गोरखपुर की मौतों से भी कुछ सीखा नहीं छत्तीसगढ़ ने

संपादकीय
21 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, राजधानी के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, में ऑक्सीजन की गड़बड़ी से तीन बच्चों की मौत की खबर है, और स्वास्थ्य विभाग के अफसर अस्पताल की गड़बड़ी को छुपाने में लग गए हैं। स्वास्थ्य सचिव को आनन-फानन प्रेस कांफ्रेंस लेनी पड़ी, और उसमें यही उजागर हुआ कि वे मीडिया को सफाई तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें खुद पूरी जानकारी नहीं है। दूसरी बात यह कि सरकार ने इसी विभाग के अफसरों को जांच का जिम्मा दिया है, जिनके मातहत ये मौतें हुई हैं। तीसरी बात यह कि स्वास्थ्य सचिव ने किसी भी जांच के शुरू होने के पहले ही अस्पताल और विभाग को एक तरह से क्लीन चिट दे दी, ऐसे में किसी जांच से हकीकत सामने आने की संभावना बुरी तरह मार खाती है।
जिन लोगों को प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में जाने की नौबत आती है, वे इसे नर्क सरीखा पाते हैं। और यह अस्पताल प्रदेश के सबसे ताकतवर लोगों के आने-जाने के रास्ते में है, मुख्यमंत्री-राज्यपाल से लेकर मंत्री और सचिव तक यहां आते-जाते हैं, और इसकी बदहाली इस बात का सुबूत है कि प्रदेश के बाकी सरकारी अस्पताल इसके मुकाबले और खराब हालत में होंगे। आज की इन मौतों के बाद सिलेंडर-कर्मचारी को शराबी और नशे में होने की वजह से निलंबित किया गया है, और यह हाल अस्पताल में सैकड़ों डॉक्टर-कर्मचारियों का है जो कि निलंबित किए जाने के लायक हैं। दरअसल प्रदेश के ताकतवर लोगों के अपने इलाज के लिए सरकार ने निजी अस्पतालों मेें खर्च करने की छूट दे रखी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि सरकारी अफसर, मंत्री, और सरकारी खर्च पर इलाज पाने वाले बाकी लोग अपने और अपने परिवार के लिए सरकारी इलाज के मोहताज नहीं रह गए हैं, और सरकारी अस्पतालों को ऐसा लगता है कि एक सोची-समझी साजिश के तहत बर्बाद किया जा रहा है ताकि सरकार के सैकड़ों करोड़ रूपए निजी अस्पतालों को दिए जा सकें।
ऑक्सीजन की कमी या गड़बड़ी से मौत होने की नौबत इसलिए नहीं आनी चाहिए थी कि अभी-अभी उत्तरप्रदेश में एक बड़ा जुर्म हुआ है, और साठ बच्चे मारे गए हैं। उस घटना से पूरे देश के बाकी सरकारी अस्पतालों को एक सबक लेना था।  पिछले हफ्ते गोरखपुर पर लिखते हुए हमने इसी जगह आधा दर्जन बार छत्तीसगढ़ के बारे में भी सरकार को सचेत किया था। हमारे नियमित पाठकों ने पढ़ा होगा-
...छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।...
...सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी  बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।...
...छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है।...
ऊपर के ये सारे पैराग्राफ हमने पिछले हफ्ते-दस दिन में इसी जगह लिखे थे, और उन्हें आज फिर दुहराने की जरूरत लग रही है। अस्पताल के इस ताजा हादसे की जांच तो हो जाएगी, और उसमें भी कुसूरवार को बचाने की पूरी कोशिश भी हो जाएगी, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों के हाल सुधारने के लिए अगर कोई गंभीर कोशिश नहीं होगी, तो सरकार को यह बात समझ लेना चाहिए कि सरकारी अस्पताल से भुगत कर लौटने वाले लोग इतने जख्मी होकर आते हैं कि अगले चुनाव तक उनके जख्म सूखेंगे नहीं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन उस्ताद बिस्मिला खां और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. कितनी शर्मनाक स्थिति है यह, देश के सरकारी अस्पतालों की इस दुखद अवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा मिलनी चाहिए और इसकी जानकारी देश के हर अख़बार तक जानी चाहिए

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