बर्बाद होता, और न ही उनका पेट बर्बाद होता। देश में इतनी भुखमरी है कि यहां पर खाने की बर्बादी एक जुर्म से कम नहीं है, और ऐसे में भारत अगर एक कानून बनाकर कारोबार को मजबूर करता है कि वे आधे प्लेट में भी सामान बेचें, तो यह एक बेहतर इंतजाम होगा।
अमरीका में हर चीज खूब बड़े आकार की बेची जाती है, और उसका नतीजा यह है कि अमरीकियों का खुद का आकार बहुत बड़ा हो चला है, और भयानक मोटापे के शिकार होकर वे तरह-तरह की बीमारियों से घिर भी रहे हैं। यह अमरीका में एक बहुत फिक्र की बात तो हो गई है, लेकिन वहां का बाजार चीजों को बड़ी-बड़ी पैकिंग में बेचना, बड़ी-बड़ी बोतल और गिलास में सर्व करना बंद नहीं करता है। हिंदुस्तान जैसे देश से जो लोग पहली बार अमरीका जाते हैं, वे रेस्त्रां में जरूरत से दुगुना ऑर्डर कर बैठते हैं, उन्हें यह अंदाज ही नहीं रहता कि एक-एक प्लेट में कितना कुछ आएगा।
दूसरी तरफ भारत सहित दुनिया के कई देश डायबिटीज जैसी बीमारियों को बढ़ते देख रहे हैं, और इसके पीछे खानपान एक बड़ी वजह है। भारत में लोगों को अभी से सावधान करने की जरूरत है वरना पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ बाजार यहां पर खाने में अंधाधुंध मक्खन, घी, नमक, और रसायन परोस रहा है। कोकाकोला किस्म के जो कोल्डड्रिंक भारत के बाजार में हैं, उनकी एक-एक बोतल में इतनी अधिक शक्कर होती है कि उसे अलग से दिखाया जाए तो लोगों की पीने की हिम्मत भी न हो। इसलिए पैकिंग पर यह भी लिखा जाना जरूरी है कि इन सामानों में फैट कितना है, शक्कर कितनी है, और नमक कितना है। अभी भी बहुत छोटे अक्षरों में इसे लिखा जाता है, लेकिन ग्राहक की सेहत के हित में यह होगा कि खानपान की चीजों के सेहतमंद होने के अलग-अलग दर्जे तय किए जाए जैसे कि आज शाकाहारी और मांसाहारी चीजों के हैं। इसके साथ-साथ भारत सरकार को बिना देर किए रेस्त्रांओं पर यह नियम लागू करना चाहिए कि वे हर चीज को आधी प्लेट में भी बेचें।

मीडिया की सुर्खियों में शब्द घटाने कोई अभियुक्त नहीं, सीधे मुजरिम

आजकल
10 अप्रैल 2017
अभी कुछ दिन पहले देश के एक सबसे बड़े अखबार ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पिछले बरस से लापता चल रहे छात्र, नजीब, के बारे में पहले पन्ने पर एक बड़ी सी खबर छापी कि दिल्ली पुलिस ने अपनी जांच में यह पाया है कि नजीब इंटरनेट पर आईएसआईएस में शामिल होने के तरीके ढूंढ रहा था। अब यह बात पुलिस की जांच के बारे में थी इसलिए इसमें किसी अटकलबाजी की गुंजाइश नहीं थी। अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने औपचारिक रूप से कैमरों के सामने इस बात का खंडन किया और कहा कि दिल्ली पुलिस को ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है।
लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि दिल्ली पुलिस उस केन्द्र सरकार के तहत काम करती है जो जेएनयू से एक गहरा और चौड़ा वैचारिक मतभेद रखती है और जेएनयू के बागी तेवरों के छात्रों के लिए, उनकी साख बचाने के लिए, दिल्ली पुलिस पर कोई दबाव नहीं हो सकता था। लेकिन इस बड़े अखबार की इस खबर के चलते जेएनयू के छात्रों के आईएसआईएस से रिश्ते जोडऩे की एक बड़ी कोशिश, और पूरी तरह बेबुनियाद कोशिश हुई थी। इस कोशिश से देश के अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की साख पर भी एक आंच लाई जा रही थी जिसके कुछ लोगों के बारे में देश के कुछ दूसरे तबकों की राय रहती है कि वे गद्दार हैं। लेकिन स्वघोषित राष्ट्रवादियों के ऐसे नारों से परे जब एक बड़ा अखबार ऐसी खबर प्रमुखता के साथ छापता है, तो यह अखबारनवीसी से परे की एक बात हो जाती है। और दिल्ली शहर में सबसे बड़े अखबार को यह सहूलियत तो हमेशा ही रहती है कि वे पुलिस से अपनी ऐसी सनसनीखेज जानकारी पर बात कर ले।
लेकिन अखबारनवीसी और अब उसके और बुरे मीडिया-संस्करण, टीवी चैनलों को देखें तो लगातार यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, और किसी की साख को चौपट करने में पल भर भी नहीं लगता। छत्तीसगढ़ में ही हम रोजाना देखते हैं कि नक्सल आरोपों पर किसी को गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें मीडिया नक्सली लिख देता है। ऐसे लोग निहत्थे रहते हैं, गरीब और आदिवासी रहते हैं, शहरों से दूर जंगलों में बसे रहते हैं, और उनके पास अपनी साख को बचाने के लिए किसी वकील की कोई सहूलियत नहीं होती। ऐसे लोगों को नक्सल-आरोपी या नक्सल संदेह से घिरे लिखने जितनी जहमत भी नहीं उठाई जाती। और यही हाल बलात्कार या हत्या के आरोप से घिरे हुए लोगों का होता है, और किसी अखबार या चैनल की सुर्खी में इस बात की जगह निकालना अब बंद हो गया है कि ये लोग आरोपी हैं, या अभियुक्त हैं, या कटघरे में खड़े हैं।
अभी कश्मीर या किसी और जगह के एक मुस्लिम नौजवान ने आतंक के आरोपों से तेरह बरस बाद बरी होने पर दिल्ली के एक बड़े अंग्रेजी अखबार में उसकी गिरफ्तारी के वक्त की खबरों की कतरनें जारी करते हुए पूछा कि तेरह बरस पहले इस अखबार ने उसे आतंकी करार दे दिया था, और बड़े-बड़े हर्फों में उसे एक बड़ी आतंकी घटना के लिए जिम्मेदारी आतंकी लिखा था। अब वह पूरी तरह से बरी हो चुका है, लेकिन ऐसी खबर की वजह से उसका और उसके परिवार का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।
दरअसल भारत का मीडिया किसी की पगड़ी उछालने के पहले महज यह देखता है कि उसकी ताकत कितने बड़े वकील को रखने की है। एक बार यह समझ आ जाए कि जिसके खिलाफ लिखा जा रहा है, वह मामूली वकील भी नहीं कर सकता, तो मीडिया न केवल उसके खिलाफ मनमर्जी झूठ छापते और दिखाते चलता है, बल्कि वह अदालत और जज बनकर उसे कुसूरवार भी ठहरा देता है। ऐसी मीडिया-ट्रायल के खिलाफ भी पिछले कुछ समय से लगातार बात उठ रही है कि मीडिया का दायरा कहां खत्म होता है, और जिस तरह अदालतों को नसीहत दी जाती है कि वे अपने दायरे से बाहर जाकर काम न करें, क्या अदालतों का दायरा भी तय करने की जरूरत है?
