गोरखपुर की मौतों से निकलते हुए सबक

संपादकीय
14 अगस्त 2017


गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में पिछले दो दिनों से हमने काफी कुछ लिखा है, लेकिन आज कुछ और बातें हैं जिन पर लिखना जरूरी है। उत्तरप्रदेश के सांसद वरूण गांधी ने इस हादसे को देखते हुए अपने संसदीय क्षेत्र सुल्तानपुर में सांसद निधि के पांच करोड़ रुपये देकर तुरंत ही एक बाल चिकित्सा केंद्र का काम शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि वे इस काम के लिए अलग-अलग कंपनियों के सामाजिक सरोकार मद से पांच करोड़ रुपये  और जुटाएंगे। इस बात पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि गोरखपुर न केवल उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मठ वाला शहर है, बल्कि वे लगातार पांच बार वहां से सांसद रहे और अब सांसद रहते-रहते मुख्यमंत्री भी बने। अब अगर वे ताजा मौतों को लेकर यह सफाई दे रहे हैं कि यह इलाका हमेशा से ही बीमारियों की वजह से ऐसी मौतों वाला रहा है, तो सवाल यह उठता है कि इतने बरसों तक लगातार सांसद रहते हुए वे अब तक इस बारे में पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर पाए थे? उनके पांच बार के सांसद कार्यकाल में तो पहले भी छह बरस अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केंद्र में थी, और वाजपेयी खुद भी उत्तरप्रदेश से ही सांसद थे। अब अगर सत्ता की इतनी ताकत के रहते हुए योगी आदित्यनाथ अपने ही शहर के लिए कुछ नहीं कर पाए थे, तो इससे उनकी क्षमता पता लगती है। वे सांसद रहते हुए भी हिंदू-मुस्लिम पे्रम संबंधों के खिलाफ एक हिंसक और हमलावर अभियान के अगुवा रहते आए हैं, और उनका निजी संगठन आज भी भाजपा सरकार के रहते हुए भी अलग से एक साम्प्रदायिक और हिंसक कार्रवाई चलाते रहता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका एक साम्प्रदायिक एजेंडा चल रहा है जिसके तहत उत्तरप्रदेश के हर मदरसे को आजादी की सालगिरह पर झंडा फहराकर अपनी देशभक्ति का वीडियो सुबूत बनाकर सरकार को देना है। जाहिर है कि अपने इलाके के बीमार बच्चों, या कि वहां हर बरस फैलने वाली दूसरी बीमारियों को रोकने के बजाय योगी का ध्यान हिंदुत्व को लागू करवाने में लगा हुआ था। आज ही एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह गोरखपुर में ही इंसेफलाइटिस से विकलांग मरीजों के इलाज और पुनर्वास के लिए बने विभाग के ग्यारह कर्मचारियों को सत्ताईस महीने से वेतन नहीं मिला, और वहां से तीन डॉक्टर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। यह हाल केंद्र में मोदी की पार्टी की सरकार आने के तीन बरस बाद का है, उत्तरप्रदेश से नरेन्द्र मोदी के सांसद बनने के ढाई बरस बाद का है, और योगी के मुख्यमंत्री बन जाने के आधे बरस बाद का तो है ही।
हम वरूण गांधी की खबर को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि किसी एक जगह अगर आग लगती है, तो बाकी लोगों को भी अपने-अपने घर संभाल लेने चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें