लड़की या महिला की कामयाबी आसानी से गले नहीं उतर पाती

संपादकीय
31 मई 2017


भारतीय फिल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा कल जर्मनी के बर्लिन में थीं, और अपनी हॉलीवुड की किसी फिल्म के प्रमोशन में पहुंची हुई थीं। वहीं पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी पहुंचे हुए थे, और उन्होंने अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच भी कुछ वक्त प्रियंका को दिया, जिसका आभार व्यक्त करते हुए प्रियंका ने फेसबुक पर इस मुलाकात की तस्वीर पोस्ट की हैं। वे एक आम पोशाक में थीं जिसमें उनके पैर दिख रहे थे, और कोई भी बात आपत्तिजनक नहीं थी, लेकिन हिन्दुस्तान में उन दकियानूसी लोगों की संस्कृति जाग गई जो घर बैठे परिवार के साथ तो टीवी पर हर तरह की फिल्में और सीरियल देख लेते हैं, लेकिन अपने नेताओं से यह उम्मीद करते हैं कि वे जरा भी खुली पोशाक से दूर रहें। मजे की बात यह है कि जिस जर्मनी में मोदी गए हुए हैं वहां पर चांसलर भी इसी तरह की पोशाक पहनती हैं, और ऐसी ही पोशाक में वे थीं भी।
लोगों के पैमाने आदमियों के लिए अलग हो जाते हैं, और औरतों के लिए अलग। जिस हिन्दुस्तान की इस संस्कृति में मंदिरों में पुजारी खुले बदन रहते हैं, नदी किनारे और कुंभ जैसे मेलों में साधू बिना कपड़ों के रहते हैं, और नागा साधू कहलाकर सम्मान भी पाते हैं, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो राजिम कुंभ जैसे सरकारी-धार्मिक मेले में इन नागा साधुओं के लिए पूरा इंतजाम सरकार करती है, और शायद नगद बिदाई भी देती है। लेकिन इसी देश में जगह-जगह जाति पंचायतें लड़कियों के जींस पर पहनने पर रोक लगाती हैं, उनके मोबाइल फोन को छीनने का हुक्म जारी करती हैं। जगह-जगह लड़कियों और महिलाओं के साथ इस देश में बलात्कार होता है और कोई नेता सुप्रीम कोर्ट से लात खाकर आने के बाद भी यह बयान जारी करता है कि लड़कियों को सुरक्षित रहना हो तो उनको घर बैठना चाहिए। जगह-जगह बलात्कार के लिए लड़कियों और महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, उनकी फैशन को जिम्मेदार कहा जाता है। अब इस बलात्कारी देश में ऐसे मूर्खों के पास इस बात का क्या जवाब है कि चार-छह बरस की बच्ची से जब बलात्कार आए दिन होते रहते हैं, तो वह बच्ची कौन सा उत्तेजक फैशन कर लेती है? कौन से मोबाइल फोन का इस्तेमाल करती है, या जींस पहनकर घर से निकलती है?
लोगों को खुद तो देसी के अलावा विदेशी टीवी कार्यक्रम और फिल्मों में बदन देखना अच्छा लगता है, लेकिन जब देश का कोई नेता ऐसे किसी फैशनेबुल के करीब रहे तो लोगों को यह सार्वजनिक जीवन के शिष्टाचार के खिलाफ बात लगने लगती है। और हिन्दुस्तान के लोगों का आज-कल का मिजाज लगातार अधिक से अधिक पाखंडी होते चल रहा है क्योंकि यहां पर अब लोकतंत्र और न्याय, तर्क और हकीकत, इन सबसे लोगों को सोच-समझकर दूर ले जाया जा रहा है। जिस तरह से गाय के नाम पर पूरे देश में एक बवाल खड़ा किया जा रहा है, उससे यह देश और इसके भीतर के लोग बंटते हुए दिख रहे हैं। आजादी के वक्त भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। अब भारत में खानपान के आधार पर एक हिंसक विभाजन चल रहा है जिसका लोकतंत्र से सीधा टकराव है, भारत के संविधान से सीधा टकराव है। जो सोच ऐसा टकराव खड़ा कर रही है, वही सोच जगह-जगह औरतों पर इतिहास की एक ऐसी हिंसक भारतीय संस्कृति लागू करना चाहती है, जो कि कभी थी ही नहीं।
प्रियंका चोपड़ा ने बिना किसी फिल्मी परिवार से आए हुए, अकेले अपने दम पर हिन्दुस्तान से लेकर हॉलीवुड तक लगातार फिल्मों में कामयाबी पाई है, और आज वह हिन्दुस्तान की सबसे मशहूर फिल्म कलाकार बनकर पूरी दुनिया में छा चुकी है। यह कामयाबी कारोबार के हिसाब से भी बहुत बड़ी है, और फिल्म-कला के हिसाब से भी अभूतपूर्व है। ऐसे में उसकी पोशाक को लेकर भद्दी बातें करके हिन्दुस्तानी यही जाहिर कर रहे हैं कि किसी लड़की या महिला की कामयाबी हिन्दुस्तानियों के गले आसानी से उतर नहीं पाती है। यह पूरी की पूरी सोच लैंगिक-हिंसा पर टिकी हुई है, और यह सोच हिन्दुस्तानी लोगों को जकड़कर रखेगी, पीछे घसीटेगी, और आगे बढऩे नहीं देगी।

रातोंरात के कानूनी फेरबदल से जनता और कारोबार त्रस्त

संपादकीय
30 मई 2017


केंद्र सरकार के ऑनलाइन दवा बिक्री के प्रस्तावित आदेश के खिलाफ देशभर की दवा दुकानें आज बंद रहीं। ऑनलाइन कारोबार से देश के दुकानदारों की हालत खराब है, क्योंकि न तो दुनिया का कारोबार, और न ही जिंदगी का कोई भी और दायरा इतनी रफ्तार से फेरबदल के लिए तैयार रहता है। बाजार के दुकानदार पीढिय़ों से पूंजी निवेश करके कामकाज खड़ा करते हैं, और बहुत से लोगों का पैसा ब्याज से लिया हुआ भी रहता है। ऐसे में रातोंरात जब ऑनलाइन बिक्री करने वाले लोग दुकानदारों की खरीदी से भी कम कीमत पर बिक्री करने लगते हैं, तो बाजार के पांव उखड़ जाते हैं। यह सिलसिला सिर्फ ऑनलाइन बिक्री के मामले में हो रहा हो ऐसा भी नहीं है, आज भारत में बहुत से दूसरे दायरों में कारोबारी ऐसी ही दिक्कतों से गुजर रहे हैं।
एक तरफ तो आजादी के बाद का अब तक का सबसे बड़ा टैक्स फेरबदल, जीएसटी लागू होने जा रहा है, और बाजार उसे लेकर परेशान है, आशंका में है, और उसकी तैयारी में लगा हुआ है। दूसरी तरफ ऑनलाइन बिक्री की मार तो चल ही रही है। फिर देश के अखबारों का कारोबार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत नया वेतन देने के संघर्ष से जूझ रहा है, और केंद्र सरकार की नई विज्ञापन नीति से भी परेशान है। पूरे देश में कामकाजी महिलाओं के लिए जो नए कानून आए हैं, उनका बोझ उठाने के लिए भी कारोबार तैयार नहीं है। फिर जीएसटी सहित दूसरे टैक्सों को लेकर गिरफ्तारी की जो नई तलवार बाजार पर टांगी गई है, लोग उससे भी डरे-सहमे हैं।  देश को होटल और रेस्त्रां-बार का कारोबार सुप्रीम कोर्ट के हाईवे पर रोक के आदेश से बुरी तरह प्रभावित हुआ है, और अकेले छत्तीसगढ़ में सैकड़ों कारोबारी इसी एक वजह से घाटे में आ रहे हैं, और अपने पूंजी निवेश पर कर्ज चुकाने की हालत में नहीं रह गए हैं।
फिर नोटबंदी से लेकर और कई तरह की रोक बैंकों और नगदी कारोबार पर लग गई है जिससे परंपरागत कारोबारी तौर-तरीके रातों-रात बदलने पड़ रहे हैं, और बाजार इसके लिए एकदम से तैयार भी नहीं है। कहीं पर सुप्रीम कोर्ट पुरानी गाडिय़ों पर रोक लगा रहा है, बाजार में पहुंच चुकी गाडिय़ों की बिक्री को बंद कर रहा है, तो कहीं अलग-अलग प्रदेश पुरानी गाडिय़ों पर अलग-अलग रोक लगा रहे हैं। ऐसे तमाम फेरबदल इस हकीकत को अनदेखा कर रहे हैं कि कर्ज लेकर काम करने वाले लोग, या कि शेयर होल्डर्स की पूंजी से काम करने वाली कंपनियां ऐसे रातोंरात के फेरबदल को नहीं झेल सकती हैं। आज जिस तरह से मांस के कारोबार को, जानवरों की हड्डियों और चमड़े के कारोबार को खत्म किया जा रहा है, दुधारू जानवरों के लाने-ले-जाने को खत्म किया जा रहा है, उससे आत्महत्या करने वाले किसान और अधिक बेबस होने जा रहे हैं। सत्ता पर बैठे हुए लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि रातोंरात के ऐसे कानूनी फेरबदल लागू होने पर जिंदगी को अस्तव्यस्त कर दे रहे हैं, करोडों लोगों के रोजगार छीन रहे हैं, और लाखों लोगों का कारोबार खत्म कर रहे हैं। यह सिलसिला देश की उत्पादकता के खिलाफ है, और अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाला है।
केंद्र सरकार को अपने खुद के इस नारे पर अमल के बारे में सोचना चाहिए जिसमें वह सबको साथ लेकर, सबके विकास की बात करती है। अभी केंद्र और राज्यों के तौर-तरीके इसके ठीक खिलाफ चल रहे हैं, और देश में लोकप्रियता की जो लहर मोदी के पक्ष में चल रही है, उसे स्थाई मानकर इस तरह के मनमाने फैसले ठीक नहीं हैं। सरकार में कोई भी रहे, जनता को जीने का हक रहना चाहिए, मौका रहना चाहिए।

दलित-पर्यटन के खिलाफ कोर्ट जाएं

आजकल
29 मई 2017
उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक दलित बस्ती में जाने वाले थे तो एक दिन पहले अफसरों ने वहां पहुंचकर गरीब दलितों में साबुन-शैम्पू बांटे और हिदायत दी कि कल जब मुख्यमंत्री पहुंचें तो वे नहा-धोकर साफ-सुथरे रहें। अफसरों की फिक्र सही हो सकती है क्योंकि भारत में गरीब प्रदेशों में भी मुख्यमंत्री को जिस तरह के राजसी घेरे में रखा जाता है, उससे उन्हें गरीबी को देखने की आदत छूट ही जाती होगी। खैर, मीडिया से लोगों ने बताया कि वे तो वैसे भी रोज अपने खरीदे साबुन से नहाते हैं, और दो बट्टी साबुन और शैम्पू की पुडिय़ा उनके कितने दिन काम आएगी?
लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते ही हुए हैं जब देश की सरहद पर शहीद हुए एक सैनिक के घर पर योगी आदित्यनाथ पहुंचने वाले थे, और एक दिन पहले अफसरों ने वहां पहुंचकर कालीन बिछा दी थी, सोफे सजा दिए थे, और तो और घर के बाहर बांस का ढांचा बनाकर उस पर चढ़ाकर एयरकंडीशनर भी लगा दिया था ताकि योगी को कुछ मिनटों वहां रहने पर भी गर्मी न लगे, उनके पांव फर्श पर न पड़ें। अब इसी भाजपा के कुछ मुख्यमंत्री दूसरे प्रदेशों में राजपरिवार से आए हुए भी हैं, जैसे कि राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया, और योगी आदित्यनाथ तो स्वघोषित योगी हैं जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे जमीन से जुड़े रहेंगे, ठाठ-बाट से दूर रहेंगे।
लेकिन होता यह है कि सत्ता पर बैठे लोग तो एक बार सादगी की सोच भी लें, उनके आसपास का चापलूस मुसाहिबों का दायरा उनके पांव जमीन पर पडऩे नहीं देता, और फिल्म पाकीजा में अभिनेता राजकुमार के कहे हुए एक डायलॉग की तरह उन्हें याद दिलाते रहता है कि आपके पांव बहुत हसीन हैं उन्हें जमीन पर मत रखिएगा, मैले हो जाएंगे। जो लोग मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री, या कि मंत्री बनने के पहले तक साधारण जिंदगी जीते थे, उन्हें एकाएक सुख के ऐसे बुलबुले के भीतर बिठा दिया जाता है कि उनके आसपास के चापलूस भी उसी बुलबुले के सुख को पाते रह सकें, और वे जब बाहर अपने लिए जनता के पैसों से सुख के अलग बुलबुले भी बनाएं तो भी वे उनके राजनीतिक मालिक को न खटकें। इसलिए गाड़ी, बंगला, दफ्तर, दूसरे खर्च, इन सबको इतना बढ़वा दिया जाता है कि उसका फायदा नीचे तक सबको मिलने लगे।
लेकिन दलितों को साबुन-शैम्पू बांटने का मामला कुछ अलग ही है। पिछले दिनों कर्नाटक से यह खबर आई कि भाजपा के मुख्यमंत्री रह चुके, और पार्टी के बाहर निकाले जाकर वापिस पार्टी में लाए गए येदियुरप्पा ने अभी एक दलित के घर जाकर खाना खाया, तो वह खाना उनके लिए होटल से लाया गया था। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चन्द्रशेखर राव ने यह सार्वजनिक बयान दिया है कि भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं के दलितों के घर जाने पर खाना होटल से ही बुलवाया जाता है। जहां तक हमें याद पड़ता है, जब पिछले कुछ बरसों में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी उत्तरप्रदेश में दलितों के घर खाने गए, तो विरोधियों की तरफ से भी ऐसी कोई तोहमत सामने नहीं आई थी कि उन दलितों को नहाने के लिए कांग्रेस ने साबुन-शैम्पू दिए थे, उन दलितों के घर पर जाकर किसी कांग्रेसी ने कालीन-सोफा बिछाए थे, या कि राहुल के खाने के लिए खाना किसी होटल से लाकर दलित घर में खिलाया गया था। हालांकि मायावती ने जरूर यह आरोप लगाया था कि यह खाना बाहर से लाया गया था, लेकिन वह आरोप टिका नहीं। उस वक्त राहुल गांधी के खिलाफ खूब अभियान चला कि वे दलित-पर्यटन कर रहे हैं।
हिन्दुस्तान में दलितों को लेकर एक सवर्ण तबके में छुआछूत की भावना खत्म हुई नहीं है। अभी तक देश के कई मंदिरों में दलितों को घुसने नहीं मिलता, और लोग अपने घरों में भी काम करने वाले दलितों को कहीं रसोई से बाहर रखते हैं, तो कहीं उन्हें चाय देने के लिए भी अलग बर्तन का इस्तेमाल करते हैं जो कि अलग रखे जाते हैं। ऐसे में दलितों के राजनीतिक उपयोग के बारे में भी सोचने की जरूरत है कि इसका किस हद तक विरोध करना चाहिए, और क्या इसे एक ओछी राजनीति मानना चाहिए या नहीं? दूसरी बात यह कि जब दलित-पर्यटन पर नेता निकलें, तो अगर दलितों को साफ-सुथरा बनाने, या उनके घर बाहर से खाना पहुंचाने का काम अगर किया जाता है, तो उस काम को दलित के अपमान के कानून के तहत जुर्म मानना चाहिए, और ऐसे लोगों पर मुकदमे चलाने चाहिए।
भारत की राजनीति लोगों से कई किस्म के ओछे काम करवाती है। हमने बलात्कार के शिकार महिलाओं को मुआवजे के चेक देते हुए मंत्रियों को फोटो खिंचवाते देखा है जो कि उनकी सरकारी मशीनरी मीडिया तक पहुंचा भी देती है। ऐसे लोगों के खिलाफ भी मुकदमे चलने चाहिए, और दो-चार लोग जब जेल चले जाएंगे, तो ही बाकी लोगों के लिए एक मिसाल बन पाएगी। इसी तरह जब फौज या पुलिस के जवान जख्मी होकर अस्पतालों में रहते हैं, या कि किसी बड़े हादसे में घायल होकर लोग बड़ी संख्या में अस्पतालों में रहते हैं, तो ऐसे जख्मी लोगों के पास पहुंचकर भी राजनीतिक दलों के नेता और सत्तारूढ़ मंत्री जिस तरह से मिजाजपुर्सी करते हैं, जिस तरह से हमदर्दी जाहिर करते हैं, उसके खिलाफ भी अदालती आदेश निकलना चाहिए। ऑपरेशन के बाद जब लोग संक्रमण का खतरा झेलते हुए अस्पताल में रहते हैं, तब उनके पास डॉक्टरों या नर्सों के अलावा और किसी को जाने की इजाजत नहीं रहनी चाहिए। लेकिन जब मंत्रियों की भीड़ अस्पतालों के ऐसे वार्ड में पहुंचती है, तो खबरों की सुर्खी दिलाने वाले ऐसे जख्मियों के अलावा भी उन वार्डों में जो लोग भर्ती रहते हैं, उन सबकी जिंदगी को एक खतरा ऐसे नेताओं से खड़ा होता है। यह सिलसिला थमना चाहिए। हमदर्दी-पर्यटन को अदालती हुक्म से रोकना चाहिए।
पिछले तीन बरसों में देश भर में लगातार कहीं गोमांस पर रोक के नाम पर, तो कहीं ऊंची कही जाने वाली ताकतवर बाहुबलि जातियों द्वारा गरीब और कमजोर जातियों पर होने वाले बलात्कार को लेकर देश के दलित आज विचलित हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर जेएनयू तक, और उत्तरप्रदेश के गांव-गांव तक, हरियाणा के गांव-कस्बे तक जगह-जगह दलित आज हिंसा के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। ऐसे में दलित समाज के ही लोगों को सामने आकर राजनीतिक दलों और सत्ता के दलित-पर्यटन के खिलाफ एक माहौल बनाना चाहिए। यह लड़ाई दलितों के बीच से ही उठनी चाहिए, सड़कों पर भी लड़ी जानी चाहिए, और कुछ लोगों को अदालत भी जाना चाहिए कि दलितों का ऐसा इस्तेमाल, उन्हें साफ करने की कोशिश, उनके घर के खाने को अछूत मानने का काम, इन सबके खिलाफ दलित प्रताडऩा विरोधी कानून के तहत कार्रवाई करवानी चाहिए।
अभी हम देश के सोशल मीडिया में दलितों को लगातार अधिक सक्रिय होते देख रहे हैं, और यह सिलसिला तेज होते भी दिख रहा है। राजनीतिक फायदे के लिए, या कि शोहरत के लिए दलितों का इस्तेमाल करना, और अपने लोगों को दलितों से बलात्कार करने देना, उन बलात्कारियों को बचाना, यह सिलसिला नहीं चलने देना चाहिए। इसके साथ-साथ यह बात भी समझने की जरूरत है कि इस देश में गरीब मुस्लिमों की बहुतायत की हालत समाज में दलितों जैसी ही है, और कुछ ताकतें उत्तरप्रदेश में पिछले कुछ समय से दलितों और मुस्लिमों के बीच एक खाई खोदने की कोशिश में लगी हैं। इसके कोई सुबूत तो जुट नहीं सकते, लेकिन दलितों को यह याद रखना चाहिए कि महज हिन्दू समाज के भीतर के दलित देश में एक बड़ी लड़ाई नहीं लड़ सकते, इसके लिए दलितों जैसी सामाजिक स्थिति वाले दूसरे धार्मिक समुदायों के लोगों को भी साथ जोडऩा होगा, वरना अलग-अलग टापुओं में बसे हुए लोगों की टुकड़ा-टुकड़ा फौज कोई जंग नहीं जीत सकती।

