आरक्षण से मलाईदार तबकों को हटाना, दलित-आदिवासी तक भी क्यों न बढ़ाया जाए?

संपादकीय
31 अगस्त 2017


केन्द्र सरकार ने पिछले कुछ दिनों में ओबीसी के आरक्षण पर दो फैसले लिए। एक तो उसने ओबीसी के भीतर की क्रीमीलेयर की आय सीमा को बढ़ाया ताकि 8 लाख रूपए सालाना आय तक के परिवार भी क्रीमीलेयर से बाहर रहें। दूसरा उसने यह फैसला लिया कि केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों और बैंकों के बड़े अफसरों के बच्चों को ओबीसी आरक्षण के फायदे से बाहर कर दिया। ये दोनों बातें अब अन्य पिछड़ा वर्ग तबके के संपन्न परिवारों के बच्चों को बाहर रखेगी, और मामूली कमाई वाले परिवार के बच्चों को मौका मिलेगा। वैसे तो देश में आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ बोलने वाले अनारक्षित तबकों के लोग कम नहीं हैं, लेकिन हम आज इन खबरों के बीच केवल एक पहलू पर बात करना चाहते हैं कि आरक्षित तबकों के बीच जो क्रीमीलेयर कही जाती है, उस मलाईदार तबके का क्या किया जाना चाहिए? यह तबका आदिवासियों के बीच भी है, दलितों के बीच भी है, और ओबीसी में इनके मुकाबले कुछ और अधिक है। और आरक्षण के फायदे का जितना बड़ा हिस्सा यह एक छोटा तबका ले जाता है, उसके बारे में सोचने की जरूरत है।
हम पहले भी इस मुद्दे पर लिखते आए हैं कि आरक्षण के पीछे की सोच यही थी कि सामाजिक और आर्थिक रूप से, ऐतिहासिक कारणों से, जो जातियां समाज की बाकी जातियों के मुकाबले बहुत अधिक पिछड़ी हुई हैं, उन्हें समाज और विकास की मूल धारा में लाने के लिए उनको आरक्षण का सहारा देना जरूरी है। अब जब किसी जाति में जन्म के आधार पर आरक्षण तय हो गया, तो उस जाति के अनगिनत लोगों के बीच जो गिने-चुने मौके नौकरी या चुनाव के लिए रहते हैं, उन तक पहुंच अधिकतर लोगों की हो ही नहीं पाती। आरक्षित तबकों के भीतर सत्ता की ताकत से, किसी ओहदे के महत्व के चलते, या संपन्नता की वजह से गिने-चुने लोग ऐसी हालत में रहते हैं कि वे और उनके परिवार के लोग आरक्षित मौकों का अधिकतम फायदा उठाने के लायक अपने आपको अधिक सक्षम बना चुके रहते हैं। ऐसा मलाईदार तबका चुनावी टिकटों को पाने, नौकरी के मुकाबले के इम्तिहान की तैयारी में अधिक ताकत रखता है, और आरक्षित तबकों के बाकी लोग इनके मुकाबले कहीं टिक नहीं पाते।
लंबे समय से यह बात चल रही है कि आरक्षण का फायदा एक पीढ़ी को मिलना चाहिए, और जब कोई सरकारी नौकरी, या संसद-विधानसभा जैसी सदस्यता पा लेते हैं, तो वे अपने अगली पीढ़ी को समाज के आम पैमाने तक पहुंचाने के लिए सक्षम हो जाते हैं, और अगली पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देने के बजाय उसी तबके के बाकी लोगों को ऐसे मौके देने चाहिए। दूसरी बात यह कि जो लोग संपन्नता का एक दर्जा पा चुके रहते हैं, उनको भी आरक्षण का फायदा नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि ऐसे परिवार समाज में मौके के लिए अपने आपको तैयार कर सकते हैं। इन तमाम स्थितियों को सोचें तो यह बात साफ दिखती है कि आरक्षण का फायदा पाने के बाद ऐसे लोगों की अगली पीढ़ी भी अपना वक्त आने पर आरक्षण का फायदा पाने के लिए एक बेहतर तैयारी कर चुकी रहती है। और कमजोर तबकों के सबसे कमजोर लोग शायद ही कभी ऐसी तैयारी तक पहुंच पाते हों। हर आरक्षित तबके के सबसे संपन्न और ओहदे वाले लोग अपने-अपने तबकों के कमजोर लोगों के मौकों को कुचलने वाले हो गए हैं। अगर आरक्षण से क्रीमीलेयर को हटाया नहीं गया, तो आरक्षण का मकसद ही कुचला जा रहा है। इसलिए आज जब किसी जाति को आरक्षण की बात उठती है, तो उसके साथ-साथ मौजूदा आरक्षण पर भी इस नजरिए से बहस होनी चाहिए कि मलाईदार तबके को फायदे से हटाया क्यों नहीं जाए। ऐसा इसलिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है कि क्रीमीलेयर के जो पैमाने हैं, उसमें आने वाले सांसदों और विधायकों को ही ऐसा संविधान संशोधन करना पड़ेगा, और वे क्यों अपने हक पर कुल्हाड़ी चलाने चले? दूसरी बात यह कि बड़े अफसर और बड़े जज, जो ऐसे किसी संवैधानिक फैसले के पहले और बाद उससे जुड़़े रहेंगे, उनमें भी आरक्षित तबकों के जो लोग हैं, वे अपनी अगली पीढ़ी के हक भला क्यों कुचलेंगे? इसलिए आज का ताकतवर तबका अपनी ताकत को, अपनी अगली पीढ़ी के मौकों को कम नहीं होने देना चाहता, और क्रीमीलेयर को बनाए रखने में उनका एक बड़ा साफ-साफ वर्गहित है। 

स्कूल से मीडिया तक खड़ा कर ठगने वाले से सबक लें

संपादकीय
30 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में कुछ बरस पहले लोगों से करीब 50 करोड़ रूपए ठगकर भागने वाले एक स्कूल संचालक राजेश शर्मा और उसकी पत्नी को बरसों की तलाश के बाद रायपुर पुलिस ने हैदराबाद से गिरफ्तार किया है। जिस आदमी ने रायपुर सहित प्रदेश के बहुत से शहरों में डॉल्फिन नाम से स्कूलें खोली थीं, और बच्चों के मां-बाप को यह झांसा दिया था कि पहली से बारहवीं तक की फीस एक साथ देने पर मोटी रियायत मिलेगी। मध्यम वर्ग के लोग लालच में आ गए, और उन्होंने फिल्मी सितारों के इश्तहार वाले इस स्कूल को अपनी मेहनत की कमाई दे दी। इसके बाद इस स्कूल संचालक ने धूमकेतु की रफ्तार से अखबार शुरू किया, टीवी समाचार चैनल की तैयारी की, और बड़े-बड़े लोगों के साथ उठना-बैठना शुरू हुआ।
अब उसकी गिरफ्तारी तो हो गई है, लेकिन जिनका पैसा डूबा है, उनमें से शायद ही किसी को कुछ वापिस मिल सके। ऐसा आज बहुत सी चिटफंड कंपनियां भी कर रही हैं, कुछ मार्केटिंग कंपनियां कर रही हैं, और कुछ नेटवर्क-मार्केटिंग योजनाएं भी लोगों को ऐसा झांसा दे रही हैं। इससे दो तरह के लोग साजिश के शिकार हो रहे हैं। वे लोग जो कि अपनी रकम ऐसे कामों में लगाते हैं, और वे लोग जो कि ऐसी योजनाओं और ऐसे जालसाजों के एजेंट बनकर काम करते हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश में जगह-जगह जालसाज योजनाओं की घोषणा करके ऐसा कर रहे हैं, और बहुत से मामलों में अखबार निकालकर या टीवी चैनल शुरू करके, कोई वेबपोर्टल शुरू करके उसकी आड़ में भी ऐसा कर रहे हैं। हमने बहुत से जालसाजों को मीडिया की ताकत और उसके असर का इस्तेमाल करके लोगों के पीछे घुसपैठ करते देखा है। छत्तीसगढ़ में ही कुछ ऐसी चिटफंड कंपनियों ने लोगों के सैकड़ों करोड़ ठग लिए, जो कि अखबार की आड़ में यह धंधा कर रही थीं।
टीवी चैनलों के मामले में केन्द्र सरकार के नियम बड़े कड़े हैं, और कोई नया चैनल शुरू होने के पहले उसके पीछे के पूंजीनिवेशकों की खासी लंबी-चौड़ी जांच होती है, लेकिन अखबारों के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है। कोई मुजरिम भी जेल के भीतर से अखबार शुरू कर सकते हैं, और जेल से ही उसका संपादन कर सकते हैं। सरकार अखबार का नाम रजिस्टर करने के पहले किसी तरह की जांच नहीं करती है, और जाहिर तौर पर जो लोग ठगी-जालसाजी कर रहे हैं, जो लोग पूरी तरह से दो नंबर के धंधों से लाई हुई रकम से, दो नंबर के धंधे बढ़ाने के लिए, उनको सुरक्षा दिलाने के लिए अखबार शुरू करते हैं, उस पर भी न तो कोई रोक है, और न ही समाज के लोग ही ऐसे अखबारों के साथ कोई फर्क करते हैं। छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी रायपुर में एक कुख्यात मुजरिम ने दर्जनों मामलों से जमानत पर रहते हुए एक अखबार शुरू किया था, तो प्रदेश के बड़े-बड़े अखबारनवीस उसमें काम करने चले गए थे, और उन सबकी मेहनत भी उसमें डूब गई थी, लेकिन तब तक उसे केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के इतने इश्तहार मिलते रहे, जितने कि बड़े-बड़े प्रतिष्ठित और प्रसारित अखबारों को भी नहीं मिलते थे।
दरअसल सरकार का काम तो कागजों पर फर्जी आंकड़े खड़े करके उन्हें दाखिल किए गए प्रमाण पत्र से भी चल जाता है, लेकिन समाज के लोगों को अच्छे और बुरे में फर्क करना सीखना चाहिए, वरना फिल्मी सितारों की चकाचौंध, बड़े-बड़े कार्यक्रम, बड़े-बड़े ईनाम, जिनका कि पत्रकारिता से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता है, उनकी आड़ में वे एक मिलावटी पत्रकारिता ही पाते हैं, जिसके पीछे दूसरे कारोबारों से आई हुई कमाई रहती है, और जिसकी ताकत से दूसरे कारोबारों को सुरक्षा दिलाने की नीयत रहती है। अभी गिरफ्तार किया गया यह ठग ऐसे कई पहलुओं की तरफ लोगों का ध्यान खींच रहा है, और ऐसे में ही लोगों को सावधानी सीखने का एक मौका भी मिलता है। लोग अपनी पूंजी ऐसे काम में लगाएं जो कि भरोसेमंद हो, और लोगों को रातों-रात हसीन सपने पूरे करने का भरोसा न दिलाते हों। दूसरी तरफ लोग ऐसे मीडिया पर भरोसा करें जो कि मीडिया की कमाई से चलता हो, न कि किसी दूसरे धंधे से लाई गई रकम से। 

बच्चे सीधे चैंपियन नहीं बन जाते, उनके अभ्यास को मैदान लगते हैं...

संपादकीय
29 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में अभी कुछ देर पहले सरकार के सालाना खेल जलसे में राज्य के होनहार खिलाडिय़ों का सम्मान किया गया, और उन्हें अलग-अलग पुरस्कार दिए गए। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने राज्य की खेल नीति बनाने की घोषणा भी की है, लेकिन हमारी नजर में राज्य के खेल को जो सबसे नुकसानदेह बात है, उसकी यहां पर चर्चा जरूरी है ताकि उसे खेल नीति में शामिल किया जा सके, और सरकार यह घोषणा करे कि उसे पूरी तरह माना जाएगा।
राज्य में स्कूल-कॉलेज के खेल मैदानों के अलावा हर शहर-कस्बे में बहुत से सार्वजनिक मैदान ऐसे रहते हैं जिन पर खेल होना चाहिए। लेकिन हम राजधानी रायपुर में ही देखते हैं कि ऐसे तमाम मैदानों पर कोई न कोई बाजारू कार्यक्रम चलते रहता है, और धर्म, समाज, राजनीति, कारोबार के कोई न कोई जलसे हर मैदान के लिए कतार में लगे ही रहते हैं। सरकार रिकॉर्ड में इन मैदानों को इन आयोजनों के लिए कुछ दिनों के लिए देना दिखाया जाता है, लेकिन उनके कई दिन पहले से, कई मामलों में तो हफ्तों पहले से उन मैदानों पर तैयारी शुरू हो जाती है, और कार्यक्रम निपट जाने के बाद गड्ढों और कचरे से भरे हुए मैदान को छोड़ दिया जाता है। स्कूल और कॉलेज के मैदान भी किसी न किसी भवन बनाने में छोटे कर दिए जाते हैं, और राजधानी रायपुर का ऐतिहासिक सपे्र स्कूल मैदान तो आसपास की सड़कों को चौड़ा करके महज पार्किंग-इस्तेमाल के लिए छोटा कर दिया गया है, और अब वह किसी टूर्नामेंट के आकार का नहीं बचा है। इसी तरह राजधानी का ऐतिहासिक गवर्नमेंट स्कूल अपने मैदान की लंबाई-चौड़ाई को सड़कें चौड़ी करने के लिए खो बैठा है, और सड़कों की यह चौड़ाई महज पार्किंग के उपयोग में आ रही हैं।
हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ सरकार को सबसे पहले यह खुली घोषणा करनी चाहिए कि राज्य के किसी भी मैदान की एक इंच जमीन भी नहीं खाई जाएगी। ऐसा अगर नहीं होगा, तो खेलों के नाम पर जलसे जरूर होंगे, बाहर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टीमों के आने पर राज्य के बड़े-बड़े स्टेडियमों में मैच तो हो जाएंगे, लेकिन स्थानीय बच्चों के खेलने-कूदने की जगह खत्म होती जाएंगी। कभी किसी जरूरत के लिए, तो कभी किसी और जरूरत के लिए, मैदानों पर लोगों की नजर लगी रहेगी और बच्चों का मैदानों पर हक सबसे आखिर में आएगा। किसी भी देश-प्रदेश में बच्चे सीधे-सीधे स्टेडियम में खेलने वाले चैंपियन नहीं बन जाते। उनको अभ्यास के लिए जब तक अपने स्कूल-कॉलेज, मोहल्ले में मैदान नहीं मिलेंगे, तब तक वे तरक्की नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा सरकार को यह भी समझना चाहिए कि खेल मैदान किसी भी शहर में खुली हवा की जगह भी रहते हैं, और उनकी वजह से आसपास की प्रदूषित हवा का जहर कुछ कम भी होता है। 

इस फर्क में पिछली सदी तक के फर्क के मुकाबले बड़ा फर्क है...

