दिग्विजय का एक अनोखा कदम छह महीने की नर्मदा परिक्रमा

संपादकीय
18 अगस्त 2017


मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह सत्ता के बाहर रहते हुए भी कभी खबरों के बाहर नहीं रहते। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद जब 2003 में विधानसभा चुनाव हुए, तो दिग्विजय सिंह दस बरस की सत्ता को खो बैठे, और कांग्रेस को बड़ी शर्मनाक हार हुई। उसके बाद उन्होंने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक फैसला लिया, और अपने आपको दस बरस के लिए चुनावों और सत्ता से परे कर लिया। कांग्रेस संगठन में उन्हें पार्टी के सबसे आक्रामक संघ-विरोधी के रूप में महत्व मिलता रहा, और एक वक्त ऐसा था जब उन्हें राहुल गांधी के राजनीतिक शिक्षक-प्रशिक्षक के रूप में भी देखा जाता था। हालांकि इस कुनबापरस्त पार्टी में जिसके भविष्य की हत्या करनी हो, उसके बारे में ऐसे विशेषण चला देना काफी होता है, और दिग्विजय सिंह के मौजूदा संगठन-पतन के पीछे हो सकता है कि यह भी एक वजह रही हो। जिस कुनबे के लोग अपनी वंशावली की वजह से देश को चलाने के हकदार माने जाते हों, पार्टी के मालिक रहते हों, उन्हें भी किसी से कुछ सीखना पड़ता है, ऐसी अपमानजनक बात कांग्रेस में किसी को आगे नहीं बढ़ा सकती। लेकिन दिग्विजय सिंह को कांग्रेस संगठन ने फिलहाल खारिज सरीखा कर दिया है, और एक-एक करके तमाम राज्यों का जिम्मा उनसे ले लिया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि गोवा में अधिक विधायक होते हुए भी उनकी चूक से वहां कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई, और इसलिए अब उनके प्रभार से सभी राज्य ले लिए जा रहे हैं।
दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह ने यह घोषणा की है कि वे छह महीने की एक नर्मदा परिक्रमा पर निकल रहे हैं, और मध्यप्रदेश से शुरू करके गुजरात तक वे एक गैरराजनीतिक पदयात्रा करेंगे जो कि उनके अपने धार्मिक और आध्यात्मिक उपयोग के लिए होगी। ऐसी खबरें हैं कि उन्होंने इसके लिए पार्टी से छह महीने की छुट्टी मांगी है, और सभी पदों से मुक्त करने का आग्रह किया है। कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि दिग्विजय सिंह अपने प्रदेश में खोई हुई जमीन वापिस पाना चाहते हैं, और वे इस यात्रा के बहाने मध्यप्रदेश और गुजरात की करीब डेढ़ सौ विधानसभा सीटों को विधानसभा चुनावों के पहले छू लेंगे, उनके भीतर से गुजरेंगे, और यह पदयात्रा भोपाल की सत्ता की तरफ वापिसी की यात्रा भी हो सकती है, जो कि अमरकंटक से गुजरात की ओर जाती तो दिखेगी, लेकिन वह अमरकंटक से भोपाल के श्यामला हिल्स पर मुख्यमंत्री निवास की तरफ जाने के मकसद से की जा रही होगी।
दिग्विजय सिंह में कुछ बात तो है जो कि उन्हें मिटने से बचाकर रखती है। वे आरएसएस और हिन्दू साम्प्रदायिकता के इतने कट्टरविरोधी हैं कि वैसी कट्टरता कांग्रेस पार्टी की नीति में भी नहीं दिखती। दूसरी तरफ वे हिन्दू-मुस्लिम सद्भावना के इतने बड़े हिमायती हैं कि वे कई मौकों पर मुस्लिम समाज को बचाते हुए उसकी चापलूसी की तोहमत भी झेल लेते हैं। आज जब पूरे देश में एक बहुत ही हिंसक और आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद फैल चुका है, और फैलाया जा रहा है, तो दिग्विजय सिंह मानो इस बिफरे हुए सांड को सींग से पकड़कर रोकने की कोशिश करते भी दिखते हैं। फिर ऐसा करते हुए उन्हें सोशल मीडिया पर लोग डॉग्विजय सिंह लिखते रहें, या कि पिग्विजय सिंह लिखते रहें, वे उसके परवाह नहीं करते। हमारा ख्याल है कि आक्रामक हिन्दुत्व और हिन्दू साम्प्रदायिकता से लडऩे के मामले में कांग्रेस पार्टी के भीतर दिग्विजय जितना हौसला और किसी का नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि वोटों की राजनीति में कांग्रेस पार्टी एक संगठन के रूप में इतनी आक्रामकता पसंद करती है, या नहीं। यह भी है कि जिस तरह दिग्विजय ने अपने आपको सत्ता से दस बरस के लिए खुद होकर बाहर कर लिया, वैसा कोई फैसला बाकी कांग्रेसी अपने खुद के बारे में कभी पसंद नहीं कर सकते। लेकिन दिग्विजय सिंह का ऐसी लंबी पदयात्रा का फैसला कांग्रेस पार्टी या कि कांग्रेसी सोच के लिए फायदे का हो सकता है, और कांग्रेस पार्टी को यह भी देखना चाहिए कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विचारधारा से मजबूत ऐसे और कौन से नेता हो सकते हैं जो कि पार्टी के लिए इस तरह की मेहनत कर सकें। भाजपा की संगठन की राजनीति में एक शब्द सुनाई पड़ता है, समयदानी। जो लोग पार्टी के काम के लिए अपने एक बरस या उससे कुछ कम समय को देने को तैयार हों। आज भाजपा तो विजयरथ पर सवार चारों तरफ फैल रही है, लेकिन अगर कांग्रेस को अपने अस्तित्व को बचाना है, तो उसे अपने संगठन में अच्छी साख वाले ऐसे समयदानी नेता ढूंढने होंगे जो कि देश के हर हिस्से में जाकर पार्टी की विचारधारा को बताएं, देश के सामने खड़े हुए मौजूदा खतरों को बताएं, और कांग्रेस की जमीन तैयार करें। इस हिसाब से दिग्विजय की यह पहल कांग्रेस के सामने एक अच्छी मिसाल भी हो सकती है कि गांव-गांव तक जाकर किस तरह लोगों से बात की जानी चाहिए।

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