जिन इलाकों में फौज तैनात है, वहां लोग ऐसा नहीं सोचेंगे

संपादकीय
29 मई 2017


भारत में लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों को कुचलने का सिलसिला जारी है। और इसमें अब सेना बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। कश्मीर में पथराव से बचने के लिए सेना की एक टुकड़ी के मेजर ने यह तय किया कि पत्थरबाजों में से एक को जीप के सामने बांधकर वहां से निकला जाए। बाद में केन्द्र सरकार से लेकर सेना के आला अफसरों तक ने इस तरीके का समर्थन किया और इस मेजर को सम्मानित भी किया। बात यहीं पर अगर खत्म हो जाती तो भी एक बार लोग इसे भूलने की कोशिश करते। लेकिन केन्द्र सरकार और सेना मानो कश्मीरियों के जख्मों को कुरेदने और भारत सहित बाकी दुनिया के मानवाधिकारवादियों के मुंह पर जूता मारने पर आमादा है। आज थलसेनाध्यक्ष का एक बयान सामने आया है कि यह तो जीप के सामने पत्थरबाज को बांधकर सेना वहां से सुरक्षित निकली, वैसे तो सेना यह चाहती थी कि प्रदर्शनकारी गोलियां चलाएं, ताकि फौज भी उसके जवाब में वह कर सके जो कि वह करना चाहती है।
थलसेनाध्यक्ष का यह बयान एकदम भयानक और अलोकतांत्रिक है। देश के भीतर अपने ही नागरिकों पर, चाहे वे पत्थर ही क्यों न चला रहे हों, उन पर गोली चलाने की हसरत और नीयत की ऐसी घोषणा करना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं के ठीक खिलाफ है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार की नीयत भला अपने लोगों पर गोली चलाने की कैसे हो सकती है? और देश के भीतर सेना की तैनाती का मतलब यही होता है कि देश और प्रदेश की सरकारें अपने काम में नाकामयाब रही हैं, और पुलिस तथा केन्द्रीय सुरक्षा बल मिलकर जब हालात पर काबू नहीं कर पा रहे हैं, तब सेना को बुलाया गया है। सेना के किसी इलाके में आने का यह मतलब कहीं भी नहीं होता कि सेना अपने लोगों पर गोली चलाने की चाहत रखे, खासकर पत्थर चलाते लोगों के लिए यह कहना कि बेहतर होता कि वे गोली चलाते ताकि थलसेना भी वह कर सकती जो कि वह करना चाहती है।
आज भारत के माहौल में सेना की कार्रवाई को, उसकी किसी भी कार्रवाई को, उसकी कैसी भी कार्रवाई को राष्ट्रप्रेम से जोड़कर उसे सही ठहराने का जो आक्रामक राष्ट्रवाद चल रहा है, उससे दुनिया के किसी और देश का कोई नुकसान नहीं हो रहा, उससे भारत के पड़ोस में बसे हुए, और दुश्मन समझे और कहे जाने वाले देश का भी कोई नुकसान नहीं हो रहा, इस आक्रामकता से देश का खुद का नुकसान हो रहा है, और देश के भीतर जो लोग ऐसी आक्रामकता से असहमत हैं, उन्हें गद्दार ठहराकर पाकिस्तान जाने को कहा जा रहा है। आज ही केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के एक फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है कि देश के हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में शौर्य दीवाल बनाई जाएगी जो कि भारत की फौज की वीरता के बारे में होगी। अब तक कॉलेज और यूनिवर्सिटी को राजनीति से और आक्रामक राष्ट्रवाद से परे रखा जाता था। लेकिन अब उन्हें भी इसमें शामिल किया जा रहा है, और दिलचस्प बात यह है कि आज देश में दर्जनों अलग-अलग जलते-सुलगते मुद्दे हैं, जिनमें से एक का भी राष्ट्रवाद से, या कि किसी दुश्मन देश से कुछ भी लेना-देना नहीं है, और वे तमाम भारत के अपने घरेलू मुद्दे हैं। ऐसे में इन तमाम बातों को छोड़कर नए-नए भावनात्मक विवादों को छेडऩा देश के लिए प्रतिउत्पादक काम है जिससे नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होने वाला है। कोई भी देश महज अपने एक झूठे इतिहास के मौजूदा पाखंडी गौरव को खड़ा करके आगे नहीं बढ़ सकता। ऐसे सम्मोहन में देश की आबादी को डुबोया तो जा सकता है, लेकिन उसे तैराया नहीं जा सकता। ऐसे तमाम अलोकतांत्रिक और गैरजरूरी मुद्दों से देश की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को भीड़ की मानसिकता में लाकर उसे एक चुनावी ध्रुवीकरण का शिकार तो बनाया जा सकता है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और देश का विकास इससे चौपट हो रहे हैं। हम आखिर में एक बार फिर फौज के इस रूख को, और इस रूख के तरफ सरकार के रूख को लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक मानते हैं, और इसकी तारीफ महज वे लोग कर सकते हैं जिनके अपने इलाके में फौज तैनात नहीं हैं। हिन्दुस्तान में जिन इलाकों में फौज है, वहां के लोग ऐसा नहीं सोचेंगे कि पत्थर की जगह भीड़ गोलियां चलाती तो अच्छा होता, क्योंकि जवाब में फौज को भी गोलियां चलाने मिलतीं। 

छेडख़ानी और बलात्कार करने वालों के घरों में मां-बहन...

संपादकीय
28 मई 2017


उत्तरप्रदेश के रामपुर से एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें दर्जन भर लड़के दो लड़कियों को छेड़ते हुए, उनके बदन से बदसलूकी करते हुए, और उसका वीडियो बनाते हुए दिख रहे हैं। इसके बाद उनका हौसला है कि वे ऐसे वीडियो को पोस्ट भी कर रहे हैं जिनमें सबके चेहरे उजागर है। पुलिस ने गिरफ्तारियां शुरू कर दी हैं, लेकिन यह फिक्र की बात है कि गुंडों का इतना हौसला है, और शायद वे इतने बेवकूफ भी हैं कि अपने जुर्म के सुबूत खुद ही छोड़ते चल रहे हैं। लेकिन इन दोनों में से जो भी बात हो, बड़ी बात यह है कि उत्तर भारत के बहुत से प्रदेशों में लड़कियां बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं। लोगों को याद होगा कि इसी उत्तरप्रदेश में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो बड़े जोर-शोर से भाजपा के चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक रोमियो दस्ते बनाए गए थे जो कि प्रेम करने वाले लड़के-लड़कियों को रोकने के लिए थे। ऐसे दस्तों की पुलिस ने लोगों के साथ बदतमीजी, बदसलूकी, और गुंडागर्दी शुरू कर दी थी। भाई-बहनों को पीटा जाने लगा था, और हालत यह हो गई थी कि एक परिवार के दो हमउम्र लड़के-लड़कियां भी बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे। जब यह उत्पात बर्दाश्त के बाहर बढ़ा, तो खुद सरकार ने चुपचाप इसे दफन कर दिया। लेकिन गुंडों के हौसले कम नहीं हुए। उत्तर भारत में रोजाना ही कहीं न कहीं कोई लड़की छेडख़ानी से थककर खुदकुशी करती है, और कहीं न कहीं ऐसे नए वीडियो सामने आते हैं, और बहुत से मामलों में तो ऐसे वीडियो सामने नहीं आते होंगे, और महज ब्लैकमेलिंग के काम लाए जाते होंगे।
यहां पर दो बातें मिलीजुली हैं। एक तो यह कि लड़कियों या महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया अभी भी किस हद तक हिकारत और हिंसा का है। और यह समाज सिर्फ आम लोगों का समाज नहीं है, यह सत्ता की कुर्सियों पर बैठे हुए नेताओं और अफसरों का समाज भी है जिसके बारे में हम आए दिन लिखते रहते हैं। लेकिन दूसरी बात भी बहुत गंभीर है कि लोग अपने ही जुर्म के साइबर-सुबूत इस तरह से बनाते और छोड़ते चल रहे हैं कि उनका जेल जाना तय हो जाता है। यह एक तरह से अच्छी नौबत भी है कि पुलिस की मेहनत बचती है, और अदालतों से मुजरिमों के छूटने का खतरा घटता है। लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि उनके घर के लड़के अगर ऐसी गुंडागर्दी करते हैं, तो उनको घर से कैसी बातें सिखाई गई हैं? सबसे अधिक सीख और नसीहत परिवार से ही मिल सकती है, और जब भी किसी परिवार के लड़के छेडख़ानी से लेकर बलात्कार तक के जुर्म में फंसते हैं, तो वे तो जेल चले जाते हैं, लेकिन जेल के बाहर बच गया परिवार बदनामी झेलते रहता है। ऐसा भी नहीं है कि परिवार की जानकारी में आए बिना लड़कों का हौसला इस हद तक बढ़ जाता हो। घर के भीतर ही अगर लड़कियों की इज्जत करना सिखाया जाए, तो लड़कों के बाहर निकलकर ऐसी हरकतें करने का खतरा घट जाता है। यह समझना चाहिए कि अगर ये लड़के घर पर ही अपनी मां और बहन की इज्जत होते देखते, तो शायद वे घर के बाहर के लड़कियों को भी इज्जत के लायक समझते। उनका सुलूक यह भी साबित करता है कि उनके परिवारों में मां-बहन की इज्जत नहीं होती होगी। जब ऐसे लड़के जेल चले जाएं तो उनके लिए रोने के बजाय पहले से ही परिवारों को अपने भीतर का माहौल ठीक करना चाहिए ताकि बाकी दुनिया की महिलाएं और लड़कियां सुरक्षित रह सकें।

जानवरों को कटने से बचाने के नाम पर एक खराब कानून

संपादकीय
27 मई 2017


केन्द्र सरकार ने जानवरों को कटने से बचाने के लिए एक नया कानून लागू किया है, और इसका व्यापक असर देश भर में कई तबकों पर होगा। इस नए कानून के तहत गाय, सांड, भैंस, बैल, बछड़े, ऊंट जैसे जानवरों को किसी भी पशु-बाजार से बूचडख़ाने ले जाने के लिए, या कि काटने के लिए नहीं खरीदा जा सकेगा। खरीदने और बेचने वालों को जिला स्तर की सरकारी कमेटी से कई तरह की इजाजत लेनी पड़ेगी, और घोषणा पत्र देना होगा कि वे खरीदने के बाद छह महीने तक जानवर को नहीं बेचेंगे। इस कानून के तहत अब इन जानवरों की धार्मिक उद्देश्य से बलि भी नहीं दी जा सकेगी।
गाय को बचाने का मोदी सरकार का अभियान अब बढ़ते हुए गाय-भैंस परिवारों के अलावा ऊंटों तक पहुंच गया है, और एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाने पर जितने तरह की रोक लगाई गई है, उन सबके चलते पशुओं का कारोबार असंभव सा हो जाएगा। आज भी पूरे देश में जगह-जगह, खासकर उत्तर भारत में गौरक्षकों के नाम पर हिंसक गुंडागर्दी करने वाले लोग जानवरों को कानूनी रूप से ले जाने वालों को भी मार डाल रहे हैं। आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त ओडिशा में लोग जख्मी पड़े हैं जो कि तमिलनाडू से गायों को ट्रेन में ले जा रहे थे और उन्हें मिजोरम सरकार को सप्लाई करने वाले थे ताकि किसानों का दूध का कारोबार हो सके। लेकिन उन्हें ट्रेन से उतारकर मारा गया, और गायों को भी उतार लिया गया। इन गौरक्षकों ने रेलवे कर्मचारियों को भी पीटा।
आज सत्तारूढ़ लोगों में से शुद्धतावादी या शाकाहारी लोगों का एक छोटा तबका खानपान की अपनी सोच को न सिर्फ दूसरे अल्पसंख्यकों धर्मों पर थोप रहा है, बल्कि वह हिन्दू समाज के भीतर के भी दलित-आदिवासियों और असंख्य ओबीसी लोगों पर भी शाकाहार को थोप रहा है। यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, और मोदी सरकार की चुनावी मोर्चे पर चल रही शोहरत के चलते हुए अभी तो यह खप जा रहा है, लेकिन इससे जो तकलीफ और नाराजगी दसियों करोड़ लोगों में हो रही है, वह किसी चुनौती के मौके पर किसी भी पार्टी के लिए घातक साबित हो सकती है। लेकिन हम राजनीतिक नफे-नुकसान से परे भी यह देख रहे हैं कि इस देश में कुछ जानवरों को बचाने के लिए जिस तरह से इंसानों को कुर्बान किया जा रहा है, और देश के लोगों की खानपान की विविधता को हिंसा के साथ खत्म किया जा रहा है, वह लोकतंत्र नहीं है। भारत में कभी गोमांस खाया ही नहीं जाता था, ऐसा एक पाखंडी झूठ फैलाया जा रहा है, और हिंसा के साथ इस झूठ को लागू किया जा रहा है। हमारा यह भी मानना है कि इस नए कानून के खिलाफ केरल सरकार ने अदालत जाने की जो घोषणा की है, उसका असर होगा और अदालत से यह नया कानून खारिज होगा।
जानवरों को खाने के अलावा भी अनंतकाल से जानवरों को खरीद-बेचकर लोग अपना काम चलाते आए हैं, और उस सिलसिले को खत्म करके यह सरकार एक ऐसा इंस्पेक्टर राज लागू कर रही है जिसमें वर्दीधारी इंस्पेक्टर तो रहेंगे ही, धार्मिक दुपट्टे पहने हुए हिंसक गुंडे भी अपने आपको गौरक्षक साबित करते हुए हिंसा करेंगे। आज भारत के किसान गरीबी और बेबसी में आत्महत्या कर रहे हैं, इस किस्म की तमाम रोकटोक उनकी हालत और खराब करेगी।

दाऊद-प्रेमी मंत्री-विधायक पर भाजपा कुछ करेगी?

संपादकीय
26 मई 2017


महाराष्ट्र की खबर कुछ परेशान करती है कि वहां कुख्यात मुजरिम दाऊद इब्राहिम के परिवार की शादी में महाराष्ट्र के एक मंत्री, कुछ विधायक, और कई पुलिसवाले शामिल हुए। दाऊद की पकड़ और उसकी ताकत हमेशा से इतनी रहती आई है कि ऐसे बहुत से लोग और बहुत से फिल्मी कलाकार, गायक, दाऊद के जन्मदिन पर दुबई जाकर नाचते-गाते रहे हैं, और देश के बड़े-बड़े क्रिकेट सितारे दाऊद की मेहमाननवाजी पाते रहे हैं। लेकिन महाराष्ट्र का एक भाजपा मंत्री और भाजपा के कई विधायक, स्थानीय नेता, और पुलिसवाले दाऊद के घर की दावत में पहुंचते हैं, तो भाजपा और शिवसेना के हाथ से दाऊद के खिलाफ एक मुद्दा निकलता है और देश के अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिमों के पाकिस्तान-परस्त होने के हिन्दूवादी हमले खारिज होते दिखते हैं।
सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनके अगल-बगल मंच पर आकर कोई खड़े हो जाएं तो यह अलग बात है, लेकिन जब ऐसे प्रमुख लोग किसी समारोह में जाकर शामिल होते हैं, तो यह नहीं माना जा सकता कि वे उस परिवार की साख से अनजान रहे होंगे। जब दाऊद के सारे रिश्तेदारों पर नजर रखी जा रही है तो ऐसे में महाराष्ट्र के इतने नेता-अफसर इस रिश्तेदारी से अनजान नहीं हो सकते। ऐसे में कांग्रेस के एक प्रवक्ता को देश को यह याद दिलाने का मौका मिल गया है कि एक तरफ तो ब्रिटेन मैनचेस्टर में अभी हमला करने वाले एक मुस्लिम नौजवान के रिश्तेदारों को भी दो दिनों में लीबिया से पकड़कर ला चुका है, और दूसरी तरफ दाऊद इब्राहिम को पकडऩे के सारे दावों के बावजूद अब तक भारत सरकार उसकी पाकिस्तान में मौजूदगी भी साबित नहीं कर पाई है। मोदी सरकार की तीसरी सालगिरह के मौके पर महाराष्ट्र में उसके लिए यह बड़ी शर्मिंदगी की बात है कि उसके नेता देश की भावनाओं की इस कदर अनदेखी कर रही है। कुछ लोगों का यह तंज कसना भी जायज है कि अगर महाराष्ट्र के इस हिन्दू भाजपाई मंत्री और हिन्दू भाजपा विधायकों की जगह किसी और पार्टी के मुस्लिम नेता अगर दाऊद के परिवार की दावत में पहुंचे होते, तो उन्हें और उनकी पार्टी को देश के गद्दार करार देकर पाकिस्तान जाने के लिए कह दिया जाता।
यह बात सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं है, और सिर्फ भाजपा के साथ नहीं है, पूरे देश में अधिकतर पार्टियों के नेताओं के आसपास सत्ता के दलाल, तरह-तरह के मुजरिम, और तरह-तरह की संदिग्ध साख वाले लोग ही अधिक मंडराते दिखते हैं। छत्तीसगढ़ में ही हम देखते हैं कि कई मंत्रियों के निजी स्टॉफ के लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के अंधाधुंध मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन उन मंत्रियों को ऐसे ही निजी सहायक पसंद आते हैं, और मीडिया या जनचर्चा को हिकारत से देखते हुए मंत्री या दूसरे नेता अपने निजी सहायकों को कायम रखते हैं। आम चर्चा यह भी रहती है कि ऐसे कर्मचारी दलालों की तरह काम करने लगते हैं, और कुछ बरस पहले यह भी सुनाई पड़ा था कि भाजपा संगठन ऐसे निजी कर्मचारियों को हटाने वाली भी थी, लेकिन हमें ऐसा एक भी कर्मचारी हटते नहीं दिखा। सत्ता का मिजाज ही कुछ ऐसा रहता है कि उसके इर्द-गिर्द सत्ता के दलाल जुट जाते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि गुड़ के टुकड़े पर मक्खियां मंडराने लगती हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को चाहिए कि पूरे देश में अपनी पार्टी के लोगों के चाल-चलन को लेकर एक आचार संहिता बनाएं, और दलालों-मुजरिमों से अपनी सरकारों को बचाकर रखें। सत्ता के तीन बरस पूरे होने पर भाजपा देश भर में कम से कम यह एक बड़ा और कड़वा फैसला ले सकती हैं। अभी भी भाजपा के भीतर सच या गलत, पता नहीं जैसी भी हो, ऐसी साख है कि मोदी और शाह की नजर देश भर में पार्टी के लोगों पर बनी रहती है। महाराष्ट्र के दाऊद-प्रेमी अपने नेताओं, और देश भर के अपने दलाल-प्रेमी मंत्रियों पर तीन बरसके बाद भी अब तक उनकी नजर पड़ी हो ऐसा दिखता नहीं है।

उत्तरप्रदेश के हाईवे पर फिर मुसाफिरों से गैंगरेप, हत्या

संपादकीय
25 मई 2017


उत्तरप्रदेश में कुछ महीने पहले एक हाईवे पर कार रोकी गई थी, और लूटने के अलावा मुजरिमों ने कार में सफर कर रही महिलाओं से बलात्कार भी किया था। उस वक्त वहां समाजवादी पार्टी का राज था, और उस पर अपराधों को लेकर बेअसर होने की तोहमतें लगी थीं। अब उत्तरप्रदेश में भाजपा का योगीराज है, और पुलिस के अफसर भी दर्जनों के भाव में बदले जा चुके हैं, लेकिन अभी फिर वैसा ही एक जुर्म हुआ, और एक गाड़ी के चक्के पर गोली मारकर उसे रोका गया, बंदूक की नोंक पर चार महिलाओं से बलात्कार हुआ, उन्हें लूटा गया, और साथ में चल रहे परिवार के एक आदमी ने जब विरोध किया, तो उसका कत्ल कर दिया गया।
यह नौबत देश के किसी भी हिस्से के लिए बहुत भयानक है, क्योंकि सड़कों के रास्ते जो लोग सफर करते हैं, वे तो रात-दिन किसी भी वक्त किसी भी प्रदेश से गुजरते हुए आते-जाते हैं, और अगर ऐसे जुर्म देश के बाकी हिस्सों में बाकी लोगों के साथ होने लगें, तो लोगों की आवाजाही ठप्प ही पड़ जाएगी। दूसरी तरफ हरियाणा में भाजपा के राज में ही पिछले बरस जब जाट आंदोलन चल रहा था, तो उसमें रास्ते रोके गए थे, और एक कार से महिलाओं को उतारकर ले जाकर खेत में उनके साथ बलात्कार किया गया था। सरकार ने सरकारी मिजाज के मुताबिक बहुत समय तक ऐसे बलात्कार का खंडन किया था, लेकिन आखिर में जाकर सभी तरह की जांच में यह कायम हुआ, और बलात्कार की शिकार महिलाएं अपनी शिकायत पर कायम भी रहीं।
समाज में कमजोर तबकों को सबक सिखाने के लिए, उनका अपमान करने के लिए, किसी जाति से टकराव के चलते, या किसी धर्म से नाराजगी की वजह से हिन्दुस्तान में जगह-जगह बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसे पारिवारिक बदला निकालने के लिए, या कि जमीन-जायदाद के झगड़े के चलते हुए भी हथियार बनाया जाता है। लोगों को याद होगा कि उत्तरप्रदेश में एक कुख्यात डकैत रही, और बाद में सांसद बनी फूलन की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी कि पहले उसके साथ बलात्कार किया गया था, और फिर इसका बदला चुकाने के लिए उसने डकैत गिरोह बनाकर बलात्कारी-समुदाय की महिलाओं से थोक में बलात्कार करवाया था, हत्याएं करवाई थीं। यह बात सिर्फ हिन्दुस्तान में हो, ऐसा भी नहीं है। बहुत से देशों के बीच जब लड़ाईयां होती हैं, तब दुश्मन कहे जाने वाले देश की महिलाओं के साथ फौजियों का ऐसा सुलूक आम है। जो दुश्मन नहीं हैं, उनके साथ भी कई बार फौज इसी तरह का बर्ताव करती हैं। फौज के अलावा सुरक्षा बलों पर भी ऐसे आरोप लगते हैं, और भारत में भी मणिपुर से लेकर मिजोरम तक, और कश्मीर से लेकर बस्तर तक सुरक्षा बलों पर बलात्कार के आरोप लगते हैं कि उन्होंने हथियारबंद आंदोलनकारियों के हमलों का हिसाब चुकता करने के लिए स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार किया।
यह भारत और बाकी दुनिया की महिलाओं के प्रति सोच का एक सुबूत और संकेत है। महिलाओं को बदला लेने के लिए एक सामान की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और हिसाब चुकता किया जाता है। लोकतंत्र तो आ गया, लोगों में यह खुशफहमी भी आ गई कि वे सभ्य हो गए हैं, लेकिन उनके भीतर की मर्दानी-हिंसा कहीं नहीं गई, और जगह-जगह बलात्कार हो रहे हैं। और तो और अभी हमने सीरिया और इराक जैसे देशों में यह देखा है कि ईश्वर और धर्म का नाम लेकर आतंक करने वाले इस्लामी संगठन लगातार महिलाओं को गुलाम बनाकर उनके साथ बरसों तक बलात्कार को धर्म के मुताबिक काम साबित करते हैं। और दुनिया भर में होने वाले ऐसे अनगिनत बलात्कार के पीछे धर्म की कायम की हुई उस व्यवस्था का भी बहुत बड़ा हाथ है जिसके तहत मर्द को औरत से बेहतर और ऊपर बताया जाता है। दुनिया में एक भी शंकराचार्य, एक भी पोप, एक भी मुल्ला-मौलवी महिला नहीं हैं, और धर्म ने महिलाओं को शोषण के सिवाय कुछ दिया भी नहीं है। यही वजह है कि धर्म को मानने वाले लोगों की नजरों में औरत हमेशा से ही दूसरे दर्जे की नागरिक रहती हैं, और यह सोच धीरे-धीरे बलात्कारी होने लगती है, जरूरी नहीं है कि यह धार्मिक रीति-रिवाज के साथ, और धर्म की चर्चा के साथ किया गया आईएस जैसा बलात्कार हो, किसी आम मुजरिम का किया हुआ बलात्कार भी धर्म से उपजी उसकी मर्दाना सोच की वजह से होता है, और जब तक दुनिया में धर्मान्धता को बढ़ाया जाता रहेगा, तब तक लोकतंत्र का, इंसाफ का, महिलाओं का इसी तरह का नुकसान जारी रहेगा।
उत्तरप्रदेश का यह ताजा सामूहिक बलात्कार बताता है कि वहां सरकार तो बदल गई है, लेकिन मुजरिमों के हौसले नहीं बदले हैं, वे उसी तरह कायम हैं, और अब कई और किस्म के धार्मिक मुजरिम बढ़ जरूर गए हैं जो कि अपने धर्म और संस्कृति को दूसरे लोगों पर थोपने के लिए उनके तरह-तरह के हिंसक और पाखंडी रूप का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की साख के लिए एक बड़ी चुनौती है, और इससे उत्तरप्रदेश की साख चौपट भी होती है, वहां जाने, बसने, काम करने के पहले लोग सौ बार सोचेंगे कि अपने परिवार को खतरे में क्यों डालें।

छंटनी के इन दिनों में कर्मचारियों को सलाह

संपादकीय
24 मई 2017


भारत में सरकार के दावे चाहे जो हों चारों तरफ से छंटनी की खबरें आ रही हैं। कुछ तो अमरीका की वजह से आईटी से जुड़ी नौकरियां वहां भी कम हो रही हैं, और उसके असर से हिन्दुस्तान में भी कम हो रही हैं, लेकिन वही अकेली जगह नहीं हैं। आज खबर आई है कि टाटा मोटर्स मैनेजमेंट के स्तर पर पंद्रह सौ लोगों की छंटनी कर रहा है। और यह छंटनी मजदूरों की नहीं है, मैनेजरों की है। इससे परे भी बहुत सी छोटी और मझली कंपनियों और दूसरे तरह के कारोबार में लगातार नौकरियां घट रही हैं, बढ़ तो कहीं नहीं रहीं। ऐसे में सभी कामगारों को अपने काम को बचाने की फिक्र करनी चाहिए।
दरअसल किसी भी संस्थान में जब किसी को नौकरी से हटाने की बात आती है, तो जो सबसे निकम्मे कर्मचारी रहते हैं, उनकी बारी सबसे पहले आती है। इसलिए सारे कामगारों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि अगर नौकरी उनके लिए मायने रखती है, तो उनको मेहनत और ईमानदारी से मैनेजमेंट के सामने अपनी ऐसी साख बनाए रखना चाहिए कि उनकी नौकरी जाने की बारी सबसे आखिर में आए। अब अगर किसी कंपनी ने उत्पादन ही घट जाए, कारोबार ठंडा हो जाए, तो एक अलग बात है, लेकिन ऐसा न होने पर काबिल लोगों को निकालने के बारे में कोई मैनेजमेंट नहीं सोचता है। नौकरी के साथ, और खासकर भारत जैसे देश में जहां पर लोग रातों-रात हटाए नहीं जा सकते, वहां पर कर्मचारियों की सोच नौकरी के हमेशा जारी रहने की हो जाती है। और ऐसा होता नहीं है। देश के मजदूर कानून बहुत मजबूत नहीं है, तो कमजोर भी नहीं है। लेकिन कानूनों पर अमल इतना कमजोर है कि मैनेजमेंट लोगों को आसानी से निकाल देता है, और बरसों तक कर्मचारी अपना बकाया भी वसूल नहीं कर पाते, मुआवजा तो दूर की बात है।
नौकरी लंबी होने से और उसकी निश्चिंतता होने से एक दिक्कत यह होती है कि कर्मचारी अपने काम को बेहतर बनाने को भूल ही जाते हैं। आज किसी भी कामकाज में टेक्नालॉजी का दखल इतना बढ़ रहा है, और लगातार बदल रहा है, कि जो लोग नई मशीनों पर, नए कम्प्यूटरों पर काम करना नहीं सीख पाते, उन्हें मैनेजमेंट अपनी छाती पर बोझ मानकर चलता है। यह सिलसिला बहुत लंबा नहीं चल पाता और ऐसे लोग जो कि वक्त के साथ कदम मिलाकर नहीं चल पाते हैं, वे नौकरी खो बैठने का खतरा पाले रखते हैं। आज दुनिया में तेल का भाव जमीन पर है, इसलिए बाकी बहुत से कारोबार अभी भी ऊंचाई पर हैं। अगर पेट्रोलियम महंगा होगा, तो भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी, और ऐसे बुरे वक्त के लिए लोगों को तैयार रहना चाहिए, नौकरी देने वालों को भी, और नौकरी पाने वालों को भी। बुरे वक्त में अच्छे-अच्छे मालिक का हौसला जवाब दे जाता है, और कर्मचारियों को कहीं भी काम नहीं मिल पाता। इसलिए हर किसी को अपने काम को बेहतर बनाकर अपनी नौकरी की गारंटी बनाकर रखना चाहिए।

कश्मीर के जख्मों पर हिंदू-राष्ट्रवादी नमक

संपादकीय
23 मई 2017


ट्विटर पर लगातार हिंदू आक्रामकता के साथ लिखने वाले फिल्म अभिनेता परेश रावल ने कल ही यह कहा कि कश्मीर में जिस तरह जीप के सामने पत्थरबाज को बांधा गया था, उसके बजाय लेखिका अरुंधति राय को बांधना चाहिए था। उनकी इस ट्वीट पर बड़ा बवाल हुआ, लेकिन घोर साम्प्रदायिकता, और आक्रामक राष्ट्रवाद के हिमायती इस बात पर बड़े खुश हो गए। अरुंधति राय पर यह आरोप लगते हैं कि वे नक्सलियों की साथी हैं, और कश्मीर के विभाजन की हिमायती हैं। खैर अरुंधति का जो कहना है, वह तो पूरा का पूरा मंच और माईक से कहा हुआ है, या कि लिखा हुआ है। लेकिन जब देश का कानून अब तक अरुंधति को कोई सजा नहीं दे पाया है, या कि ये कहें कि देश की या प्रदेश की सरकारें अरुंधति को सजा नहीं दिला पाई हैं तो क्या उनके बारे में ऐसी हिंसक बात लिखना ठीक है? और दूसरी बात यह भी कि परेश रावल की कही हुई यह बात एक किस्म से कश्मीर में फौज की उस कार्रवाई को सही भी ठहराती है जिसमें उसने एक कश्मीरी नौजवान को जीप के सामने बांधकर आक्रामक पत्थरबाजों के बीच से सुरक्षित निकलने का काम किया था। इसके बाद फौज की इसको लेकर आलोचना हुई थी, लेकिन सरकार ने इस कार्रवाई को सही ठहराया था, और दुनिया को हैरान करते हुए भारतीय सेना ने ऐसा करने वाले अपने मेजर का कल एक पदक देकर सम्मान भी किया है।
यह पूरा सिलसिला बहुत घातक है, और परेश रावल जैसे कमअक्ल वाले बड़बोले-बकवासी चर्चित व्यक्ति जैसी ही समझ वाली फौज का सुबूत भी है। एक तरफ तो फौज अपनी सारी ताकत के बावजूद कश्मीर को काबू में नहीं रख पा रही है, और दूसरी ओर हालत यह है कि कश्मीर के जख्मों पर एक तरफ आक्रामक हिंदुत्ववादी ऐसा नमक छिड़क रहे हैं कि वह बाकी भारत से कभी मन न मिला पाए, दूसरी तरफ जो फौज कश्मीर में तैनात है, वह खुद अपनी ऐसी अलोकतांत्रिक और हिंसक कार्रवाई करने वाले अफसर को सम्मानित कर रही है। हो सकता है कि यह सम्मान किसी और बहादुरी की वजह से हो, लेकिन यह सम्मान कश्मीर को और जख्मी करने वाला है, उसे और अलग-थलग करने वाला है।
देश के बहुत से समझदार और अलग-अलग तबकों का यह मानना है कि कश्मीर को जोड़कर रखने के लिए कोई जरूरी बात तो हो नहीं रही है, लगातार उसे बाकी देश से तोडऩे की हरकत चल रही है। कश्मीर हिंदुस्तान की धरती का एक टुकड़ा भर नहीं है, वह इंसानों की आबादी भी है, और वह पाकिस्तान के साथ जुड़ी हुई सरहद पर बसा हुआ प्रदेश है जो कि बाकी तमाम बातों से परे, हिंदुस्तानी फौजी जरूरतों के हिसाब से भी बहुत अहमियत रखता है। भारत सरकार को तुरंत अपनी कश्मीर-नीति के बारे में सोचना चाहिए, देश के बहुत से जानकार लोगों का यह मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के बाद कश्मीर का इतना खराब हाल बीच में कभी नहीं था।

भ्रमचारी-बलात्कारियों का हौसला ठंडा करने का तरीका कुछ हिंसक जरूर है...

