शरद यादव के सामने आ खड़ा है एक ऐतिहासिक मौका

संपादकीय
10 अगस्त 2017


बिहार में सत्तारूढ़ जदयू के भीतर की बेचैनी अब किसी किनारे लगते दिख रही है। वहां पर पार्टी के सबसे ताकतवर नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार भाजपा के साथ उनकी ताकत तो कम नहीं होगी, लेकिन पार्टी के सबसे बड़े राष्ट्रीय स्तर के वैचारिक स्तंभ शरद यादव अगर पार्टी के बाहर निकलकर भाजपा-एनडीए विरोधी विपक्ष के लिए खुला काम करते हैं, तो इससे एक वैकल्पिक विपक्ष मजबूत होकर सामने आने की संभावना बन सकती है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही इन्हीं नीतीश कुमार को मोदी के मुकाबले संयुक्त विपक्ष का एक संभावित नेता माना जा रहा था, फिर अचानक बिहार की सत्ता से लालू को बाहर करने के लिए नीतीश ने भाजपा का दामन थाम लिया, और कुछ घंटों के भीतर ही वे सीएम की कुर्सी छोड़कर फिर सीएम की कुर्सी पर बैठ गए, और दलबदल या सत्ता पलट की एक बिल्कुल ही अभूतपूर्व मिसाल पेश की थी, और उनकी पार्टी के ही शरद यादव इस फैसले को टीवी पर ही देख पा रहे थे, रूबरू नहीं। ऐसे में शरद यादव ने अपने कुछ तेवर नीतीश के फैसले के खिलाफ दिखाए हैं, और गुजरात के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के खिलाफ कांग्रेस को वोट देने के लिए अपने समर्थक जेडीयू विधायक को कहा।
शरद यादव एनडीए सरकार में रह चुके हैं, नीतीश कुमार के साथ-साथ। इसलिए यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि वे भाजपा से ऐसे परहेजी हैं कि उसके साथ बैठ भी नहीं सकते, लेकिन भारत की राजनीति यह बताती है कि पिछली एनडीए सरकार के वक्त की वाजपेयी की भाजपा, और आज मोदी-शाह की भाजपा में लोग बड़ा फर्क देखते हैं। बिहार में ही नीतीश कुमार ने पिछले चुनाव के वक्त भाजपा से नाता तोड़कर अपने धुरविरोधी लालू यादव से गठबंधन इसी मुद्दे पर किया था कि वे मोदी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। लेकिन उन्होंने कोई ऐसी एंटी एलर्जिक दवा पा ली है कि अब वे मोदी को भारत का अगला भविष्य भी देख रहे हैं, और शरद यादव इस नौबत को मान नहीं पा रहे हैं। ऐसे में वे अब तक ऐसी संभावनाओं की चर्चा का लालच छोड़कर बाहर बैठे हुए हैं कि बिहार के गठबंधन के केन्द्र में विस्तार के रूप में उन्हें भी केन्द्रीय मंत्री बनाया जा सकता है। शरद यादव सत्तर बरस की उम्र में अब सत्ता के मोह को छोड़कर सैद्धांतिक राजनीति भी कर सकते हैं, और उनके आगे आने से एनडीए-विरोधी एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बन सकता है, जो कि आज कांग्रेस की अगुवाई में नहीं बन सकता। नीतीश कुमार ने बहुत ही पाखंडी नारों के साथ भाजपा से गठबंधन किया है कि वे लालू के भ्रष्टाचार के साथ रह नहीं पा रहे थे, यह अलग बात है कि एनडीए में बादल कुनबा वैसी ही साख वाला कुनबापरस्त और भ्रष्टाचारजीवी परिवार है, और उससे भी बढ़कर अब जया-शशिकला का अन्नाद्रमुक भी एनडीए में आते दिख रहा है।
देश की राजनीति में गठबंधनों का ध्रुवीकरण लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है, और शरद यादव के सभी दलों के साथ ऐसे दोस्ताना संबंध हैं कि कांग्रेसियों से लेकर वामपंथियों तक, और छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियों तक से वे बात कर सकते हैं। हमारा ख्याल है कि देश की राजनीति पर एनडीए और मोदी के एकाधिकार के मुकाबले ऐसी एक राजनीतिक एकजुटता लोकतंत्र के शक्ति संतुलन में मदद करेगी, और आज शरद यादव के अलावा किसी दूसरे में ऐसी संभावना नहीं दिख रही है। यह उनके सामने एक ऐतिहासिक मौका है, और यह बात पहली बार हम नहीं लिख रहे हैं, बल्कि कुछ और राजनीतिक विश्लेषक लिख चुके हैं कि नीतीश देश के दूसरे जयप्रकाश नारायण बन सकते हैं जो खुद सत्ता में न आकर देश की सत्ता के खिलाफ एक बहुत बड़ा जनमोर्चा खड़ा करने का इतिहास बना चुके हैं। जब भी किसी की मिसाल किसी दूसरे पर लागू की जाती है, तो वह खतरे भी खड़े करती है, इसलिए हम ऐसी मिसाल पर जोर देने के बजाय बस इतना ही कहना चाहते हैं कि शरद यादव को उनके सामने अनायास पेश हो गए इस मौके पर भारतीय लोकतंत्र के लिए अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए।

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