माणिक सरकार को अब त्रिपुरा के बाहर बाकी दुनिया ने भी पढ़ा

संपादकीय
16 अगस्त 2017


अबकी बार स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह पर भारत में पहली बार एक बात हुई जो कि शायद इसके पहले कभी नहीं हुई थी। त्रिपुरा के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री माणिक सरकार का भाषण दूरदर्शन ने रिकॉर्ड करने और प्रसारित करने से मना कर दिया, और मुख्यमंत्री को बता दिया गया कि उन्होंने जो बातें लिखी हैं उनके साथ उसे प्रसारित नहीं किया जा सकता। दूरदर्शन को नियंत्रित करने वाली केन्द्र सरकार की स्वायत्तशासी संस्था प्रसार भारती की तरफ से मुख्यमंत्री को बताया गया कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों के भावनाओं के अनुरूप बनाएं। माणिक सरकार ने अपने भाषण में कोई फेरबदल करने से मना कर दिया। अब उनकी पार्टी ने वह भाषण सार्वजनिक किया है, और उसके मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए।
त्रिपुरा के एक दुर्लभ साख वाले, बहुत ही किफायत और सादगी से चलने वाले, ईमानदारी के लिए मशहूर मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपने भाषण में आज देश में फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता, और गाय के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों पर किए जा रहे हमलों की चर्चा की है। उन्होंने अनेकता में एकता वाली भारत की संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा कि आज कुछ ताकतें देश को तोडऩे की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने बिना किसी पार्टी या संगठन का नाम लिए हुए यह लिखा जो लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, बल्कि अंग्रेजों के साथ मिलकर जिन्होंने आजादी के आंदोलन का विरोध किया था, आज वे लोग देश की जड़ों पर हमला करके देश को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। उनके भाषण में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद के नाम पर देश में फैलाए जा रहे तनाव के खिलाफ पूरी तरह से अहिंसक और शांतिवादी बातें कही गई हैं।
केन्द्र सरकार के हाथ महज इतना ही तो है कि दूरदर्शन या आकाशवाणी पर किसी मुख्यमंत्री के भाषण को रोक दे। इससे अधिक तो सरकार कुछ कर नहीं सकती। केन्द्र का यह रवैया भी हैरान करने वाला है जिसमें एक मुख्यमंत्री को कहा गया है कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं। यह तो अपना-अपना नजरिया है, भाजपा के कोई मुख्यमंत्री अपने नजरिए से कोई बात कह सकते हैं, वामपंथी मुख्यमंत्री का अपना नजरिया हो सकता है, और कश्मीर में महबूबा की बात किसी तीसरी तरह की हो सकती है। अगर यह कहा जाए कि वे अपने भाषण को लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं, तो यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि किन लोगों की भावनाओं के अनुरूप? माणिक सरकार का भाषण देश के अल्पसंख्यक तबके, दलित और आदिवासी तबके, गरीब और धर्मनिरपेक्ष तबके की भावना के अनुरूप है, और यह आबादी ही देश में आधी से अधिक आबादी है। देश में एक बहुत छोटी आबादी बाकी पूरी आबादी के खान-पान, उसकी देशभक्ति के पैमाने, उसकी भाषा, और उसके पहरावे पर काबू पाने में लगी है। ऐसी ताकतों के बीच माणिक सरकार ने देश को बचाने और एक बनाए रखने की एक समझदारी की बात कही है, जो कि सरकारी रेडियो-टीवी के बिना भी अहमियत रखती है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की जनता से यह सलाह मांगते दिख रहे थे कि वे लालकिले से आजादी की सालगिरह पर अपने भाषण में कौन सी बातों को शामिल करें। और दूसरी तरफ जब देश के एक सबसे अच्छे मुख्यमंत्री ने देश को एक रखने की बात कही, तो उसके भाषण को ही रोक दिया गया! प्रधानमंत्री को यह सोचने की जरूरत है कि उन्होंने सलाह मांगने का जो सार्वजनिक आव्हान किया था, उसका क्या हुआ? देश के संघीय ढांचे में एक राज्य के मुख्यमंत्री की अहिंसक और धर्मनिरपेक्ष बातों को रोक देने का अधिकार केन्द्र को कैसे मिला है, इस बारे में भी प्रधानमंत्री को इसलिए बात करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने लालकिले से भारत के ढांचे को एक कोऑपरेटिव फेडरलिज्म कहा है। अब एक मुख्यमंत्री के भाषण को रोकना किस तरह से एक सहकारी-संघवाद कहा जा सकता है? दरअसल माणिक सरकार की सोच तो उनके राज्य में लोग अच्छी तरह जानते हैं, अब उनके भाषण को रोककर केन्द्र सरकार ने पूरी दुनिया को उनकी वामपंथी सोच को जानने का मौका दिया है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों का हुआ है जिन्हें आलोचना से बचाने के लिए केन्द्र सरकार ने माणिक सरकार को रोका।

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