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ अरसा पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से यह जानना चाहा है कि किसी मामले की छानबीन के चलते हुए उसकी कितनी जानकारी मीडिया को दी जानी चाहिए, और कौन सी जानकारियां ऐसी हैं जो जांच अफसर भी उजागर न करें, मीडिया को न बताएं, जांच में घिरे लोगों की इज्जत चौपट न करें।
लेकिन जैसा कि आसपास के माहौल का असर हर किसी पर होता है, भारत के अखबारों पर पहले तो असर टीवी चैनलों का पड़ा जो कि ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में एक-दूसरे से कुछ मिनटों भी आगे रहने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं, और इस चक्कर में वे खबरों को चटपटा और सनसनीखेज बनाकर, आपाधापी में, जल्द से जल्द पेश करने के मुकाबले में रहते हैं। अखबारों ने भी धीरे-धीरे टीवी के इसी अंदाज को अपनाना शुरू कर दिया, और अब अखबार अपने वेबसाइटें भी रखते हैं, और उन पर तो और भी गैरजिम्मेदारी के साथ खबरें डाली जाती हैं।
इसके बाद आया सोशल मीडिया जो कि किसी भी तरह की जिम्मेदारी और जवाबदेही के बिना एक आजाद पंछी सरीखा है और जो जहां चाहे वहां से दाना चुग सकता है, जहां चाहे बैठ सकता है, और जहां चाहे बीट कर सकता है। ऐसे सोशल मीडिया का असर भी टीवी पर पड़ा और अखबारों पर भी पड़ा। नतीजा यह हुआ कि अब अखबार अपनी चूक को जायज और मासूम ठहराने के लिए सोशल मीडिया पर तोहमत जडऩे लगे हैं कि यह खबर तो सोशल मीडिया पर चारों तरफ थी, वॉट्सऐप पर चारों तरफ थी, और इसलिए इसे छाप दिया था। मामला इतना बिगड़ गया है कि एक टीवी चैनल ने तो वायरल सच या वायरल झूठ नाम से एक कार्यक्रम ही रोज सुबह दिखाना शुरू कर दिया है कि सोशल मीडिया पर या संदेशों पर जो बातें तैर रही हैं, उनमें सच क्या हैं, और झूठ क्या हैं?
सोशल मीडिया तो एक बेकाबू औजार है, और यही हाल मोबाइल फोन पर फैलने वाले संदेशों का है जो कि सोशल मीडिया न होते हुए भी थोक में सैकड़ों लोगों को भेजे जाने वाले संदेश रहते हैं, वीडियो रहते हैं, और तस्वीरें रहती हैं। लेकिन परंपरागत मीडिया को इस बारे में फिर से सोचना चाहिए कि क्या किसी संदेही को, किसी आरोपी को, किसी अभियुक्त को मुजरिम करार देने वाली भाषा लिखना जारी रखा जाए, या फिर उन लोगों का भी ख्याल रखा जाए जो कि महंगे वकील खड़े करके मीडिया पर मानहानि के मुकदमे नहीं कर सकते। भारत में न्यायपालिका सौ में से शायद 95 लोगों को बरी कर देती है, और गिने-चुने लोगों को ही सजा मिलती है। ऐसे में किसी का हक नहीं बनता कि वे अभियुक्तों को हत्यारा, बलात्कारी, नक्सली, आतंकी करार देते चलें।

शरणार्थियों से परे भी लोकतंत्र की बातों को समझने की जरूरत

संपादकीय
10 अप्रैल 2017


स्वीडन के प्रधानमंत्री का यह बयान सामने आया है कि वे अपने देश में आकर रह रहे (मुस्लिम) शरणार्थियों को अब तक जिस उदारता के साथ जगह देते आए हैं, ऐसा अब कभी नहीं करेंगे। राजधानी स्टॉकहोम में अभी एक शरणार्थी ने एक ट्रक को हाईजैक कर लिया, और उसे लोगों पर चढ़ा दिया। इसमें कई लोग मारे गए, और देश के भीतर सरकार के खिलाफ बड़ी नाराजगी हुई। योरप के एक-एक करके कई देशों में यह नौबत आ रही है कि जो सरकारें उदारता से शरणार्थियों को जगह दे रही थीं, वे अपने देश के अमन-पसंद लोगों या कि संकीर्णतावादी लोगों की आलोचना की शिकार हो रही हैं। दरअसल इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थी पहुंच रहे हैं कि उनके साथ वहां से आतंकियों के कुछ एजेंट भी अगर आ रहे होंगे तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। और फिर सीरिया या इराक में जो इस्लामी संगठन आतंक का राज कायम रखे हुए हैं, उन लोगों को भी यह बात नहीं जंचती है कि वहां के लोग निकलकर दूसरे देशों में जा बसें, इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर शरणार्थियों के साथ आ गए लोगों में कुछ आतंकी भी हों, और वे योरप के इन देशों में शरणार्थियों के खिलाफ भावना भड़काने के लिए आतंक की ऐसी वारदातें कर रहे हों।
