अखबारों को मीडिया के व्यापक दायरे से बाहर निकलना चाहिए

संपादकीय
20 अगस्त 2017


कल अंधेरा होने के बाद उत्कल एक्सप्रेस बेपटरी हुई, करीब दो दर्जन मौतें हुईं, और आबादी के बीच का इलाका होने की वजह से मीडिया अपने कैमरों सहित आनन-फानन वहां पहुंच गई। नतीजा यह हुआ कि बिखरे हुए टूट-फूटे डिब्बों के नीचे से पटरियों और वहां पहले से चल रही, और शायद हादसे के लिए जिम्मेदार भी, मरम्मत के औजारों को दिखा-दिखाकर टीवी समाचार चैनलों के कैमरे अपने दर्शकों को नजारा दिखा रहे थे। कोई टीवी रिपोर्टर पटरियों पर ट्रेन के ब्रेक लगने के निशान छू-छूकर दिखा रहा था, तो उनमें से कई एक-एक औजारों को उठा-उठाकर साबित कर रहे थे कि यहां मरम्मत चल रही थी।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे बड़े रेल हादसे के बाद जब यह जांच शुरू होनी है कि कौन सी बातें इस हादसे के लिए जिम्मेदार रहीं, तो पटरियों के निशान, और औजारों को हटा-हटाकर की जा रही रिपोर्टिंग क्या सुबूतों को चौपट भी करेगी? किसी छोटे से हादसे या छोटे से जुर्म में भी सुबूतों की इज्जत की जाती है, और एक घेरा डालकर उस जगह से सभी लोगों को दूर रखा जाता है। खुले में हुए रेल हादसे में लोगों की जिंदगी बचाना सबसे अधिक जरूरी रहता है, और इसलिए वहां पर ऐसा कोई घेरा नहीं डाला जा सकता, लेकिन क्या अरबों के कारोबार वाले मीडिया में अपने लोगों को इतना सिखाने की जहमत उठाई जा सकती है कि वे सुबूतों के साथ ऐसी छेड़छाड़ न करें? लेकिन आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल यह है कि उसके चैनलों के बीच पल-पल का गलाकाट मुकाबला रहता है। अखबारों में तो चौबीस घंटे में एक बार का मुकाबला रहता है, लेकिन चैनलों में मिनट भर की देरी भी एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के प्रचार में काम आती है। नतीजा यह होता है कि सब कुछ, सबसे पहले, और सबसे अधिक खुलासे से दिखाने की होड़ किसी और बात की इज्जत नहीं छोड़ती।  किसी जुर्म के नजारे को दिखाते हुए आसपास के बच्चों के चेहरे धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों या महिलाओं की शिनाख्त भी कई तरह से उजागर होती रहती है।
अब टीवी चैनलों से परे एक और मीडिया आगे बढ़ रहा है जो कि इंटरनेट का इस्तेमाल करता है, और वहां पर सबसे पहले खबरों को डालने के मुकाबले में लगा हुआ है। वेब-आधारित मीडिया को टीवी चैनलों की तरह किसी उपग्रह की जरूरत भी नहीं पड़ती, और न ही महंगे या बड़े कैमरों की। नतीजा यह होता है कि एक मोबाइल फोन से रिकॉर्डिंग भी हो जाती है, और तस्वीरें या वीडियो पोस्ट भी हो जाते हैं। इनकी हड़बड़ी टीवी चैनलों से भी अधिक होती है, और एक समय पत्रकारिता जिस तरह की जिम्मेदारी का काम होता था, सामाजिक सरोकार और नीति-सिद्धांत का काम होता था, वह अब कमजोर होते-होते पहले तो मीडिया बना, और अब वह मीडिया और सोशल मीडिया के बीच की एक नई संकर-नस्ल बन गया है जो पूरी तरह से बेकाबू है, और जवाबदेही से भी परे है। अखबारों में एक वक्त छपकर प्रेस से निकल चुके पन्ने पुख्ता सुबूत रहते थे, और गलती की कतरनें पूरी जिंदगी मुंह चिढ़ाती थीं, वह नौबत अब वेब-आधारित खबरों से गायब हो गई है, क्योंकि पहले पोस्ट करो, फिर जांचों-परखो के दौर में अपनी जानकारी गलत मिलने पर लोग बिना किसी सफाई के, सीधे पोस्ट हटा देते हैं, और बात को आई-गई मान लेते हैं।
इसलिए कम से कम छपे हुए मीडिया को अपने पुराने नाम, प्रेस, या अखबारनवीसी, या पत्रकारिता की तरफ लौटना चाहिए। इसके बाद आज इस्तेमाल हो रहे मीडिया शब्द को बाकी तमाम लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए, ताकि वे टीवी के लिए या कि इंटरनेट के लिए इसका मनचाहा इस्तेमाल करें। अखबारनवीसी एक वक्त बड़ी जिम्मेदारी और बड़ी इज्जत का काम माना जाता था, फिर चाहे वह चौबीस घंटे में महज एक बार समाचार-विचार देता था। अखबारों को अपने उसी रूख की तरफ लौटना चाहिए क्योंकि छपे हुए शब्द आज भी अधिक जिम्मेदारी के साथ तय होते हैं, फिर चाहे उन्हीं अखबारों के वेब-संस्करण गैरजिम्मेदारी से क्यों न बनते हों। आज मीडिया नाम के एक बहुत ही व्यापक दायरे से प्रेस को बाहर निकल जाना चाहिए, और अपनी पुरानी पहचान बनाकर, पुराने तौर-तरीकों से, अधिक ईमानदार काम करना चाहिए।

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