दलबदलू सांसद-विधायकों की सीट छीन लेनी चाहिए

संपादकीय
1 अगस्त 2017


गुजरात, बिहार, और उत्तरप्रदेश में कांगे्रस और दूसरी विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शाामिल हो रहे हैं। गुजरात में तो कांगे्रस के लिए अपना घर संभालकर रखना मुश्किल पड़ रहा है, और राज्यसभा चुनाव के मतदान तक उसे अपने विधायकों को अपनी पार्टी के राज वाले कर्नाटक भेजना पड़ा, और उनके मोबाइल फोन ले लेने पड़े। आज सोशल मीडिया और मीडिया दोनों जगह कांगे्रस विधायकों की आलोचना हो रही है कि बाढ़ में डूबे गुजरात में वे अपने मतदाताओं के बीच न रहकर कर्नाटक में छुपकर बैठे हैं, लेकिन लोगों को याद रहना चाहिए कि भाजपा के येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री रहते हुए जब वहां उनके मंत्री, रेड्डी बंधु सरकार पलटने के लिए विधायक खरीदी में लगे थे, तो कर्नाटक में बाढ़ की तबाही के बावजूद भाजपा के विधायक दूसरे प्रदेश में ले जाकर संभालकर रखे गए थे कि भाजपा का खरबपति खदान मालिक-मंत्री ही उन्हें न खरीद ले। इसलिए विधायकों या सांसदों की खरीद-फरोख्त कोई नई बात नहीं है। हमारा अनुभव यह रहा है कि छत्तीसगढ़ में 2003 में भाजपा विधायकों की जोगी द्वारा खरीदी के मामले से लेकर सांसदों की खरीदी तक, कोई मामले अदालतों में साबित नहीं हो पाते, और यह खरीद-बिक्री चलती ही रहती है।
ऐसे में हमें लगता है कि देश के चुनाव कानून में एक ऐसे फेरबदल की जरूरत है कि पांच बरसों के लिए चुने गए सांसद या विधायक जिस पार्टी के निशान पर चुने जाते हैं, उस पार्टी को छोड़कर जाने पर, या कि थोक में दलबदल करने पर भी अपनी सीट खो बैठें। आज दलबदल कानून अकेले सांसद-विधायक को दलबदल से रोकता है, लेकिन जब एक तिहाई से अधिक सांसद-विधायक दलबदल करते हैं, तो उसे कानूनी मंजूरी है। चुनाव कानून में संशोधन करके दल बदलने वाले तमाम लोगों को बाकी कार्यकाल के लिए अपात्र कर देना चाहिए, और अगर उनकी सीट पर दुबारा चुनाव होता भी है, तो भी उन्हें चुनाव लडऩे की पात्रता नहीं रहनी चाहिए। आज तो हालत यह है कि गुजरात में कांगे्रस के जिस विधायक ने पार्टी छोड़ी और भाजपा में शामिल हुआ, उसे अगले ही दिन भाजपा ने अपना राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया। खुद भाजपा के लिए यह शर्मिंदगी की बात है कि अपने इतने नेताओं के रहते हुए वह इस तरह कल के दलबदलू को आज का प्रत्याशी बना रही है। यह सिलसिला लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है, और कानून का बेजा इस्तेमाल है। इसके खिलाफ एक संशोधन तुरंत जरूरी है जिससे दल बदलने वाले लोग कम से कम कुछ बरस तो सदन और सत्ता से दूर रहें।
यह बात अपनी जगह सही है कि हर नौबत को देखते हुए जब कानून में फेरबदल होते हैं, तो वे फेरबदल खतरनाक भी रहते हैं। लेकिन आज हिंदुस्तान में सांसदों और विधायकों की खुली खरीद-फरोख्त लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक हो चुकी है, और इस पर कड़ी रोक लगनी चाहिए। जनादेश शब्द का सम्मान होना चाहिए, और जिस विधायक को या सांसद को जिस पार्टी के साथ जनादेश मिला है, उस पार्टी से अलग होते ही वह जनादेश समाप्त मान लेना चाहिए, फिर चाहे यह अलग होना अकेले हो, या एक तिहाई भीड़ के साथ हो।

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