आजकल
28 अगस्त 2017

इंसान का पिछले कुछ सौ बरस का दर्ज इतिहास देखें तो यह समझ पड़ता है कि टेक्नालॉजी ने उसकी जिंदगी के रूख को भी बदला, और रफ्तार को भी। ऐसा माना जाता है कि इंसान ने जब चक्का बनाया, तो वह उस वक्त तक का सबसे बड़ा आविष्कार था क्योंकि मशीनों से लेकर गाडिय़ों तक, और अब हवाई जहाज के उडऩे तक, इनमें से कोई भी काम चक्के के बिना नहीं हो सकता था। इसके अलावा कभी बारूद का आविष्कार, तो कभी बिजली का आविष्कार, कभी टेलीफोन का आविष्कार या कभी सीमेंट का, इन्होंने इंसान की जिंदगी को और जीने के तौर-तरीकों को समय-समय पर बदला, किसी ने कम, किसी ने अधिक।
ऐसा माना जाता है कि चक्के का आविष्कार पासान मानव के वक्त, एक ऐसे दौर में हुआ जिसे निओलिथिक दौर कहते हैं। लेकिन पिछले हजारों बरस में, चक्के के बनने के बाद से अब तक टेक्नालॉजी ने लोगों की जिंदगी बदलने में सैकड़ों बरस लगाए। लेकिन हाल के बरसों को देखें तो इंटरनेट, मोबाइल फोन, और सोशल मीडिया जैसे औजारों ने मोटे तौर पर पिछले बीस-पच्चीस बरसों में दुनिया के इतने बड़े हिस्से की जिंदगी को इतना बदलकर रख दिया है कि पच्चीस बरस बाद कोई कोमा से बाहर आएं, तो उन्हें लगेगा कि वह विज्ञान कथा की किसी नई दुनिया में पहुंच गए हैं।
यहां पर यह भी समझने की जरूरत है कि इन सूचना-औजारों में कामकाज और लोगों की उत्पादकता, कारोबार और किसी प्रोडक्ट की धारणा को तो एक विस्फोट की रफ्तार से बदलकर रख दिया है, लेकिन इसके साथ-साथ इंसान के संबंधों और उनकी सोच को भी, संस्कृतियों और जीवन के मूल्यों को भी इस कदर बदल दिया है, कि उन्हें पहचानना मुश्किल है। एक वक्त था जब लोगों की जिंदगी में स्टूडियो में पहुंचकर एक तस्वीर खिंचवाना बड़ी बात होती थी, और उस एक तस्वीर की तीन कॉपियां बनवाकर उन्हें पीढिय़ों तक सम्हालकर रखा जाता था। आज लोग खाते-नहाते अपनी तस्वीरें लेते हैं, उन्हें सेमर के फल के फटने पर हवा में उड़ते रेशों की तरह चारों तरफ फैला देते हैं, और उन पर दुनिया भर में बिखरे दोस्तों के बीच चर्चा भी शुरू हो जाती है।
अभी हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में निजता के अधिकार को लेकर एक ऐतिहासिक और सबसे बड़ा फैसला हुआ है, लेकिन इस निजता को लोग आज सोशल मीडिया पर खुद होकर जिस अंदाज और रफ्तार से कचरे की टोकरी में डालते दिखते हैं, वह भी किसी ने अभी दस-बीस बरस पहले तक सोचा भी न होगा। इस तरह टेक्नालॉजी ने इस बार जिस रफ्तार से लोगों की जिंदगी बदली है, उसकी कल्पना विज्ञान कथा लेखकों से परे शायद ही किसी ने की हो।
निजी जिंदगी, कामकाज, कारोबार, लोकतंत्र, कानून, इन सबकी परिभाषाएं जिस रफ्तार से टेक्नालॉजी की वजह से बदल रही हैं, वह अविश्वसनीय सा है। लोगों के परिवार के भीतर के रिश्ते ऐसे बदल रहे हैं कि एक पीढ़ी पहले तक उसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। सामाजिक संस्कृति, पारिवारिक तौर-तरीके, और निजी सोच, इन सबमें संचार तकनीक और सोशल मीडिया ने एक धमाके के साथ कुछ वैसा ही फर्क ला दिया है जैसा कि किसी खदान में चट्टानों को तोडऩे के लिए धमाका किया जाता है, और उसके साथ ही वहां की तस्वीर बदल जाती है। दो पीढिय़ों के बीच के फासले, परिवार के भीतर के दो रिश्तों के बीच के फासले, ये सारे के सारे खो गए हैं, और तकनीक की एक छलांग ने इन सबको एक बराबर नाप दिया है, एक साथ पार कर लिया है, और इनके बीच की सरहदों को मिटा दिया है।
और किसी भी टेक्नालॉजी की तरह, संचार और सोशल मीडिया की यह टेक्नालॉजी लौटने के लिए नहीं आई है, महज आगे बढऩे के लिए आई है। चक्का जब पत्थर का बना था, तो वह फिर से पत्थर बनने के लिए नहीं बना था, घूमने के लिए, घुमाने के लिए, और आगे बढऩे के लिए बना था। उसी तरह आज संचार तकनीक और अधिक संपर्क, और अधिक अंतरसंबंध, और अधिक बताने और जानने के लिए आई है, और धीरे-धीरे यह एक ऐसे दिन की तरफ बढ़ रही है जब औजारों की जरूरत कम से कम होती जाएगी। आज भी जिस तरह मोबाइल फोन के सिग्नल दिखते नहीं हैं, घरों के भीतर वाईफाई की तरंगें दिखती नहीं है, लेकिन हैं। इसी तरह फोन या कम्प्यूटर की तरह के औजार धीरे-धीरे खत्म होने की तरफ बढ़ रहे हैं, और लोगों के बदन में ऐसी माइक्रोचिप लगाना शुरू हो गया है जो कि महज सिग्नलों के मार्फत दूसरी मशीनों से, दूसरे लोगों से बातचीत करने लगेंगे, करने लग गए हैं, और अमरीका में ऐसे दफ्तर सामने आए हैं जहां के कर्मचारी अपने बदन में माइक्रोचिप लगवाकर सभी तरह की शिनाख्त और पासवर्ड की जरूरत को पार कर चुके हैं। दूसरी तरफ टेक्नालॉजी ऐसे उपकरण बना चुकी है जिससे कम्प्यूटर किसी के दिमाग में चल रही बातों को पढऩे लगे हैं, और दिमाग अब महज सोचकर कम्प्यूटरों पर काम करने लगे हैं, बिना बोले, बिना उंगली भी हिलाए।
इंसानों के बीच अब तक बिना बोले महज उंगलियों से एक फोन से दूसरे फोन पर, एक संदेश से दूसरे संदेश पर बातचीत रोजमर्रा की बात हो गई है। अब अगला कदम टेक्नालॉजी का यह रहने जा रहा है कि बिना कहे एक-दूसरे से कह लेना, और दूसरे को सुन लेना। तीसरा कदम जिस तरफ इंसान बढ़ चुके हैं, वह है लोगों के दिमाग को पढ़ लेना, और यह बहुत दूर की बात नहीं है, शायद अगली आधी सदी के भीतर यह होने लगेगा।
लेकिन हजारों बरस के सफर में इंसान टेक्नालॉजी की मदद से 20वीं सदी में ही कम्प्यूटर-इंटरनेट, और फोन के इस्तेमाल से अपनी जिंदगी को बदल पाए। इनमें से सौ-सौ बरस में लोगों की जिंदगी में जो फर्क पड़ा होगा, वह अब शायद हर एक बरस में या हर दो-चार बरस में पडऩे लगा है, और इस बार का यह फर्क किसी कारोबार या किसी सामान के मार्फत न होकर, किसी कारखाने से बनकर कारोबारी से होते हुए ग्राहक के हाथों तक न पहुंचकर, सीधे एक इंसान से दूसरे इंसान के हाथों, एक इंसान से दूसरे के दिमाग तक पहुंचने वाला फर्क है, और इस फर्क में पिछली सदी तक के फर्क के मुकाबले खासा बड़ा फर्क है।

विपक्षी एकजुटता को लालू ने औलादों को समर्थन मान लिया

संपादकीय
28 अगस्त 2017


बिहार में कल भाजपा, मोदी, और नीतीश के खिलाफ लालू यादव ने विपक्ष की एक बड़ी रैली बुलाई जिसमें डेढ़ दर्जन पार्टियां शामिल हुईं, और कांग्रेस से अध्यक्ष-उपाध्यक्ष उसमें नहीं पहुंच पाए लेकिन उन्होंने अपना संदेश भेजा और पार्टी के नेता भेजे। यह एक अलग विवाद चल रहा है कि रैली में भीड़ की जो फोटो लालू यादव ने ट्वीट की है वह असली है या नकली है, लेकिन दूसरी तरफ जो बात रैली के कल के नजारे से सामने आ रही है, और आज लालू के बयान से दिख रही है, उससे लगता है कि अपनी दुर्गति के बावजूद लालू यादव को यह अक्ल नहीं आई है कि अब समय अश्लील कुनबापरस्ती का नहीं रह गया है, और वे सारे विपक्ष को इसलिए इकट्ठा नहीं कर सकते कि वे अपनी औलादों को आगे बढ़ाएं। विपक्ष के नेता मोदी के विरोध के लिए पहुंचे थे, उनकी एकजुटता को अपनी औलादों का समर्थन मानने की गलती करके लालू यादव और कहीं के नहीं रहेंगे।
कल जिस तरह से सर्वदलीय या बहुदलीय आमसभा के मंच पर देश भर के नेताओं की मौजूदगी में लालू के बेटों ने एकाधिकार जमा रखा, और एक बेटे ने जिस भौंडी जुबान में आरएसएस के मुखिया के खिलाफ नासमझी की बातें कीं, उनसे भी यह जाहिर होता है कि लालू अपने कुनबे को बचाने और बढ़ाने के लिए विपक्ष का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बात विपक्ष की एकता की किसी भी संभावना को चौपट करने के लिए काफी है क्योंकि मोदी के खिलाफ, एनडीए या भाजपा के खिलाफ कोई भी मोर्चा मुद्दों पर आधारित हो सकता है, न कि कुनबे पर आधारित। और फिर आज लालू यादव ने अपने बेटों को कृष्ण और अर्जुन बताते हुए जिस तरह के बयान दिए हैं, वह सब विपक्ष की संभावनाओं पर एक बड़ी चोट है। पिछले दिनों, कुछ हफ्ते पहले ही नीतीश कुमार ने विपक्ष की संभावनाओं को चौपट किया था, और अब लालू इस अंदाज में दिख रहे हैं, कि आज मेरी बारी है।
जब भाजपा विरोधी नेता इस कदर आत्ममुग्ध हों, और बददिमाग हों, तो फिर इस देश में भाजपा-विरोध की बात करना फिजूल है। देश में जब-जब कोई मुद्दा जलता-सुलगता है, कांग्रेस पार्टी के राजकुमार देश के बाहर रहते हैं, और बाहर भी ऐसे रहते हैं कि दो लाईन का बयान भी नहीं दे सकते। हरियाणा आज जिस तरह से बाबाग्रस्त है, जल रहा है, वैसे में राहुल गांधी को आज नार्वे की राजनीति की फिक्र पड़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाजपा-राज्यों की नाकामयाबी पर ट्वीट न करना तो समझ आता है, लेकिन जिस राहुल गांधी को ऐसे में लीड लेनी चाहिए, वे ऐसे मौके पर चुप और नदारद रहते हैं। कांग्रेस पार्टी में भाजपा से विरोध का खुला दमखम रखने वाले दिग्विजय सिंह हाशिए पर कर दिए गए हैं, और बाकी नेता मानो सहमे-सहमे से बयान देते हैं।
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की संभावनाएं बनना तो दूर रहा, हर कुछ महीनों में ये संभावनाएं चौपट हो रही हैं, और इसके बाद अगर भाजपा विरोधी पार्टियां देश की जनता को साम्प्रदायिकता के झांसे में आने की तोहमत देंगी, तो वह पूरी तरह से नाजायज तोहमत होगी। जब भाजपा का कोई विकल्प देश की जनता के सामने पेश नहीं किया जाएगा, तो उसके पास पसंद क्या है?

बेइंसाफी के मुद्दों पर सरकार सफाई दे, न कि चुप रहे...

संपादकीय
27 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में पुलिस के बहुत से मंझले और छोटे अफसरों की बर्खास्तगी से कुछ नए मुद्दे उठे हैं। बर्खास्त होने वाले अधिकारियों का अपना दर्द रहना जायज है, और उन्होंने यह सवाल खड़ा किया है कि बर्खास्त अधिकतर अफसर दलित और आदिवासी तबकों के हैं, और बर्खास्तगी तय करने वाली अफसरों की कमेटी में शायद कोई दलित-आदिवासी नहीं हैं। बर्खास्त लोगों में से कुछ महिलाओं ने यह सवाल भी खड़े किए हैं कि सवर्ण जातियों के बहुत से ऐसे अधिकारी हैं जिनके खिलाफ बड़ी गंभीर शिकायतें बनी हुई हैं। इसके अलावा कम से कम एक महिला अधिकारी ने अपने बड़े अफसरों के चाल-चलन को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं, और उसका कहना है कि उसने पहले भी इसकी शिकायत सरकार से की है। इसी वक्त राज्य सरकार में एक और कार्रवाई हुई है, एक बड़े आईपीएस अफसर को प्रमोशन दिया गया है, और उसके खिलाफ एक छोटी महिला सिपाही द्वारा यौन प्रताडऩा की लगातार की गई शिकायत पर कोई कार्रवाई न होने को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग तक कई बार नोटिस भेज चुका है। खुद राज्य सरकार ने इस सिपाही की शिकायत पर बड़ी उच्च स्तरीय जांच करवाई थी, और उसकी रिपोर्ट भी सरकार और पुलिस मुख्यालय के बीच फुटबॉल की तरह एक-दूसरे की तरफ फेंकी जा रही है, और कोई कार्रवाई नहीं की गई।
हम इनमें से किसी भी आरोप या किसी भी शिकायत के सही या गलत होने पर कुछ कहे बिना इन मुद्दों पर चर्चा करना चाहते हैं कि अगर राज्य में दलित-आदिवासी जैसे कमजोर तबके के लोगों को भेदभाव की ऐसी शिकायत हो रही है, तो राज्य सरकार को और राज्य की दूसरी राजनीतिक-सामाजिक ताकतों को इसके बारे में सोचना चाहिए। न्याय का एक बुनियादी सिद्धांत रहता है कि न्याय न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना भी चाहिए। क्या सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों की बर्खास्तगी के लिए बनी कमेटियों में सरकारी सेवा के कमजोर तबकों के अधिकारी सचमुच नहीं हैं? क्या किसी छोटी महिला सिपाही की बार-बार लिखवाई गई रिपोर्ट, बार-बार की गई शिकायत पर खुद शासन की करवाई गई जांच की रिपोर्ट पर महीनों गुजर जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न करना, और आरोपों से घिरे अफसर को प्रमोशन देना जायज बात है? हम यहां पर इन दोनों पक्षों में से किसी एक की हिमायत नहीं कर रहे, लेकिन क्या लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकार को इंसाफ करते हुए दिखना नहीं चाहिए? ऐसी कौन सी वजह है कि राज्य की एक सबसे बड़ी महिला अधिकारी की अगुवाई में बनाई गई जांच कमेटी की रिपोर्ट को न सरकार खारिज कर रही है, न उसे मंजूर करके कोई कार्रवाई कर रही है? ऐसे में जब सिपाही स्तर की एक महिला आईजी स्तर के एक अफसर के खिलाफ लगातार इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है, तो उसकी बात अनसुनी करके, जांच रिपोर्ट को अनदेखा करके राज्य सरकार प्रदेश की बाकी महिला कर्मचारियों और बाकी महिलाओं को किस तरह का संदेश दे रही है?
हमारा ख्याल है कि संविधान में और कानून में भारत के कमजोर तबकों को खुलासे से पहचाना गया है, और उनके बारे में खास सावधानी बरतने, उनका खास ख्याल रखने की जिम्मेदारी न सिर्फ राज्य सरकारों को, बल्कि राज्यपालों को भी दी गई है। राज्यपालों को एक किस्म से ऐसे कमजोर तबकों का संरक्षक माना गया है, और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी-बहुल राज्य में तो राज्यपाल का आदिवासी इलाकों के लिए अतिरिक्त जिम्मा भी संविधान में लिखा गया है। ऐसे में अगर सरकार लगातार दलित-आदिवासी कर्मचारियों-अधिकारियों के साथ भेदभाव की नाइंसाफी करने की तोहमत पा रही है, तो सरकार को किसी स्तर पर अपनी सफाई देनी चाहिए। इसके अलावा अगर महिला का शोषण हुआ है, और वह इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है, तो उसे सड़क पर अकेले छोड़कर सरकार ऐसे अफसर को प्रमोशन दे जिस पर तोहमतें लगी हैं, और जैसी कि खबरें हैं, जांच रिपोर्ट में आरोप सही पाए गए हैं, तो यह राज्य का कैसा कल्याणकारी रूख है? छत्तीसगढ़ सरकार को आज देश की हवा देखते हुए यह समझ लेना चाहिए कि देश की न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के बीच तीन तलाक को लेकर जागरूकता आई है, बल्कि देश की सभी महिलाओं के बीच अपने अधिकारों को लेकर एक नया हौसला सामने आया है, और कानून उनका साथ भी दे रहा है। दूसरी बात यह दलित-आदिवासी तबकों की शिकायतों को लगातार और लंबे समय तक अनदेखा करना है किसी भी राजनीतिक ताकत के लिए समझदारी नहीं होगी, क्योंकि ये तबके सड़कों पर लड़ाई के साथ-साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण की ताकत भी रखते हैं, और अदालतों में जाने जितनी ताकत भी इनकी हो गई है।
एक जनकल्याणकारी सरकार की जिम्मेदारी निभाते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को इन तमाम मुद्दों पर अपना पक्ष साफ करना चाहिए, इसके पहले कि नसबंदी मौतों, बस्तर की बलात्कार-मौतों, और गौशाला-मौतों के बाद बेइंसाफी की शिकार किसी महिला की हताशा-मौत भी सामने आ जाए। 