इतनी दूर की इन घटनाओं पर लिखने की हमारी एक वजह यह भी है कि भारत में भी कई देशों के शरणार्थी समय-समय पर आकर बसे हैं, और इनमें से अधिकतर के खिलाफ किसी तरह की कोई नाराजगी नहीं रही है। आजादी के पहले का इतिहास अगर देखें तो ईरान से आए हुए पारसियों ने भी गुजरात से भारत में प्रवेश किया था, और यहां रहने की जगह पाई, कामयाबी पाई, और वे अब किसी भी दूसरे हिन्दुस्तानी से कम नहीं हैं। यहां तिब्बत से आए हुए लोग देश भर में सम्मान के साथ रह रहे हैं, और उनका कहीं भी अपमान नहीं होता है। 1971 की लड़ाई के वक्त बांग्लादेश से लाखों शरणार्थी भारत आए, और उनके साथ किसी तरह का तनाव नहीं हुआ। आज भी असम जैसे राज्य में जिन बांग्लादेशियों के साथ तनाव की खबरें आती हैं, वे शरणार्थी नहीं है, और अवैध तरीके से भारत में आकर बसे हुए लोग हैं, और उन्हें वापिस भेजने की मांग जरूर उठती है। अभी सबसे ताजा मामला म्यांमार से आए हुए मुस्लिम शरणार्थियों का है जिन्हें कि हिन्दू-बहुल जम्मू के इलाके में बसा दिया गया था, और कश्मीर का यह हिस्सा वैसे भी धार्मिक अलगाव से गुजरते आया है, ऐसे में वहां पर म्यांमार के मुस्लिमों को ठहराना समझदारी का फैसला भी नहीं था, और उनका विरोध हुआ।
एक उम्मीद जो तनाव के बीच से निकलकर आए हुए लोगों से नहीं की जा सकती है, वह यह कि जिस देश में जाकर उन्हें रहने को जगह मिल रही है, उस देश के रीति-रिवाज का इतना सम्मान करें कि वे वहां घुलमिल जाएं। जहां-जहां वैसा होता है, वहां-वहां पर बाहर से आए हुए लोगों को दिक्कत नहीं होती है, वरना दूसरे देशों की क्या बात है, भारत के भीतर ही ओडिशा से मारवाडिय़ों को मारकर भगाया गया था। यही बात समाज में नसीहत की तरह ली जानी चाहिए कि जहां रहना है वहां पर स्थानीय परंपराओं, स्थानीय संस्कृति, स्थानीय कानून का सम्मान करना चाहिए। मुस्लिम देशों से योरप पहुंच रहे शरणार्थियों के साथ एक दिक्कत यह भी है कि उनके पहुंचने के पहले भी जो मुस्लिम आबादी इन देशों में है, उनके पहनावे को लेकर, उनकी शादियों के नियम-कानून को लेकर एक सामाजिक तनाव चले ही आ रहा था। एक के बाद एक देश की संसद पहरावे को लेकर मुस्लिम महिला को आजादी देने की कोशिश कर रही है, और कुछ लोग इसे आजादी मान रहे हैं, तो कुछ लोग पहरावे की आजादी को खत्म करना भी मान रहे हैं। ऐसे दोनों नजरियों से परे यह बात साफ है कि संस्कृतियों का टकराव, लोकतंत्र और धार्मिक आस्थाओं का टकराव, स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी, और बाहर से आए हुए लोगों के कामकाज का टकराव, और स्थानीय सरकार के बजट का बाहरी लोगों पर खर्च होने का मुद्दा, इन सबसे दुनिया के बाकी देशों के लोगों को भी सीखने की जरूरत है, क्योंकि जैसे-जैसे दुनिया के देशों में नए टकराव खड़े होंगे, वैसे-वैसे इन मुद्दों पर एक समझदारी दिखाने की जरूरत आती ही रहेगी। जो देश आज लोकतांत्रिक उदारता दिखा रहे हैं, वे आतंकी हमलों को झेलते हुए ऐसी उदारता छोडऩे पर मजबूर भी हो सकते हैं, हो रहे हैं, इसलिए हर संबंधित तबके को उदारता और अमन के महत्व को समझने की जरूरत है।

ठगी-जालसाजी वाले गांवों पर भी शिकंजा क्यों नहीं?