आजकल
22 मई 2017
केरल से एक दिल दहलाने वाली खबर आई है कि बाईस बरस की एक युवती ने अपने घर पर आए हुए एक हिन्दू, भगवाधारी स्वामी के बलात्कार से थककर चाकू से उस स्वामी का गुप्तांग काट दिया, और मर्दानगी की उसकी शान को चौपट कर दिया। इसके बाद उसने खुद होकर पुलिस को खबर की, और अब उसे केरल के जागरूक समाज से लेकर मुख्यमंत्री तक की वाहवाही मिल रही है। इस स्वामी का उस घर में दाखिला इस लड़की के पिता के इलाज के नाम पर हुआ था, और वह पिछले आठ बरस से इससे बलात्कार करते आ रहा था। जाहिर है कि यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब यह लड़की नाबालिग बच्ची रही होगी, और जब उसका बर्दाश्त जवाब दे गया, तब उसने आत्मरक्षा में यह हिंसक कार्रवाई की है। इस स्वामी को केरल के एक बहुत ताकतवर हिन्दू संगठन से जुड़ा हुआ बताया गया है और सुबूत में ऐसी दर्जनों तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आ रही हैं जिनमें यह स्वामी इस हिन्दू ऐक्य वेदी नाम के संगठन के लोगों को लेकर वहां के मुख्यमंत्री से भी मिल रहा है, और इस संगठन के दूसरे कार्यक्रमों में भी शामिल है।
यह मामला महज हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं है क्योंकि हम लगातार ऐसी खबरें भी देखते और छापते आ रहे हैं जिनमें पश्चिम के देशों में जहां कानूनी जागरूकता और अधिकार अधिक हैं, वहां पर चर्च के पादरी छोटे-छोटे बच्चों का देह-शोषण करते हैं, और जब ऐसे मामले उजागर भी होते हैं, तो कैथोलिक समुदाय के दुनिया के मुखिया पोप की तरफ से उन्हें माफी भी मिल जाती है, और चर्च उन्हें कानून के हवाले नहीं करता। अमरीका की एक दूसरी घटना को भी इसी सिलसिले में याद करना जरूरी है जिसमें इस्कॉन नाम के बहुचर्चित हिन्दू संगठन के एक हॉस्टल में बच्चों का देह-शोषण किया गया, और उसके एवज में अदालत से बाहर मामले को निपटाने के लिए इस संगठन ने सैकड़ों करोड़ का भुगतान किया।
दरअसल धर्म से जुड़े हुए संगठनों के साथ यह दिक्कत हमेशा इसलिए बनी रहेगी कि बहुत से धर्मों में बहुत किस्म के काम करने वाले स्वामी, पादरी, या इसी तरह के दूसरे लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे ब्रम्हचारी रहेंगे, शादी नहीं करेंगे, और पूरा जीवन, पूरी ताकत ईश्वर की सेवा में लगा देंगे। धर्म से परे कुछ एक आध्यात्मिक संगठन, या कि योग-ध्यान से जुड़े हुए कुछ संगठनों में भी ऐसे लोग रहते हैं जो कि शादी नहीं करते।
हमारा तजुर्बा यह है कि ऐसे लोग शादी तो नहीं करते, लेकिन बर्बादी बहुत करते हैं। और चूंकि इनकी पहुंच पेशेवर वेश्याओं तक नहीं रहती, इसलिए ये लोग आसपास के बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं, या कि आस्थावान महिलाओं को दबोचते हैं। ब्रम्हचर्य की पूरी की पूरी सोच प्रकृति के खिलाफ है। करोड़ों साल से विकसित होकर बना हुआ मानव शरीर कई तरह की जरूरतों को लेकर इस शक्ल में आया है, और इनमें से भूख और प्यास की तरह ही सेक्स एक बड़ी जरूरत है। जो कोई ब्रम्हचर्य मानने की बात तय करते हैं, उनको खुद को इस बात का अंदाज नहीं रहता कि उनके इस फैसले के खिलाफ उनके तन-मन कब-कब बागी हो जाएंगे, और किस हद तक उनको परेशान करेंगे। लेकिन होता यह है कि सार्वजनिक रूप से जब एक बार सांसारिकता को छोड़कर लोग धर्म या आध्यात्म में शामिल हो जाते हैं, अलग-अलग रंग के चोले पहन लेते हैं, तो फिर उन्हें वहां से बाहर निकलना आसान भी नहीं लगता , क्योंकि वह बहुत बड़ी शर्मिंदगी की बात होगी।
हमारा यह भी देखा हुआ है कि जिन धर्मों में जिन भूमिकाओं के लिए लोगों की शादी पर रोक नहीं होती है, वैसे लोग बलात्कार या यौन शोषण कम करते हैं, उनके मामले कम सामने आते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि प्रकृति ने तन-मन की जो जरूरतें बनाई हैं, उनके पूरे होने का कोई साधन उनके पास रहता है, और अपनी न्यूनतम जरूरतों के पूरा होने पर अगर वे संतुष्ट रह पाते हैं, तो यह संभावना अधिक रहती है कि वे अपने आप पर अधिक काबू भी पा सकें। दूसरी तरफ जिन लोगों को ब्रम्हचारी रहने की मजबूरी रहती है, उनके तन-मन उन्हें ईश्वर या आध्यात्म से परे दूसरी तन की तरफ धकेलते रहते हैं, और मासूम बच्चे उनके शिकार होते हैं, अपने परिवार या जीवन से निराश होकर आई हुई आस्थावान महिलाएं अपनी कमजोर या नाजुक मानसिक हालत की वजह से जल्द ही उनकी शिकार हो जाती हैं।
धर्म सेक्स के खिलाफ बहुत सी बातें कहता है, वह सेक्स को मोटे तौर पर केवल मानव जीवन के आगे बढ़ाने के काम के रूप में देखता है, और बाकी तमाम जरूरतों को अनदेखा करता है। हर धर्म में काम वासना के खिलाफ बहुत सारी बातें लिखी जाती हैं, और हिन्दू धर्म सहित बहुत से धर्मों में तो प्रार्थनाओं से लेकर प्रवचन तक में यह बात खुलकर कही जाती है कि अगर किसी को स्वर्ग पाना है, ईश्वर को खुश करना है, तो उसे अपने आपको काम वासना से दूर रखना चाहिए। एक तरफ तो ईश्वर की ऐसी तस्वीरें और ऐसी कहानियां हिन्दू धर्म में भरी पड़ी हैं जिनमें ईश्वर एक से ज्यादा महिलाओं की तरफ खिंचे रहते हैं, किसी दूसरे की पत्नी पर भी हाथ डाल देते हैं, अपने आसपास के वर्जित रिश्तों के साथ भी बलात्कार कर देते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं देवताओं की पूजा करने वालों को प्रकृति के खिलाफ जाकर सेक्स से दूर रहने की धार्मिक नसीहत दी जाती है।
यह पूरा सिलसिला सेक्स को तो नहीं घटा पाता, सेक्स अपराधों को जरूर बढ़ा देता है। ब्रम्हचर्य की असली शक्ल भ्रमचर्य की है, वे ब्रम्ह को तो हासिल नहीं कर पाते, ब्रम्ह को पाने के भ्रम को जरूर हासिल कर लेते हैं। जो लोग लगातार अपने जीवन को सेक्स से दूर रखने के संघर्ष में लगे रहते हैं, उनसे यह उम्मीद करना एक दिमागी पाखंड है कि वे ईश्वर के करीब जाने का संघर्ष कर रहे होंगे। जब किसी ब्रम्हचारी या साध्वी-सन्यासी, या कि पादरी का जीवन प्रकृति के खिलाफ संघर्ष से भरा हुआ हो, तब उनके पास इतना वक्त कहां हो सकता है कि वे ईश्वर के करीब जाने का संघर्ष करें।
इस बात को एक दूसरी मिसाल से समझा जा सकता है कि बहुत से धर्मों में बहुत से त्यौहारों पर तरह-तरह से उपवास रखने की प्रथा है। किसी ईश्वर ने ऐसा कहा हो कि उसके लिए उपवास रखें, ऐसा तो नहीं लगता, लोगों ने तरह-तरह की तकलीफें पाने, तरह-तरह से अपने पर काबू पाने को धर्म, और ईश्वर तक पहुंचने का जरिया मान लिया है। जब धार्मिक उपवास चलते हैं, तो यह जाहिर है कि लोगों का ध्यान इस बात पर लगे रहता है कि भूखे रहने के घंटे कब खत्म होंगे, और कब उन्हें खाने को क्या-क्या मिलेगा, और ऐसे घंटों के लिए लोग तरह-तरह की चीजों का इंतजाम भी करके रखते हैं, उपवास के बाद के तरह-तरह के पकवान तैयार किए जाते हैं। ऐसे लंबे उपवासों के दौरान जब उपवास करने वाले लोग आपस में मिलते हैं, तो उनके बीच बहुत कम ही चर्चा ईश्वर के बारे में होते दिखती है, उनकी अधिक चर्चा उपवास और उपवासी पकवान तक सीमित रहती है, कि क्या-क्या खाया जा सकता है, कैसे-कैसे पकाया जा सकता है।
मतलब यह कि जिस चीज से दूर धकेलने की कोशिश होती है, खासकर प्रकृति की जरूरतों के खिलाफ जाकर जो करने की कोशिश होती है, उस दौरान लोगों के तन-मन उसी तरफ जाने की कोशिश करते हैं। जब लोगों के मन खाने में फंसे हों, तो बिना भोजन भजन आखिर कैसे हो सकते हैं? जब लोगों को मजबूरी में सेक्स से दूर रहना पड़े, तो जाहिर है कि उनके तन-मन उन्हें सेक्स की संभावनाओं की तरफ खींचते और धकेलते रहेंगे, और ईश्वर की बारी तो इस जरूरत के पूरे होने के बाद कभी आएगी तो आएगी।
दूसरी बात यह कि हर किस्म के धर्म में किसी भी पाप से मुक्ति पाने के लिए प्रायश्चित के कई तरह के रास्ते बना दिए गए हैं। धर्म को जब शोषण के सबसे बड़े और सबसे दीर्घकालीन हथियार की तरह डिजाइन किया गया, तो उसी साजिश के दौरान यह भी समझ लिया गया था कि इंसान तो इंसान ही रहेंगे, और उनकी इंसानी जरूरतें भी कायम रहेंगी। अगर पाप करने वाले लोगों को धर्म से निकाल देने का सिलसिला शुरू होगा, तो ईश्वर और उसके एजेंट पोप-पुजारी ये सब भूखे ही मर जाएंगे। इसलिए तमाम किस्म के मुजरिमों और पापियों को धर्म में बनाए रखने के लिए प्रायश्चित नाम की एक ऐसी लॉंड्री खोली गई जहां अपनी आत्मा लाकर लोग कुछ बिल चुकाकर उसे साफ करवा सकते हैं, और फिर छाती पर किसी बोझ के बिना बाकी दुनिया में जाकर एक बार फिर से पाप करना शुरू कर सकते हैं।
पश्चिमी देशों में ईसाई धर्म को मानने वालों के बीच अधिकतर जगहों पर लोकतंत्र कुछ अधिक विकसित है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान वहां पर धार्मिक भावना के मुकाबले कम नहीं है। इसीलिए अमरीका से लेकर फ्रांस और जर्मनी तक लोगों को धार्मिक पुस्तकों को जलाने की आजादी है, अलग-अलग धर्मों के ईश्वरों को लेकर कार्टून बनाने की आजादी है, और तरह-तरह के लतीफे गढऩे की आजादी है। ईसाईयों के बीच पश्चिमी देशों में चर्च के कन्फेशन चेम्बर को लेकर अनगिनत लतीफे हैं कि किस तरह लोग वहां जाकर अपने पाप की स्वीकारोक्ति करते हैं, और किस तरह उसके बाद दूसरी तरफ बैठा हुआ पादरी उन पापों को माफ करता है। इस चेम्बर को लेकर पादरियों के सेक्स को लेकर अब तक लाखों लतीफे और कार्टून बन चुके हैं कि वे किस तरह अपराधबोधग्रस्त लोगों का फायदा उठाते हैं, और खुद अपने लिए सेक्स की संभावनाएं ढूंढ लेते हैं।
बहुत से देशों में बहुत से धर्म अपनी खामियों और अपने पाखंड की चर्चा से परहेज करते हैं, न मजाकिया चर्चा, न ही गंभीर चर्चा। नतीजा यह होता है कि वहां पर पाखंड और पनपते चलता है, और उसे दबाकर, छुपाकर रखा जाता है। लोगों को याद होगा कि बहुत से स्वामियों के सेक्स की वीडियो रिकॉर्डिंग पिछले बरसों में सामने आई है, और हमने अपने खुद के इलाके में प्रदेश के सबसे बड़े कुछ मठों के महंतों की सेक्स की कहानियां सुनते-सुनते ही जिंदगी गुजारी है। यह सार्वजनिक चर्चा रहती है कि ब्रम्हचारी जीवन गुजारने वाले ऐसे महंत के सेक्स संबंधों से उनकी कौन-कौन सी संतानें हैं, और उन्हें मठ की जमीनों में से कौन-कौन सी जमीनें दी गई हैं। यह सिलसिला अनंत है, और चूंकि धर्म को बहुत से लोग कानून और तर्क से परे की चीज मान लेते हैं, इसलिए ऐसे भ्रमचर्य पर भी कोई चर्चा नहीं हो पाती है। ऐसी नौबत में ऐसे भ्रमचर्य का एक आसान और अच्छा इलाज यही है कि तेज धार वाला एक चाकू या उस्तरा रखा जाए, और धर्म की मर्दानगी का ऐसा विसर्जन कर दिया जाए। हमारा ख्याल है कि देश का कानून भी धर्म के बलात्कार के खिलाफ आत्मरक्षा के लोगों के अधिकार का सम्मान करेगा, केरल में जनता और मुख्यमंत्री ने यह सकारात्मक रूख दिखाया है, और शायद यही तरीका बाकी भ्रमचारी-बलात्कारियों का हौसला ठंडा कर सकेगा। 