हरियाणा में दुबका हुआ लोकतंत्र और बलात्कारी के गुंडों का राज

संपादकीय
26 अगस्त 2017


हरियाणा में कल जो हुआ, उसके बारे में हम कल दोपहर के पहले इसी जगह पर लिखे संपादकीय में आशंका जाहिर कर चुके थे। हमने यह भी लिखा था कि जिस तरह 6 दिसंबर 1992 को उत्तरप्रदेश के अयोध्या में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सहमति और तैयारी से वहां जुटे लाखों कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी थी, ठीक उसी तरह कल हरियाणा के पंचकुला में बाबा राम रहीम के अनुयायियों ने पूरे शहर को तबाह कर दिया, जगह-जगह आग लगा दी, यह पूरा अंदेशा हाईकोर्ट को दो दिनों से था, और हर कुछ घंटों में हाईकोर्ट इस बारे में सुनवाई करके हरियाणा के पुलिस प्रमुख को लताड़ लगा रहा था, लेकिन मानो सरकार को कोई होश नहीं था, कानून को बनाए रखने का उसमें कोई जोश नहीं था। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने ऐसा ही निकम्मापन जाट आंदोलन के समय दिखाया था, और उसी का दुहराव कल हुआ, जब बलात्कारी बाबा के गुंडे-मवाली कानून को हाथ में लेकर अदालत का भी मुंह चिढ़ाते रहे।
कुछ बरस पहले तक देश में केन्द्र सरकार जरूरत पडऩे पर राज्य सरकारों को बर्खास्त करती थी। और सिलसिला वैसे तो असंवैधानिक था, लेकिन हरियाणा के इस ताजा माहौल में उस सिलसिले की याद जरूर आती है। हम उस अलोकतांत्रिक परंपरा को फिर आगे बढ़ाने की वकालत नहीं करते, लेकिन मनोहर लाल खट्टर उसी बर्ताव के हकदार हैं। दूसरी बात यह कि उन्होंने हरियाणा को जितनी शर्मिंदगी दिलाई है, उसे देखते हुए देश में बहुत से लोग यह मान रहे हैं कि केन्द्र की मोदी सरकार हरियाणा की भाजपा सरकार को बर्खास्त तो नहीं करेगी, लेकिन ऐसे मुख्यमंत्री को हटाने से मोदी-अमित शाह को कौन रोकता है? लोगों को याद होगा कि इस बलात्कारी बाबा के लिए इस खट्टर की जुबान में आज सुबह टीवी पर दिए गए बयानों में भी अपार श्रद्धा झलकती है, और बाबा के गुंडों की हिंसा की आलोचना करने के बजाय मुख्यमंत्री उसके पीछे की वजहों को गिनाते हुए मानो उसे न्यायोचित ठहरा रहे हैं। बाबा के कितने लाख भक्त हैं, और बाबा का कितना असर है, और बाबा के भक्त कितने राज्यों में हैं, यह गिनाते हुए मानो खट्टर का गला ही सूख रहा है।
यह नौबत पूरे देश के लिए सम्हलकर बैठने, और यह सोचने की है कि यह किस तरह का भारत हो गया है, और मोदी इसे किस तरह का नया भारत बनाना चाह रहे हैं? पिछले तीन बरस इस देश ने वैज्ञानिक सोच के पतन, और अंधविश्वास, पाखंड, कट्टरता, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता के बढऩे के ही देखे हैं। यह सोच कमसमझ लोगों  के वोटों का बहुमत तो दिला सकती है, लेकिन किसी तरह का नया भारत नहीं बना सकती। बहुत से लोगों का यह मानना है कि जाट आंदोलन के वक्त मुर्दा पड़ी हरियाणा सरकार की याद अभी ताजा-ताजा थी, और उसी भरोसे डेरा के मवालियों ने बड़े पैमाने पर यह हिंसा की। किसी राज्य में धार्मिक शांति, सद्भावना, मजदूर शांति, कानून का सम्मान, यह रातों-रात खड़ा नहीं होता। जहां पर मनोहर लाल खट्टर का यह सार्वजनिक बयान लोगों को याद हो कि जिन महिलाओं को रात में अकेले बाहर निकलने का शौक, वे महिलाएं नंगी क्यों नहीं घूमतीं, वहां पर महिलाओं का अपमान होना तय है, और बलात्कारी बाबा का बोलबाला होना भी तय है।
लेकिन पिछले हफ्ते दो बड़े फैसले ऐसे आए जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले दिए। मुस्लिम महिला को तीन तलाक की हिंसा से बचाने का फैसला, और निजता को मौलिक अधिकार मानने का फैसला। इसके बाद अब सीबीआई की एक राज्य अदालत ने बाबा राम रहीम को बलात्कार का कुसूरवार मानने का फैसला दिया। और यह भी माना जा रहा है कि निजता वाले फैसले से सुप्रीम कोर्ट में दूसरे बहुत से मामलों में भी फर्क पड़ेगा, बीफ का मामला, आधार कार्ड का मामला। इस तरह अभी ऐसा लग रहा है कि इस देश में सरकार और संसद के करने के बहुत से काम अदालतें कर रही हैं, और कल ही पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जिस तरह से इस बलात्कारी बाबा और उसके मवालियों की गुंडागर्दी पर लगातार सरकार को उसका काम सिखाया है, वह भारत की न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा फिर कायम करता है, और सरकार को निकम्मेपन का सर्टिफिकेट भी देता है। केन्द्र की मोदी सरकार को अपनी पार्टी की इस राज्य सरकार के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए क्योंकि हरियाणा में सरकार खट्टर के चेहरे पर नहीं, मोदी के चेहरे पर बनी है। और केन्द्र सरकार के साथ-साथ भाजपा को यह भी सोचना चाहिए कि आज हाईकोर्ट ने किस कदर मजबूर और निराश होने के बाद यह कहा है कि हरियाणा सरकार ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए पंचकुला को जल जाने दिया। हमें अदालतों के ऐसे हिम्मती बयान अधिक याद नहीं पड़ते हैं।
इससे परे देश भर में सरकारों और राजनीतिक दलों को यह भी सोचने की जरूरत है कि वे अपने-अपने इलाकों में बाबाओं को कितना ताकतवर होने देना चाहते हैं? छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में भी हम ऐसे कई बाबा देखते हैं जिनके पैरों पर नेता, अफसर, और जज पड़े रहते हैं, और वे बाबा भी ऐसी ही कई तरह की संदिग्ध हरकतों से घिरे रहते हैं, सत्ता और अदालत की दलाली करते हैं, और मुजरिमों को बढ़ावा देते हैं। यह सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए कि किसी तबके के वोटों के दलाल ऐसे बाबाओं के जुर्म माफ करते हुए सत्ता उनके पैरों पर पड़ी रहे। और जब लाखों की संख्या में जनता ऐसे पाखंडी मुजरिमों को अपना भगवान मानती है, तो इससे यह भी पता लगता है कि उस जनता की अपनी सोच कितनी परिपक्व है, उसमें समझ कितनी है। और जनता तो शायद एक बार ऐसी नासमझी से उबर भी जाती, लेकिन नेता चाहते हैं कि उसकी नासमझी कायम रहे। इस बारे में समाज के और लोगों को भी सोचने की जरूरत है कि क्या सरकार और पार्टियों से परे जनता के बीच के लोग खुद भी जागरूकता फैला सकते हैं? हालांकि ऐसा करने वाले लोगों को महाराष्ट्र के सुधारवादियों की तरह मौत का सामना भी करना पड़ सकता है, और जिनके कातिलों को ढूंढना भी सरकार न चाहती हो।

अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से मुंह चुराती हरियाणा सरकार और फौज के घेरे में कोर्ट

संपादकीय
25 अगस्त 2017


हरियाणा की अदालत जरा देर में राम रहीम नाम के एक सामुदायिक गुरू के एक आपराधिक मामले में फैसला सुनाने जा रही है। यह राम रहीम के बहुत से मामलों में से एक है, और बलात्कार के आरोप वाले इस मामले से परे कहीं कत्ल का कोई मामला, तो कहीं लोगों को नपुंसक बनाने का मामला, ऐसे कई और अपराध उसके नाम पर दर्ज हैं जिन पर फैसले आने अभी बाकी हैं। आज जरा देर में बलात्कार के मामले में फैसला आने वाला है, और फैसला राम रहीम के खिलाफ जाने की आशंका में उनके लाखों भक्तजन अदालत के शहर में डेरा डाल चुके हैं, और हाईकोर्ट के बहुत ही कड़े रूख और हुक्म के बावजूद हरियाणा के पुलिस प्रमुख इस गैरकानूनी भीड़ को हटाने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं। पंचकुला में पहले से प्रतिबंधात्मक धारा लागू है, और चार से अधिक लोगों का इक_ा होना गैरकानूनी है, लेकिन पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में गुरमीत राम रहीम की पकड़ को देखते हुए निर्वाचित सरकारों की बोलती बंद है, और हरियाणा में तो वैसे भी भाजपा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर राम रहीम के प्रशंसक हैं। इसलिए हाईकोर्ट के कड़े रूख और बर्खास्तगी की चेतावनी के बावजूद प्रदेश के पुलिस प्रमुख ने किसी को नहीं हटाया, और पंचकुला मानो आज बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। बाबा के समर्थक कहने को तो अब तक शांत हैं, लेकिन भक्तों को नापसंद कोई फैसला आने पर दसियों हजार सुरक्षा कर्मचारियों की मौजूदगी भी हालात को शायद ही काबू में रख सके। नौबत इतनी खराब है कि अदालत के इलाके को फौजी छावनी की तरह बना दिया गया है, और हिन्दुस्तानी फौज को भी वहां लाकर रखा गया है। 
भारतीय राजनीति में धर्म, आध्यात्म, और जाति संगठनों के नेताओं के वोटरों पर दबदबे के चलते हुए उनके जुर्म पर सरकारें कुछ करना नहीं चाहतीं। फिर यह भी है कि मुख्यमंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्रियों तक ऐसे लोगों की पकड़ इतनी रहती है कि आमतौर पर किसी जांच एजेंसी और किसी जांच अधिकारी का हौसला भी इनको कटघरे तक ले जाने का नहीं हो पाता। और ऐसा ही सामाजिक दबाव, शायद राजनीतिक दबाव भी, अदालत के जज पर भी आता है जो अपने अहाते के बाहर लाखों लोगों के बागी और हिंसक तेवर के खतरे को देखते हुए भी फैसला देने के दबाव में रहते हैं। यह नौबत शर्मनाक है क्योंकि लोकतंत्र में सरकारों को अदालत से लात खाए बिना भी अपना काम करना सीखना चाहिए। आज लाखों लोगों की मौजूदगी के बाद अगर किसी तरह की हिंसा शुरू होती है, तो उसके लिए पूरी तरह ऐसी भीड़ और उससे भी अधिक हरियाणा की सरकार जिम्मेदार रहेगी। लोगों को याद होगा कि छह दिसंबर 1992 को जब बावरी मस्जिद गिराई गई थी, तो उसके पहले भी वहां के भाजपा मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अदालत को यह हलफनामा दिया था कि मस्जिद की सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी है। और उसके बाद मानो सरकारी हिफाजत में दसियों हजार कारसेवकों ने बावरी मस्जिद की ईंट से ईंट बजा दी, पूरे ढांचे को गिरा दिया, और सरकार हाथ पर हाथ धरे देखती रही। हमारा मानना है कि बेकाबू भीड़ की आशंका को देखते हुए सरकारों को पहले से कार्रवाई करनी चाहिए, न कि भीड़ आ जाने के बाद असहाय की तरह हाथ बांधे खतरा खड़े होने देने के। 
भारत की अदालतों के जज भी इसी समाज में रहते हैं, और वे अपनी जिंदगी के लिए, नौकरी के लिए, सहूलियतों के लिए तरह-तरह से सरकार और समाज पर निर्भर भी करते हैं। ऐसे में ऐसा भयानक सामाजिक तनाव उनके फैसले को प्रभावित कर सकता है। इसलिए हमारा मानना है कि संविधान के प्रति जवाबदेह सरकारों को अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, न कि अयोध्या और पंचकुला जैसी नौबत लाकर जुर्म होने देना चाहिए। अभी खबर आ रही है कि पंचकुला की अदालत के बाहर सेना को तैनात किया गया है, और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट लगातार इस मामले को देखकर छोटी-छोटी बातों पर हुक्म देने के लिए मजबूर हो गया है। जब अदालत को किसी प्रदेश और शहर के प्रशासन को चलाने के लिए खुद लाठी उठाकर सरकार को चेतावनी देनी पड़े, और भीड़ को चेतावनी देनी पड़े, तो वह निर्वाचित सरकार के लिए डूब मरने की बात है। हरियाणा की खट्टर सरकार के लिए यह एक शर्मनाक दिन है कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारी को हाईकोर्ट ढो रहा है, और राज्य सरकार ने ऐसी विस्फोटक नौबत लाकर खड़ी की है। लोकतंत्र में चुनावी राजनीति के लिए भीड़ के तुष्टिकरण की यह एक शर्मनाक मिसाल है, और देश की बाकी सरकारें इस नौबत से नसीहत ले सकती हैं। जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं उस वक्त मौके पर तनाव बना हुआ है, और कल शायद इस मुद्दे पर हमें फिर लिखने की जरूरत आए।

