परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है..

संपादकीय
13 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में जिस तरह ऑक्सीजन की कमी से साठ या अधिक बच्चे दो-चार दिनों में मारे गए हैं, वह मामला एक न्यायिक जांच से कम का नहीं है, लेकिन न तो उत्तरप्रदेश सरकार इसकी परवाह कर रही, न ही उत्तरप्रदेश में हाईकोर्ट ने खुद होकर इसका कोई संज्ञान लिया, सरकार से जवाब मांगा, या कि किसी जांच का आदेश दिया। केन्द्र सरकार का रूख भाजपा के राज वाले प्रदेशों में बड़ा साफ है कि जितनी मौतों पर प्रधानमंत्री दुनिया के किसी और देश के लिए भी हमदर्दी ट्वीट कर देते हैं, उससे दस गुना मौतें भी अगर भाजपा राज में हो जाएं, तो वे चुप्पी साधे रहते हैं। यह सिलसिला देश के लोगों को बहुत विचलित कर रहा है, और परंपरागत मालिकाना हक वाले मीडिया से परे आज देश और दुनिया में बागी तेवरों वाला और अभूतपूर्व आजादी वाला जो सोशल मीडिया अतिसक्रिय है, वह इन बातों पर गौर कर रहा है। उस पर बागी तेवर भी दिखते हैं, बिके हुए तेवर भी दिखते हैं, और गुलाम तेवर भी देखते हैं। इन तमाम पहलुओं के पूर्वाग्रहों के साथ सोशल मीडिया पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह सत्ता और मीडिया के एकाधिकार को एक बड़ी चुनौती है, और बेजा इस्तेमाल के तमाम खतरों के बीच भी सोशल मीडिया आजादी की ताजी हवा का एक झोंका बना हुआ है।
जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, और भाजपा के अश्वमेधी घोड़े की लगाम थामने को अब हाथ नहीं बचे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि चुनावों से परे लोकतंत्र इतिहास दर्ज करते चलता है। चुनाव का इतिहास तो चुनाव आयोग दर्ज कर देता है, वह बहुत मेहनत का काम भी नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र की बाकी बातों, बाकी पहलुओं का इतिहास बहुत सी ताकतें, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब बहुत से कमजोर तबके भी, लिखते हैं, और लिख रहे हैं। लोग यह भी देख रहे हैं कि किस तरह कल लाशों के बीच किसी एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती मंच पर जोर-जोर से हॅंस रहे थे। लाशों के बीच की यह हॅंसी महज एक तस्वीर से ही दर्ज हो जाती है, और उसके लिए वामपंथी या दक्षिणपंथी इतिहासकारों की जरूरत नहीं पड़ती। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि ऐसी ही हॅंसी बिलासपुर की नसबंदी मौतों की लाशों के बीच उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की भी दर्ज हुई थी, और मुख्यमंत्री जब दम तोड़ती महिलाओं से बात कर रहे थे, तब सरकारी अस्पताल के वार्ड में स्वास्थ्य मंत्री देर तक जोरों से हॅंसते जा रहे थे। उस वीडियो को किसी और टिप्पणी या इतिहास लेखन की जरूरत नहीं थी।
लेकिन सोशल मीडिया की सारी मौजूदगी के बीच भी हैरानी इस बात की है कि उत्तरप्रदेश के मंत्रियों से लेकर केन्द्र सरकार के भाजपा मंत्रियों तक के पास इस बात का भारी हौसला बचा है कि गोरखपुर में बच्चों की लाश थामे रोते-बिलखते मां-बाप के दिलों के जख्म पर और नमक छिड़कें। इन मंत्रियों और नेताओं के बयान अगर सुनें, तो ऐसा लगता है कि जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह तो इनके भीतर बाकी ही नहीं है, और वह सामान्य समझ भी बाकी नहीं है कि इस चुनावी दुनिया में जिंदा रहने के लिए जिस जनता की जरूरत इंदिरा से लेकर मोदी तक हर किसी को पड़ती है, उस जनता की भावनाओं को बिना वजह अपने बूटों से कुचलते जाना समझदारी नहीं है। इतिहास ऐसी छोटी-छोटी वीडियो क्लिप भी अब सम्हालकर रख रहा है, प्रधानमंत्री सहित बाकी लोगों की चुप्पी को सम्हालकर रख रहा है, और दम तोड़ते बच्चों की सांसों की कीमत पर आक्सीजन-कमीशनखोरी करते योगी के अफसरों को भी दर्ज कर रहा है। इन मौतों के कुछ ही घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बेटी के कुछ महीने बाद भारत आने की तारीख तय होने पर ट्वीट करके उनका स्वागत किया था। गोरखपुर में दर्जनों नवजात बच्चों की ऐसी अकाल मौत पर हमदर्दी ट्वीट न करके वे उत्तरप्रदेश की अपनी सरकार की मदद नहीं कर रहे हैं, खुद अपनी चुप्पी को अपने ही हाथों इतिहास में दर्ज कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया के मार्फत लिखा जा रहा इतिहास अब तक के परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है।

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