जंगली जानवर कहीं मर रहे कहीं मार रहे, सोचना जरूरी

संपादकीय
22 मई 2017


छत्तीसगढ़ में आज लगातार दूसरा दिन है जब हाथियों के पैरों तले दो महिलाओं की मौत हो गई है। राज्य के जिन इलाकों में हाथी हैं, वहीं पर जंगल भी है, और वहां पर गांवों की अर्थव्यवस्था जंगलों पर टिकी हुई है। कभी महुआ बीनने, तो कभी तेंदूपत्ता के लिए गांव के लोग जंगल जाते हैं और हाथियों का शिकार हो जाते हैं। दूसरी तरफ लगातार इस प्रदेश में भालू मरते हुए दिख रहे हैं और आए दिन कहीं न कहीं भूख-प्यास से मरते हुए भालुओं की तस्वीरें आती हैं। इन दोनों के अलावा कई जगहों पर लोगों पर हमला करते हुए भालू की खबरें भी आती हैं, और लोग कहीं बिजली के तार बिछाकर तो कहीं जहर डालकर जानवरों को मारते हुए दिखते हैं।
इंसान और जानवरों का यह टकराव नया मुद्दा तो नहीं है, लेकिन यह बढ़ता हुआ मुद्दा जरूर है। छत्तीसगढ़ में जंगली जानवरों के हक को लेकर लोग हाईकोर्ट भी गए हुए हैं और सरकार वहां पर जवाब देने के लिए खड़ी हुई है। इस दिक्कत को देखें तो यह बात साफ समझ आती है कि जानवरों के हक के जंगलों पर जैसे-जैसे इंसान का कब्जा बढ़ा, वैसे-वैसे उनके पेड़ कटे, और उनके पीने के लिए पानी भी नहीं बचा। नतीजा यह होता है कि जंगल से जानवर आसपास की बस्तियों में कभी पालतू जानवरों के शिकार के लिए आ जाते हैं, तो कभी पानी पीने आ जाते हैं। और अगर इंसान यह सोचते हैं कि वे जंगलों पर काबिज होते जाएंगे, जंगलों के बीच से सड़कें निकालेंगे, वहां खदानों को खोदते रहेंगे, और पेड़ काटते रहेंगे, तो इसे बर्दाश्त करके जानवर चुप भी नहीं बैठेंगे। यह टकराव बढ़ते चलेगा, और हो सकता है कि धीरे-धीरे जानवर मिट ही जाएं। आज तो जहां जंगल बचे हुए हैं, वहीं पर जानवर हैं। और कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यह कहा था कि पड़ोसी राज्यों से हाथियों के छत्तीसगढ़ आने का यही मतलब है कि यहां पर जंगल अभी बचे हुए हैं। अगर जंगल न होते तो हाथी अपना इलाका छोड़कर यहां क्यों आते? लेकिन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच बरसों से हाथी-गलियारे की बात भी चल रही है, और ऐसा न होने पर हाथियों और इंसानों का टकराव होते चल रहा है, जिसमें आमतौर पर जान इंसानों की जा रही है, और ऐसे इंसानों की जा रही है जो कि जंगल गए बिना जिंदा रह नहीं सकते।
हमारा मानना है कि जंगलों में शहरों को घुसना बंद करना होगा। आज टेक्नालॉजी ने शहरों को आसमान की तरफ ऊपर उठने की सहूलियत दी है। शहरों को अपनी जमीन पर ऊंची इमारतें बनानी होगी, और जंगलों की तरफ जाना बंद करना होगा। इसके बिना यह तबाही नहीं रूकेगी, और जंगलों का मिटना महज जंगली जानवरों के लिए खतरा नहीं है, धरती के पर्यावरण के लिए भी खतरा है, और पेड़ों के घटते चले जाने से बारिश का पानी जड़ों के आसपास की मिट्टी को भी नदियों में ले आएगा, उनमें गाद भर देगा, नदियों की पानी की क्षमता घट जाएगी, और कुल मिलाकर जमीन के नीचे का पानी घट जाएगा। इसलिए जंगलों को बचाना जानवरों के लिए जरूरी नहीं है, यह इंसान के खुद के लिए जरूरी है, और आज जानवरों की बदहाली को एक संकेत और सुबूत मानना चाहिए कि इंसान अपने काम के जंगलों को खत्म कर रहा है, खत्म कर चुका है। इस मुद्दे पर राज्य और केन्द्र सरकार को बेबस करने के लिए वन्य प्राणी संगठनों और पर्यावरणवादियों को लगातार दबाव बढ़ाना होगा। 

मोदी सरकार के तीन बरस और भाजपा की रीति-नीति

संपादकीय
21 मई 2017


नरेन्द्र मोदी की सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर राजनीतिक और सरकारी दोनों किस्म के मोर्चों पर बहुत तरह के विश्लेषण होने शुरू हो गए हैं, और ये कई दिनों तक चलते रहेंगे। आर्थिक मोर्चे के अधिक जानकार लोग उस बारे में लिखेंगे, और विदेश नीति के जानकार लोग उस बारे में। लेकिन बहुत सी साधारण बातें हैं जिन पर लिखने के लिए एक साधारण समझ काफी होती है, और न्याय की सोच जरूरी होती है। इनमें से एक, राजनीतिक पैमाने पर तौला जाए तो नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्री बनने के पहले से जिस तरह देश के जनमत को झकझोर कर रख दिया था, और एक ऐतिहासिक जीत के  साथ वे भाजपा को सत्ता पर लेकर आए थे, उस पर तो लिखा जा चुका है, लेकिन उस राजनीतिक जीत की जो निरंतरता बनी हुई है, वह हैरान करने वाली है। एक के बाद दूसरा राज्य जीतकर भाजपा ने अपनी ताकत और अपनी जमीनी पकड़ को उसकी अपनी उम्मीद से बहुत अधिक बढ़ा लिया है। और देश के दूसरे राजनीतिक दलों के सामने यह बात न सिर्फ एक मिसाल की तरह खड़ी हो गई है, बल्कि एक ऐसी चुनौती भी बन गई है जिसका कोई मुकाबला 2019 के आम चुनावों में भी लोगों को नहीं दिख रहा है।
हम कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा करना चाहते हैं कि भाजपा की इस बुलंदी की क्या वजहें रही हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की गुजरात के कार्यकाल की जोड़ी दिल्ली में आकर पहली बार काम कर रही है, और उसने दिल्ली सहित पूरे देश के अपने संगठन को कुछ इस तरह मजबूत पकड़ में ले लिया है कि उनसे परे भाजपा में कुछ बचा हुआ दिखता नहीं है। अब कुछ लोगों को यह लग सकता है कि दो लोगों के हाथों में सत्ता का इतना इक_ा हो जाना लोकतांत्रिक नहीं है, लेकिन देश की अधिकतर पार्टियां तो ऐसी हैं जिनमें दो नेता भी नहीं, महज एक ही कुनबे के हाथ में पूरी ताकत है, ऐसे में दो लोगों के हाथों में ताकत को अलोकतांत्रिक कैसे कहा जाए? दूसरी बात यह कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने खुद अविश्वसनीय किस्म की रोजाना की मेहनत लगातार जारी रखी है, और उनकी पार्टी के जिला स्तर के नेताओं का भी यह कहना है कि जिस तरह पार्टी में एक वक्त संघ के प्रचारक आकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता का काम करते थे, आज उसी तरह भाजपा के हर सदस्य से पूर्णकालिक मेहनत करवाई जा रही है, और साल भर पार्टी के कार्यक्रम चल रहे हैं।
तीसरी बात यह कि भाजपा ने इन तीन बरसों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लेकर गोहत्या या नौजवानों के प्रेम जैसे बहुत से भावनात्मक मुद्दों को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचाने से कोई परहेज नहीं किया, और पार्टी के कुछ नेता अहिंसक बातें करते रहे, और कुछ दूसरे नेता घोर हिंसक और साम्प्रदायिक बातें करते हुए ही केन्द्रीय मंत्री, और राज्य के योगी सरीखे मुख्यमंत्री भी बनते रहे। देश की जनता के बीच एक धुंध सी कायम रही, और दोनों तरह के नेताओं की जगह बनाकर भाजपा ने हिन्दुओं के बीच अपने पांव पहले के मुकाबले बहुत अधिक फैला लिए। इसके साथ-साथ भाजपा ने बहुत सारी चीजों को लेकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद का नारा भी लगा दिया। जिस तरह की तकलीफदेह नोटबंदी रही, और उसमें तकलीफ पाते हुए लोग जिस तरह उस तकलीफ को देशभक्ति से जोडऩे के लिए उत्साही दिखे, वह एक अविश्वसनीय किस्म की बात रही। लोगों ने जब एक नामौजूद राष्ट्रीय जरूरत के नाम पर नोटों की अपनी सहूलियत, और रोज की अपनी कमाई को भूल जाने को भी बुरा नहीं माना, तो वह भाजपा के लिए उम्मीद से अधिक उपलब्धि थी।
लेकिन दूसरे राजनीतिक दलों को सीखने और समझने के लिए जो जरूरी है, वह भाजपा की मेहनत और उसका तौर-तरीका है। उसकी बहुत सी नीतियां गलत हो सकती हैं, लेकिन उसकी मेहनत और उसकी रणनीति ने उन गलतियों और उन गलत कामों को दबा दिया। जनता के बीच अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने और उन्हें प्रभावित करने की भाजपा की रणनीति से दूसरे राजनीतिक  दलों को सीखने की जरूरत है। भाजपा की आलोचना तो ठीक है, लेकिन देश के चुनावी लोकतंत्र में जिसे भी भाजपा से अगला चुनाव लडऩा है, वे भाजपा से कम से कम कुछ सीख भी लें।

कुछ के तलुए सहलाना और कुछ को पैरोंतले कुचलना...

संपादकीय
20 मई 2017


छत्तीसगढ़ में जनता की दिक्कतों को जानने के लिए चल रहे लंबे लोकसुराज कार्यक्रम में अभी एक जिले में लगातार दो दिन वहां के कलेक्टर पर भाजपा के दो नेता बरसे। एक भूतपूर्व मंत्री थे, और एक वर्तमान मंत्री। इन दिनों हर किसी के हाथ में मोबाइल फोन रहता है इसलिए इन दोनों घटनाओं की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तैर रही है। कुछ लोगों को लग सकता है कि नेताओं ने अफसर के साथ बुरा सुलूक किया है, कुछ लोगों को यह लग सकता है कि जनता की दिक्कतों की बात करने वाले सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेताओं के साथ बात करते हुए कलेक्टर का व्यवहार ठीक नहीं था। लेकिन इन दोनों में से जो भी बात सही हो, यह बात तो अपनी जगह सही है ही कि जिसके हाथ अधिक ताकत रहती है, उसका बर्ताव अपने से कमजोर लोगों के साथ अमूमन खराब रहता है। लोगों का बर्ताव अपने से बड़े ओहदे वाले, या कि अधिक ताकत वाले लोगों के साथ तो चाहते हुए, या कि मजबूरी में अच्छा रहता है, लेकिन जहां अपने से कमजोर लोग सामने आए, लोग अपने असली रंग में आने लगते हैं, और बदसलूकी शुरू हो जाती है।
आज ही महाराष्ट्र की एक खबर है कि किस तरह वहां जेल में बंद एक विधायक ने अदालत जाने के लिए गाड़ी लेट होने पर पुलिस को धमकाया और गालियां देते हुए कहा कि पुलिस उसे जानती नहीं है क्या? यह विधायक तीन सौ करोड़ के घोटाले में 19 महीने से जेल में है, लेकिन ऐंठ अभी तक गई नहीं है। पुरानी कहावत है कि रस्सी जल गई, लेकिन बल नहीं गया। ऐसा ही इस विधायक के बर्ताव से दिखाई पड़ता है, और महाराष्ट्र से परे कम से कम पूरे हिन्दुस्तान में तो यह दिखता ही है कि ताकत सिर चढ़कर बोलती है, और कमजोरी लोगों को पैरों पर गिरा देती है। अब अगर इसके पीछे की मानसिकता को देखें, तो इसकी एक बहुत अच्छी मिसाल इन दिनों हिन्दुस्तानी टीवी पर बड़े मशहूर हुए कपिल के कॉमेडी शो में देखने मिलती है।
जिन लोगों ने यह कार्यक्रम देखा है उन्होंने भी इस बात का एहसास नहीं किया होगा कि पूरे का पूरा कार्यक्रम इस सोच पर बनाया गया है कि इसका मुख्य किरदार कपिल शर्मा, अपने से कमजोर तमाम लोगों की खिल्ली उड़ाकर, उनको बेइज्जत करके, उनके साथ परले दर्जे की बदसलूकी करके लोगों को हंसाता है। दूसरी तरफ कार्यक्रम में आने वाले प्रमुख कलाकारों से वह शुरू से आखिर तक महज चापलूसी करता है, और मानो उनके तलुए सहलाता है। इस कार्यक्रम को अगर देखें तो यह इंसानी सोच के दो बिल्कुल अलग-अलग पहलुओं के बीच बना हुआ है। ताकतवर के तलुए सहलाओ, और कमजोर को पैरोंतले कुचलो। एक-दो बरस से लगातार यही करते-करते इस कामयाब कॉमेडियन की अपनी सोच यह हो गई कि कुछ महीने पहले उसने अपने ही साथियों से एक विमान में नशे में धुत्त होकर भारी बदसलूकी की, और उसके घमंड को देखकर वे कलाकार कार्यक्रम छोड़ गए।
शोहरत और कामयाबी की ताकत किस तरह सिर चढ़कर सब कुछ तबाह करती है, इसकी इससे बड़ी कोई मिसाल हाल के बरसों में हमें याद नहीं पड़ती। और कॉमेडी शो से लेकर राजनीति तक, सरकार तक, और सार्वजनिक जीवन तक लोगों का बर्ताव इन्हीं दो ध्रुवों के बीच कभी इधर तो कभी उधर खिसकते रहता है। बहुत से लोग तो ठीक इसी कॉमेडी शो की तरह, कुछ मिनट चापलूसी में लग जाते हैं, और कुछ मिनट दूसरे लोगों को दुत्कारने में। इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार को सत्तारूढ़ नेताओं और सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों के बर्ताव तय करने के लिए मेहनत करनी चाहिए। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के एक मंत्री महज तौलिया लपेटे हुए कुर्सी पर पसरे दिख रहे थे, और सामने उनके दरबार में बहुत सी बेबस महिलाएं अपनी अर्जियां लेकर खड़ी थीं। हमारा ख्याल है कि ऐसे बर्ताव चाहे वे मंत्रियों के हों, या कि अफसरों के हों, इसके खिलाफ जनता को भी उठ खड़ा होना चाहिए, और इसे जमकर धिक्कारना चाहिए, क्योंकि सरकारी कामकाज जनता के पैसों पर चलता है, वह किसी निजी टीवी कंपनी का बनाया हुआ कॉमेडी शो तो है नहीं। सरकार अगर खुद नहीं सुधरती, तो उसके लोगों की बदसलूकी के खिलाफ जनता को उठना चाहिए। सरकार की ताकत की ऐसी ही बददिमागी के चलते हुए दो दिन पहले बिलासपुर में एक गरीब औरत बच्चे को जन्म देने दो सरकारी अस्पतालों से भगा दिए जाने के बाद सड़क किनारे के किसी खंडहर में बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर हुई थीं। यह मामला खबरों से हटा नहीं है कि आज एक और तस्वीर छपी है कि किस तरह 92 बरस की एक बुजुर्ग महिला को वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए सरकारी दफ्तर में बुलाया गया, और उसके परिवार का एक आदमी उसे ठेले पर लिटाकर भरी धूप में वहां लेकर गया। सरकार अगर संवेदनशील नहीं होती, तो ऐसे मामलों को लोगों को उठाना चाहिए, और इनके लिए जिम्मेदार अफसरों या नेताओं के नाम दूसरों के सामने बार-बार दुहराने चाहिए।

भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए

संपादकीय
19 मई 2017


आज देश भर में कारोबारियों के बीच महज एक बात की चर्चा है कि नए लागू होने वाले जीएसटी से क्या-क्या फर्क पड़ेगा। बाजार का दोनंबरी हिस्सा इस बात को लेकर भी फिक्र में है कि क्या इससे बिना बिल, बिना टैक्स का धंधा करना मुश्किल हो जाएगा? लेकिन इन सबसे परे एक मजे की बात यह है कि यूपीए सरकार के पूरे दस बरस जीएसटी का पूरी ताकत से विरोध करने वाली एनडीए ने आज सरकार में रहते हुए इसे लागू किया है, और यूपीए ने विपक्ष के अपने हक का इस्तेमाल करते हुए पिछले ढाई बरस इसका विरोध किया, लेकिन अब साथ देकर संसद में जीएसटी बिल पास करा लिया, क्योंकि यह जीएसटी बिल यूपीए का ही बनाया हुआ था।
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ सहित भाजपा वाले राज्यों के वित्त और वाणिज्य मंत्रियों ने यूपीए की बुलाई हुई राज्यों की बैठकों में लगातार जीएसटी का जमकर विरोध किया था, और अब केन्द्र की सत्ता में आने के बाद अपने सारे विरोध को वापिस लेकर वित्तमंत्री अरूण जेटली मानो दूसरे पक्ष की तरफ से अदालत में जिरह करने लगे, और जीएसटी पास कराने के लिए पसीना बहाने लगे। लेकिन ऐसा सिर्फ इसी एक मामले को लेकर नहीं हुआ है, यूपीए सरकार का एक और बहुत बड़ा कार्यक्रम था आधार कार्ड का, जिसे एनडीए ने देश के लिए तबाही करने वाला, और गोपनीयता, निजता खत्म करने वाला करार दिया था, और घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर एनडीए की सरकार आधार कार्ड को खत्म कर देगी। लेकिन सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री से आधार कार्ड के जन्मदाता, कांग्रेस में शामिल हो चुके नंदन निलेकेणि ने मुलाकात की, और एक ही मुलाकात में नरेन्द्र मोदी आधार कार्ड पर कुछ ऐसे फिदा हुए कि सुप्रीम कोर्ट की सारी रोक-टोक के खिलाफ जाकर भी हर बात के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया, और अब तो भारत में आधार कार्ड को लेकर लतीफे और कॉर्टून बनते हैं कि इसके बिना लोग क्या-क्या नहीं कर सकते।
हम जीएसटी पर चर्चा के लिए आज यहां नहीं लिख रहे, हमारा मकसद राजनीति के इस पहलू पर लिखना था कि बहुत सी बड़ी योजनाओं और बड़ी नीतियों पर भारत की राजनीति में विरोध के लिए विरोध का जो माहौल है, उससे बड़ा नुकसान भी होता है। राजनीतिक दलों के बीच कटुता इतनी हावी हो जाती है कि जनकल्याण के लिए भी सत्ता और विपक्ष के बीच बातचीत नहीं हो पाती। एनडीए सरकार ने कश्मीर में भाजपा की पुरानी सारी कश्मीर-नीति या कश्मीर-रणनीति को किनारे धर दिया है, और अपने सारे सिद्धांतों को छोड़कर वह वहां पर राज्य सरकार में हिस्सेदार हो गई है। हम ऐसी बातों को याद दिलाकर एनडीए या भाजपा को कोई ताना देना नहीं चाहते क्योंकि भारत जैसे संसदीय-चुनावी लोकतंत्र में बहुत से मुद्दे चुनावों के साथ खत्म हो जाते हैं। जो नरेन्द्र मोदी पूरे चुनाव में नवाज शरीफ को मनमोहन सरकार की खिलाई बिरयानी को गिनाते हुए आमसभाओं में यह दावा करते थे कि किस तरह एक हिन्दुस्तानी फौजी के सिर के बदले दस या कितने सिर पाकिस्तानी सैनिकों के लेकर आएंगे, वही नरेन्द्र मोदी खुद होकर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाने पाकिस्तान गए, उनके परिवार के लिए तोहफे लेकर गए, और उनके परिवार से मोदी की मां के लिए आए हुए तोहफों को मंजूर भी किया।
भारतीय राजनीति में थोड़ी सी परिपक्वता बढऩे की जरूरत है। सत्ता और विपक्ष इन दोनों में रहते हुए तर्क और न्याय को छोडऩा नहीं चाहिए। देश के हित में क्या है, और दुनिया के हित में क्या है यह ध्यान में रखकर ही चुनावी राजनीति करनी चाहिए। यह एक अच्छी बात है कि यूपीए के बनाए हुए बहुत से कार्यक्रमों को, बहुत से नीतियों को, एनडीए लागू कर रही है, जारी रखे हुए हैं, और उनके लिए अंधाधुंध बजट भी दे रही है, जैसे कि आधार कार्ड के लिए, या कि मनरेगा की मजदूरी के लिए। भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए, और उसकी वजहें, महज कुछ ही वजहें हमने यहां गिनाई हैं।

किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव

संपादकीय
18 मई 2017


हरियाणा के मुख्यमंत्री रहते हुए ओमप्रकाश चौटाला पर शिक्षक भर्ती में बड़े घोटाले का मुकदमा चला, और दो बरस पहले अदालत से उन्हें दस बरस कैद मिली। वह कैद अब तक जारी है इससे यह जाहिर होता है कि उन्हें ऊपर की किसी अदालत से अधिक राहत नहीं मिल पाई। चौटाला परिवार के ऊपर सत्ता की ताकत से अंधाधुंध कमाई के राजनीतिक आरोप भी लगते रहे, और जब किसी को ऐसी सजा मिल जाती है, तो यह जाहिर रहता है कि उनके खिलाफ आरोप संदेहों से परे साबित हो चुके हैं। वरना हिन्दुस्तानी अदालतों से ताकतवर तो आमतौर पर बाहर अपनी कार तक लाल कालीन बिछाकर लौटते हैं, और वहां से जेल महज गरीब और कमजोर ही जाते हैं। लेकिन सत्ता पर बैठकर भ्रष्टाचार पर लिखने को नया कुछ भी नहीं है, चौटाला पर लिखने का मौका एक दूसरी वजह से है कि 82 बरस की उम्र में ओमप्रकाश चौटाला ने जेल के भीतर से बारहवीं की परीक्षा पास की है, और फस्र्ट डिवीजन में पास की है। अब इसके बाद वे कॉलेज की पढ़ाई करना चाहते हैं। परिवार ने बताया कि वे एक पारिवारिक शादी के लिए पैरोल पर घर आए थे, लेकिन परीक्षा देने के लिए फिर जेल लौट गए।
अब यह बात बड़ी दिलचस्प है कि 82 बरस की उम्र में, जब अगले आठ बरस जेल में और रहना है, तब कोई ताकतवर आदमी मेहनत से पढ़े, और इम्तिहान दे। इस बात को हम इस भरोसे के साथ लिख रहे हैं कि जिस भ्रष्टाचार की वजह से चौटाला जेल में है, वैसा कोई भ्रष्टाचार उन्होंने जेल के भीतर इस परीक्षा को पास करने के लिए नहीं किया होगा। अभी तक की खबरें बताती हैं कि उन्होंने मेहनत से पढ़ाई की है, और यह मेहनत, यह लगन, दूसरों के लिए कुछ सीखने की बात भी हो सकती है। एक अरबपति परिवार का एक बुजुर्ग, मुख्यमंत्री रहने के बाद 80 बरस की उम्र में जेल जाए, और वक्त का इस्तेमाल करके पढ़ाई करे, तो इससे जेल के भीतर के बाकी लोग, और जेल के बाहर के आजाद लोगों को भी यह सीखने का मौका मिलता है कि समय का कैसा इस्तेमाल किया जा सकता है।
आज जेल के बाहर भी हिन्दुस्तान में दसियों करोड़ ऐसे नौजवान हैं जो स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई के बाद निठल्ले बैठे हुए हैं, और उन्हें अपनी नालायकी, या निकम्मेपन को सही ठहराने के लिए कुछ तर्क भी हासिल हैं। अगर वे अनारक्षित तबके के हैं, तो वे आरक्षित तबकों को कोस लेते हैं, अगर वे गरीब हैं, तो उनके पास यह तर्क है कि सरकारी नौकरी तो बिना रिश्वत मिलती नहीं है। लेकिन खाली बैठे हुए लोग अंग्रेजी सीखें, कम्प्यूटर सीखें, तौर-तरीके सीखें, सामान्य ज्ञान बढ़ाएं, तो जीवन में उनकी सभी तरह की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की आबादी के एक बड़े हिस्से में लोगों के मन में चुनौतियों के लिए कोई सम्मान नहीं है, और बच्चे यह उम्मीद करते हैं कि मां-बाप उन्हें पढ़ाएं-लिखाएं, और उसके बाद उनके लिए एक नौकरी भी खरीद दें। और जब तक नौकरी न खरीदी जा सके, तब तक एक मोबाइल और एक मोबाइक जरूर खरीद दें। दूसरी तरफ दुनिया के जो विकसित और संपन्न देश हैं, उनमें खरबपतियों के बच्चे भी अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में जेब खर्च निकालने के लिए कहीं वेटर की तरह काम कर लेते हैं, कहीं कार धो लेते हैं, तो कहीं किसी और किस्म की मजदूरी कर लेते हैं। विकसित सभ्यताओं में उन बच्चों को हिकारत के साथ देखा जाता है जो अपने संपन्न मां-बाप के पैसों पर पलते हुए बिना कोई काम करते हुए कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में मेहनत को हिकारत से देखा जाता है, और यहां के नौजवान यह मानकर चलते हैं कि पढ़-लिख लेने के बाद थोड़े समय के लिए भी मेहनत का कोई काम करना उनका बड़ा अपमान होगा।
लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा, और यह सोचना होगा कि फिजूल गुजारा हुआ वक्त कभी दुबारा नहीं आता। घड़ी के कांटे उल्टे नहीं घूमते, और न ही चलती हुई घड़ी के कांटे थमकर यह इंतजार करते हैं कि उसे बांधे हुए लोग पहले कुछ और कर लें, तब फिर घड़ी आगे बढ़ेगी। लोग अगर यह सोचें कि हर दिन का एक तिहाई वक्त तो सोने में जाता है, बाकी वक्त में कुछ घंटे रोज के जरूरी कामों में जाते हैं। इस तरह किसी के पास भी जिंदगी में आधे से कम वक्त ही कुछ करने के लिए बचता है। इसलिए रोज एक घंटे बर्बाद करने वाले लोग भी रोज के पूरे समय में से दो घंटे बर्बाद कर लेते हैं। यह सोचकर लोगों को वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए, और इसकी संभावनाएं बहुत हैं। बयासी बरस की उम्र में एक अरबपति जेल में रहते हुए मेहनत करके पढ़ रहा है, और अगर बाकी की आठ बरस की कैद पूरी गुजारनी पड़ी, तो हो सकता है कि ओमप्रकाश चौटाला एमए-पीएचडी होकर जेल से निकलें। एक किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव होता है।

मोहब्बत का दुश्मन बना हुआ यह देश

संपादकीय
17 मई 2017


अभी जब यह अखबार तैयार हो रहा है छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक नौजवान ने एक युवती की कटार भोंककर हत्या की कोशिश की, और खुद एक टॉवर पर चढ़कर कूदकर जान दे दी। पिछले ही हफ्ते इसी राज्य के महासमुंद में दो नौजवानों ने एक साथ फांसी लगा ली, और उनके बारे में बाद में बताया गया कि उन दोनों की प्रेमिकाओं की किसी और से शादियां हो गईं, और इसी गम में उन्होंने जान दे दी। ऐसा कोई दिन नहीं होता जब प्रेम को लेकर कोई आत्महत्या न होती हो, यह एक अलग बात है कि नफरत को लेकर आत्महत्या करने की बात भी सुनाई नहीं देती है कि कोई व्यक्ति किसी विचारधारा या किसी नेता से नफरत करते हुए आत्महत्या कर ले।
भारत में लगातार प्रेम के खिलाफ एक नफरत का माहौल बढ़ते चल रहा है। दरअसल लोगों की जितनी दिक्कत किसी के प्रेम से है, उससे कहीं अधिक दिक्कत इससे है कि वह प्रेम किसी ऐसे न हो जाए जो कि किसी दूसरी जाति का हो, या कि किसी दूसरे धर्म का हो। बहुत से लोगों की दिक्कत यह भी रहती है कि अपने अमीर घर के लड़के या लड़की को किसी गरीब से मोहब्बत न हो जाए। ऐसे में धर्म और जाति व्यवस्था, आर्थिक असमानता, ये सब तो नौजवान मोहब्बत पर टूट ही पड़ते हैं, इनके अलावा भी परिवार के लोगों का भरोसा इस बात से भी टूटता है, और उन्हें इस बात से भी निराशा होती है कि घर के लड़के या लड़की के जीवनसाथी चुनने का मौका उन्हें नहीं मिल रहा। यह पूरा सिलसिला एक पूरी नौजवान पीढ़ी को निराशा में जीने या हताशा में मरने के लिए बेबस करके छोड़ रहा है।
हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि दुनिया में वही समाज आगे बढ़ते हैं, वही देश तरक्की करते हैं जहां पर नौजवान पीढ़ी को अपनी हसरतों को पूरा करने का मौका मिलता है। जो लोग प्रेम या सेक्स, या जीवनशैली को लेकर लगातार निराशा में जीते हैं, उनके कामकाज पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है, और देश की अर्थव्यवस्था पर भी। ऐसे में समाज के भीतर एक जागरूकता आना तो दूर रहा, लोग तभी अपने काबू को छोड़ पा रहे हैं जब शहरीकरण के चलते गांव छोड़कर लोग शहर आ जाएं, या कि नौजवान बच्चे मां-बाप का घर छोड़कर काम के सिलसिले में किसी दूसरे शहर या किसी दूसरे देश जाकर बस जाएं, तभी मां-बाप या समाज का शिकंजा ढीला पड़ता है।
भारत में समाज में जागरूकता की जरूरत इतनी अधिक है, और उसका कोई जरिया दिख नहीं रहा है, इसलिए रोजाना प्रेम को लेकर कई तरह से हत्या और आत्महत्या की नौबत आ रही है। दूसरी बात यह कि इस पूरे सिलसिले को एक निजी मामला मानकर लोग इसे एक सामाजिक समस्या भी नहीं मान रहे हैं। जबकि प्रेम विवाह से धर्म और जाति के बंधन टूटते हैं, दहेज प्रथा टूटती है, और कई तरह की वे बीमारियां हटती हैं जो कि एक ही रक्त समूह की जात-बिरादरी के भीतर शादियों से बढ़ती हैं। इसलिए देश के लोगों को प्रेम विवाह को बढ़ावा देने के लिए एक जागरूकता लाने की कोशिश करना चाहिए।

अन्ना हजारे, रविशंकर, रामदेव चुनिंदा निशानेबाजी के चैंपियन

संपादकीय
16 मई 2017


अन्ना हजारे ने पिछले हफ्ते भर में बहुत अरसे बाद मुंह खोला। अपने ही चेले रहे हुए अरविंद केजरीवाल पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो आरोपों की जांच की बात कहते हुए अन्ना ने केजरीवाल के खिलाफ सब कुछ कह दिया, मानो कि आरोप सही हों, और इस्तीफे का वक्त आ गया हो। कुछ इसी तरह का हाल रामदेव के बर्ताव में देखने मिलता है। योग-आयुर्वेद के दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी बन गए स्वघोषित बाबा, रामदेव को पिछले बरसों में लगातार यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर हमले के लिए सुर्खियां मिलीं, और फिर उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त खुलकर मोदी को वोट दिलवाए। ऐसे ही एक और व्यक्ति अपने आपको श्रीश्री कहने वाले रविशंकर हैं जो कि यूपीए सरकार के दिल्ली के भ्रष्टाचार से लेकर दूसरी कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार के खिलाफ घूम-घूमकर पिछले बरसों में बहुत बोलते रहे।
लेकिन इन तीनों में एक बात एक सरीखी है, कि इनके निशाने चुने हुए हैं, और इनकी बंदूक या तोप उन्हीं चुनिंदा निशानों को निपटाने के लिए निकलती हैं। जिस वक्त रविशंकर कर्नाटक में बैठे हुए येदियुरप्पा की भाजपा सरकार के भयानक और ऐतिहासिक भ्रष्टाचार को देख रहे थे, और उस मंत्रालय से महज कुछ मील की दूरी पर रविशंकर का आश्रम था, तब भी उस भ्रष्टाचार के खिलाफ रविशंकर का मुंह नहीं खुला। आज उत्तरप्रदेश में लगातार तरह-तरह की हिंसा चल रही है, साम्प्रदायिक तनाव चल रहा है, और योगी राज में बड़े-बड़े जुर्म भी हो रहे हैं, लेकिन भगवा भाईचारे के चलते हुए रामदेव का मुंह भी नहीं खुलता है, और आज भी उनके निशाने पर अपनी प्रतिद्वंदी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अलावा गैरभाजपा लोग ही रहते हैं। कमोबेश यही हाल अन्ना हजारे का है जिनके बारे में आज सोशल मीडिया पर लगातार यह पूछा जा रहा है कि जिस लोकपाल आंदोलन को लेकर वे दिल्ली में अपनी जान भी देने पर उतारू हो गए थे, आज मोदी सरकार के तीन बरस होने पर भी उनके मुंह से लोकपाल शब्द क्यों नहीं निकल रहा है? यूपीए सरकार के रहते तो अन्ना को यह लगता था कि लोकपाल एक ऐसी रामबाण दवा है जिससे कि भारतीय लोकतंत्र की सारी बीमारियां दूर हो जाएंगी, लेकिन अब अन्ना नाम का यह हकीम इस लोकपाल नाम की दवा की पर्ची लिखना ही भूल गया है।
और यह सब अनायास नहीं होता है, न ही अन्ना की उम्र उनकी याददाश्त पर हावी हो रही है, यह सब कुछ सोचा-समझा है, एकाएक ऐसे कुछ किरदार भारतीय राजनीति में आकर खड़े हो जाते हैं, और अपनी पसंदीदा, चुनिंदा सरकार पर हमले करना शुरू कर देते हैं। लेकिन उनके हमले उतनी ही भ्रष्ट, या उससे भी अधिक भ्रष्ट दूसरी सरकारों की तरफ कभी नहीं मुड़ते। यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है जहां पर जनता के प्रति जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त लोग जनमत को मोडऩे का काम एक योजना, या बेहतर यह कहना होगा कि एक साजिश, के तहत करते हैं, और किसी पार्टी को जिताने का, किसी को हराने का काम करते हैं। ऐसा न होता तो जब देश का सुप्रीम कोर्ट केन्द्र की मोदी सरकार को इस बात के लिए फटकार लगा रहा है कि वह लोकपाल नियुक्त क्यों नहीं कर रही है, और यह हुक्म दे रहा है कि तुरंत लोकपाल नियुक्त किया जाए, तब भी अन्ना हजारे अपनी जिंदगी के इस सबसे बड़े मकसद के बारे में मुंह भी नहीं खोल रहे हैं, उस तरफ देख भी नहीं रहे हैं। लेकिन वे दिल्ली को बड़ी बारीकी से देख रहे हैं, और यह घोषणा कर रहे हैं कि अगर केजरीवाल का भ्रष्टाचार साबित होता है तो वे दिल्ली आकर धरना देंगे। ऐसे गैरराजनीतिक नेताओं के, सामाजिक और धार्मिक नेताओं के, कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले चुनावी-राजनीतिक मकसद के मुद्दे जनता को समझने चाहिए।