पत्रकारिता के नाम पर विश्वविद्यालय, राष्ट्रवादी पशुपालन प्रशिक्षण केन्द्र

संपादकीय
24 अगस्त 2017


अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से भोपाल में चल रही माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में एक अनोखा फैसला लिया है, और विश्वविद्यालय के अहाते में दो एकड़ जमीन पर गौशाला बनाना शुरू किया है। विश्वविद्यालय के कुलपति एक बहुत सक्रिय हिन्दुत्ववादी हैं, और उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के नए बन रहे परिसर में पचास एकड़ जमीन जिसमें से दो एकड़ का कोई उपयोग नहीं सूझ रहा था, इसलिए वहां पर गौशाला बनाना शुरू कर दिया गया है।
मध्यप्रदेश का यह विश्वविद्यालय और छत्तीसगढ़ का इसी की तर्ज पर नए राज्य बनने के बाद बनाया गया कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय मप्र-छत्तीसगढ़ में भाजपा राज आने के बाद से लगातार एक-दूसरे से मुकाबले में है कि कहां पर आक्रामक राष्ट्रवादी हिन्दुत्व को अधिक बढ़ाया जा सकता है। दोनों ही विश्वविद्यालयों में लगातार ऐसी सोच के लोग कुलपति मनोनीत किए गए, और इन दोनों के कार्यक्रमों की लिस्ट देखें, तो छांट-छांटकर देश भर से ऐसे लोगों को यहां बुलाया गया जो कि भाजपा और हिन्दुत्व का अभियान चलाने की पत्रकारिता करते आए हैं, और घोषित रूप से भी इन विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादिता के बैनर तले कार्यक्रम करवाए जाते रहे हैं। हम छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को उसकी स्थापना के समय से करीब से देखते आ रहे हैं, और इसने राष्ट्रवाद की एक हिन्दुत्ववादी सोच को बढ़ाने के अलावा कोई योगदान नहीं दिया, पत्रकारिता में तो इसका योगदान शून्य से भी नीचे, नकारात्मक रहा। उसकी वजह यह है कि जब तक छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों के तहत पत्रकारिता विभाग चलते थे, वे विश्वविद्यालयों की एक गैरराजनीतिक और गैरसाम्प्रदायिक सोच के मुताबिक विषय की पढ़ाई करवाते थे। जब से पत्रकारिता के पढ़ाई के नाम पर बिना जरूरत विश्वविद्यालय नाम का हाथी पाला गया, उस पर सरकार का खर्च हुए जा रहा है, और वहां से कोई पत्रकार बनकर निकल नहीं रहे हैं। हमारा ख्याल है कि अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जब पत्रकारिता की पढ़ाई होती थी, तो छत्तीसगढ़ के मीडिया को भी यहां से निकले हुए कुछ अच्छे पत्रकार मिल जाते थे, लेकिन अब वहां से निकले हुए लोगों के पास पत्रकारिता का हुनर तो नहीं होता, उनके दिमाग पर राष्ट्रवाद की टोकरी जरूर लदी होती है।
हम अगर जनता के पैसों पर चलने वाले छत्तीसगढ़ के इस पत्रकारिता विश्वविद्याय को देखें तो इसे पचास एकड़ से अधिक की जगह मिली हुई है, और करोड़ों रूपए साल का खर्च हो रहा है। यहां के छात्र-छात्राओं की गिनती इतने बरसों में भी कुछ सौ से अधिक नहीं पहुंच पाई है, और इनमें से जानकार लोगों का यह मानना है कि दूसरे प्रदेश से यहां आकर दाखिला लेने, और फिर सीधे इम्तिहान देने वाले छात्र-छात्रा बड़ी संख्या में हैं, जिन्हें न विश्वविद्यालय से कोई फायदा होता, और न ही जिनसे पत्रकारिता का कुछ भला होता। दरअसल एक विचारधारा के विस्तार के लिए, और उस विचारधारा के लिए समर्पित लेखक-पत्रकारों को उपकृत करने के लिए यह विश्वविद्यालय चलाया जा रहा है, और पत्रकारिता जैसे पेशेवर विषय, ऐसी संभावनाओं वाले विषय को पढ़ाने के बजाय इसे डिग्री देने वाले एक बहुत महंगे सरकारी छापाखाना बनाकर रख दिया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार को अपने इस विश्वविद्यालय के बारे में सोचना चाहिए, और मध्यप्रदेश सरकार से तो कुछ उम्मीद करना फिजूल इसलिए है कि दूध, गोमूत्र, और गोबर के माध्यम से पत्रकारिता सिखाने की निर्वाचित सरकार की कोशिश इस विश्वविद्यालय के डिग्री की रही-सही इज्जत भी खत्म कर देगी।
दरअसल जब कभी सत्ता की ऐसी विचारधारा शैक्षणिक संस्थाओं पर थोपी जाती है, और फिर उसके ऊपर धर्मान्धता और राष्ट्रवादिता का बोझ भी लाद दिया जाता है, तो वहां पर पढ़ाई का हाल वैसा ही होगा, जैसा गोरखपुर के अस्पताल में बच्चों का हुआ, या जैसा छत्तीसगढ़ की गौशालाओं में गायों का हुआ। कल के दिन केन्द्र सरकार मध्यप्रदेश सरकार के इस विश्वविद्यालय से प्रेरणा पाकर इसरो में भी गौशाला खोल दे, और वैज्ञानिकों के लिए यह तय कर दे कि रॉकेट केवल ऐसे बनाए जाएं जो कि गोमूत्र से चलें, तो हिन्दुस्तान तेज रफ्तार से सैकड़ों बरस पीछे जरूर चले जाएगा, रॉकेट चाहे धरती से सौ फीट भी ऊपर न जा सके। आज गोमूत्र और गोबर को तिलस्म की तरह पेश करने का जो बावलापन चला हुआ है, वह देश के ज्ञान-विज्ञान और देश की सोच को तबाह करके रख देगा, अगर यह बावलापन कुछ और बरस जारी रहा तो। पत्रकारिता न सिखाकर गौपालन सिखाना परले दर्जे की रद्दी सोच है, और दुनिया का इतिहास ऐसे विश्वविद्यालयों से बना नहीं है। यही वजह है कि केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को इस बात पर गौरव है और वे अपनी तस्वीर बेटी के साथ पोस्ट कर रहे हैं कि वह अमरीका के एमआईटी में पढऩे जा रही है। क्या आज देश के ताकतवर नेता, खरबपति कारोबारी, और कामयाब पेशेवर लोगों में से कोई भी अपनी संतानों को माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय या कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पढऩे भेजेंगे? यहां आने वाले गरीब या मध्यमवर्गीय छात्र-छात्राओं की जिंदगी तबाह करने पर आमादा ऐसे विश्वविद्यालयों के खिलाफ न सिर्फ स्थानीय जनमत तैयार होना चाहिए, बल्कि उनके खिलाफ जनहित याचिका भी लगानी चाहिए।

आस्था को हथियार बनाकर शक्तिप्रदर्शन, कुचला जाए

संपादकीय
23 अगस्त 2017


हरियाणा में एक संप्रदाय के गुरू गुरमीत राम रहीम के खिलाफ चल रहे एक बलात्कार-मामले में सीबीआई अदालत का फैसला आने जा रहा है, और दो दिन बाद आने वाले इस फैसले के मौके पर उनका साथ देने के लिए उनके भक्त और अनुयायी लाखों की संख्या में चंडीगढ़ पहुंचने की आशंका है। इसे देखते हुए राज्य सरकार की मांग पर केंद्र ने सीआरपीएफ के दस हजार जवान भेजे हैं। सरकारी एजेंसियों को यह आशंका है कि डेरा सच्चा सौदा नाम के इस संप्रदाय के अनुयायियों ने पंजाब, हरियाणा के इलाकों में हथियार और पेट्रोल इक_ा कर रखे हैं, और उनके गुरू को सजा होने की स्थिति में वे बड़े पैमाने पर हिंसा और तोडफ़ोड़ कर सकते हैं, हालत इतने तनाव से भरी है कि लोगों ने शादियां भी आगे बढ़ा दी हैं कि इस फैसले से कोई तनाव पैदा हो तो शादी बर्बाद न हो। यह मामला 2007 से चल रहा है, और गुरमीत राम रहीम पर उन्हीं की एक पूर्व महिला अनुयायी ने डेरा शिविर में कई बार बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी।
लोगों को याद होगा कि बलात्कार के ही एक आरोप में बरसों से जेल में कैद और जमानत का हकदार न माना जाने वाला आसाराम जब-जब अदालत लाया जाता है, तब-तब उसके अनुयायी वहां पहुंचकर सड़कों पर उत्पात करते हैं, अदालत को चारों तरफ से घेरने की कोशिश करते हैं, और अपने गुरू का हौसला बढ़ाते हैं। इसी तरह की नौबत कई धर्मों और संप्रदायों के गुरूओं के जुर्म में सामने आती हैं, जहां कानून और पुलिस के लिए बड़ी दिक्कत खड़ी होती है। गुरमीत राम रहीम के अनुयायियों में बड़ी संख्या में दलित हैं, और पंजाब-हरियाणा के इलाकों में उनका खासा असर माना जाता है। सिख धर्म के गुरूओं जैसी पोशाक पहनकर वह पहले भी तनाव खड़ा कर चुका है और बाद में इसके लिए उसे सिखों से माफी भी मांगनी पड़ी थी।
लोकतंत्र में कानून और आस्था के बीच टकराव की बहुत सी नौबतें आती हैं। जब मामला अदालत में चलते रहता है, तब भी देश भर में मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे सरीखे आंदोलन चलता है, और लोग बाबरी मस्जिद को गिराकर उसकी र्इंटों को लेकर देश भर में अपने-अपने शहर लौटते हैं, और वहां उनका युद्ध-विजेता जैसा सम्मान होता है। छत्तीसगढ़ में अभी-अभी सरकार ने एक धर्मगुरू पर बरसों से चल रहे एक मामले को वापिस लिया है जिसमें पुलिस ने उसे एक निजी संपत्ति पर बलवे और कब्जे में शामिल पाया था। धर्म और संप्रदाय की ताकत को कहीं हिंसा करने के लिए, तो कहीं जुर्म को मंजूरी दिलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, और भारत में आस्था एक बहुत बड़ा हथियार हमेशा से ही रहा है। इस आस्था का इस्तेमाल करते हुए बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, और उसके बाद देश भर में दंगों और हिंसा में हजारों लोग मारे गए थे।
लोगों को याद होगा कि हरियाणा में ही एक संप्रदाय के रामपाल नाम के एक गुरू को गिरफ्तार करने जब पुलिस पहुंची थी, तो उसके पूरे डेरे को एक फौजी छावनी बना दिया गया था और कई दिनों तक पुलिस और भक्तों के बीच हथियारबंद संघर्ष की नौबत रही थी। लोगों को कुछ दशक पहले का अमरीका का एक वाकया याद हो तो वहां भी एक संप्रदाय बनाकर किले सरीखी फौजी हिफाजत में रह रहे एक विवादास्पद गुरू से निपटने के लिए जब आम हथियार कारगर नहीं रह गए थे तो फौजी हथियार और शायद टैंक भी लेकर जाना पड़ा था।
ऐसी तमाम घटनाओं को देखते हुए यह लगता है कि संप्रदायों के साथ, या कि धार्मिक-मुजरिमों के साथ जब तक सरकारें बहुत कड़ाई से  निपटना शुरू नहीं करेंगी, तब तक आस्था की ताकत को हथियार बनाकर संप्रदाय या धर्म के मुजरिम अपनी हरकतें जारी रखेंगे। ऐसे तनाव के मौके पर केंद्र और राज्य सरकारों को पूरी कड़ाई से, और पूरी तैयारी से कार्रवाई करनी चाहिए ताकि यह कार्रवाई आगे भी ऐसे शक्तिप्रदर्शन का हौसला पस्त कर सके।

तीन-तलाक के बाद और भी कई रिवाज खत्म किए जाएं

संपादकीय
22 अगस्त 2017


सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के एक फैसले से मुस्लिम महिला के साथ लंबे समय से चली आ रही बेइंसाफी को खत्म करने की कोशिश की है और तीन-तलाक के प्रचलन को गैरकानूनी करार दिया है। पांच में से तीन जजों ने बहुमत से यह तय किया और केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह छह महीने में इसके लिए कानून बनाए। तब तक देश में तीन-तलाक गैरकानूनी रहेगा।
इस मामले के लिए एक अनोखी संविधानपीठ बनी थी जिसमें पांच अलग-अलग धर्मों के जज थे। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी। ऐसा लगता है कि बौद्ध धर्म को मानने वाले, आमतौर पर दलित कोई जज सुप्रीम कोर्ट में हैं नहीं, या फिर पांच धर्मों में उन्हें शामिल करना जरूरी नहीं समझा गया, और देश में गिनती के पारसियों के समुदाय से आए एक जज को इस बेंच में रखा गया। खैर, हम जजों के अपने धर्म का कोई ऐसा महत्व नहीं देखते कि देश की सबसे बड़ी अदालत जज के धर्म से ग्रस्त फैसले देती हो, वरना क्रिकेट के अंपायर की तरह तीसरे किसी देश के व्यक्ति की तरह सुप्रीम कोर्ट में तीसरे धर्म का जज रखना पड़ता। लेकिन इस चर्चा के बीच यह जिक्र जरूरी है कि इस मामले को मुख्य न्यायाधीश ने इतना महत्वपूर्ण माना कि इसके लिए गर्मी की छुट्टियां रद्द कर दीं, और पक्ष-विपक्ष के वकीलों को भी कह दिया गया कि जजों की तरह वे भी छुट्टी छोड़ इस मामले को निपटाने रोज अदालत आएं।
हम इस फैसले से सहमत हैं क्योंकि किसी धर्म की व्यवस्था के तहत अगर समाज धर्म के नाम पर, या कि धर्म के मुताबिक भी कोई ऐसे रीति-रिवाज लागू करके रखता है जो कि बुनियादी अधिकारों के खिलाफ हैं, मानवाधिकारों के खिलाफ हैं, या कि औरत-मर्द की बराबरी के खिलाफ हैं, तो उन रिवाजों को कानून बनाकर खत्म करना बेहतर और जरूरी दोनों ही हैं। एक वक्त हिंदू धर्म में सती प्रथा को सामाजिक मान्यता थी, आज भी हिंदुओं के बीच बालविवाह को सामाजिक मान्यता है, और विधवा-विवाह को समाज ठीक नहीं मानता, छुआ-छूत को मानता है, दहेज को मानता है, लेकिन इन सबके खिलाफ समय-समय पर कानून बने और लागू हुए। इनकी वजह से हालात काफी कुछ सुधरे और लोगों को धार्मिक-सामाजिक रीति-रिवाजों से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक न्याय और समानता की तरफ बढऩे के मौके मिले।
न सिर्फ मुस्लिम समाज में, बल्कि कई दूसरे समाजों में भी धर्म के नाम पर, या कि धार्मिक परंपरा के रूप में बेइंसाफी चलती रहती है। इनको खत्म करने के लिए सिर्फ समाज सुधार कभी काफी नहीं होते। वरना राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद की कोशिशें ही काफी होतीं। समाज के जो सबसे कट्टर और धर्मांध लोग होते हैं, वे कभी भी सुधार को आने नहीं देते क्यों उनकी अपनी नेतागिरी कट्टरता पर टिकी होती है। हमारा मानना है कि किसी भी धर्म की खाप पंचायतें हों, उनसे ऊपर देश के लोकतांत्रिक कानून को रखना ही होगा। किसी समाज के सबसे धर्मांध नेताओं को खुश रखने के चक्कर में यह देश एक बार मुस्लिम समाज की शाहबानो को कुचल चुका है। जब सुप्रीम कोर्ट ने उसे उसका हक दिलाया था तो कट्टर और दकियानूसी मुस्लिम नेताओं के आंदोलनों की धमकी से डरकर, और उन्हें खुश रखने के लिए तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद में अपने ऐतिहासिक बाहुबल से कानून बदल डाला था, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले और शाहबानो के हक दोनों को दफन कर दिया था। इस बार ऐसी उम्मीद है कि केंद्र सरकार चूंकि खुद ही लगातार तीन-तलाक के खिलाफ लगी हुई है, और मुस्लिम समाज के भीतर भी एक बड़ा तबका इस हिंसक प्रथा को खत्म करने का हिमायती है, इस बार संसद मुस्लिम महिला को हक दिलाने का कानून बनाएगी, और शाहबानो के साथ दशकों पहले हुए बेइंसाफी की कालिख अपने चेहरे से पोंछेगी।
हमारा यह साफ मानना है कि किसी धर्म के लोगों का आबादी में अल्पसंख्यक हो जाने से उस धर्म के तहत चलते रिवाजों की खामियों और बेइंसाफियों को जारी रखने देना गलत होगा। भारत को योरप की तरफ भी देखना चाहिए, वहां के जो विकसित और सभ्य देश हंै, वे एक तरफ तो अपनी मूल आबादी की नाराजगी भी झेलते हुए मुस्लिम देशों से पहुंच रहे लाखों शरणार्थियों को अपनी जमीन पर बसा रहे हैं, उन्हें बचा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ वे मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने के रिवाज के खिलाफ कानून बना रहे हैं जो कि उनकी अपनी अदालतों से लेकर यूरोपीय संसद तक सभी जगह सही ठहराए जा रहे हैं। इस मामले को लेकर दुनिया भर में एक मतभेद है, और बहस जारी है कि मुस्लिम महिला पर बुर्का एक बोझ है, बंधन है, या कि यह उसकी पोशाक की आजादी है। लेकिन हमारा यह मानना है कि मुस्लिम महिला का बुर्का हो या कि हिंदू महिला का घूंघट हो, यह सब महिला की आजादी के खिलाफ के रिवाज हैं, और इनको समाज सुधार से या कानून बनाकर खत्म करना बेहतर होगा, बजाय इसके कि इसे मुस्लिम महिला की आजादी माना जाए। कल तक तो हिंदू धर्म में पति खोने वाली महिला के लिए भी यही कहा जाता था कि वह अपनी मर्जी से सती होती है। लेकिन ऐसी मर्जी आमतौर पर महिलाओं पर थोप दी जाती है, और इसे उनकी आजादी का हक मानना गलत है। योरप के देश यह सही कर रहे हैं कि वे अपने कानून के मुताबिक इसे आजादी के बजाय बंधन मान रहे हैं, और कानून बनाकर इसे खत्म कर रहे हैं। भारत में भी महिलाओं की हालत सुधारने के लिए ऐसी बहुत से रिवाज खत्म करने की जरूरत है, और तीन-तलाक का खात्मा एक बड़ी शुरुआत होनी चाहिए, न कि किसी बात का अंत।