संपादकीय
9 अप्रैल 2017


पिछले कुछ दिनों से लगातार ये खबरें आ रही हैं कि किस तरह देश के कुछ गिने-चुने शहरों में बैठकर पूरे देश में फोन करके लोगों को ठगने और बैंक-जालसाजी करने वाले लोग पकड़ में आ रहे हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि झारखंड के किसी एक गांव में अगर हजारों लोग यही काम कर रहे हैं, तो मोबाइल फोन पर धोखा देने के इस संगठित जुर्म को पकडऩे के लिए अलग-अलग राज्यों की पुलिस को क्यों मेहनत करनी पड़ रही है, जहां के लोग ठगे जा रहे हैं? केन्द्र सरकार या स्थानीय राज्य ऐसे संगठित अपराध पर सीधे कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रहे?
आज हिन्दुस्तान में जिस रफ्तार से लोगों का मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ा है, बैंक और उनकी बाकी सुविधाओं को आधार कार्ड से जिस रफ्तार से जोड़ा जा रहा है, और लोगों की तकनीकी समझ अब तक जितनी सीमित है, इन सबके चलते एक खतरनाक नौबत आकर खड़ी हो गई है, और बैंकवाला बनकर ठग लोगों को फोन करते हैं, उनके नंबर पूछ लेते हैं, और उनके खातों से रकम निकाल लेते हैं। आज केन्द्र सरकार नगदी को घटाकर लोगों के हर तरह के कामकाज में बैंक खाते को जिस आक्रामक तरीके से बढ़ावा दे रही है, उतनी आक्रामकता न तो लोगों को जागरूक करने में दिखती, और न ही ऐसे साइबर क्राईम को पकडऩे की तैयारी में दिखती। हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि भारत में ठगी और जालसाजी जैसे आर्थिक अपराधों की रिपोर्ट होने के बाद उनकी जांच और कार्रवाई में बहुत देर हो जाती है, और तब तक लोग तो लुट चुके रहते हैं। ऐसे में आर्थिक अपराधों के लिए एक खुफिया निगरानी तंत्र होना चाहिए जो कि ऐसे अपराध होने के पहले ही, या होना शुरू होते ही उन्हें रोक सके ताकि लुटने वाले लोगों की गिनती न बढ़े।
अब जब टेलीफोन नंबरों की शिनाख्त के बाद उनके इलाके को जाना जा सकता है, तब यह बात हमारी समझ से परे है कि एक-दो गिने-चुने बदनाम गांव-कस्बे ऐसे कैसे हो सकते हैं कि जहां हजारों लोगों का पेशा ही ठगी-जालसाजी, और साइबर जुर्म हो? ऐसे गांव पर कार्रवाई आसान हो सकती है, वहां के नंबरों से होने वाले कॉल की रिकॉर्डिंग हो सकती है, वहां से चलने वाले बैंक खातों पर नजर रखी जा सकती है, और अगर सरकार ऐसा नहीं कर पाती है, तो उसे डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने का कोई अधिकार भी नहीं है। डिजिटल इंडिया जैसे-जैसे शक्ल लेता जाएगा, वैसे-वैसे बेकसूर लोग और भी अधिक शिकार होते जाएंगे। इस सिलसिले को तुरंत रोकने की जरूरत है, और यह मामला ऐसा है जिसमें भारत के बाहर बसे हुए साइबर-विशेषज्ञ भारतवंशी लोग भी मदद कर सकते हैं। भारत सरकार को बिना देर किए एक अभियान इसी पर चलाना चाहिए, और उसे आगे भी जारी रखना पड़ेगा क्योंकि साइबर-सुरक्षा में सरकार जितना भी आगे बढ़ेगी, मुजरिम उससे चार कदम आगे चलने के रास्ते निकालते ही रहेंगे।