हरियाणा में बढ़ते सेक्स-जुर्म के पीछे बकवासी नेता जिम्मेदार

संपादकीय
15 मई 2017


हरियाणा में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार, दलितों से बलात्कार, और स्कूल-कॉलेज की लड़कियों से छेडख़ानी की खबरें भयानक रफ्तार से आ रही हैं, और भाजपा सरकार के राज में वहां के हाल पिछली कांग्रेस सरकार के हाल से बहुत अधिक खराब दिख रहे हैं। वैसे तो बलात्कार और सेक्स-अपराध हर बार रोके जाने लायक जुर्म नहीं रहते हैं, क्योंकि इनके हो जाने के बाद ही आमतौर पर पुलिस तक बात पहुंचती है, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी है कि महिलाओं पर होने वाले जुर्म और जुल्म को लेकर सरकार का जो रूख रहता है, उससे भी ऐसे जुर्म के खतरे कम या ज्यादा होना तय होता है। हरियाणा के साथ यह बुरी नौबत पहले दिन से जुड़ी हुई है जब मनोहर लाल खट्टर ने वहां का राज सम्हाला। लोगों को अच्छी तरह याद है, और गूगल पल भर में सैकड़ों नतीजे पेश कर देता है कि किस तरह चुनाव के पहले ही खट्टर ने महिलाओं के बारे में बहुत ही अश्लील, भद्दी, और हिंसक बातें कही थीं। बलात्कार को लेकर खट्टर ने कहा था कि जिन औरतों को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं चली जातीं।
अब हरियाणा एक तो पहले से ही महिलाओं के साथ बेइंसाफी वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता, और इसका सबसे बड़ा सुबूत वहां आबादी के अनुपात में है, पूरे देश में लड़कियों का सबसे कम अनुपात इसी एक शहर में है। दूसरी तरफ यहां की खाप पंचायतें लगातार लड़कियों और महिलाओं पर तरह-तरह की रोक लगाती आई हैं, और कांग्रेस हो या भाजपा, इनका कभी यह हौसला नहीं रहा कि वे खाप पंचायतों के खिलाफ मुंह भी खोल सकें। नतीजा यह रहा कि जब दंगल जैसी फिल्म के रास्ते हरियाणा की कुछ बहादुर लड़कियां सामने आईं, और इसके पहले उन्होंने ओलंपिक में जाकर हिन्दुस्तान का सिर ऊंचा किया, तो फिर हरियाणा में लड़कियों के हक की चर्चा की सुगबुगाहट शुरू हुई। लेकिन आज भाजपा के राज में हरियाणा का हाल यह है कि वहां स्कूल की बच्चियां स्कूल की पोशाक में अनशन पर बैठी हैं कि उन्हें आते-जाते रास्ते में छेड़ा जाता है। छेडऩे वालों का यह हौसला, और उनकी यह सोच वहां की खाप पंचायतों और वहां के मुख्यमंत्री के मर्दाना बयानों से बढ़ती हैं। दिक्कत यह है कि खट्टर के ऐसे किसी भी बयान पर उनकी पार्टी की कोई नाराजगी सामने नहीं आई, और इससे हरियाणा के लोगों को ऐसा लगा कि लड़कियां और महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं, और उन पर कभी भी हाथ डाला जा सकता है।
हमने उत्तरप्रदेश में समाजवादी नेता आजम खान के अश्लील बयानों को लेकर भी कहा था कि बलात्कार की शिकार लड़की के खिलाफ ऐसा बयान देने वालों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए। बाद में कुछ लोगों के अदालत पहुंचने पर अदालत ने आजम खान की बांह मरोड़ी थी, और उनसे बिना शर्त माफी मंगवाई थी। हमारा यह मानना है कि पूरे देश में जहां-जहां किसी भी पार्टी के नेता, या कोई और सार्वजनिक व्यक्ति, जब कभी कोई हिंसक महिला-विरोधी बयान दें, तो उसके खिलाफ महिला आयोगों को, मानवाधिकार आयोगों को तुरंत नोटिस लेना चाहिए, और उन्हें नोटिस देना चाहिए। जब तक बकवासी नेता सजा नहीं पाएंगे, तब तक वे समाज में सेक्स-अपराधियों का हौसला बढ़ाने का काम ही करते रहेंगे। यह सिलसिला चारों तरफ की कोशिशों से रोकने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि किसी भी चुनाव के वक्त किसी भी पार्टी या नेता के ऐसे बयानों की रिकॉर्डिंग या कतरनों को लेकर जनता को जागरूक करना चाहिए कि क्या वे ऐसे लोगों को वोट देना चाहेंगे? अगर ऐसी मुहिम चलने लगी, तो नेताओं की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। दिक्कत यह है कि राजनीतिक दलों में से अधिकतर में ऐसे नेता भरे हुए हैं, और इसलिए इस तरह के मुद्दों को कोई पार्टी उठाती नहीं है। चुनाव के वक्त मतदाता-जागरूकता के लिए गैरराजनीतिक संगठनों को अभियान चलाना चाहिए। आज भी कुछ संगठन नेताओं और पार्टियों के खर्च, उनके अपराध को लेकर रिपोर्ट जारी करते हैं। कुछ दूसरे संगठनों को यह जिम्मा लेना चाहिए कि बकवास करने वाले नेताओं की कतरनों को चुनाव के वक्त जनता के सामने रखे, और जनमत को प्रभावित करे।

तीन तलाक का विरोध तो ठीक है लेकिन...

आजकल
15 मई 2017
इन दिनों उत्तरप्रदेश में हिन्दुत्ववादी लोग मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से बचाने पर जुट गए हैं। इन्हीं कोशिशों में एक यह है कि हनुमान मंदिर में मुस्लिम महिलाएं बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ कर रही हैं कि उससे वे तीन तलाक से छुटकारा पा सकेंगी। यह बात सही है कि सीता को रावण की कैद से छुड़ाकर लाने के लिए हनुमान ने बहुत कोशिश की थी। लेकिन जहां तक तीन तलाक से महिला को बचाने की बात है, तो रामकथा के प्रसंग को याद करने की जरूरत है। जब राम ने गर्भवती सीता को घर से निकाल दिया, तो वह एक किस्म से पत्नी का त्याग कर देना ही था, और सीता अकेले ही अपने गर्भ में पल रहे लव-कुश को लिए हुए हमेशा के लिए चली गई थी।
मुझे रामकथा की बहुत अधिक जानकारी नहीं है, लेकिन गर्भवती पत्नी को हमेशा के लिए घर से निकाल देने वाले राम के भक्त हनुमान ने उस वक्त सीता को बचाने के लिए क्या कुछ किया था? उस युग में कुछ न कर पाए हनुमान से आज मुस्लिम महिलाओं को उम्मीद दिलवाई जा रही है, हे राम!
मुस्लिम महिलाओं को इंसानी हक दिलाने की जिद तो अच्छी है क्योंकि इंसानी हक तो हर किसी को मिलने ही चाहिए। लेकिन कई तरह के सवाल उठते हैं कि जिन लोगों के अपने घरों में सिरफुटव्वल चल रहा हो, वे पड़ोसी के घर की बहस में दखल देने क्यों जा रहे हैं? आज हिन्दू या जैन समाज में कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेज तक की कहानियां आम हैं। हिन्दुओं के बीच अभी तक राज करने वाले हिंसक और हमलावर तबके से यह करते भी नहीं बन पाया है कि दलितों को पैरों तले कुचलने के लिए हिन्दू समाज के भीतर रखा जाए, मंदिरों में उन्हें आने दिया जाए, या कि मार-मारकर बाहर निकाला जाए, उनके पेशे को गंदा कहा जाए, उनके खानपान पर रोक लगाई जाए, उनसे गैरदलितों की शादियों को रोका जाए, और दलित महिलाओं के साथ जितना बन सके उतना बलात्कार किया जाए।
हिन्दू समाज के जो लोग आज मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी दिलाने के लिए लगे हुए हैं, उनके पास हिन्दू समाज के भीतर के इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, और न ही इस इम्तिहान में बैठने में उनकी कोई दिलचस्पी है। इसलिए तीन तलाक के मुद्दे पर उनकी मुस्लिम महिला-हिमायत देखकर थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि क्या हिन्दुओं ने अपने भीतर के सारे झगड़ों को सुलझा लिया है, और उनके पास बाकी दुनिया को सुधारने के लिए समय ही समय है?
गोमांस खाने न खाने को लेकर आज राष्ट्रीय हिंसा का एक सबसे बड़ा मुद्दा गैरहिन्दुओं पर हमले का नहीं है, यह हिन्दू समाज के एक बहुत ही छोटे हमलावर तबके का बहुसंख्यक हिन्दू आबादी पर हमला है, और खानपान की ऐतिहासिक हकीकत को नकारते हुए आज एक पाखंडी पवित्रता लादने की हिंसक जिद है। इसलिए हिन्दू समाज का जो सत्तारूढ़ तबका मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की हिंसा से आजाद करने का बीड़ा उठाए खड़ा है, वह सत्तारूढ़ तबका अपनी पवित्रतावादी पाखंडी मान्यताओं को दूसरी विचारधाराओं पर, हिन्दू समाज के दूसरे हिस्सों पर, आदिवासियों सरीखे गैरहिन्दुओं पर थोपने पर उतारू है, और उसके लिए मुस्लिम समाज की दकियानूसी मान्यताओं पर हमला अपने हमलावर मिजाज का एक विस्तार ही है, कोई मुस्लिम-कल्याण नीति नहीं है।
वैसे तो समाज सुधार के लिए जो कोई भी आगे आएं, वह एक अच्छी बात रहती है, लेकिन आज सुधार की जरूरत जिन लोगों को सबसे अधिक है, और जिनके भीतर के ताकतवर, बाहुबलि लठैत जिस तरह से कानून की बांह मरोड़ रहे हैं, और बेकसूरों को मार रहे हैं, तो सवाल यह भी उठता है कि सरकार और सत्तारूढ़ लोगों की प्राथमिकता मुस्लिम समाज की दकियानूसी मान्यताओं को खत्म करना होना चाहिए, या कि सत्तारूढ़ समाज के भीतर की ताजा खड़ी की जा रही हिंसा को खत्म करना होना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से तो यह कहा जा सकता है कि ये दोनों बातें साथ-साथ चल सकती हैं, लेकिन हमने यह देखा है कि सत्तारूढ़ पाखंड को खत्म करना तो दूर रहा, पाखंडी मुद्दों पर सत्ता के हिंसा को ताजा खड़ा करने की अंतहीन कोशिशें चल रही हैं, और कहीं पर रोमियो का लेबल लगाकर नौजवान भाई-बहनों को पीटा जा रहा है, तो कहीं सिनेमाघर से लौटते पति-पत्नी से शादी का प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है। कन्या भ्रूण हत्या पर बात ही नहीं हो रही है, दहेज और दहेज हत्या पर बात ही नहीं हो रही है, आबादी में हिन्दू लड़कियों का अनुपात लगातार गिरने पर बात ही नहीं हो रही है, और जिस गाय को बचाने के लिए इंसानों को मारा जा रहा है, उस गाय के लिए भी घूरे से परे किसी खाने के इंतजाम की बात नहीं हो रही है।
पाखंड से भरा हुआ ऐसा चाल-चलन लोगों की नीयत पर सवाल खड़े करता है कि आज मुस्लिम महिला के हिमायती बने हुए ये लोग अपने ही घरों में भ्रूण हत्या रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, लड़कियों को लड़कों के बराबरी के हक दिलाने के लिए क्या कर रहे हैं, दहेज और दहेज हत्या रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, विधवाओं की हालत सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं? ये लोग अपने समाज के भीतर अलग-अलग तबकों के खानपान, पहरावे, बोली और रिवाजों की विविधता के सम्मान के लिए क्या कर रहे हैं? ये लोग उत्तर-पूर्व और कश्मीर के लोगों की विविधता और असहमत राजनीतिक विचारधारा के साथ तालमेल बिठाने के लिए क्या कर रहे हैं?
ये वही लोग हैं जिन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मुस्लिम विरोधी नफरत सुलगाने वाले डोनाल्ड ट्रंप की जीत के लिए दिल्ली में हिन्दू-हवन किए थे और आज उस डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिमों से अधिक हिन्दुस्तानी-कामगारों के रोजगार की हत्या की है। इसलिए जब ऐसे लोग एकाएक मुस्लिम समाज की बेइंसाफी के खिलाफ खड़े होते हैं, तो उनकी लाठियों से कहीं अधिक उनकी नीयत को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हर लाठी के पीछे दर्जनभर सवाल साफ-साफ खड़े दिखते हैं, और ऐसे में लगता है कि गब्बर सिंह ने अगर रामगढ़ की बसंतियों को आयरन की टेबलेट बांटने की समाजसेवा कर रहा है, तो पहले वह अपनी और सांभा-कालिया की बाकी हरकतों पर जवाब तो दे दे। महिलाओं को आयरन की टेबलेट की जरूरत तो रहती है, लेकिन रामगढ़ के लोगों को गब्बर की बाकी हिंसा से आजादी की जरूरत भी तो रहती है। और आज तो पूरे देश में बहुसंख्यक हिन्दू और गैरहिन्दू तबकों पर, एक अल्पसंख्यक-हिन्दू तबके की लगातार बढ़ती हिंसा की जवाबदेही कोई नहीं उठा रहा है, हर किसी के पास महज चुप्पी है।

अगर योगी के ऐसे महंगे अंदाज हैं तो बाकी से फिर क्या उम्मीद?

संपादकीय
14 मई 2017


उत्तरप्रदेश में एक योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा लगा था कि सरकार के कामकाज में कुछ सादगी भी आ सकती है। अपने शुरुआती हफ्तों में योगी आदित्यनाथ ने कुछ ऐसे फैसले लिए भी, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फैसले के पहले ही राज्य सरकार की गाडिय़ों से लालबत्तियां हटवा दी थीं। इसके अलावा उन्होंने छुट्टियां घटा दीं, काम के घंटे तय करने को कहा, और सरकारी दफ्तरों में गंदगी के खिलाफ मुहिम छेड़ी। लेकिन दूसरी तरफ अपनी पार्टी से परे के उनके अपने निजी, और घोर साम्प्रदायिक संगठन, हिन्दूवाहिनी, द्वारा उत्तरप्रदेश में कानून हाथ में लेकर हमला करना जारी रहा, और योगी के ऐसे भाषणों का कोई मतलब नहीं रहा कि उनकी सरकार सभी धर्मों को बराबर मानकर चलेगी। उनके खुद के इस आक्रामक और हिंसक संगठन ने एक किस्म से स्थानीय स्तर पर सरकार अपने हाथ में ले ली, और अफसरों से, खासकर पुलिस से, बदसलूकी में भाजपा के नेता भी शामिल रहे, और योगी की हिन्दूवाहिनी के लोग भी।
अब एक नई खबर सामने आई कि कश्मीर के मोर्चे पर तैनात सेना के एक जवान के शहीद होने के बाद जब योगी उसके घर मिलने गए, तो एक दिन पहले से अफसरों ने इस मामूली घर में जुगाड़ लगाकर, बांस-बल्ली से टांगकर एसी लगवा दिया, और घर के भीतर सोफा और कालीन सजा दिया। अगले दिन योगी आकर गए, और आधे घंटे बाद सारा सामान हटा दिया गया और एसी भी निकाल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि अगर एक योगी के भी मुख्यमंत्री बनने पर सादगी नहीं आ सकती, तो कब आएगी? बहुत से नेता सत्ता पर आते ही ऐसा बर्ताव करने लगते हैं कि उनके पुरखे मानो बादशाह रहे हों। और यह बात सही है कि सत्ता से हटने तक ये तमाम नेता अपनी बादशाहत बनाए रखने के लिए कालेधन का अंबार जुटा लेते हैं। इस तरह सत्ता का मतलब सत्तासुख और सुखी भविष्य दोनों ही हो जाता है।
यह सिलसिला लोकतंत्र को खोखला करते चलता है, और जनता की लोकतंत्र पर आस्था को खाते चलता है। जिस देश में गरीबों को महीनों तक सरकारी योजनाओं की मजदूरी नहीं मिल पाती है, जहां पर कुछ सौ रूपए की वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए बुजुर्गों को दर्जनों मील चलकर पहुंचना पड़ता है, और खाली हाथ लौटना पड़ता है, वहां पर अगर कुछ मिनटों के लिए भी मुख्यमंत्री बिना कालीन और बिना एसी न बैठ सकें, तो यह लोकतंत्र की शिकस्त है, भाजपा की शिकस्त है, और योगी-जीवन को लेकर जितने किस्म की जनधारणाएं हैं, उनकी भी शिकस्त है। यही काम अगर उत्तरप्रदेश के दलित परिवारों में खाने या सोने वाले राहुल गांधी के लिए किया गया होता, तो नेहरू-गांधी परिवार का राजकुमार कहकर उनका मखौल हफ्तों चला होता।
हमारा ख्याल है कि पूरे देश में अदालती दखल से सरकारी फिजूलखर्ची, और ऐशोआराम को खत्म करना चाहिए। सरकार हांकने वाले लोग खुद तो ऐसा नहीं करेंगे, लेकिन हो सकता है कि अदालत में कोई ऐसे फक्कड़ जज बैठे हों जो कि किफायत के लिए हुक्म दे सकें, न सिर्फ सरकार में बैठे लोगों के लिए, बल्कि खुद अदालत में बैठे बड़े जजों के लिए भी। देश भर में जनता के पैसों पर जिस किसी को सहूलियत देने का इंतजाम रहता है, वे लोग ऐशोआराम जुटाने में जुट जाते हैं। धीरे-धीरे एक-एक करके सभी पार्टियों का जब यह हाल हो जाता है, तो फिर लोगों की शर्म भी खत्म हो जाती है। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल जैसे राज्य को एक मिसाल की तरह देखना चाहिए जहां दशकों के वामपंथी राज के बाद भी जिस तरह की सादगी और किफायत की परंपरा जारी रही, उसका एक नैतिक दबाव था कि उन्हें हराकर सत्ता में आने वाली ममता बैनर्जी के सामने भी सादगी और किफायत की एक बेबसी थी, और उन्हें अपनी सरकार को इस रास्ते पर ही चलाना पड़ा। हो सकता है कि वे खुद होकर भी ऐसा करतीं, लेकिन अगर वो ऐसा करना न भी चाहतीं, तो भी वामपंथी मिसाल के सामने जनता उनकी फिजूलखर्ची को खारिज कर देती। आज हाल यह है कि बाकी प्रदेशों में सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में बैठे हुए लोग भी जनता के पैसों पर हर किस्म की फिजूलखर्ची जारी रखते हैं, और जनता यह देख-देखकर राजनीति के लिए ऐसी हिकारत मन में पाल लेती है कि वह लोकतंत्र से हिकारत में बदल जाती है।