गुमनाम संदेश की नई तकनीक साराहा, पखानों के भीतर लिखने जैसी सुविधा?

आजकल
21 अगस्त 2017

अभी एक नई मैसेंजर सर्विस शुरू हुई है, जिसका नाम है साराहा। इस शब्द का मतलब अरबी भाषा में ईमानदारी से या दिल खोलकर सच-सच कह देना होता है। इस नाम के मुताबिक ही इस मोबाइल एप्लीकेशन को गढ़ा गया है, इससे आप लोगों को संदेश भेज सकते हैं, लेकिन उन्हें आपका नाम पता नहीं चलेगा। भेजने वाले के नाम के बिना जाने वाले संदेशों का कोई जवाब भी नहीं दिया जा सकेगा। और आज की दुनिया में जब लोगों को एक-दूसरे तक संदेश भेजने के बावलेपन का दौर चल रहा है, लोग इसका इस्तेमाल करने पर टूट पड़े हैं। लेकिन इससे जुड़ी हुई कुछ बातों पर पहले सोच लेना बेहतर होगा, बजाय बिना सोचे इसका इस्तेमाल करने के।
पहली बात तो यह है कि कई बरस पहले जब फेसबुक जैसा एक सोशल मीडिया शुरू हुआ, तब भी लोगों को यह शक था कि यह अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए का एक औजार है, और इससे लोग अपनी निजी और गोपनीय बातों को भी संदेश के बक्से में, या अधिक दुस्साहसी लोग इन्हें खुले रूप में भी लिखने लगे हैं। यह लतीफा भी चल निकला था कि फेसबुक आने के बाद अमरीकी सरकार ने सीआईए का खुफिया बजट घटा दिया है क्योंकि अब उसे मेहनत की जरूरत नहीं रहती, लोग ही अपने आने-जाने, खाने-पीने, जान-पहचान के बारे में लिख देते हैं, और तस्वीरें पोस्ट कर देते हैं। कुछ लोगों का अब भी यह शक है कि दुनिया की खुफिया एजेंसियां फेसबुक पर निजी संदेश को भी देखने की ताकत रखती हैं, और कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता। इसके बाद वॉट्सऐप नाम का एक दूसरा मैसेंजर लोकप्रिय हुआ, और दुनिया की सरकारें इसके संदेशों पर निगरानी रखने का कानूनी हक पाने के लिए अदालतों में पहुंची हुई हैं।
अभी जो लोग यह मानकर चलते हैं कि निजी संदेश गोपनीय रहते हैं, और मिटा देने पर वे हमेशा के लिए मिट जाते हैं, वे गलती पर हैं। कम्प्यूटर, फोन या इंटरनेट पर एक बार का भेजा हुआ कुछ भी कभी नहीं मिटता, और आगे-पीछे ऐसी तकनीक विकसित हो जाएगी जो मिटाई गई तमाम बातों को भी दुबारा सुबूत की शक्ल में खड़ा कर देगी। अब ऐसी नौबत में यह एक नया संदेशवाहक आया है जो कि भेजने वाले के नाम-नंबर के बिना एक गुमनाम संदेश पहुंचा देता है। हो सकता है कि जो लोग आधुनिक तकनीक को ताबीज की तरह मान लेते हैं, वे लोग इस बात पर भी भरोसा कर लें कि ये संदेश सचमुच ही गोपनीय रहेंगे, और हमेशा के लिए गोपनीय रहेंगे। लेकिन ऐसे लोगों को यह याद रखना चाहिए कि दुनिया की सबसे ताकतवर अमरीकी सरकार के राजदूत अपनी सरकार को जो खुफिया ई-मेल भेजते थे, उन्हें विकीलीक्स ने करोड़ों की संख्या में चारों तरफ उजागर कर दिया था। इसके पहले और इसके बाद भी दुनिया की कुछ सबसे गोपनीय जानकारी उजागर हो गई थी, और कारोबार की दुनिया में बैंकों के कम्प्यूटरों को हैक करके सेंधमार अरबों-खरबों की चोरी करते ही रहते हैं।
ऐसे में अरब दुनिया से ईमानदारी के एक खिलौने की शक्ल में सामने आए इस मैसेंजर साराहा के बारे में सोचें, तो इसे इंसानी सोच के साथ जोड़कर देखना होगा। जब लोगों को गुमनाम कुछ करने की सहूलियत होती है, तो उनके भीतर की सबसे बुरी बातें निकलकर सामने आती हैं। किसी भी सार्वजनिक जगह पर पखानों के दरवाजों के भीतर लोगों की सारी भड़ास लिखी हुई दिखती है, और मौका मिलने पर खुली दीवारों और पेड़ों पर भी लोग अपनी हसरतों को गोद डालते हैं। ऐसे में जब लोगों को यह कहा जा रहा है कि उनके संदेश उनके नाम के बिना जाएंगे, तो लोगों के भीतर की हिंसा, उनकी भड़ास, उनकी अपूरित इच्छाएं, वे सब सामने आने लगेंगी। और देर रात अपने बिस्तर पर बैठे या लेटे हुए लोगों को बाकी दुनिया को परेशान करना कुछ वैसा ही सूझने लगेगा जैसा कि कुछ सार्वजनिक जगहों पर लोग अपने कपड़े हटाकर औरों को अपना बदन दिखाकर करने लगते हैं।
गुमनाम संदेश, यह सुनने में तो एक अच्छी सहूलियत है, लेकिन दूसरी तरफ जिन लोगों को ऐसे संदेश मिलेंगे, उनका दिमागी सुख-चैन हो सकता है कि बहुत से संदेशों से गायब होने लगे। लोग यही सोचते हैरान हो जाएंगे कि कौन उनसे मिलने की हसरत जाहिर कर रहे हैं, कौन उनके खुफिया राज जानते हैं, और कौन ऐसे लोग हैं जो कि उनसे इतनी नफरत करते हैं, या कि धमकी भेज रहे हैं। यह अपने आप में एक कानूनी दिक्कत की बात भी हो सकती है कि किसी को धमकी मिले, और वह उसके खिलाफ शिकायत भी न कर पाए। यह देश के कानून के खिलाफ भी हो सकता है कि ऐसा कोई मैसेंजर हो जो गुमनाम काम करे, और जिसे जांच एजेंसियां भी पकड़ न पाएं, रोक न पाएं। इसलिए यह लोगों के दिमागी सुख-चैन से लेकर देश के कानून तक के लिए परेशानी का मैसेंजर हो सकता है। दुनिया में टेक्नालॉजी बनती तो है लोगों की जिंदगी में सहूलियतें बढ़ाने के लिए, लेकिन धीरे-धीरे तकनीक के सारे औजारों का बेजा इस्तेमाल भी होने लगता है, और जब यह इस्तेमाल बढ़ते-बढ़ते गुमनाम इस्तेमाल तक पहुंचने लगे, तो उसके कुछ अलग खतरे होने लगते हैं।
लोगों को याद होगा कि जब विकीलीक्स ने अमरीकी सरकार और उसके राजदूतों के बीच के करोड़ों ई-मेल उजागर किए, तो दुनिया भर के देशों को, वहां के नेताओं को, और वहां के प्रमुख लोगों को यह देखकर सदमा लगा था कि अमरीकी लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। अब यह सोचें कि साराहा जैसे मैसेंजर कल के दिन कानूनी रूप से या तकनीकी सेंधमारी से यह उजागर करने को बेबस हो जाएगा, या कि उसका भांडा फूट जाएगा, और सारे संदेशों के साथ यह बात इंटरनेट पर तैरने लगेगी कि किसने किसको क्या लिख भेजा था, तो उस वक्त क्या होगा? यह कुछ उसी तरह का रहेगा कि पखाने के भीतर कैमरा फिट करके यह रिकॉर्ड कर लिया जाए कि दरवाजे के पीछे कौन सी गाली कौन लिख रहे हैं।
लोगों को अलग-अलग तरह की गोपनीयता देने वाले कुछ और मैसेंजर भी बाजार में है। सिग्नल नाम का एक मैसेंजर ऐसा माना जाता है कि उसे खुफिया एजेंसियां आसानी से हैक नहीं कर पातीं। यह मैसेंजर यह सुविधा भी देता है कि लोग अपने भेजे संदेशों के साथ यह तय कर सकें कि वे कितने सेकेंड बाद अपने आप मिट जाएंगे। अब ऐसी सुविधा के साथ लोग अधिक गोपनीय बातें, अधिक खतरनाक बातें लिखने को भी महफूज मान बैठने का खतरा उठा लेते हैं। लेकिन कल के दिन यह साबित हो जाए कि फोन की स्क्रीन से कुछ सेकेंड में गायब हो जाने वाले संदेश विकीलीक्स जैसे किसी भांडाफोड़ू ने इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिए हैं, तो क्या होगा?
इसलिए यह समझ लेना चाहिए कि टेक्नालॉजी कोई तिलस्म नहीं है, और दुनिया में सौ फीसदी गोपनीयता किसी चीज की नहीं होती। आज तो लोगों के दिल-दिमाग में जो सोच है, वह जरूर गोपनीय है, लेकिन इसके बारे में भी लोगों को यह मालूम रहना चाहिए कि दुनिया की कुछ सबसे आधुनिक प्रयोगशालाएं इसी बात का प्रयोग कर रही हैं कि लोगों के दिमाग को कैसे पढ़ा जा सके। जैसे-जैसे इसके लिए औजार बनते चलेंगे, वैसे-वैसे लोग अपनी सोच के साथ भी बिना कपड़ों की तरह हो जाएंगे, और मशीनें यह बताने लगेंगी कि किसके दिमाग में क्या चल रहा है। ऐसे में किसी भी टेक्नालॉजी, किसी भी मैसेंजर सर्विस पर एक अंधविश्वास करना ठीक नहीं है। साराहा नाम का यह नया मैसेंजर आने के कुछ दिनों के भीतर ही कई ऐसी फर्जी वेबसाइटें आ गई हैं जो यह दावा कर रही हैं कि वे आपके पास आए इस गुमनाम संदेश को भेजने वाले के नाम-नंबर बता सकती हैं। अभी तो ऐसे दावे फर्जी दिख रहे हैं, लेकिन असली दावे अधिक दूर भी नहीं होंगे। इसलिए टेक्नालॉजी के बजाय अपनी सोच, अपनी नीयत, और अपने चाल-चलन पर अधिक भरोसा करना बेहतर है।

गोरखपुर की मौतों से भी कुछ सीखा नहीं छत्तीसगढ़ ने

संपादकीय
21 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, राजधानी के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, में ऑक्सीजन की गड़बड़ी से तीन बच्चों की मौत की खबर है, और स्वास्थ्य विभाग के अफसर अस्पताल की गड़बड़ी को छुपाने में लग गए हैं। स्वास्थ्य सचिव को आनन-फानन प्रेस कांफ्रेंस लेनी पड़ी, और उसमें यही उजागर हुआ कि वे मीडिया को सफाई तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें खुद पूरी जानकारी नहीं है। दूसरी बात यह कि सरकार ने इसी विभाग के अफसरों को जांच का जिम्मा दिया है, जिनके मातहत ये मौतें हुई हैं। तीसरी बात यह कि स्वास्थ्य सचिव ने किसी भी जांच के शुरू होने के पहले ही अस्पताल और विभाग को एक तरह से क्लीन चिट दे दी, ऐसे में किसी जांच से हकीकत सामने आने की संभावना बुरी तरह मार खाती है।
जिन लोगों को प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में जाने की नौबत आती है, वे इसे नर्क सरीखा पाते हैं। और यह अस्पताल प्रदेश के सबसे ताकतवर लोगों के आने-जाने के रास्ते में है, मुख्यमंत्री-राज्यपाल से लेकर मंत्री और सचिव तक यहां आते-जाते हैं, और इसकी बदहाली इस बात का सुबूत है कि प्रदेश के बाकी सरकारी अस्पताल इसके मुकाबले और खराब हालत में होंगे। आज की इन मौतों के बाद सिलेंडर-कर्मचारी को शराबी और नशे में होने की वजह से निलंबित किया गया है, और यह हाल अस्पताल में सैकड़ों डॉक्टर-कर्मचारियों का है जो कि निलंबित किए जाने के लायक हैं। दरअसल प्रदेश के ताकतवर लोगों के अपने इलाज के लिए सरकार ने निजी अस्पतालों मेें खर्च करने की छूट दे रखी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि सरकारी अफसर, मंत्री, और सरकारी खर्च पर इलाज पाने वाले बाकी लोग अपने और अपने परिवार के लिए सरकारी इलाज के मोहताज नहीं रह गए हैं, और सरकारी अस्पतालों को ऐसा लगता है कि एक सोची-समझी साजिश के तहत बर्बाद किया जा रहा है ताकि सरकार के सैकड़ों करोड़ रूपए निजी अस्पतालों को दिए जा सकें।
ऑक्सीजन की कमी या गड़बड़ी से मौत होने की नौबत इसलिए नहीं आनी चाहिए थी कि अभी-अभी उत्तरप्रदेश में एक बड़ा जुर्म हुआ है, और साठ बच्चे मारे गए हैं। उस घटना से पूरे देश के बाकी सरकारी अस्पतालों को एक सबक लेना था।  पिछले हफ्ते गोरखपुर पर लिखते हुए हमने इसी जगह आधा दर्जन बार छत्तीसगढ़ के बारे में भी सरकार को सचेत किया था। हमारे नियमित पाठकों ने पढ़ा होगा-
...छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।...
...सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी  बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।...
...छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है।...
ऊपर के ये सारे पैराग्राफ हमने पिछले हफ्ते-दस दिन में इसी जगह लिखे थे, और उन्हें आज फिर दुहराने की जरूरत लग रही है। अस्पताल के इस ताजा हादसे की जांच तो हो जाएगी, और उसमें भी कुसूरवार को बचाने की पूरी कोशिश भी हो जाएगी, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों के हाल सुधारने के लिए अगर कोई गंभीर कोशिश नहीं होगी, तो सरकार को यह बात समझ लेना चाहिए कि सरकारी अस्पताल से भुगत कर लौटने वाले लोग इतने जख्मी होकर आते हैं कि अगले चुनाव तक उनके जख्म सूखेंगे नहीं।

