अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से मुंह चुराती हरियाणा सरकार और फौज के घेरे में कोर्ट

संपादकीय
25 अगस्त 2017


हरियाणा की अदालत जरा देर में राम रहीम नाम के एक सामुदायिक गुरू के एक आपराधिक मामले में फैसला सुनाने जा रही है। यह राम रहीम के बहुत से मामलों में से एक है, और बलात्कार के आरोप वाले इस मामले से परे कहीं कत्ल का कोई मामला, तो कहीं लोगों को नपुंसक बनाने का मामला, ऐसे कई और अपराध उसके नाम पर दर्ज हैं जिन पर फैसले आने अभी बाकी हैं। आज जरा देर में बलात्कार के मामले में फैसला आने वाला है, और फैसला राम रहीम के खिलाफ जाने की आशंका में उनके लाखों भक्तजन अदालत के शहर में डेरा डाल चुके हैं, और हाईकोर्ट के बहुत ही कड़े रूख और हुक्म के बावजूद हरियाणा के पुलिस प्रमुख इस गैरकानूनी भीड़ को हटाने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं। पंचकुला में पहले से प्रतिबंधात्मक धारा लागू है, और चार से अधिक लोगों का इक_ा होना गैरकानूनी है, लेकिन पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में गुरमीत राम रहीम की पकड़ को देखते हुए निर्वाचित सरकारों की बोलती बंद है, और हरियाणा में तो वैसे भी भाजपा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर राम रहीम के प्रशंसक हैं। इसलिए हाईकोर्ट के कड़े रूख और बर्खास्तगी की चेतावनी के बावजूद प्रदेश के पुलिस प्रमुख ने किसी को नहीं हटाया, और पंचकुला मानो आज बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। बाबा के समर्थक कहने को तो अब तक शांत हैं, लेकिन भक्तों को नापसंद कोई फैसला आने पर दसियों हजार सुरक्षा कर्मचारियों की मौजूदगी भी हालात को शायद ही काबू में रख सके। नौबत इतनी खराब है कि अदालत के इलाके को फौजी छावनी की तरह बना दिया गया है, और हिन्दुस्तानी फौज को भी वहां लाकर रखा गया है। 
भारतीय राजनीति में धर्म, आध्यात्म, और जाति संगठनों के नेताओं के वोटरों पर दबदबे के चलते हुए उनके जुर्म पर सरकारें कुछ करना नहीं चाहतीं। फिर यह भी है कि मुख्यमंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्रियों तक ऐसे लोगों की पकड़ इतनी रहती है कि आमतौर पर किसी जांच एजेंसी और किसी जांच अधिकारी का हौसला भी इनको कटघरे तक ले जाने का नहीं हो पाता। और ऐसा ही सामाजिक दबाव, शायद राजनीतिक दबाव भी, अदालत के जज पर भी आता है जो अपने अहाते के बाहर लाखों लोगों के बागी और हिंसक तेवर के खतरे को देखते हुए भी फैसला देने के दबाव में रहते हैं। यह नौबत शर्मनाक है क्योंकि लोकतंत्र में सरकारों को अदालत से लात खाए बिना भी अपना काम करना सीखना चाहिए। आज लाखों लोगों की मौजूदगी के बाद अगर किसी तरह की हिंसा शुरू होती है, तो उसके लिए पूरी तरह ऐसी भीड़ और उससे भी अधिक हरियाणा की सरकार जिम्मेदार रहेगी। लोगों को याद होगा कि छह दिसंबर 1992 को जब बावरी मस्जिद गिराई गई थी, तो उसके पहले भी वहां के भाजपा मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अदालत को यह हलफनामा दिया था कि मस्जिद की सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी है। और उसके बाद मानो सरकारी हिफाजत में दसियों हजार कारसेवकों ने बावरी मस्जिद की ईंट से ईंट बजा दी, पूरे ढांचे को गिरा दिया, और सरकार हाथ पर हाथ धरे देखती रही। हमारा मानना है कि बेकाबू भीड़ की आशंका को देखते हुए सरकारों को पहले से कार्रवाई करनी चाहिए, न कि भीड़ आ जाने के बाद असहाय की तरह हाथ बांधे खतरा खड़े होने देने के। 
भारत की अदालतों के जज भी इसी समाज में रहते हैं, और वे अपनी जिंदगी के लिए, नौकरी के लिए, सहूलियतों के लिए तरह-तरह से सरकार और समाज पर निर्भर भी करते हैं। ऐसे में ऐसा भयानक सामाजिक तनाव उनके फैसले को प्रभावित कर सकता है। इसलिए हमारा मानना है कि संविधान के प्रति जवाबदेह सरकारों को अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, न कि अयोध्या और पंचकुला जैसी नौबत लाकर जुर्म होने देना चाहिए। अभी खबर आ रही है कि पंचकुला की अदालत के बाहर सेना को तैनात किया गया है, और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट लगातार इस मामले को देखकर छोटी-छोटी बातों पर हुक्म देने के लिए मजबूर हो गया है। जब अदालत को किसी प्रदेश और शहर के प्रशासन को चलाने के लिए खुद लाठी उठाकर सरकार को चेतावनी देनी पड़े, और भीड़ को चेतावनी देनी पड़े, तो वह निर्वाचित सरकार के लिए डूब मरने की बात है। हरियाणा की खट्टर सरकार के लिए यह एक शर्मनाक दिन है कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारी को हाईकोर्ट ढो रहा है, और राज्य सरकार ने ऐसी विस्फोटक नौबत लाकर खड़ी की है। लोकतंत्र में चुनावी राजनीति के लिए भीड़ के तुष्टिकरण की यह एक शर्मनाक मिसाल है, और देश की बाकी सरकारें इस नौबत से नसीहत ले सकती हैं। जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं उस वक्त मौके पर तनाव बना हुआ है, और कल शायद इस मुद्दे पर हमें फिर लिखने की जरूरत आए।

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