उत्साही समाजसेवियों को सरकारी बढ़ावा भी मिले

संपादकीय
13 मई 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज मुख्यमंत्री ने एम्स के पास मरीजों के रिश्तेदारों के ठहरने के लिए बनाई जा रही एक धर्मशाला का भूमिपूजन किया है। इसे एक निजी ट्रस्ट बना रहा है, और यह ट्रस्ट पहले से प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल, रायपुर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के पास बरसों से यह काम कर रहा है। बहुत ही रियायती दाम पर गरीब मरीजों के साथ आए लोगों के रहने और खाने-पीने का एक बहुत अच्छा और साफ-सुथरा इंतजाम संभव हो सकता है, यह इन बरसों में देखने मिला है, और इसके साबित होने के बाद राज्य सरकार ने वहीं पर बनी एक दूसरी सरकारी धर्मशाला भी इसी ट्रस्ट को चलाने के लिए दे दी है। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि मेकाहारा के पास की यह पहली धर्मशाला भी सब्जी बेचकर कमाने वाली बिन्नी बाई नाम की एक महिला ने अपने लाखों रूपए देकर बनवाई थी, और अब यह दूसरा ट्रस्ट अपनी बनाई धर्मशाला के साथ इसे भी चला रहा है।
ऐसी कुछ मिसालें यह साबित करती हैं कि अगर समाज में उत्साही लोग रहें, और उनकी साख की विश्वसनीयता रहे, तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके लिए अपने पैसे भी खर्च करने होते हैं, और दूसरे लोग भी साथ जुट जाते हैं। और यह बात कोई अकेले छत्तीसगढ़ में ही नहीं है, देश भर में जगह-जगह समाजसेवा की ऐसी मिसालें सामने आती हैं, और बहुत से लोग दूसरों को देखकर, उनसे सीखकर भी ऐसा काम करते हैं। इस बात की तारीफ में हम इसलिए लिख रहे हैं कि पूरे प्रदेश में जहां-जहां अस्पताल हैं, वहां-वहां मरीजों के साथ आकर सैकड़ों लोगों को रहना पड़ता है, और उनके लिए कोई इंतजाम नहीं हो पाता। गरीब रिश्तेदार तो अस्पताल के बरामदों में या किसी पेड़ के नीचे भी सो जाते हैं, लेकिन उनके नहाने-खाने का कोई इंतजाम नहीं रहता। उनकी इतनी क्षमता भी नहीं रहती कि वे खर्च करके यह काम कर सके। इसलिए अगर कोई ट्रस्ट ऐसा काम कर रहा है, तो उससे दूसरे शहरों के दूसरे लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए, और सरकार को भी उनका हौसला बढ़ाना चाहिए।
रायपुर में ही एक दूसरी ऐसी मिसाल एक चिकित्सा जांच केन्द्र की है जिसे एक व्यापारी परिवार ने अपने पैसों से बनवाया है, और वहां पर रोजाना सैकड़ों लोगों की रियायती जांच होती है। वैसे तो सरकार को यह सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए, लेकिन भारत में सरकारी ढांचा जितने भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार रहता है, उसके चलते सरकार ऐसी इमारत चाहे बना दे, उसे सरकारी कर्मचारियों के भरोसे चलाया नहीं जा सकता। इसके लिए बहुत ही समर्पित समाजसेवी रहना जरूरी है, और जहां-जहां ऐसे लोग सामने आते हैं, सरकार को जमीन से लेकर दूसरे किस्म के अनुदान तक का इंतजाम करना चाहिए, ताकि गरीबों की सेवा हो सके, उन्हें सहूलियत मिल सके। इससे परे भी बहुत से ऐसे दायरे हैं जिनमें समाज की सबसे जरूरतमंद लोगों के लिए बाकी सक्षम समाज कुछ कर सकता है, और इसी छत्तीसगढ़ में बढ़ते कदम नाम की एक संस्था ने मृत्युकर्म से जुड़े हुए बहुत से कामों के लिए अपनी मुफ्त की सेवा देना शुरू किया, और उसे लगातार बढ़ाया है। दूसरी तरफ इसी संस्था ने रक्तदान-नेत्रदान से लेकर शरीरदान तक की प्रेरणा देने, और करवाने का रिकॉर्ड भी बनाया है। इसी तरह कुछ संस्थाएं स्कूली बच्चों की पुरानी किताबों को इकट्ठा करके उन्हें दूसरे जरूरतमंद बच्चों को देने का काम कर रही हैं। समाज और सरकार को ऐसी कोशिशों का हौसला बढ़ाना चाहिए।

ईवीएम पर आयोग की चुनौती बरसों देर से सामने आई...

संपादकीय
12 मई 2017


चुनाव आयोग ने आज राजनीतिक दलों की बैठक बुलाकर यह चुनौती दी है कि वे ईवीएम के साथ छेडख़ानी करके दिखाएं। पिछले दिनों पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में निराश और हक्का-बक्का आम आदमी पार्टी ने सबसे जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया था, और बाद में उत्तरप्रदेश चुनाव में मटियामेट हो गईं मायावती ने भी यही राग अलापा था कि उन्हें ईवीएम ने हराया है। अब उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि जो भाजपा उत्तरप्रदेश में सपा की सरकार रहते हुए इतने बड़े पैमाने पर ईवीएम धांधली कर सकती थी, तो उसने पंजाब को अपने हाथ से क्यों जाने दिया, और गोवा-मणिपुर में कुछ सीटों से अपना बहुमत क्यों खोया? उत्तरप्रदेश में तो चुनाव करवाने वाले कर्मचारी-अधिकारी लंबे समय से सपा सरकार के तहत काम कर रहे थे, लेकिन पंजाब और गोवा में तो सरकार में भाजपा थी, और कर्मचारी उसके मातहत थे जहां ईवीएम के साथ अगर कोई छेडख़ानी हो सकती थी, तो वह भाजपा के लिए आसान थी। इसलिए ईवीएम की हैकिंग अगर तकनीकी रूप से संभव भी है, तो भी अपनी वजहों से हार को मशीन पर थोपना राजनीतिक दलों के लिए आत्मघाती था, क्योंकि इससे वे खुद ही अंधेरे में जीते हैं।
चुनाव आयोग ने आज यह काम सही किया है कि राजनीतिक दलों को ईवीएम-हैकिंग की चुनौती दी है। दुनिया में बड़ी से बड़ी कंपनियों के फोन-कम्प्यूटर हैक हो जाते हैं, और इसके लिए ये कंपनियां खुद भी हैकर्स को तनख्वाह पर रखती हैं, और बाहर के लोगों को हैकिंग करके दिखाने पर ईनाम भी देती हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी रहता है कि ऐसी कमजोरियां सामने आने पर कंपनियां अपनी मशीनों को, या कि उनके सॉफ्टवेयर को मजबूत बना पाती हैं। भारत का चुनाव आयोग दुनिया के कई देशों में चुनाव करवाने में प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद करता है, और भारतीय चुनाव आयोग की साख बड़ी ऊंची मानी जाती है। ऐसे में अपनी मशीनों को लेकर उसके मन में यह भरोसा रहना चाहिए था कि उन्हें कोई हैक नहीं कर सकते। विपक्ष में रहने वाले दल बरसों से ईवीएम पर शक जाहिर करते आए हैं, और आज भाजपा के एक सांसद ने तो ईवीएम के खिलाफ कुछ बरस पहले एक पूरी किताब ही लिखी थी जो कि बाजार में भी है। आज भाजपा के विरोधी शक जाहिर कर रहे हैं, और ऐसे में चुनाव आयोग को बहुत पहले से यह चुनौती पार्टियों के सामने रख देनी थी। कई बार मुजरिमों से भी पुलिस को सीखने मिलता है, नकली चाबी से ताले खोलने वालों के तजुर्बे से ताला बनाने वाली कंपनियां बहुत कुछ सीख पाती हैं।
इस पूरे सिलसिले में एक ही बात हमारी समझ में नहीं आई है कि भारत जैसे आईटी-दिमागों से संपन्न इस देश में चुनाव आयोग ने पहले ही अपनी मशीनों को राजनीतिक दलों और जानकारों के सामने क्यों नहीं रख दिया था? ऐसा करके या तो आयोग की मशीनों की कमजोरी और खामी सामने आती, या फिर जनता के बीच गलतफहमी फैलाने की राजनीतिक कोशिशें थमतीं। आयोग की यह पहल बहुत देर से आई है, और देश की साखदार संस्थाओं को जनता के बीच भरोसा बनाए रखने के लिए समय रहते काम करना चाहिए। जब अपने आपको चुनाव विशेषज्ञ कहने वाले एक व्यक्ति ने ईवीएम की अविश्वसनीयता पर पूरी किताब लिख मारी थी, तभी अगर उसके दावे चुनाव आयोग झूठे साबित कर देता, तो आज वह आदमी भाजपा का सांसद नहीं बना होता। ईवीएम पर शक और तोहमत लगाकर, उस सीढ़ी पर चढ़कर एक शक्की तो संसद पहुंच गया, और चुनाव आयोग उसके बाद भी बरसों बैठे रहा। लोकतंत्र में जनधारणा का ख्याल रखना भी जरूरी रहता है, और हम उम्मीद करते हैं कि चुनाव आयोग की चुनौती से जो भी साबित हो, किसी न किसी की साख जरूर बढ़ेगी, ईवीएम और चुनाव आयोग की बढ़ेगी, या मशीनों को अविश्वसनीय बताने वाले नेताओं की बढ़ेगी। लोकतंत्र और जनता इन दोनों ही हालात में जीतेंगे।

कश्मीर के हालात खतरनाक, पर टापू जैसा जीतना असंभव

संपादकीय
11 मई 2017


कश्मीर में कल जिस तरह वहां के एक नौजवान की प्रताडऩा के बाद की लाश सामने आई है, वह दिल दहलाने वाली बात है। बाईस बरस का यह कश्मीरी फौज में भर्ती हुआ था, और पहली बार अपने गांव गया था, जहां आतंकियों ने उसका अपहरण किया, और फिर बहुत बुरी यातना के बाद उसकी लाश को फेंक दिया। पहले से तनाव में चल रहे, बहुत बुरी तरह हिंसा और अलगाव झेल रहे कश्मीर में यह मौत तनाव को किस तरफ मोड़ेगी यह तो साफ नहीं है लेकिन इसने वहां के लोगों को भी हिलाकर रख दिया है।
कश्मीर में जनता का एक हिस्सा अलगाववादियों के साथ है, और उन्हें बाकी हिन्दुस्तान के लोग चाहे राष्ट्रविरोधी कहें, वे अपनी जगह इस तर्कसंगत बात को दोहराते हैं कि जब कश्मीर का भारत में विलय हुआ था, तब यह साफ था कि वहां की जनता जनमत संग्रह करेगी और भारत या पाकिस्तान में रहने की अपनी पसंद से अपना भविष्य तय करेगी। लेकिन जनमत संग्रह के साथ कुछ और शर्तें भी जुड़ी हुई थीं, जिनमें पाक कब्जे वाले कश्मीर से फौजों का हटना भी था, और वह शर्त पूरी न होने की बात कहते हुए भारत ने जनमत संग्रह की संभावना को खारिज ही कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि अब धीरे-धीरे भारत जनमत संग्रह का कोई भविष्य नहीं देखता और वह कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग मानते हुए ही आगे किसी बातचीत के लिए तैयार होता है, चाहे वह पाकिस्तान से हो, चाहे वह कश्मीर के अलगाववादियों से हो।
कश्मीर में लगातार फौज की मौजूदगी से हालात ऐसे बने हैं कि फौज पर तरह-तरह की हिंसा के आरोप लगते हैं, और जब वहां के स्थानीय नौजवान पुलिस और सेना पर, केन्द्रीय सुरक्षा बलों पर पथराव करते हैं, तो जवाबी पुलिस कार्रवाई की वजह से कश्मीरियों को आए जख्म हालात को और बिगाड़ते हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है, और अदालतों को यह समझ नहीं आ रहा है कि जब तक पथराव चलते रहेगा, तब तक कैसे सुरक्षा बलों से यह कहा जाए कि वे छर्रे वाली बंदूकें इस्तेमाल न करें। दूसरी तरफ कश्मीर के मुद्दे को, उसकी जटिलता को, समझने वाले लोगों का यह कहना है कि कश्मीर की समस्या को एक टापू की तरह नहीं सुलझाया जा सकता, और बाकी देश में जब लगातार माहौल मुस्लिमों के खिलाफ बना रहे, जब देश में जगह-जगह कश्मीरियों पर कुछ हमले भी हों, तब कश्मीरी नौजवानों की नाराजगी को खत्म कर पाना आसान नहीं है। यह एक और बात है कि बार-बार ऐसे सुबूत सामने आते हैं कि पत्थरबाजों को अलगाववादी ताकतें, या कि आतंकी ताकतें, भाड़े पर लेती हैं, और पथराव करना सैकड़ों नौजवानों का पेशा सा हो गया है, तो यह समझ पड़ता है कि कश्मीर में राजनीतिक पहल की जरूरत है, और महज बंदूकों से बात बनने वाली नहीं है। बंदूकें तो कश्मीर में आधी सदी से तैनात हैं लेकिन बात किसी किनारे पहुंच नहीं रही है।
कश्मीर में आज राज्य सरकार भाजपा के साथ गठबंधन वाली है, यह पहला मौका है जब भाजपा जम्मू-कश्मीर सरकार में सत्ता में भागीदार है, और यह भी एक अनोखा मौका है कि वह केन्द्र सरकार में भी इसी वक्त गठबंधन की मुखिया है, और सरकार पर उसका लगभग एकाधिकार है। जहां तक कश्मीर का सवाल है, तो राज्य के भीतर तो भाजपा ने दशकों से चले आ रहे अपने खुद के सभी विवादास्पद मुद्दों को ताक पर धर दिया है, और गठबंधन में छोटे भागीदार की तरह काम कर रही है। लेकिन ऐसा लगता है कि इतना काफी नहीं है, और कश्मीर के हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बाकी देश के हालात सुधारने की जरूरत है, क्योंकि आज अगर देश में यह माहौल बन रहा है कि हिन्दुओं के भीतर ही एक अल्पसंख्यक तबके के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों के मुताबिक देश की बाकी पूरी आबादी को रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो इस तरह का साम्प्रदायिक तनाव बाकी देश के साथ-साथ कश्मीर को भी प्रभावित कर रहा है, और मोदी सरकार, भाजपा, इनकी जैसी साख की जरूरत कश्मीर में है, वैसी साख बन नहीं रही है। बाकी देश में अलग दिक्कत चल रही है, लेकिन खास कश्मीर के सिलसिले में यह कहना जरूरी है कि उसे एक टापू की तरह नहीं जीता जा सकता, बाकी देश के साथ मिलाकर ही देखना होगा।