अखबारों को मीडिया के व्यापक दायरे से बाहर निकलना चाहिए

संपादकीय
20 अगस्त 2017


कल अंधेरा होने के बाद उत्कल एक्सप्रेस बेपटरी हुई, करीब दो दर्जन मौतें हुईं, और आबादी के बीच का इलाका होने की वजह से मीडिया अपने कैमरों सहित आनन-फानन वहां पहुंच गई। नतीजा यह हुआ कि बिखरे हुए टूट-फूटे डिब्बों के नीचे से पटरियों और वहां पहले से चल रही, और शायद हादसे के लिए जिम्मेदार भी, मरम्मत के औजारों को दिखा-दिखाकर टीवी समाचार चैनलों के कैमरे अपने दर्शकों को नजारा दिखा रहे थे। कोई टीवी रिपोर्टर पटरियों पर ट्रेन के ब्रेक लगने के निशान छू-छूकर दिखा रहा था, तो उनमें से कई एक-एक औजारों को उठा-उठाकर साबित कर रहे थे कि यहां मरम्मत चल रही थी।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे बड़े रेल हादसे के बाद जब यह जांच शुरू होनी है कि कौन सी बातें इस हादसे के लिए जिम्मेदार रहीं, तो पटरियों के निशान, और औजारों को हटा-हटाकर की जा रही रिपोर्टिंग क्या सुबूतों को चौपट भी करेगी? किसी छोटे से हादसे या छोटे से जुर्म में भी सुबूतों की इज्जत की जाती है, और एक घेरा डालकर उस जगह से सभी लोगों को दूर रखा जाता है। खुले में हुए रेल हादसे में लोगों की जिंदगी बचाना सबसे अधिक जरूरी रहता है, और इसलिए वहां पर ऐसा कोई घेरा नहीं डाला जा सकता, लेकिन क्या अरबों के कारोबार वाले मीडिया में अपने लोगों को इतना सिखाने की जहमत उठाई जा सकती है कि वे सुबूतों के साथ ऐसी छेड़छाड़ न करें? लेकिन आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल यह है कि उसके चैनलों के बीच पल-पल का गलाकाट मुकाबला रहता है। अखबारों में तो चौबीस घंटे में एक बार का मुकाबला रहता है, लेकिन चैनलों में मिनट भर की देरी भी एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के प्रचार में काम आती है। नतीजा यह होता है कि सब कुछ, सबसे पहले, और सबसे अधिक खुलासे से दिखाने की होड़ किसी और बात की इज्जत नहीं छोड़ती।  किसी जुर्म के नजारे को दिखाते हुए आसपास के बच्चों के चेहरे धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों या महिलाओं की शिनाख्त भी कई तरह से उजागर होती रहती है।
अब टीवी चैनलों से परे एक और मीडिया आगे बढ़ रहा है जो कि इंटरनेट का इस्तेमाल करता है, और वहां पर सबसे पहले खबरों को डालने के मुकाबले में लगा हुआ है। वेब-आधारित मीडिया को टीवी चैनलों की तरह किसी उपग्रह की जरूरत भी नहीं पड़ती, और न ही महंगे या बड़े कैमरों की। नतीजा यह होता है कि एक मोबाइल फोन से रिकॉर्डिंग भी हो जाती है, और तस्वीरें या वीडियो पोस्ट भी हो जाते हैं। इनकी हड़बड़ी टीवी चैनलों से भी अधिक होती है, और एक समय पत्रकारिता जिस तरह की जिम्मेदारी का काम होता था, सामाजिक सरोकार और नीति-सिद्धांत का काम होता था, वह अब कमजोर होते-होते पहले तो मीडिया बना, और अब वह मीडिया और सोशल मीडिया के बीच की एक नई संकर-नस्ल बन गया है जो पूरी तरह से बेकाबू है, और जवाबदेही से भी परे है। अखबारों में एक वक्त छपकर प्रेस से निकल चुके पन्ने पुख्ता सुबूत रहते थे, और गलती की कतरनें पूरी जिंदगी मुंह चिढ़ाती थीं, वह नौबत अब वेब-आधारित खबरों से गायब हो गई है, क्योंकि पहले पोस्ट करो, फिर जांचों-परखो के दौर में अपनी जानकारी गलत मिलने पर लोग बिना किसी सफाई के, सीधे पोस्ट हटा देते हैं, और बात को आई-गई मान लेते हैं।
इसलिए कम से कम छपे हुए मीडिया को अपने पुराने नाम, प्रेस, या अखबारनवीसी, या पत्रकारिता की तरफ लौटना चाहिए। इसके बाद आज इस्तेमाल हो रहे मीडिया शब्द को बाकी तमाम लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए, ताकि वे टीवी के लिए या कि इंटरनेट के लिए इसका मनचाहा इस्तेमाल करें। अखबारनवीसी एक वक्त बड़ी जिम्मेदारी और बड़ी इज्जत का काम माना जाता था, फिर चाहे वह चौबीस घंटे में महज एक बार समाचार-विचार देता था। अखबारों को अपने उसी रूख की तरफ लौटना चाहिए क्योंकि छपे हुए शब्द आज भी अधिक जिम्मेदारी के साथ तय होते हैं, फिर चाहे उन्हीं अखबारों के वेब-संस्करण गैरजिम्मेदारी से क्यों न बनते हों। आज मीडिया नाम के एक बहुत ही व्यापक दायरे से प्रेस को बाहर निकल जाना चाहिए, और अपनी पुरानी पहचान बनाकर, पुराने तौर-तरीकों से, अधिक ईमानदार काम करना चाहिए।

सरकारी अनुदान पर गायों को ऐसी मौत कोई और देता तो?

संपादकीय
19 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में एक भाजपा नेता और म्युनिसिपल में निर्वाचित पद पर बैठे हुए स्थानीय मुखिया की गौशाला में पिछले दो-चार दिनों में दर्जनों गायों की बहुत ही बुरी हालत में मौत पाई गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो सौ से अधिक गायें मारी गई हैं क्योंकि उन्हें खाना भी नहीं मिला। जब थोक में इतनी मौतें हो गई हैं, और इतनी लाशों को ठिकाने लगाना मुमकिन नहीं था, तो गौसेवा आयोग ने पुलिस रिपोर्ट की, और यह भाजपा नेता गिरफ्तार किया गया। अब जानकारी सामने आ रही है कि इसकी गौशाला को पिछले पांच बरस में करीब एक करोड़ रूपए का सरकारी अनुदान मिला था, और अनुदान के बेजा इस्तेमाल से लेकर गायों की बदहाली तक के लिए इसे सरकारी नोटिस मिलते रहे। यह सब भाजपा का एक हिन्दू नेता करते रहा, और इसके बाद जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि किस तरह सरकारी अनुदान पर गौशाला चलाकर हिन्दू नेता कमाई कर रहे हैं, और उनकी गऊमाता भूखों मर रही है।
यह मामला भयानक इसलिए भी है कि देश भर में जगह-जगह दो-चार गायों को लेकर भी दलितों और अल्पसंख्यकों को पीट-पीटकर मार डाला गया है, और देश में कुछ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि इसमें इंसानों के रहने की गुंजाइश चाहे न बचे, गायों का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए। ऐसे में जब शहरी घूरों पर जगह-जगह गायें गंदगी, मैला, और प्लास्टिक का कचरा खाते दिखती हैं, तो लगता है कि उनकी वो राष्ट्रवादी संतानें कहां हैं जिन्हें गाय की निकलती हुई सांस में भी ऑक्सीजन दिखता है, गोमूत्र में सोना दिखता है, गोबर में रेडियो एक्टिविटी रोकने की ताकत दिखती है, और इन सबमें कैंसर का इलाज दिखता है? गाय के नाम पर साम्प्रदायिक और हिंसक राजनीति करने वाले तब क्या करते जब छत्तीसगढ़ की इस गौशाला में हुई सैकड़ों मौतों के पीछे कोई गैरहिन्दू, कोई दलित या कोई अल्पसंख्यक जिम्मेदार होता?
यहां दो बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं। एक तो गाय को लेकर देश में जो साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है, उसे जिस तरह राष्ट्रवाद से जोड़ा जा रहा है, और उसे लेकर जिस तरह की अवैज्ञानिक बातें फैलाई जा रही हैं, उन्हें वैज्ञानिक सच ठहराया जा रहा है, वह सब अपने आपमें बड़ी फिक्र का सामान है। अब उसके साथ-साथ यह भी है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी अनुदान से सैकड़ों करोड़ रूपए लेकर गौशाला चलाने वालों ने अपनी संतानों के लिए कई पीढिय़ों का भ्रष्टाचार जमा कर लिया, और गाय की कई पीढिय़ों को मार डाला। बिहार में नीतीश-भाजपा गठबंधन सरकार के वक्त भाजपा के नेताओं ने सृजन नाम के एनजीओ के नाम पर सरकारी खजाने से करीब हजार करोड़ रूपए पार कर दिए, और अब वे लोग फरार हैं। लेकिन उसमें कम से कम किसी गाय का नाम नहीं था, इसलिए भाजपा के उन नेताओं ने कोई राष्ट्रद्रोह नहीं किया था, गऊमाता का कोई निवाला नहीं छीना था, महज गरीब जनता के खजाने के हजार करोड़ रूपए पार कर दिए थे। लेकिन छत्तीसगढ़ में तो इन हिन्दू नेताओं ने गाय पालने की गौशाला के नाम पर जगह-जगह फर्जीवाड़ा किया, और गाय को भूखे मार डाला। यह अनुदान देने वाला छत्तीसगढ़ सरकार का पशुपालन विभाग है जिसके मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अभी इजराइल के दौरे से ऐसी गौशालाओं पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भेज रहे हैं। लेकिन उनके विभाग से बंटने वाले ऐसे अनुदान पाकर भयानक भ्रष्टाचार करने की शिकायतें तो खुद विभाग की जांच में बरसों से साबित होती रही हैं, और इस पर अगर उन्होंने कार्रवाई की होती, तो उसके बाद से अब तक ऐसी हजारों गायों को भूखे और बीमार नहीं मरना पड़ता। बृजमोहन अग्रवाल से यह उम्मीद इसलिए भी की जाती थी कि उनके पिता पूरी जिंदगी से राजधानी रायपुर की एक सबसे बड़ी गौशाला से जुड़े हुए हैं। हमने इसी अखबार में गौशालाओं को सरकारी अनुदान में करोड़ों के घोटाले की रिपोर्ट एक-दो बरस पहले ही सरकारी जांच के हवाले से छापी थी, लेकिन जाहिर है कि उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। आज जब यह बात लिखी जा रही है, तब इजराइल के प्रवास से कृषि एवं पशुपालन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का भेजा समाचार मिला है कि वे वहां पर अत्याधुनिक डेयरी देख रहे हैं। उन्हें वहां से यह भी देखकर लौटना चाहिए कि बिना खाना दिए गायों को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है, ताकि छत्तीसगढ़ में उनकी सरकार की बदनामी न हो।
सैकड़ों गायों की लाशों का हिसाब अब सामने आ रहा है, और छत्तीसगढ़ के टीवी चैनलों पर भयानक तस्वीरें दिख रही हैं कि किस तरह ट्रैक्टर ट्रॉली भर-भरकर लाशों को छुपाया गया है। ऐसे एक गौशाला संचालक को गिरफ्तार करना काफी नहीं है, और राज्य सरकार ने सभी जिलों में गौशाला की जांच का जो आदेश दिया है, उस पर अगर ईमानदार रिपोर्ट आएगी, तो दर्जनों लोग सरकारी अनुदान में अफरा-तफरी के जुर्म में गिरफ्तार हो जाएंगे। दूसरी तरफ जिन गौभक्तों को गाय में ईश्वर दिखते हैं, उनको गाय या ईश्वर से यह सवाल भी करना चाहिए कि गाय को भूखे मारने वाले लोगों को क्या कोई सजा मिलेगी? या फिर गाय की जिंदगी महज घूरों पर ही गुजरेगी? एक अखबार में यह भी लिखा हुआ है कि गौशाला घोटाला करने वाला यह भाजपा नेता मरी गाय की खाल को मछलियों की चारे की तरह इस्तेमाल करता था, और तालाब में डालता था। देश भर में दलितों और अल्पसंख्यकों को जितने तरह की गौ-हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराया जा रहा है, उसमें कई नई मौलिक किस्में छत्तीसगढ़ में जुड़ रही हैं, और राज्य सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग गायों को ऐसा भूखा मारने की रिपोर्ट पढ़ते हुए क्या खुद खाना खा सकेंगे?
आज देश भर में गाय को लेकर जिस तरह का अवैज्ञानिक और हिंसक-साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है, केन्द्र और राज्य तरह-तरह के कानून बना रहे हैं, उन सबको लेकर देश की खेती से पशुओं का खात्मा हो रहा है। अब कोई किसान जानवर पालने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे, और छोटे-छोटे डेयरी वाले भी डर-सहमकर अपने कारोबार बदल देंगे। तो क्या यह पूरा गौ-उन्माद डेयरी के अरबपति-खरबपति कारोबार को बढ़ावा देने का एक हथियार भी है? ऐसी कई बातें मन में उठती हैं क्योंकि गौ-उन्माद में बनाए गए कानूनों से देश में करोड़ों लोगों का पशु आधारित रोजगार खत्म हो चुका है जिसमें डेयरी से लेकर खेती तक, और चमड़े से लेकर हड्डियों तक का कारोबार है। गाय-भैंस के मांस का कारोबार आज देश के खरबपति कारखानों में धड़ल्ले से जारी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसे जुर्म बनाकर खत्म कर दिया गया है। इस तरह यह धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद करोड़ों के रोजगार छीनकर कुछ सौ लोगों को अरबपति बनाने का एक अभियान भी साबित हो रहा है। 

दिग्विजय का एक अनोखा कदम छह महीने की नर्मदा परिक्रमा

संपादकीय
18 अगस्त 2017


मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह सत्ता के बाहर रहते हुए भी कभी खबरों के बाहर नहीं रहते। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद जब 2003 में विधानसभा चुनाव हुए, तो दिग्विजय सिंह दस बरस की सत्ता को खो बैठे, और कांग्रेस को बड़ी शर्मनाक हार हुई। उसके बाद उन्होंने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक फैसला लिया, और अपने आपको दस बरस के लिए चुनावों और सत्ता से परे कर लिया। कांग्रेस संगठन में उन्हें पार्टी के सबसे आक्रामक संघ-विरोधी के रूप में महत्व मिलता रहा, और एक वक्त ऐसा था जब उन्हें राहुल गांधी के राजनीतिक शिक्षक-प्रशिक्षक के रूप में भी देखा जाता था। हालांकि इस कुनबापरस्त पार्टी में जिसके भविष्य की हत्या करनी हो, उसके बारे में ऐसे विशेषण चला देना काफी होता है, और दिग्विजय सिंह के मौजूदा संगठन-पतन के पीछे हो सकता है कि यह भी एक वजह रही हो। जिस कुनबे के लोग अपनी वंशावली की वजह से देश को चलाने के हकदार माने जाते हों, पार्टी के मालिक रहते हों, उन्हें भी किसी से कुछ सीखना पड़ता है, ऐसी अपमानजनक बात कांग्रेस में किसी को आगे नहीं बढ़ा सकती। लेकिन दिग्विजय सिंह को कांग्रेस संगठन ने फिलहाल खारिज सरीखा कर दिया है, और एक-एक करके तमाम राज्यों का जिम्मा उनसे ले लिया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि गोवा में अधिक विधायक होते हुए भी उनकी चूक से वहां कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई, और इसलिए अब उनके प्रभार से सभी राज्य ले लिए जा रहे हैं।
दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह ने यह घोषणा की है कि वे छह महीने की एक नर्मदा परिक्रमा पर निकल रहे हैं, और मध्यप्रदेश से शुरू करके गुजरात तक वे एक गैरराजनीतिक पदयात्रा करेंगे जो कि उनके अपने धार्मिक और आध्यात्मिक उपयोग के लिए होगी। ऐसी खबरें हैं कि उन्होंने इसके लिए पार्टी से छह महीने की छुट्टी मांगी है, और सभी पदों से मुक्त करने का आग्रह किया है। कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि दिग्विजय सिंह अपने प्रदेश में खोई हुई जमीन वापिस पाना चाहते हैं, और वे इस यात्रा के बहाने मध्यप्रदेश और गुजरात की करीब डेढ़ सौ विधानसभा सीटों को विधानसभा चुनावों के पहले छू लेंगे, उनके भीतर से गुजरेंगे, और यह पदयात्रा भोपाल की सत्ता की तरफ वापिसी की यात्रा भी हो सकती है, जो कि अमरकंटक से गुजरात की ओर जाती तो दिखेगी, लेकिन वह अमरकंटक से भोपाल के श्यामला हिल्स पर मुख्यमंत्री निवास की तरफ जाने के मकसद से की जा रही होगी।
दिग्विजय सिंह में कुछ बात तो है जो कि उन्हें मिटने से बचाकर रखती है। वे आरएसएस और हिन्दू साम्प्रदायिकता के इतने कट्टरविरोधी हैं कि वैसी कट्टरता कांग्रेस पार्टी की नीति में भी नहीं दिखती। दूसरी तरफ वे हिन्दू-मुस्लिम सद्भावना के इतने बड़े हिमायती हैं कि वे कई मौकों पर मुस्लिम समाज को बचाते हुए उसकी चापलूसी की तोहमत भी झेल लेते हैं। आज जब पूरे देश में एक बहुत ही हिंसक और आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद फैल चुका है, और फैलाया जा रहा है, तो दिग्विजय सिंह मानो इस बिफरे हुए सांड को सींग से पकड़कर रोकने की कोशिश करते भी दिखते हैं। फिर ऐसा करते हुए उन्हें सोशल मीडिया पर लोग डॉग्विजय सिंह लिखते रहें, या कि पिग्विजय सिंह लिखते रहें, वे उसके परवाह नहीं करते। हमारा ख्याल है कि आक्रामक हिन्दुत्व और हिन्दू साम्प्रदायिकता से लडऩे के मामले में कांग्रेस पार्टी के भीतर दिग्विजय जितना हौसला और किसी का नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि वोटों की राजनीति में कांग्रेस पार्टी एक संगठन के रूप में इतनी आक्रामकता पसंद करती है, या नहीं। यह भी है कि जिस तरह दिग्विजय ने अपने आपको सत्ता से दस बरस के लिए खुद होकर बाहर कर लिया, वैसा कोई फैसला बाकी कांग्रेसी अपने खुद के बारे में कभी पसंद नहीं कर सकते। लेकिन दिग्विजय सिंह का ऐसी लंबी पदयात्रा का फैसला कांग्रेस पार्टी या कि कांग्रेसी सोच के लिए फायदे का हो सकता है, और कांग्रेस पार्टी को यह भी देखना चाहिए कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विचारधारा से मजबूत ऐसे और कौन से नेता हो सकते हैं जो कि पार्टी के लिए इस तरह की मेहनत कर सकें। भाजपा की संगठन की राजनीति में एक शब्द सुनाई पड़ता है, समयदानी। जो लोग पार्टी के काम के लिए अपने एक बरस या उससे कुछ कम समय को देने को तैयार हों। आज भाजपा तो विजयरथ पर सवार चारों तरफ फैल रही है, लेकिन अगर कांग्रेस को अपने अस्तित्व को बचाना है, तो उसे अपने संगठन में अच्छी साख वाले ऐसे समयदानी नेता ढूंढने होंगे जो कि देश के हर हिस्से में जाकर पार्टी की विचारधारा को बताएं, देश के सामने खड़े हुए मौजूदा खतरों को बताएं, और कांग्रेस की जमीन तैयार करें। इस हिसाब से दिग्विजय की यह पहल कांग्रेस के सामने एक अच्छी मिसाल भी हो सकती है कि गांव-गांव तक जाकर किस तरह लोगों से बात की जानी चाहिए।

बाढ़ से निपटने के क्या-क्या तरीके हो सकते हैं भारत में

संपादकीय
17 अगस्त 2017


भारत के बहुत से हिस्सों में हर बरस बड़ी बुरी बाढ़ आती है। और यह बाढ़ भारत के साथ-साथ बांग्लादेश में भी दिखती है जहां भारत से जुड़ी हुई नदियां पहुंचती हैं। दूसरी तरफ अभी बिहार की बाढ़ में आई हुई खबर बताती है कि नेपाल ने वहां बाढ़ को देखते हुए अपने बांध से पानी छोड़ा, और उसकी वजह से बिहार में नौबत और बुरी हो गई। अभी चीन के साथ सरहद पर जो फौजी तनाव चल रहा है, उसके चलते  ऐसी आशंका है कि हथियारों की जंग के पहले चीन वहां से पानी छोड़कर भी एक जंग शुरू कर सकता है। कुल मिलाकर बात यह है कि एक तो कुदरत की नाराजगी, और फिर पड़ोस में बसे हुए देशों से बिगड़े हुए रिश्ते, ये दोनों मिलकर बाढ़ की तबाही को और बुरा कर सकते हैं। साथ-साथ यह भी याद रखने की जरूरत है कि दुनिया में एक्स्ट्रीम वेदर कहे जाने वाली स्थितियां बढ़ती चल रही हैं, यानी अगर बारिश होती है तो अंधाधुंध हो जाती है, ठंड पड़ती है तो कई-कई फीट बर्फ शहरों को दबा देती है, और गर्मी पड़ती है तो लू में सैकड़ों लोग मरने लगते हैं। मौसम की मार के ऐसे दिन हर बरस बढ़ते चले जा रहे हैं, और यह फिक्र छोटी नहीं है, किसी एक देश तक सीमित नहीं है, और सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं है।
लेकिन पूरी दुनिया में मौसम में बदलाव को रोकना तो एक इतना बड़ा अभियान है कि जब तक अमरीका जैसे गैरजिम्मेदार देश मौसम के समझौतों को तोडऩे पर आमादा रहेंगे, तब तक बाकी दुनिया मिलकर भी इस बदलाव को पूरी तरह थाम नहीं सकती। फिर इंसान लगातार ऐसी नौबत ला रहे हैं कि उससे बाढ़ बढ़ती चले। हिन्दुस्तान में ही नदियों के आसपास के जंगल कटते चले जा रहे हैं, और उनकी जड़ों को थामकर रखने वाली मिट्टी ढीली होकर पानी में बहकर नदियों तक पहुंचने लगी है, और नदी की पानी सम्हालने की क्षमता को घटा चुकी है। नतीजा यह है कि बाढ़ बढ़ती जा रही है। फिर इंसान नदियों के किनारों को रेत के लिए खोद रहे हैं, नदियों के बहुत करीब तक जाकर शहर और बस्तियां बसा रहे हैं, और यह मानकर चल रहे हैं कि हर मानसून में सरकार और फौज आकर उन्हें बचाने का अपना जिम्मा पूरा करेंगी।
इस सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पर्यावरण के लिए खतरनाक और अच्छी दोनों तरह की समझी जाने वाली नदी जोड़ योजना पर अभी काम शुरू भी नहीं हुआ है, और भारत की सबसे बड़ी अदालत लाठी लेकर इसे पूरा करवाने में लगी हुई है। नदियों के जोडऩे से पर्यावरण पर कितना फर्क पड़ेगा, इसका अभी अंदाज नहीं है। लेकिन नुकसान से परे एक फर्क यह भी पड़ सकता है कि बाढ़ का अतिरिक्त पानी उन नदियों तक चले जाए जिनके इलाके में बाढ़ नहीं है, बिजली बनाना बढ़ जाए, सिंचाई बढ़ जाए, और हो सकता है कि जल परिवहन शुरू हो जाए। हम आज यहां इस जगह नदी जोड़ परियोजना के नफे-नुकसान पर अधिक खुलासे से चर्चा करना नहीं चाहते क्योंकि इससे बाढ़ के मौजूदा खतरे की बात धरी रह जाएगी। आज भारत में असम और बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ जितनी विकराल दिख रही है, उसका लंबे वक्त के लिए कोई इलाज ढूंढना जरूरी है। हो सकता है कि आबादी को नदियों के किनारे से कुछ दूरी पर ले जाना एक समाधान हो, दूसरा समाधान नदियों को जोडऩे से हो सकता है, और तीसरा समाधान यह हो सकता है कि जिस-जिस इलाके में बाढ़ आती है, वहां पर समय रहते जमीन के भीतर पानी को डालने का काम व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जाए ताकि बिना प्रदूषण भूजल स्तर बढ़ सके। ऐसा तो उन इलाकों में भी होना चाहिए जहां बाढ़ से अधिक तबाही नहीं आती है। जो इलाके डूबते नहीं है, वहां भी जमीन के भीतर बारिश के पानी को डालने के लिए बड़े-बड़े तालाब बनाए जाने चाहिए, और वे ऐसे रास्तों पर हों जहां से होकर पानी नदियों तक जाता है। नदियों में बाढ़ आए, और वे ही इलाके गर्मियों में सूख जाएं, यह एक अदूरदर्शिता की वजह से पैदा होने वाली नौबत है। बारिश और बाढ़ के अतिरिक्त पानी को समंदर तक जाना घटाना चाहिए, और उस पानी का जमीन के भीतर इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसी टुकड़ा-टुकड़ा बहुत सी बातें हैं जिन पर बाढ़ के दौरान सोचा-विचारा जा सकता है।

माणिक सरकार को अब त्रिपुरा के बाहर बाकी दुनिया ने भी पढ़ा

संपादकीय
16 अगस्त 2017


अबकी बार स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह पर भारत में पहली बार एक बात हुई जो कि शायद इसके पहले कभी नहीं हुई थी। त्रिपुरा के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री माणिक सरकार का भाषण दूरदर्शन ने रिकॉर्ड करने और प्रसारित करने से मना कर दिया, और मुख्यमंत्री को बता दिया गया कि उन्होंने जो बातें लिखी हैं उनके साथ उसे प्रसारित नहीं किया जा सकता। दूरदर्शन को नियंत्रित करने वाली केन्द्र सरकार की स्वायत्तशासी संस्था प्रसार भारती की तरफ से मुख्यमंत्री को बताया गया कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों के भावनाओं के अनुरूप बनाएं। माणिक सरकार ने अपने भाषण में कोई फेरबदल करने से मना कर दिया। अब उनकी पार्टी ने वह भाषण सार्वजनिक किया है, और उसके मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए।
त्रिपुरा के एक दुर्लभ साख वाले, बहुत ही किफायत और सादगी से चलने वाले, ईमानदारी के लिए मशहूर मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपने भाषण में आज देश में फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता, और गाय के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों पर किए जा रहे हमलों की चर्चा की है। उन्होंने अनेकता में एकता वाली भारत की संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा कि आज कुछ ताकतें देश को तोडऩे की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने बिना किसी पार्टी या संगठन का नाम लिए हुए यह लिखा जो लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, बल्कि अंग्रेजों के साथ मिलकर जिन्होंने आजादी के आंदोलन का विरोध किया था, आज वे लोग देश की जड़ों पर हमला करके देश को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। उनके भाषण में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद के नाम पर देश में फैलाए जा रहे तनाव के खिलाफ पूरी तरह से अहिंसक और शांतिवादी बातें कही गई हैं।
केन्द्र सरकार के हाथ महज इतना ही तो है कि दूरदर्शन या आकाशवाणी पर किसी मुख्यमंत्री के भाषण को रोक दे। इससे अधिक तो सरकार कुछ कर नहीं सकती। केन्द्र का यह रवैया भी हैरान करने वाला है जिसमें एक मुख्यमंत्री को कहा गया है कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं। यह तो अपना-अपना नजरिया है, भाजपा के कोई मुख्यमंत्री अपने नजरिए से कोई बात कह सकते हैं, वामपंथी मुख्यमंत्री का अपना नजरिया हो सकता है, और कश्मीर में महबूबा की बात किसी तीसरी तरह की हो सकती है। अगर यह कहा जाए कि वे अपने भाषण को लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं, तो यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि किन लोगों की भावनाओं के अनुरूप? माणिक सरकार का भाषण देश के अल्पसंख्यक तबके, दलित और आदिवासी तबके, गरीब और धर्मनिरपेक्ष तबके की भावना के अनुरूप है, और यह आबादी ही देश में आधी से अधिक आबादी है। देश में एक बहुत छोटी आबादी बाकी पूरी आबादी के खान-पान, उसकी देशभक्ति के पैमाने, उसकी भाषा, और उसके पहरावे पर काबू पाने में लगी है। ऐसी ताकतों के बीच माणिक सरकार ने देश को बचाने और एक बनाए रखने की एक समझदारी की बात कही है, जो कि सरकारी रेडियो-टीवी के बिना भी अहमियत रखती है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की जनता से यह सलाह मांगते दिख रहे थे कि वे लालकिले से आजादी की सालगिरह पर अपने भाषण में कौन सी बातों को शामिल करें। और दूसरी तरफ जब देश के एक सबसे अच्छे मुख्यमंत्री ने देश को एक रखने की बात कही, तो उसके भाषण को ही रोक दिया गया! प्रधानमंत्री को यह सोचने की जरूरत है कि उन्होंने सलाह मांगने का जो सार्वजनिक आव्हान किया था, उसका क्या हुआ? देश के संघीय ढांचे में एक राज्य के मुख्यमंत्री की अहिंसक और धर्मनिरपेक्ष बातों को रोक देने का अधिकार केन्द्र को कैसे मिला है, इस बारे में भी प्रधानमंत्री को इसलिए बात करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने लालकिले से भारत के ढांचे को एक कोऑपरेटिव फेडरलिज्म कहा है। अब एक मुख्यमंत्री के भाषण को रोकना किस तरह से एक सहकारी-संघवाद कहा जा सकता है? दरअसल माणिक सरकार की सोच तो उनके राज्य में लोग अच्छी तरह जानते हैं, अब उनके भाषण को रोककर केन्द्र सरकार ने पूरी दुनिया को उनकी वामपंथी सोच को जानने का मौका दिया है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों का हुआ है जिन्हें आलोचना से बचाने के लिए केन्द्र सरकार ने माणिक सरकार को रोका।

