पत्रकारिता के नाम पर विश्वविद्यालय, राष्ट्रवादी पशुपालन प्रशिक्षण केन्द्र

संपादकीय
24 अगस्त 2017


अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से भोपाल में चल रही माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में एक अनोखा फैसला लिया है, और विश्वविद्यालय के अहाते में दो एकड़ जमीन पर गौशाला बनाना शुरू किया है। विश्वविद्यालय के कुलपति एक बहुत सक्रिय हिन्दुत्ववादी हैं, और उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के नए बन रहे परिसर में पचास एकड़ जमीन जिसमें से दो एकड़ का कोई उपयोग नहीं सूझ रहा था, इसलिए वहां पर गौशाला बनाना शुरू कर दिया गया है।
मध्यप्रदेश का यह विश्वविद्यालय और छत्तीसगढ़ का इसी की तर्ज पर नए राज्य बनने के बाद बनाया गया कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय मप्र-छत्तीसगढ़ में भाजपा राज आने के बाद से लगातार एक-दूसरे से मुकाबले में है कि कहां पर आक्रामक राष्ट्रवादी हिन्दुत्व को अधिक बढ़ाया जा सकता है। दोनों ही विश्वविद्यालयों में लगातार ऐसी सोच के लोग कुलपति मनोनीत किए गए, और इन दोनों के कार्यक्रमों की लिस्ट देखें, तो छांट-छांटकर देश भर से ऐसे लोगों को यहां बुलाया गया जो कि भाजपा और हिन्दुत्व का अभियान चलाने की पत्रकारिता करते आए हैं, और घोषित रूप से भी इन विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादिता के बैनर तले कार्यक्रम करवाए जाते रहे हैं। हम छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को उसकी स्थापना के समय से करीब से देखते आ रहे हैं, और इसने राष्ट्रवाद की एक हिन्दुत्ववादी सोच को बढ़ाने के अलावा कोई योगदान नहीं दिया, पत्रकारिता में तो इसका योगदान शून्य से भी नीचे, नकारात्मक रहा। उसकी वजह यह है कि जब तक छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों के तहत पत्रकारिता विभाग चलते थे, वे विश्वविद्यालयों की एक गैरराजनीतिक और गैरसाम्प्रदायिक सोच के मुताबिक विषय की पढ़ाई करवाते थे। जब से पत्रकारिता के पढ़ाई के नाम पर बिना जरूरत विश्वविद्यालय नाम का हाथी पाला गया, उस पर सरकार का खर्च हुए जा रहा है, और वहां से कोई पत्रकार बनकर निकल नहीं रहे हैं। हमारा ख्याल है कि अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जब पत्रकारिता की पढ़ाई होती थी, तो छत्तीसगढ़ के मीडिया को भी यहां से निकले हुए कुछ अच्छे पत्रकार मिल जाते थे, लेकिन अब वहां से निकले हुए लोगों के पास पत्रकारिता का हुनर तो नहीं होता, उनके दिमाग पर राष्ट्रवाद की टोकरी जरूर लदी होती है।
हम अगर जनता के पैसों पर चलने वाले छत्तीसगढ़ के इस पत्रकारिता विश्वविद्याय को देखें तो इसे पचास एकड़ से अधिक की जगह मिली हुई है, और करोड़ों रूपए साल का खर्च हो रहा है। यहां के छात्र-छात्राओं की गिनती इतने बरसों में भी कुछ सौ से अधिक नहीं पहुंच पाई है, और इनमें से जानकार लोगों का यह मानना है कि दूसरे प्रदेश से यहां आकर दाखिला लेने, और फिर सीधे इम्तिहान देने वाले छात्र-छात्रा बड़ी संख्या में हैं, जिन्हें न विश्वविद्यालय से कोई फायदा होता, और न ही जिनसे पत्रकारिता का कुछ भला होता। दरअसल एक विचारधारा के विस्तार के लिए, और उस विचारधारा के लिए समर्पित लेखक-पत्रकारों को उपकृत करने के लिए यह विश्वविद्यालय चलाया जा रहा है, और पत्रकारिता जैसे पेशेवर विषय, ऐसी संभावनाओं वाले विषय को पढ़ाने के बजाय इसे डिग्री देने वाले एक बहुत महंगे सरकारी छापाखाना बनाकर रख दिया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार को अपने इस विश्वविद्यालय के बारे में सोचना चाहिए, और मध्यप्रदेश सरकार से तो कुछ उम्मीद करना फिजूल इसलिए है कि दूध, गोमूत्र, और गोबर के माध्यम से पत्रकारिता सिखाने की निर्वाचित सरकार की कोशिश इस विश्वविद्यालय के डिग्री की रही-सही इज्जत भी खत्म कर देगी।
दरअसल जब कभी सत्ता की ऐसी विचारधारा शैक्षणिक संस्थाओं पर थोपी जाती है, और फिर उसके ऊपर धर्मान्धता और राष्ट्रवादिता का बोझ भी लाद दिया जाता है, तो वहां पर पढ़ाई का हाल वैसा ही होगा, जैसा गोरखपुर के अस्पताल में बच्चों का हुआ, या जैसा छत्तीसगढ़ की गौशालाओं में गायों का हुआ। कल के दिन केन्द्र सरकार मध्यप्रदेश सरकार के इस विश्वविद्यालय से प्रेरणा पाकर इसरो में भी गौशाला खोल दे, और वैज्ञानिकों के लिए यह तय कर दे कि रॉकेट केवल ऐसे बनाए जाएं जो कि गोमूत्र से चलें, तो हिन्दुस्तान तेज रफ्तार से सैकड़ों बरस पीछे जरूर चले जाएगा, रॉकेट चाहे धरती से सौ फीट भी ऊपर न जा सके। आज गोमूत्र और गोबर को तिलस्म की तरह पेश करने का जो बावलापन चला हुआ है, वह देश के ज्ञान-विज्ञान और देश की सोच को तबाह करके रख देगा, अगर यह बावलापन कुछ और बरस जारी रहा तो। पत्रकारिता न सिखाकर गौपालन सिखाना परले दर्जे की रद्दी सोच है, और दुनिया का इतिहास ऐसे विश्वविद्यालयों से बना नहीं है। यही वजह है कि केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को इस बात पर गौरव है और वे अपनी तस्वीर बेटी के साथ पोस्ट कर रहे हैं कि वह अमरीका के एमआईटी में पढऩे जा रही है। क्या आज देश के ताकतवर नेता, खरबपति कारोबारी, और कामयाब पेशेवर लोगों में से कोई भी अपनी संतानों को माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय या कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पढऩे भेजेंगे? यहां आने वाले गरीब या मध्यमवर्गीय छात्र-छात्राओं की जिंदगी तबाह करने पर आमादा ऐसे विश्वविद्यालयों के खिलाफ न सिर्फ स्थानीय जनमत तैयार होना चाहिए, बल्कि उनके खिलाफ जनहित याचिका भी लगानी चाहिए।

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