बाढ़ से निपटने के क्या-क्या तरीके हो सकते हैं भारत में

संपादकीय
17 अगस्त 2017


भारत के बहुत से हिस्सों में हर बरस बड़ी बुरी बाढ़ आती है। और यह बाढ़ भारत के साथ-साथ बांग्लादेश में भी दिखती है जहां भारत से जुड़ी हुई नदियां पहुंचती हैं। दूसरी तरफ अभी बिहार की बाढ़ में आई हुई खबर बताती है कि नेपाल ने वहां बाढ़ को देखते हुए अपने बांध से पानी छोड़ा, और उसकी वजह से बिहार में नौबत और बुरी हो गई। अभी चीन के साथ सरहद पर जो फौजी तनाव चल रहा है, उसके चलते  ऐसी आशंका है कि हथियारों की जंग के पहले चीन वहां से पानी छोड़कर भी एक जंग शुरू कर सकता है। कुल मिलाकर बात यह है कि एक तो कुदरत की नाराजगी, और फिर पड़ोस में बसे हुए देशों से बिगड़े हुए रिश्ते, ये दोनों मिलकर बाढ़ की तबाही को और बुरा कर सकते हैं। साथ-साथ यह भी याद रखने की जरूरत है कि दुनिया में एक्स्ट्रीम वेदर कहे जाने वाली स्थितियां बढ़ती चल रही हैं, यानी अगर बारिश होती है तो अंधाधुंध हो जाती है, ठंड पड़ती है तो कई-कई फीट बर्फ शहरों को दबा देती है, और गर्मी पड़ती है तो लू में सैकड़ों लोग मरने लगते हैं। मौसम की मार के ऐसे दिन हर बरस बढ़ते चले जा रहे हैं, और यह फिक्र छोटी नहीं है, किसी एक देश तक सीमित नहीं है, और सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं है।
लेकिन पूरी दुनिया में मौसम में बदलाव को रोकना तो एक इतना बड़ा अभियान है कि जब तक अमरीका जैसे गैरजिम्मेदार देश मौसम के समझौतों को तोडऩे पर आमादा रहेंगे, तब तक बाकी दुनिया मिलकर भी इस बदलाव को पूरी तरह थाम नहीं सकती। फिर इंसान लगातार ऐसी नौबत ला रहे हैं कि उससे बाढ़ बढ़ती चले। हिन्दुस्तान में ही नदियों के आसपास के जंगल कटते चले जा रहे हैं, और उनकी जड़ों को थामकर रखने वाली मिट्टी ढीली होकर पानी में बहकर नदियों तक पहुंचने लगी है, और नदी की पानी सम्हालने की क्षमता को घटा चुकी है। नतीजा यह है कि बाढ़ बढ़ती जा रही है। फिर इंसान नदियों के किनारों को रेत के लिए खोद रहे हैं, नदियों के बहुत करीब तक जाकर शहर और बस्तियां बसा रहे हैं, और यह मानकर चल रहे हैं कि हर मानसून में सरकार और फौज आकर उन्हें बचाने का अपना जिम्मा पूरा करेंगी।
इस सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पर्यावरण के लिए खतरनाक और अच्छी दोनों तरह की समझी जाने वाली नदी जोड़ योजना पर अभी काम शुरू भी नहीं हुआ है, और भारत की सबसे बड़ी अदालत लाठी लेकर इसे पूरा करवाने में लगी हुई है। नदियों के जोडऩे से पर्यावरण पर कितना फर्क पड़ेगा, इसका अभी अंदाज नहीं है। लेकिन नुकसान से परे एक फर्क यह भी पड़ सकता है कि बाढ़ का अतिरिक्त पानी उन नदियों तक चले जाए जिनके इलाके में बाढ़ नहीं है, बिजली बनाना बढ़ जाए, सिंचाई बढ़ जाए, और हो सकता है कि जल परिवहन शुरू हो जाए। हम आज यहां इस जगह नदी जोड़ परियोजना के नफे-नुकसान पर अधिक खुलासे से चर्चा करना नहीं चाहते क्योंकि इससे बाढ़ के मौजूदा खतरे की बात धरी रह जाएगी। आज भारत में असम और बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ जितनी विकराल दिख रही है, उसका लंबे वक्त के लिए कोई इलाज ढूंढना जरूरी है। हो सकता है कि आबादी को नदियों के किनारे से कुछ दूरी पर ले जाना एक समाधान हो, दूसरा समाधान नदियों को जोडऩे से हो सकता है, और तीसरा समाधान यह हो सकता है कि जिस-जिस इलाके में बाढ़ आती है, वहां पर समय रहते जमीन के भीतर पानी को डालने का काम व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जाए ताकि बिना प्रदूषण भूजल स्तर बढ़ सके। ऐसा तो उन इलाकों में भी होना चाहिए जहां बाढ़ से अधिक तबाही नहीं आती है। जो इलाके डूबते नहीं है, वहां भी जमीन के भीतर बारिश के पानी को डालने के लिए बड़े-बड़े तालाब बनाए जाने चाहिए, और वे ऐसे रास्तों पर हों जहां से होकर पानी नदियों तक जाता है। नदियों में बाढ़ आए, और वे ही इलाके गर्मियों में सूख जाएं, यह एक अदूरदर्शिता की वजह से पैदा होने वाली नौबत है। बारिश और बाढ़ के अतिरिक्त पानी को समंदर तक जाना घटाना चाहिए, और उस पानी का जमीन के भीतर इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसी टुकड़ा-टुकड़ा बहुत सी बातें हैं जिन पर बाढ़ के दौरान सोचा-विचारा जा सकता है।

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