गोरखपुर की मौतों से निकलते हुए सबक

संपादकीय
14 अगस्त 2017


गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में पिछले दो दिनों से हमने काफी कुछ लिखा है, लेकिन आज कुछ और बातें हैं जिन पर लिखना जरूरी है। उत्तरप्रदेश के सांसद वरूण गांधी ने इस हादसे को देखते हुए अपने संसदीय क्षेत्र सुल्तानपुर में सांसद निधि के पांच करोड़ रुपये देकर तुरंत ही एक बाल चिकित्सा केंद्र का काम शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि वे इस काम के लिए अलग-अलग कंपनियों के सामाजिक सरोकार मद से पांच करोड़ रुपये  और जुटाएंगे। इस बात पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि गोरखपुर न केवल उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मठ वाला शहर है, बल्कि वे लगातार पांच बार वहां से सांसद रहे और अब सांसद रहते-रहते मुख्यमंत्री भी बने। अब अगर वे ताजा मौतों को लेकर यह सफाई दे रहे हैं कि यह इलाका हमेशा से ही बीमारियों की वजह से ऐसी मौतों वाला रहा है, तो सवाल यह उठता है कि इतने बरसों तक लगातार सांसद रहते हुए वे अब तक इस बारे में पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर पाए थे? उनके पांच बार के सांसद कार्यकाल में तो पहले भी छह बरस अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केंद्र में थी, और वाजपेयी खुद भी उत्तरप्रदेश से ही सांसद थे। अब अगर सत्ता की इतनी ताकत के रहते हुए योगी आदित्यनाथ अपने ही शहर के लिए कुछ नहीं कर पाए थे, तो इससे उनकी क्षमता पता लगती है। वे सांसद रहते हुए भी हिंदू-मुस्लिम पे्रम संबंधों के खिलाफ एक हिंसक और हमलावर अभियान के अगुवा रहते आए हैं, और उनका निजी संगठन आज भी भाजपा सरकार के रहते हुए भी अलग से एक साम्प्रदायिक और हिंसक कार्रवाई चलाते रहता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका एक साम्प्रदायिक एजेंडा चल रहा है जिसके तहत उत्तरप्रदेश के हर मदरसे को आजादी की सालगिरह पर झंडा फहराकर अपनी देशभक्ति का वीडियो सुबूत बनाकर सरकार को देना है। जाहिर है कि अपने इलाके के बीमार बच्चों, या कि वहां हर बरस फैलने वाली दूसरी बीमारियों को रोकने के बजाय योगी का ध्यान हिंदुत्व को लागू करवाने में लगा हुआ था। आज ही एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह गोरखपुर में ही इंसेफलाइटिस से विकलांग मरीजों के इलाज और पुनर्वास के लिए बने विभाग के ग्यारह कर्मचारियों को सत्ताईस महीने से वेतन नहीं मिला, और वहां से तीन डॉक्टर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। यह हाल केंद्र में मोदी की पार्टी की सरकार आने के तीन बरस बाद का है, उत्तरप्रदेश से नरेन्द्र मोदी के सांसद बनने के ढाई बरस बाद का है, और योगी के मुख्यमंत्री बन जाने के आधे बरस बाद का तो है ही।
हम वरूण गांधी की खबर को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि किसी एक जगह अगर आग लगती है, तो बाकी लोगों को भी अपने-अपने घर संभाल लेने चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।

परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है..

संपादकीय
13 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में जिस तरह ऑक्सीजन की कमी से साठ या अधिक बच्चे दो-चार दिनों में मारे गए हैं, वह मामला एक न्यायिक जांच से कम का नहीं है, लेकिन न तो उत्तरप्रदेश सरकार इसकी परवाह कर रही, न ही उत्तरप्रदेश में हाईकोर्ट ने खुद होकर इसका कोई संज्ञान लिया, सरकार से जवाब मांगा, या कि किसी जांच का आदेश दिया। केन्द्र सरकार का रूख भाजपा के राज वाले प्रदेशों में बड़ा साफ है कि जितनी मौतों पर प्रधानमंत्री दुनिया के किसी और देश के लिए भी हमदर्दी ट्वीट कर देते हैं, उससे दस गुना मौतें भी अगर भाजपा राज में हो जाएं, तो वे चुप्पी साधे रहते हैं। यह सिलसिला देश के लोगों को बहुत विचलित कर रहा है, और परंपरागत मालिकाना हक वाले मीडिया से परे आज देश और दुनिया में बागी तेवरों वाला और अभूतपूर्व आजादी वाला जो सोशल मीडिया अतिसक्रिय है, वह इन बातों पर गौर कर रहा है। उस पर बागी तेवर भी दिखते हैं, बिके हुए तेवर भी दिखते हैं, और गुलाम तेवर भी देखते हैं। इन तमाम पहलुओं के पूर्वाग्रहों के साथ सोशल मीडिया पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह सत्ता और मीडिया के एकाधिकार को एक बड़ी चुनौती है, और बेजा इस्तेमाल के तमाम खतरों के बीच भी सोशल मीडिया आजादी की ताजी हवा का एक झोंका बना हुआ है।
जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, और भाजपा के अश्वमेधी घोड़े की लगाम थामने को अब हाथ नहीं बचे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि चुनावों से परे लोकतंत्र इतिहास दर्ज करते चलता है। चुनाव का इतिहास तो चुनाव आयोग दर्ज कर देता है, वह बहुत मेहनत का काम भी नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र की बाकी बातों, बाकी पहलुओं का इतिहास बहुत सी ताकतें, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब बहुत से कमजोर तबके भी, लिखते हैं, और लिख रहे हैं। लोग यह भी देख रहे हैं कि किस तरह कल लाशों के बीच किसी एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती मंच पर जोर-जोर से हॅंस रहे थे। लाशों के बीच की यह हॅंसी महज एक तस्वीर से ही दर्ज हो जाती है, और उसके लिए वामपंथी या दक्षिणपंथी इतिहासकारों की जरूरत नहीं पड़ती। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि ऐसी ही हॅंसी बिलासपुर की नसबंदी मौतों की लाशों के बीच उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की भी दर्ज हुई थी, और मुख्यमंत्री जब दम तोड़ती महिलाओं से बात कर रहे थे, तब सरकारी अस्पताल के वार्ड में स्वास्थ्य मंत्री देर तक जोरों से हॅंसते जा रहे थे। उस वीडियो को किसी और टिप्पणी या इतिहास लेखन की जरूरत नहीं थी।
लेकिन सोशल मीडिया की सारी मौजूदगी के बीच भी हैरानी इस बात की है कि उत्तरप्रदेश के मंत्रियों से लेकर केन्द्र सरकार के भाजपा मंत्रियों तक के पास इस बात का भारी हौसला बचा है कि गोरखपुर में बच्चों की लाश थामे रोते-बिलखते मां-बाप के दिलों के जख्म पर और नमक छिड़कें। इन मंत्रियों और नेताओं के बयान अगर सुनें, तो ऐसा लगता है कि जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह तो इनके भीतर बाकी ही नहीं है, और वह सामान्य समझ भी बाकी नहीं है कि इस चुनावी दुनिया में जिंदा रहने के लिए जिस जनता की जरूरत इंदिरा से लेकर मोदी तक हर किसी को पड़ती है, उस जनता की भावनाओं को बिना वजह अपने बूटों से कुचलते जाना समझदारी नहीं है। इतिहास ऐसी छोटी-छोटी वीडियो क्लिप भी अब सम्हालकर रख रहा है, प्रधानमंत्री सहित बाकी लोगों की चुप्पी को सम्हालकर रख रहा है, और दम तोड़ते बच्चों की सांसों की कीमत पर आक्सीजन-कमीशनखोरी करते योगी के अफसरों को भी दर्ज कर रहा है। इन मौतों के कुछ ही घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बेटी के कुछ महीने बाद भारत आने की तारीख तय होने पर ट्वीट करके उनका स्वागत किया था। गोरखपुर में दर्जनों नवजात बच्चों की ऐसी अकाल मौत पर हमदर्दी ट्वीट न करके वे उत्तरप्रदेश की अपनी सरकार की मदद नहीं कर रहे हैं, खुद अपनी चुप्पी को अपने ही हाथों इतिहास में दर्ज कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया के मार्फत लिखा जा रहा इतिहास अब तक के परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है।

उप्र में ऑक्सीजन दलाली के चलते दर्जनों मौतें, हत्यारे कौन?

संपादकीय
12 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हास्पिटल में ऑक्सीजन सप्लायर का भुगतान नहीं हुआ तो उसने कई नोटिसों के बाद ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी, और इस वजह से वहां भर्ती तीन दर्जन बच्चों की मौत पिछले दो दिनों में हो चुकी है, और कुल मिलाकर पिछले चार-पांच दिनों में साठ के करीब मौतों का अंदाज है। खुद भाजपा के सांसद और नेता इसे सरकारी लापरवाही मान रहे हैं, और हत्या का मुकदमा चलाने की बात कह रहे हैं, लेकिन कुछ और लोगों का यह भी कहना है कि सप्लायर से कमीशन और दलाली पर मुख्यमंत्री के करीबी लोग मोल-भाव कर रहे थे और इसी की वजह से भुगतान रोका गया था, और बड़ी संख्या में यह मौतें हुईं। यह मामला इतना भयानक है कि दो दिन बाद आजादी की सालगिरह उत्तरप्रदेश में मनाई जाए या न मनाई जाए, इस बारे में सोचना चाहिए। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक रूप से देश की जनता से यह मांग रहे हैं कि वे किन-किन मुद्दों पर लालकिले से बोलें, इस पर जनता राय दे। इससे बड़ी और राय क्या हो सकती है कि देश में भाजपा के राज वाले कई राज्यों में अस्पतालों में थोक में ऐसी मौतें हुई हैं, वे कम से कम अपनी पार्टी के राज पर तो बोल ही दें।
दरअसल सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी कल ही बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।
छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है। प्रधानमंत्री को पूरे देश के राज्यों को सचेत करना चाहिए, और खासकर अपनी पार्टी के राज वाले प्रदेशों को तो सबसे पहले। आज उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ इसमें लगे हुए हैं कि वहां के मदरसे तिरंगा फहराते हैं या नहीं, और उसका वीडियो बनाकर अपनी देशभक्ति का सुबूत भेजते हैं या नहीं। हमारे हिसाब से ऑक्सीजन के दलाल हत्यारों से कम नहीं हैं, देशद्रोही से कम नहीं हैं, और उन्हीं को पहले सजा हो जाए, मदरसों की देशभक्ति बाद में नापी-तौली जाए।

सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती होती है

संपादकीय
11 अगस्त 2017


हरियाणा के भाजपाध्यक्ष का बेटा दारू के नशे में साथियों के साथ कार में एक  लड़की का पीछा करने और उसके अपहरण की कोशिश में गिरफ्तार है, और हरियाणा के मुख्यमंत्री की शुरुआती प्रतिक्रिया मुजरिम दिखते शराबी नौजवान के खिलाफ होने के बजाय उसके पिता को बेकसूर ठहराने वाली सामने आई है। यह बात अपनी जगह सही है कि किसी बालिग औलाद के लिए मां-बाप जिम्मेदार नहीं होते, लेकिन यह बात भी सही है कि संविधान की शपथ लेकर सरकार चलाने वाले किसी इंसान को मुजरिम को सजा दिलाने की बात कहनी चाहिए, उसे बचाने वाली नहीं।
लेकिन यह बचाना बड़ा आम हो चुका है। देश में जगह-जगह कई पार्टियों के लोग अपने नेताओं को, और अपने कुनबों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाते हैं। पड़ोस के मध्यप्रदेश को ही देखें, तो वहां वेश्याएं मुहैया कराने के सेक्स-कारोबार में फंसे हुए और गिरफ्तार हुए भाजपा नेता से लेकर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करते गिरफ्तार भाजपा नेताओं तक एक लंबा सिलसिला सामने आया है, लेकिन भाजपा ने अपने इन कुलकलंकों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा है। ऐसा न कहना उनको बचाने सरीखा है। दूसरी तरफ अगर ये काम करने वाले कोई मुस्लिम होते, तो उन्हें मध्यप्रदेश के भाजपा नेता कूद-कूदकर पीटते और देशद्रोही करार देते, भारत की संस्कृति तबाह करने वाला बताते। लेकिन गोमांस बेचने वाले भी कुछ लोग भाजपा के निकले हैं, कुछ लोग नकली नोट छापने और चलाने वाले भी निकले हैं, लेकिन पार्टी ने इनके खिलाफ कुछ नहीं कहा। मोटेतौर पर यही हाल बाकी पार्टियों का है, और ऐसे में यह देखकर हैरानी होती है कि किस तरह सीपीएम ने बंगाल में अपने एक नेता को इसलिए निलंबित कर दिया कि वह एक महंगा मोबाइल इस्तेमाल करता था। आज तो बाकी किसी भी पार्टी में लोग लाखों-करोड़ों की घडिय़ां पहनकर घूमें तो भी उनकी पार्टी को उससे कोई दिक्कत नहीं होती, वे एयरपोर्ट या दूसरी जगहों पर सरकारी कर्मचारियों को पीटें तो भी उनको कोई दिक्कत नहीं होती है।
ऐसी बददिमागी, गुंडागर्दी, और जुर्म के लिए जो हौसला सत्ता से मिलता है, वही हौसला लोगों को तबाही तक ले जाता है। पूरे देश में जगह-जगह राजनीतिक दलों के नेताओं ने भ्रष्टाचार की छूट मिलने को इतने बड़े-बड़े भ्रष्टाचार किए कि वे उनकी अगली पूरी सदी की राजनीतिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से अधिक की दौलत और जायदाद जुटाने वाले रहे, और उसी चक्कर में वे जेल भी पहुंच गए, सजा भी काट रहे हैं। जिस चौटाला कुनबे की अरबों-खरबों की दौलत है, उसके मुख्यमंत्री रहे हुए मुखिया जेल में सजा काट रहे हैं, तमिलनाडू की शशिकला कर्नाटक की जेल में बंद हैं। राजनीति में भ्रष्ट पैसे की कुछ जरूरत तो हो सकती है, अगर ईमानदारी से चुनाव लडऩे का हौसला न हो तो। लेकिन ऐसी मजबूरी किसी की नहीं रहती। ऐसे में सत्ता की बददिमागी सिर चढ़कर बोलती है, और मां-बाप भ्रष्ट रहते हैं, आल-औलाद गुंडागर्दी पर उतर आती है, और सौ में से चाहे एक ही सही, सारी ताकत के बावजूद जेल की कैद तक पहुंच ही जाते हैं। अगली सौ पीढ़ी के लिए जमा की गई दौलत धरी रह जाती है, और एक मामले में पुख्ता सुबूत, ईमानदार जज आ जाने से वह पूरी दौलत किसी ताकत की नहीं रह जाती।
जो लोग सत्ता की ताकत से जुर्म करते चलते हैं, उनको याद रखना चाहिए कि अगर कानून एक बार भी ठीक से काम कर बैठा हो, तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे। लेकिन सत्ता से ऐसी बददिमागी आती है कि लोगों को यह लगता ही नहीं कि उनके बुरे दिन भी कभी आ सकते हैं, कभी उनके मामलों पर कार्रवाई करने वालों अफसर या जज ईमानदार भी निकल सकते हैं, या कि कोई ऐसे गवाह भी हो सकते हैं जिन्हें धमकाना या खरीदना मुमकिन न हो। मध्यप्रदेश में सत्ता की सारी ताकत मिलकर भी व्यापम घोटाला फूटने से रोक नहीं पाई। सत्ता के कई लोग सरकार की लाख कोशिश के बावजूद जेल चले गए, हालांकि सत्ता से जुड़ी रहस्यमय ताकतों की इतनी कामयाबी तो सामने आई कि इस मामले से जुड़े हुए पचास लोग अब तक रहस्यमय तरीके से मर चुके हैं, या कि मार डाले गए हैं। इस पूरे सिलसिले से हम केवल यही एक नतीजा निकालना चाहते हैं कि सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती साबित होती है।